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- 13h ago
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और उसके फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर कई अहम टिप्पणियां सामने आईं। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि यदि जांच के बाद यह सामने आता है कि चुनाव आयोग के किसी फैसले को न तो सर्वसम्मति से लिया गया और न ही बहुमत के आधार पर, तो अदालत उस फैसले पर हस्तक्षेप कर सकती है और जरूरत पड़ने पर उसे रद्द भी किया जा सकता है।
पीठ में सीजेआई सूर्य कांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट की 5 अक्टूबर 2026 की कॉज लिस्ट में भी यही पीठ दर्ज है।
हालांकि अदालत ने फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने या उनके अधिकारों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभी उसके सामने पर्याप्त और प्रमाणित सामग्री नहीं है। अदालत पहले चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से जवाब लेना चाहती है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट 100 प्रतिशत सही हो सकती है, आंशिक रूप से सही हो सकती है या फिर उसमें कुछ बातें गलत भी हो सकती हैं। इसलिए केवल किसी अखबार की रिपोर्ट को आधार बनाकर अदालत तत्काल कोई आदेश पारित नहीं कर सकती।
सीजेआई सूर्य कांत ने स्पष्ट किया कि अदालत को पहले संबंधित पक्षों से जवाब और प्रमाणित जानकारी चाहिए। इसके बाद ही यह तय किया जाएगा कि जिन फैसलों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वे किस प्रक्रिया के तहत लिए गए थे।
कोर्ट ने संकेत दिया कि चुनाव आयोग से इस संबंध में जवाब मांगा जाएगा और उसके बाद मामले के कानूनी पहलुओं की जांच की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू की है। रिपोर्ट के अनुसार, सीईसी ज्ञानेश कुमार के अलावा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से भी जवाब मांगा गया है।
इसके साथ ही चुनाव आयोग के डीजी (आईटी) सीमा खन्ना और वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग से भी संबंधित आरोपों पर जवाब मांगा गया है।
इसका मतलब यह है कि अब अदालत के सामने चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज और संबंधित अधिकारियों का पक्ष आ सकता है। इसके आधार पर अदालत यह देख सकती है कि आरोपों में कितनी तथ्यात्मक पुष्टि होती है।
याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कुछ महत्वपूर्ण फैसले कथित तौर पर चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए।
मामले में खास तौर पर चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR से जुड़े फैसलों का जिक्र किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि आयोग के तीनों सदस्यों वाले निकाय में लिए जाने वाले फैसलों में सभी सदस्यों की भूमिका होनी चाहिए और यदि किसी मुद्दे पर सर्वसम्मति नहीं बनती है तो कानून के मुताबिक बहुमत के आधार पर फैसला लिया जा सकता है।
यहां मूल सवाल यही है कि क्या किसी बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था की सामूहिक शक्ति का इस्तेमाल एक व्यक्ति अकेले कर सकता है या नहीं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग में कामकाज के संचालन से संबंधित व्यवस्था में पहले सर्वसम्मति की कोशिश होती है। यदि सर्वसम्मति नहीं बनती है तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जा सकता है।
इसलिए यदि किसी निर्णय के संबंध में यह प्रमाणित होता है कि वह न तो सर्वसम्मति से लिया गया था और न ही बहुमत से, तो उस निर्णय की वैधता पर सवाल उठ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अगर किसी निर्णय में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है तो अदालत के पास उस निर्णय को रद्द करने का अधिकार हो सकता है।
अदालत ने तत्काल सीईसी को निलंबित करने की मांग पर भी सावधानी बरती। याचिकाकर्ताओं की ओर से अंतरिम राहत की मांग की गई थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि पहले प्रमाणित और प्रामाणिक जानकारी सामने आनी चाहिए।
सीजेआई ने संकेत दिया कि अदालत पहले नोटिस जारी करेगी, संबंधित पक्षों का जवाब लेगी और उसके बाद आगे की कार्रवाई पर विचार करेगी।
अदालत का रुख यह था कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ गंभीर अंतरिम कार्रवाई करने से पहले न्यायालय के सामने पर्याप्त तथ्य और आधिकारिक रिकॉर्ड होना जरूरी है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से मांग की गई थी कि मामले की सुनवाई लंबित रहने तक मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद के अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोका जाए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मांग को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने संकेत दिया कि वह पहले संबंधित रिकॉर्ड और जवाब देखेगी। इसके बाद यदि कोई निर्णय कानून और निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत पाया जाता है तो उसके खिलाफ उचित कानूनी कदम उठाया जा सकता है।
