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- 13h ago
लखनऊ/नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने आठ उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने इस बार राज्यसभा की मौजूदा टीम में बड़ा बदलाव करते हुए सभी नए चेहरों को मैदान में उतारा है। भाजपा की ओर से घोषित उम्मीदवारों में धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार शामिल हैं।
उम्मीदवारों की सूची सामने आने के साथ ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। सबसे ज्यादा ध्यान इस बात पर गया है कि पार्टी ने अपने किसी भी मौजूदा राज्यसभा सदस्य को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया है। इनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा भी शामिल हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भाजपा के सभी प्रत्याशियों को जीत की अग्रिम शुभकामनाएं दी हैं।
भाजपा की ओर से जारी सूची को सामाजिक समीकरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। घोषित आठ उम्मीदवारों में तीन अन्य पिछड़ा वर्ग, दो अनुसूचित जाति और तीन सामान्य वर्ग से हैं।
सूची में दो महिला उम्मीदवारों को भी स्थान मिला है। वहीं सामाजिक संरचना में दो ब्राह्मण और एक राजपूत उम्मीदवार शामिल बताए जा रहे हैं।
ओबीसी वर्ग में एक लोधी, एक पाल और एक कुर्मी समुदाय को प्रतिनिधित्व दिया गया है।
यानी भाजपा ने राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों का चयन करते समय केवल राजनीतिक अनुभव ही नहीं, बल्कि सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का भी ध्यान रखा है।
इस बार भाजपा ने राज्यसभा के लिए पूरी तरह नए चेहरों को मौका दिया है। जिन मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उनमें अरुण सिंह, सीमा द्विवेदी, बीएल वर्मा, हरदीप सिंह पुरी, नीरज शेखर, बृजलाल, दिनेश शर्मा और गीता शाक्य जैसे नाम शामिल हैं।
इनमें से किसी को भी इस बार यूपी से दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया गया।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्यसभा में पार्टी के लिए लंबे समय से काम कर रहे अनुभवी नेताओं की जगह अब संगठन और प्रदेश की राजनीति में सक्रिय चेहरों को आगे लाया गया है।
इस सूची में सबसे ज्यादा चर्चा केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी को लेकर है।
पुरी केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। इसके बावजूद भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश से दोबारा राज्यसभा उम्मीदवार नहीं बनाया।
हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि उनका राजनीतिक भविष्य समाप्त हो गया या उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाने का फैसला हो चुका है।
राज्यसभा टिकट न मिलना और मंत्री पद समाप्त होना दो अलग-अलग राजनीतिक फैसले हैं। इसलिए फिलहाल सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि यूपी से राज्यसभा के लिए भाजपा की नई सूची में हरदीप सिंह पुरी का नाम नहीं है।
आगे पार्टी उन्हें किस भूमिका में रखती है, यह आने वाले फैसलों से स्पष्ट होगा।
केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा को भी भाजपा ने दोबारा राज्यसभा उम्मीदवार नहीं बनाया है।
वर्मा भी उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य हैं और केंद्र सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनका नाम सूची में नहीं होने से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पार्टी उनके लिए आगे कौन सी भूमिका तय करती है।
हालांकि अभी भाजपा की ओर से उनके भविष्य को लेकर कोई अलग घोषणा नहीं की गई है।
राजनीतिक दलों में राज्यसभा की सदस्यता समाप्त होने के बाद भी नेताओं के लिए संगठनात्मक और अन्य राजनीतिक जिम्मेदारियों के रास्ते खुले रहते हैं।
धर्मपाल सिंह उत्तर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं। वह बरेली के आंवला क्षेत्र से भाजपा की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और कई बार विधायक रह चुके हैं।
फिलहाल वह योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। उनके पास पशुपालन और डेयरी विकास विभाग की जिम्मेदारी है।
धर्मपाल सिंह को राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने को भाजपा के सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।
वह लोधी बिरादरी से आते हैं और पश्चिमी तथा मध्य उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस सामाजिक समूह की महत्वपूर्ण उपस्थिति है।
उनकी उम्मीदवारी से यह भी संकेत मिलता है कि भाजपा राज्यसभा के जरिए उत्तर प्रदेश के मजबूत सामाजिक आधार वाले नेताओं को राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
विद्यासागर सोनकर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। उनका राजनीतिक प्रभाव जौनपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में रहा है।
वह 1996 में 11वीं लोकसभा के लिए सैदपुर से सांसद चुने गए थे।
सोनकर पार्टी संगठन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। वह पूर्व एमएलसी और मछलीशहर से पूर्व सांसद भी रह चुके हैं।
