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- 13h ago
नई दिल्ली/लखनऊ। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने सोमवार को अपने आठ उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। 16 अक्टूबर को होने वाले चुनाव के लिए जारी इस सूची ने सिर्फ राज्यसभा के समीकरण नहीं बदले, बल्कि भाजपा के संगठन और केंद्र सरकार में संभावित बदलावों को लेकर भी राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है।
भाजपा ने धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया है। खास बात यह है कि यूपी से भाजपा के जिन मौजूदा राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उनमें से किसी को भी इस सूची में दोबारा जगह नहीं मिली।
सबसे ज्यादा ध्यान दो नामों पर गया है—केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बी.एल. वर्मा। दोनों इस समय केंद्र सरकार में मंत्री हैं और यूपी से राज्यसभा सदस्य हैं, लेकिन भाजपा ने उन्हें इस बार दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया है। दोनों का मौजूदा कार्यकाल नवंबर में समाप्त होना है।
यही वजह है कि अब राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या यह सिर्फ राज्यसभा टिकटों में बदलाव है या भाजपा की आने वाली बड़ी संगठनात्मक और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी है?
हालांकि, अभी तक भाजपा या केंद्र सरकार की ओर से किसी मंत्री को हटाने या मंत्रिमंडल में बदलाव की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए संभावित कैबिनेट फेरबदल की चर्चा को फिलहाल राजनीतिक अटकल के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
भाजपा की सूची का सबसे बड़ा संदेश यही है कि पार्टी ने इस बार यूपी से राज्यसभा जाने वाले चेहरों में बड़ा बदलाव किया है।
मौजूदा सदस्यों को दोबारा टिकट देने के बजाय पार्टी ने प्रदेश संगठन, राज्य सरकार और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े नेताओं को आगे किया है।
सूची में उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री धर्मपाल सिंह का नाम है। इसके अलावा प्रदेश संगठन से जुड़े प्रकाश पाल और राम प्रताप सिंह चौहान जैसे नेताओं को भी राज्यसभा के लिए चुना गया है।
पूर्व सांसद प्रियंका सिंह रावत और श्रुति गंगवार को भी उम्मीदवार बनाया गया है।
यानी पार्टी ने राज्यसभा की सूची में ऐसे चेहरों को प्राथमिकता दी है जिनका यूपी की राजनीति और संगठन से सीधा संबंध है।
आठ नामों की घोषणा के बाद सबसे ज्यादा चर्चा केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी को लेकर हो रही है।
पुरी भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल रहे हैं। ऐसे में उनका यूपी से दोबारा राज्यसभा उम्मीदवार न बनाया जाना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है।
लेकिन यहां एक अंतर समझना जरूरी है।
राज्यसभा का टिकट न मिलना अपने आप में केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर होने का प्रमाण नहीं है।
यदि किसी मंत्री की राज्यसभा सदस्यता समाप्त होती है, तब भी उसके राजनीतिक भविष्य के अन्य रास्ते हो सकते हैं। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पुरी की मंत्री पद से विदाई तय है।
फिलहाल तथ्य इतना है कि भाजपा ने उन्हें यूपी से दोबारा राज्यसभा उम्मीदवार नहीं बनाया है।
दूसरा महत्वपूर्ण नाम बी.एल. वर्मा का है।
वर्मा भी केंद्र सरकार में मंत्री हैं और यूपी से राज्यसभा सदस्य हैं। भाजपा ने उन्हें भी इस बार दोबारा टिकट नहीं दिया।
इससे यह सवाल और बड़ा हो गया है कि क्या केंद्र सरकार में आने वाले समय में कुछ जिम्मेदारियों का पुनर्विन्यास देखने को मिल सकता है?