इसलिए सोमवार की सुनवाई का तत्काल नतीजा यह रहा कि CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अंतरिम निलंबन का आदेश नहीं दिया गया, लेकिन मामले को आगे जांचने के लिए चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा गया।
मामले में दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच करीब 14 मौकों पर दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों या कदमों को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं।
इन आरोपों में चुनावी रोल से जुड़े बदलाव, प्रक्रियागत फैसले और अन्य चुनाव संबंधी कदम शामिल बताए गए हैं।
हालांकि इन आरोपों को अंतिम रूप से सही मानना अभी अदालत का निष्कर्ष नहीं है। चुनाव आयोग ने इससे पहले इन आपत्तियों को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए कहा था कि पिछले वर्ष के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने संबंधित रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि अलग-अलग विचार निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं।
यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट अब सीधे आधिकारिक जवाब और रिकॉर्ड देखना चाहता है।
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आरोप और उनका खंडन दोनों मौजूद हैं।
एक ओर याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कुछ फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। दूसरी ओर चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि आयोग के फैसले निर्धारित प्रक्रिया के तहत और सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
इसलिए अदालत के सामने अब मूल सवाल आरोपों की राजनीतिक व्याख्या नहीं, बल्कि दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय लेने की वास्तविक प्रक्रिया का है।
भारत में चुनाव आयोग की भूमिका चुनावों के संचालन और चुनावी प्रक्रिया की निगरानी से जुड़ी है। ऐसे में उसके फैसलों का सीधा संबंध मतदाता सूची, चुनाव कार्यक्रम, चुनाव प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों से हो सकता है।
इसी वजह से आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और संस्थागत पारदर्शिता का सवाल महत्वपूर्ण माना जाता है।
मामले में यह भी तर्क दिया गया है कि अगर संवैधानिक रूप से सामूहिक शक्ति किसी बहुसदस्यीय निकाय को दी गई है, तो उस शक्ति का इस्तेमाल निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक ही होना चाहिए।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को मिली शक्तियों का संदर्भ दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि आयोग को संविधान ने एक संस्थागत निकाय के रूप में स्थापित किया है और इसलिए निर्णय लेने की शक्ति भी उसी सामूहिक संस्थागत ढांचे के तहत इस्तेमाल की जानी चाहिए।
मामले में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि आयोग की सामूहिक शक्ति वास्तव में किसी एक कार्यालय या व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल की जाती है तो क्या यह संविधान और संबंधित कानून की भावना के अनुरूप होगा।
हालांकि इस मुद्दे पर अंतिम कानूनी निष्कर्ष अभी नहीं आया है।
मामले का एक अहम हिस्सा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़ा है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर पहले भी सुप्रीम कोर्ट में अलग से महत्वपूर्ण सुनवाई हो चुकी है।
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार की SIR प्रक्रिया से संबंधित मामले में चुनाव आयोग की शक्तियों, प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े कई सवालों पर विचार किया था। उस मामले में अदालत ने यह भी कहा था कि गलत तरीके से नाम हटाए जाने की स्थिति में संबंधित व्यक्ति न्यायिक समीक्षा का सहारा ले सकता है।
वर्तमान याचिकाओं में SIR से जुड़े फैसलों और चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को भी चुनौती दी गई है।
सुनवाई में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को मिली कानूनी सुरक्षा का मुद्दा भी उठा।
याचिकाकर्ता की ओर से 2023 के कानून की धारा 16 का हवाला देते हुए कहा गया कि इसमें सीईसी को पद छोड़ने के बाद भी कुछ प्रकार की कानूनी सुरक्षा मिलती है।
याचिकाकर्ता के वकील ने इस सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए और कहा कि ऐसी व्यवस्था को लेकर भी न्यायिक जांच की आवश्यकता है।