इसके अलावा पार्टी में महामंत्री जैसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद पर भी उन्होंने काम किया है।
उनका राज्यसभा के लिए चयन भाजपा के उस प्रयास के रूप में देखा जा सकता है जिसमें पार्टी पुराने संगठनात्मक अनुभव वाले नेताओं को भी नई भूमिका दे रही है।
सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी उनका नाम महत्वपूर्ण है। वह दलित समुदाय से आते हैं।
प्रियंका सिंह रावत भाजपा की पूर्व लोकसभा सांसद हैं।
उन्होंने 2014 का लोकसभा चुनाव बाराबंकी से जीता था। उस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीएल पुनिया को हराया था।
लोकसभा की राजनीति में सक्रिय रहने के बाद अब राज्यसभा के माध्यम से उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका मिलने की संभावना बनी है।
भाजपा की सूची में उनका नाम शामिल होना महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
राम प्रताप सिंह चौहान उत्तर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ संगठन नेताओं में शामिल हैं।
जून 2026 में यूपी भाजपा में हुए संगठनात्मक बदलाव के दौरान उन्हें प्रदेश महामंत्री की जिम्मेदारी दी गई थी।
इसके बाद अगस्त 2026 में उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संगठनात्मक क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी गई।
पश्चिमी यूपी भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसे में संगठनात्मक स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाने वाले चौहान को राज्यसभा उम्मीदवार बनाया जाना पार्टी के संगठन-केंद्रित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
उनके चयन से यह संकेत भी मिलता है कि भाजपा राज्यसभा के जरिए संगठन में सक्रिय नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व देना चाहती है।
प्रकाश पाल भाजपा के वरिष्ठ संगठन नेता हैं और उत्तर प्रदेश भाजपा ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं।
उन्होंने पहले भाजपा के कानपुर-बुंदेलखंड संगठनात्मक क्षेत्र की जिम्मेदारी भी संभाली है।
पाल समुदाय को ओबीसी सामाजिक समूह में रखा जाता है और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में इस समुदाय की महत्वपूर्ण राजनीतिक उपस्थिति है।
प्रकाश पाल का राज्यसभा उम्मीदवार बनना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा ने प्रदेश संगठन और ओबीसी नेतृत्व से जुड़े एक सक्रिय चेहरे को संसद के उच्च सदन में भेजने का फैसला किया है।
भाजपा की सूची में राधाकांत ओझा, गोपी कृष्ण पांडेय और श्रुति गंगवार के नाम भी शामिल हैं।
इन तीनों नामों के जरिए पार्टी ने सूची में अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को जगह दी है।
विशेष रूप से श्रुति गंगवार के नाम से महिला प्रतिनिधित्व का आंकड़ा दो हो जाता है। इससे राज्यसभा में उत्तर प्रदेश भाजपा की महिला भागीदारी बढ़ेगी।
पार्टी की सूची को देखते हुए यह स्पष्ट है कि उम्मीदवार चयन में संगठनात्मक सक्रियता के साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व को भी महत्व दिया गया है।
राज्यसभा उम्मीदवारों की इस सूची को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए सामाजिक समीकरण, संगठनात्मक संतुलन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
भाजपा की सूची में ओबीसी, दलित, सामान्य वर्ग और महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिला है।
इसलिए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि पार्टी राज्यसभा के माध्यम से भी अपने सामाजिक और संगठनात्मक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
हालांकि केवल राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची के आधार पर 2027 की पूरी चुनावी रणनीति तय मानना उचित नहीं होगा। चुनाव से पहले पार्टी के अन्य फैसले भी महत्वपूर्ण होंगे।
भाजपा की सूची में संगठन के उन नेताओं को जगह मिली है जिनका उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में संगठनात्मक अनुभव रहा है।
राम प्रताप सिंह चौहान को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद अब उनका राज्यसभा उम्मीदवार बनना इस क्षेत्र के संगठनात्मक महत्व को भी सामने लाता है।
पश्चिमी यूपी में किसान, जाट, गुर्जर, ओबीसी, दलित और अन्य सामाजिक समूहों का चुनावी प्रभाव है।
ऐसे में पार्टी के लिए यहां संगठनात्मक नेटवर्क को मजबूत रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।
विद्यासागर सोनकर जैसे वरिष्ठ नेता का नाम सूची में होने से पूर्वी उत्तर प्रदेश को भी प्रतिनिधित्व मिला है।
जौनपुर और आसपास के क्षेत्रों में सोनकर का राजनीतिक अनुभव पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
इस तरह भाजपा की सूची में पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश से जुड़े राजनीतिक चेहरों का मिश्रण दिखाई देता है।
इस बार भाजपा ने आठ उम्मीदवारों में दो महिलाओं को जगह दी है।
प्रियंका सिंह रावत और श्रुति गंगवार का चयन महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से उल्लेखनीय है।