लेकिन फिलहाल इस बारे में कोई आधिकारिक संकेत नहीं है।
बी.एल. वर्मा का राजनीतिक आधार और संगठन में उनकी भूमिका अलग-अलग स्तर पर रही है। इसलिए यह भी संभव है कि पार्टी उनके लिए आगे कोई अन्य संगठनात्मक या राजनीतिक भूमिका तय करे।
राज्यसभा की एक सीट का खत्म होना राजनीतिक भूमिका के खत्म होने के बराबर नहीं होता।
भाजपा की इस पूरी सूची को समझने के लिए 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सबसे महत्वपूर्ण संदर्भ है।
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है। ऐसे में राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन को केवल दिल्ली की राजनीति से जोड़कर देखना अधूरा होगा।
भाजपा के सामने राज्य में संगठन को मजबूत बनाए रखने, अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।
नई सूची में यही सामाजिक और संगठनात्मक गणित दिखाई देता है।
रिपोर्टों के मुताबिक आठ उम्मीदवारों में तीन ओबीसी, दो अनुसूचित जाति और तीन सामान्य वर्ग से हैं। दो महिला उम्मीदवारों को भी जगह मिली है।
यह प्रतिनिधित्व 2027 की चुनावी राजनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है।
भाजपा की राजनीति में उत्तर प्रदेश का ओबीसी वोट बैंक लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है।
नई सूची में ओबीसी प्रतिनिधित्व को जगह दी गई है। प्रकाश पाल को उम्मीदवार बनाए जाने को इस दृष्टि से भी देखा जा रहा है। वे भाजपा के ओबीसी मोर्चा से जुड़े रहे हैं।
इसी तरह धर्मपाल सिंह भी पिछड़े वर्ग के प्रभावशाली सामाजिक आधार से आते हैं।
इससे यह संदेश जाता है कि पार्टी राज्यसभा के माध्यम से भी सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखना चाहती है।
भाजपा ने इस बार यूपी से राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में दो महिलाओं को जगह दी है।
प्रियंका सिंह रावत और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया गया है। प्रियंका सिंह रावत पूर्व सांसद हैं, जबकि श्रुति गंगवार पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार की बेटी हैं।
महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी यह सूची महत्वपूर्ण है।
खास तौर पर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में राज्यसभा उम्मीदवारों का चयन केवल जातीय गणित तक सीमित नहीं रहता। क्षेत्र, संगठन, महिला प्रतिनिधित्व और चुनावी उपयोगिता जैसे कई पहलू इसमें शामिल होते हैं।
श्रुति गंगवार का नाम सामने आने के बाद राजनीतिक चर्चा में एक और पहलू जुड़ गया है।
वह पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार की बेटी हैं। ऐसे में भाजपा ने एक राजनीतिक परिवार से आने वाले चेहरे को भी राज्यसभा के लिए आगे किया है।
यह फैसला पार्टी की उस रणनीति को भी दिखाता है जिसमें अनुभवी राजनीतिक परिवारों से जुड़े चेहरों और संगठन के सक्रिय नेताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा सकती है।
प्रियंका सिंह रावत उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहले भी सक्रिय भूमिका निभा चुकी हैं और पूर्व सांसद रही हैं।
राज्यसभा के जरिए उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में फिर से भूमिका मिल सकती है।
उनकी उम्मीदवारी यह भी बताती है कि भाजपा ने पूरी सूची में सिर्फ नए और अपरिचित चेहरों पर निर्भरता नहीं दिखाई, बल्कि ऐसे नेताओं को भी चुना है जिनके पास चुनावी और संगठनात्मक अनुभव है।
प्रकाश पाल का नाम भी इस सूची में महत्वपूर्ण है।
वे भाजपा के ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। ऐसे में राज्यसभा के लिए उनका चयन संगठन के भीतर उनकी भूमिका को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाने वाला कदम माना जा सकता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओबीसी मतदाताओं की भूमिका को देखते हुए यह नियुक्ति आने वाले विधानसभा चुनाव के संदर्भ में भी चर्चा में रहेगी।
उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री धर्मपाल सिंह को राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने से एक और सवाल उठता है—क्या इससे राज्य सरकार और संगठन के बीच जिम्मेदारियों का नया बंटवारा हो सकता है?