सुनवाई के दौरान इस बात पर चर्चा हुई कि यह सुरक्षा किस सीमा तक लागू होती है और इसका संवैधानिक दायरा क्या है। अदालत ने इस पहलू की भी जांच करने में रुचि दिखाई है।
सोमवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का यह रुख खास तौर पर महत्वपूर्ण रहा कि अदालत किसी मीडिया रिपोर्ट को स्वतः प्रमाणित तथ्य नहीं मान सकती।
अदालत ने कहा कि रिपोर्ट पूरी तरह सही, आंशिक रूप से सही या पूरी तरह गलत भी हो सकती है। इसलिए न्यायिक आदेश के लिए अदालत को संबंधित संस्थान से जवाब और प्रमाणित जानकारी की आवश्यकता होगी।
यह टिप्पणी इस मामले में आगे होने वाली सुनवाई की दिशा भी स्पष्ट करती है—अब आधिकारिक रिकॉर्ड, फैसलों की प्रक्रिया, बैठक के दस्तावेज और संबंधित अधिकारियों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि यदि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि किसी निर्णय को निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत नहीं लिया गया, तो अदालत उस निर्णय की वैधता की जांच कर सकती है।
यदि किसी फैसले में न तो सर्वसम्मति हो और न ही बहुमत का समर्थन, तो उसके खिलाफ न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना बन सकती है।
लेकिन फिलहाल यह केवल अदालत द्वारा बताए गए संभावित कानूनी रास्ते का हिस्सा है। अभी किसी विशिष्ट चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित नहीं किया है।
1. चुनाव आयोग से जवाब मांगा जाएगा
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू की है।
2. केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर आदेश नहीं
अदालत ने कहा कि अखबार की रिपोर्ट के आधार पर सीधे कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता।
3. फैसलों की प्रक्रिया की जांच होगी
कोर्ट यह देखेगा कि विवादित फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे या बहुमत के आधार पर।
4. प्रमाणित रिकॉर्ड जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी गंभीर अंतरिम कार्रवाई से पहले उसे प्रामाणिक और आधिकारिक जानकारी चाहिए।
5. CEC को फिलहाल निलंबित नहीं किया गया
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से हटाने या उनके अधिकारों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग फिलहाल स्वीकार नहीं की गई।
अब इस मामले में चुनाव आयोग और अन्य संबंधित पक्षों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे। अदालत के सामने जब आधिकारिक रिकॉर्ड आएगा, तब यह जांच की जा सकेगी कि जिन फैसलों पर सवाल उठाए गए हैं, वे किस बैठक में, किस प्रक्रिया के तहत और किन सदस्यों की सहमति से लिए गए थे।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट यह तय कर सकता है कि आगे विस्तृत न्यायिक जांच की आवश्यकता है या नहीं।
यदि अदालत को रिकॉर्ड में प्रक्रिया संबंधी गंभीर खामी दिखाई देती है तो वह संबंधित फैसलों की वैधता पर विचार कर सकती है। वहीं यदि रिकॉर्ड आरोपों की पुष्टि नहीं करता है तो मामले की दिशा अलग हो सकती है।
यह पूरा मामला केवल किसी एक अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया, जवाबदेही और संस्थागत कार्यप्रणाली से जुड़े सवाल हैं।
चुनाव आयोग के फैसलों का असर सीधे चुनावी प्रक्रिया और मतदाताओं पर पड़ सकता है। इसलिए इस मामले में अदालत का ध्यान इस बात पर है कि आयोग की संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल निर्धारित कानूनी ढांचे के भीतर हो।
साथ ही अदालत ने तत्काल कार्रवाई से पहले पर्याप्त प्रमाण जुटाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।
सोमवार की सुनवाई को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने एकतरफा तरीके से फैसले लिए या चुनाव आयोग के किसी निर्णय को अवैध घोषित किया है।
अदालत ने फिलहाल आरोपों की जांच के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ाई है और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
यानी अब अगला महत्वपूर्ण चरण होगा—चुनाव आयोग का आधिकारिक जवाब, संबंधित रिकॉर्ड और फैसलों की वास्तविक प्रक्रिया का अदालत के सामने आना।
इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि लगाए गए आरोपों में कितनी तथ्यात्मक और कानूनी मजबूती है और विवादित फैसलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट किस दिशा में आगे बढ़ता है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है: किसी संवैधानिक संस्था के फैसले की वैधता पर गंभीर सवाल उठते हैं तो अदालत प्रमाणित रिकॉर्ड देखेगी, लेकिन केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर सीधे निष्कर्ष नहीं निकालेगी।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