प्रियंका सिंह रावत पहले लोकसभा सदस्य रह चुकी हैं, जबकि श्रुति गंगवार भी राजनीतिक परिवार की पृष्ठभूमि से आती हैं।
राज्यसभा में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक दलों की भूमिका पर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में यूपी से दो महिला उम्मीदवारों को टिकट मिलना पार्टी की सूची का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
उत्तर प्रदेश से इस बार राज्यसभा की कुल 10 सीटों पर चुनाव होना है। भाजपा ने अपनी ओर से आठ उम्मीदवारों की घोषणा की है।
विधानसभा में पार्टी और उसके सहयोगियों की संख्या को देखते हुए भाजपा इन आठ सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत मानती है।
इसलिए उम्मीदवार चयन का महत्व केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है। असली राजनीतिक महत्व इस बात का है कि पार्टी ने इन आठ सीटों के लिए किन नेताओं को आगे किया।
मौजूदा सदस्यों में शामिल दिनेश शर्मा का नाम भी इस बार उम्मीदवारों की सूची में नहीं है।
दिनेश शर्मा उत्तर प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री रहे हैं और बाद में राज्यसभा सदस्य बने।
अब उन्हें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का उपराज्यपाल नियुक्त किया जा चुका है।
इसलिए उनका दोबारा राज्यसभा उम्मीदवार न बनना अन्य नेताओं से अलग राजनीतिक परिस्थिति में देखा जाएगा।
उनकी नई संवैधानिक जिम्मेदारी पहले ही तय हो चुकी है।
आठ मौजूदा सदस्यों को दोबारा टिकट न मिलने के बाद अब भाजपा के अंदर एक बड़ा सवाल यह है कि इन नेताओं की आगे क्या भूमिका होगी।
हर नेता के मामले में स्थिति अलग हो सकती है।
कुछ नेता संगठन में जा सकते हैं, कुछ को सरकार या अन्य संस्थागत जिम्मेदारियां मिल सकती हैं और कुछ नेताओं की भूमिका फिलहाल सीमित भी हो सकती है।
लेकिन इस संबंध में भाजपा ने अभी कोई व्यापक घोषणा नहीं की है।
इसलिए राज्यसभा टिकट न मिलने को सीधे राजनीतिक विदाई मानना सही नहीं होगा।
हरदीप सिंह पुरी का नाम इसलिए सबसे ज्यादा चर्चा में है क्योंकि वह केंद्र सरकार में मंत्री हैं।
सामान्य तौर पर किसी केंद्रीय मंत्री की राज्यसभा सदस्यता खत्म होने की स्थिति में पार्टी को उनकी संसद सदस्यता और मंत्री पद से जुड़े भविष्य के लिए कोई न कोई व्यवस्था करनी पड़ सकती है।
यही वजह है कि उनके नाम को लेकर अब राजनीतिक अटकलें तेज हो सकती हैं।
लेकिन भाजपा की ओर से जब तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं होती, तब तक इसे संभावित बदलाव के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
आठ उम्मीदवारों की घोषणा के बाद अब कई सवाल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हैं—
क्या हरदीप सिंह पुरी को किसी दूसरे राज्य से राज्यसभा भेजा जाएगा?
बीएल वर्मा की अगली राजनीतिक भूमिका क्या होगी?
क्या केंद्र सरकार में मंत्रिमंडल फेरबदल होगा?
क्या उत्तर प्रदेश सरकार में भी कुछ जिम्मेदारियां बदलेंगी?
क्या संगठन में और बड़े बदलाव होंगे?
क्या यह पूरी कवायद 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की रणनीति है?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में भाजपा के अगले फैसलों से सामने आएंगे।
| उम्मीदवार | प्रमुख पहचान |
|---|---|
| धर्मपाल सिंह | वरिष्ठ भाजपा नेता, यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री |
| राधाकांत ओझा | भाजपा उम्मीदवार |
| प्रकाश पाल | वरिष्ठ संगठन नेता, ओबीसी मोर्चा से जुड़े |
| विद्यासागर सोनकर | पूर्व सांसद/एमएलसी, वरिष्ठ संगठन नेता |
| गोपी कृष्ण पांडेय | भाजपा उम्मीदवार |
| प्रियंका सिंह रावत | पूर्व लोकसभा सांसद |
| राम प्रताप सिंह चौहान | प्रदेश महामंत्री, संगठन नेता |
| श्रुति गंगवार | भाजपा उम्मीदवार, महिला प्रतिनिधित्व |
राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा के बाद अब नामांकन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इसके बाद मतदान और मतगणना के साथ यूपी से राज्यसभा की नई तस्वीर सामने आएगी।
लेकिन राजनीतिक रूप से इस चुनाव की कहानी सिर्फ आठ सीटों तक सीमित नहीं है।
भाजपा ने एक साथ कई पुराने चेहरों को हटाकर नए नेताओं को मौका दिया है। इसमें संगठन, सामाजिक समीकरण, महिला प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन सभी पहलू दिखाई देते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया गया है।
इससे दिल्ली की राजनीति में संभावित बदलावों को लेकर चर्चा जरूर तेज होगी, लेकिन अभी किसी कैबिनेट फेरबदल को तय मानना जल्दबाजी होगी।
वहीं उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह सूची 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की संगठनात्मक दिशा के कुछ संकेत जरूर देती है।
कुल मिलाकर भाजपा ने राज्यसभा के लिए इस बार अनुभव से ज्यादा संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और नए चेहरों पर भरोसा दिखाया है। अब देखना यह होगा कि राज्यसभा की यह नई टीम संसद में भाजपा की भूमिका को किस तरह आगे बढ़ाती है और इन नियुक्तियों के बाद उत्तर प्रदेश तथा केंद्र की राजनीति में अगला बदलाव क्या होता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