धर्मपाल सिंह का राज्यसभा जाना केवल संसद की सीट से जुड़ा बदलाव नहीं होगा। इसके साथ उत्तर प्रदेश सरकार में उनकी मौजूदा भूमिका को लेकर भी आगे सवाल उठ सकते हैं।
हालांकि अभी पार्टी ने उनकी वर्तमान जिम्मेदारी को लेकर कोई अलग घोषणा नहीं की है।
इसलिए इसे फिलहाल संभावित राजनीतिक बदलाव के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
राज्यसभा चुनाव की घोषणा से पहले भाजपा के संभावित उम्मीदवारों को लेकर कई बड़े नाम चर्चा में थे।
इनमें स्मृति ईरानी और वरुण गांधी के नाम भी प्रमुखता से सामने आए थे। कुछ रिपोर्टों में दोनों को यूपी से राज्यसभा भेजे जाने की संभावना पर चर्चा हुई थी।
लेकिन भाजपा की अंतिम सूची में दोनों के नाम नहीं हैं।
इससे यह साफ हो गया कि शुरुआती चर्चाओं और पार्टी के अंतिम फैसले में अंतर रहा।
स्मृति ईरानी को लेकर इसलिए भी चर्चा थी क्योंकि वह भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख चेहरा रही हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से हारने के बाद राज्यसभा के जरिए संसद में वापसी की संभावनाओं पर अटकलें लगती रही थीं।
लेकिन सोमवार की अंतिम सूची ने फिलहाल उस संभावना को समाप्त कर दिया है—कम से कम उत्तर प्रदेश की इस राज्यसभा चुनाव सूची के संदर्भ में।
वरुण गांधी का नाम भी संभावित उम्मीदवारों में चर्चा में था। चुनाव से पहले कई राजनीतिक रिपोर्टों में उनके नाम को लेकर अटकलें थीं।
लेकिन भाजपा ने आठ नामों की अंतिम सूची में उन्हें शामिल नहीं किया।
इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी राजनीतिक भूमिका को लेकर पार्टी ने कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक कर दिया है। इतना जरूर है कि 16 अक्टूबर के यूपी राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा की ओर से उनके नाम पर दांव नहीं लगाया गया है।
राज्यसभा चुनाव से पहले भाजपा के संभावित नामों को लेकर कई रिपोर्टें सामने आई थीं। इनमें स्मृति ईरानी, वरुण गांधी, हरदीप सिंह पुरी, कुमार विश्वास, हरीश द्विवेदी समेत कई नामों पर चर्चा हुई थी।
लेकिन अंतिम फैसला आठ उम्मीदवारों के पक्ष में हुआ।
यह भाजपा की केंद्रीय चुनाव प्रक्रिया की एक खासियत भी दिखाता है कि शुरुआती पैनल और अंतिम सूची अलग हो सकती है।
अंतिम निर्णय में संगठनात्मक जरूरत, सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और आने वाले चुनावों को ध्यान में रखा जा सकता है।
यही सबसे बड़ा सवाल है।
हरदीप पुरी और बी.एल. वर्मा दोनों केंद्रीय मंत्री हैं। दोनों को दोबारा राज्यसभा उम्मीदवार न बनाए जाने से कैबिनेट फेरबदल की चर्चा शुरू होना स्वाभाविक है।
लेकिन अभी तक उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में ऐसा कोई फैसला घोषित नहीं किया गया है।
इसलिए फिलहाल तीन संभावनाओं को अलग-अलग समझना जरूरी है।
दोनों मंत्रियों को किसी अन्य राज्य से राज्यसभा भेजा जा सकता है या संसद में बने रहने के लिए कोई अन्य संवैधानिक/राजनीतिक रास्ता निकाला जा सकता है।
पार्टी उन्हें संगठन या किसी अन्य राजनीतिक जिम्मेदारी में इस्तेमाल कर सकती है।
आने वाले समय में केंद्र सरकार में बदलाव हो सकता है और कुछ जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण किया जा सकता है।
इनमें से कौन सा रास्ता अपनाया जाएगा, यह भाजपा के अगले फैसलों से ही स्पष्ट होगा।
उत्तर प्रदेश में इस बार राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चुनाव होना है।
भाजपा के पास विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए आठ सीटों पर जीत की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। समाजवादी पार्टी ने राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाया है।
इसलिए भाजपा ने अपने हिस्से की संभावित आठ सीटों के लिए उम्मीदवारों का ऐलान किया है।
चुनाव 16 अक्टूबर को होगा। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है, 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 9 अक्टूबर तक नाम वापस लिए जा सकेंगे। मतदान 16 अक्टूबर को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा और उसी दिन मतगणना होगी।
इस चुनावी गणित में पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा की राज्यसभा सीट भी महत्वपूर्ण है।
दिनेश शर्मा ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल नियुक्त होने के बाद राज्यसभा से इस्तीफा दिया था। उनकी सीट 11 सितंबर से खाली हुई थी।
इस तरह इस चुनाव में केवल नियमित कार्यकाल समाप्त होने वाली सीटें ही नहीं, बल्कि यह रिक्त सीट भी चुनावी गणित का हिस्सा है।
नई सूची को देखने पर एक बात खास तौर पर सामने आती है—भाजपा ने राज्यसभा को प्रदेश संगठन के नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर लाने के लिए भी इस्तेमाल किया है।
प्रकाश पाल, राम प्रताप सिंह चौहान और प्रियंका सिंह रावत जैसे नाम यूपी संगठन और प्रदेश की राजनीति से जुड़े रहे हैं।
इससे संकेत मिलता है कि भाजपा राज्यसभा में ऐसे चेहरों की संख्या बढ़ाना चाहती है जो सीधे प्रदेश संगठन के अनुभव से आते हैं।
यानी इस बार राज्यसभा का टिकट सिर्फ वरिष्ठ नेताओं को संसद में बनाए रखने का माध्यम नहीं बना, बल्कि संगठन के सक्रिय नेताओं के राजनीतिक विस्तार का रास्ता भी बना।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होना है।
ऐसे में राज्यसभा उम्मीदवारों की सामाजिक संरचना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ओबीसी, अनुसूचित जाति, सामान्य वर्ग और महिला प्रतिनिधित्व का संतुलन पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि राज्यसभा की सूची अकेले 2027 की पूरी रणनीति को साबित नहीं करती। चुनावी रणनीति में उम्मीदवार चयन के अलावा बूथ संगठन, गठबंधन, स्थानीय नेतृत्व, मुद्दे और चुनाव प्रचार जैसे कई अन्य तत्व भी होते हैं।
फिर भी, उम्मीदवारों की सामाजिक और संगठनात्मक पृष्ठभूमि से पार्टी की प्राथमिकताओं के बारे में संकेत जरूर मिल सकते हैं।
भाजपा ने इस बार एक तरह से यूपी में राज्यसभा के पुराने चेहरों को बदलने का फैसला किया है।
यह बदलाव पार्टी की नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
इसके साथ ही यह भी संभव है कि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कुछ नेताओं को दूसरी भूमिकाओं में इस्तेमाल करना चाहती हो।
राजनीतिक दलों में राज्यसभा की सीटें अक्सर संगठनात्मक संतुलन, चुनावी रणनीति और नेतृत्व प्रबंधन का माध्यम भी बनती हैं।
इसलिए आठ उम्मीदवारों की सूची को केवल आठ नामों की घोषणा के रूप में देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं बताएगा।
यूपी की सूची आने के बाद भाजपा के अंदर और बाहर सबसे ज्यादा निगाहें अब दिल्ली की ओर हैं।
क्या केंद्र सरकार में कोई फेरबदल होगा?
क्या हरदीप पुरी को कोई नई जिम्मेदारी मिलेगी?
क्या बी.एल. वर्मा की भूमिका बदलेगी?
क्या संगठन में कुछ वरिष्ठ नेताओं को नई जिम्मेदारियां मिलेंगी?
क्या उत्तर प्रदेश सरकार और संगठन में भी कुछ बदलाव होंगे?
इन सभी सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।
राजनीतिक रूप से देखें तो भाजपा की राज्यसभा सूची ने पहला संकेत दे दिया है।
लेकिन इस सूची का वास्तविक असर तब सामने आएगा जब पार्टी अगले चरण में अपनी सरकार और संगठन को लेकर फैसले करेगी।
यदि आने वाले दिनों में केंद्रीय मंत्रिमंडल में बदलाव होता है तो आज की राज्यसभा सूची को उस बड़े घटनाक्रम की शुरुआती कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।
अगर ऐसा कोई बदलाव नहीं होता, तो यह सूची मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक और सामाजिक प्रतिनिधित्व के पुनर्संतुलन के रूप में देखी जाएगी।
यानी अभी कहानी का अगला अध्याय बाकी है।
भाजपा की यूपी राज्यसभा सूची से फिलहाल कई बातें सामने आती हैं—
पहला, पार्टी ने किसी भी मौजूदा भाजपा राज्यसभा सदस्य को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया।
दूसरा, दो केंद्रीय मंत्रियों—हरदीप सिंह पुरी और बी.एल. वर्मा—को टिकट नहीं मिला।
तीसरा, संगठन और प्रदेश की राजनीति से जुड़े चेहरों को जगह मिली।
चौथा, ओबीसी और अनुसूचित जाति प्रतिनिधित्व के साथ सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है।
पांचवां, दो महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया गया।
छठा, स्मृति ईरानी और वरुण गांधी जैसे चर्चित नाम अंतिम सूची में नहीं आए।
सातवां, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी संगठन को मजबूत करने का संभावित संकेत मिलता है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा अक्सर इस बात से शुरू होती है कि किस नेता का टिकट कट गया।
लेकिन इस बार बड़ा सवाल यह भी है कि जिन्हें टिकट मिला, वे पार्टी की भविष्य की राजनीति में क्या भूमिका निभाएंगे?
क्या प्रकाश पाल और राम प्रताप सिंह चौहान को राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिलेंगी?
क्या प्रियंका सिंह रावत की राज्यसभा में वापसी महिला नेतृत्व को मजबूत करने की रणनीति है?
क्या श्रुति गंगवार के जरिए भाजपा किसी खास सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण को साधना चाहती है?
क्या धर्मपाल सिंह के राज्यसभा जाने से उत्तर प्रदेश सरकार में कोई बदलाव होगा?
और सबसे अहम—क्या हरदीप सिंह पुरी और बी.एल. वर्मा के लिए भाजपा ने कोई वैकल्पिक योजना तैयार कर रखी है?
उत्तर प्रदेश की राज्यसभा सूची ने भाजपा की राजनीति में तत्काल कोई घोषित कैबिनेट फेरबदल नहीं किया है, लेकिन इसने संभावित बदलावों को लेकर अटकलों के लिए जरूर जमीन तैयार कर दी है।
आधिकारिक रूप से अभी इतना ही कहा जा सकता है कि भाजपा ने यूपी से आठ नए उम्मीदवार घोषित किए हैं और मौजूदा सदस्यों में शामिल हरदीप सिंह पुरी तथा बी.एल. वर्मा को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया है।
बाकी सवाल—मंत्रिमंडल, संगठन, नई जिम्मेदारियां और 2027 की बड़ी रणनीति—आने वाले फैसलों से ही साफ होंगे।
इसलिए यूपी की राज्यसभा सूची को भाजपा की पूरी रणनीति का अंतिम अध्याय नहीं, बल्कि संभावित राजनीतिक बदलावों की शुरुआत के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।
क्योंकि इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राज्यसभा में कौन जाएगा।
सवाल यह भी है कि—
किसे नई जिम्मेदारी मिलेगी?
किसकी भूमिका बदलेगी?
किसे संगठन में भेजा जाएगा?
किसे सरकार में नई जिम्मेदारी मिलेगी?
और 2027 के यूपी चुनाव से पहले भाजपा अपने संगठन और नेतृत्व की तस्वीर कितनी बदलेगी?
इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में होने वाले अगले फैसलों से सामने आएगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


