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- 13h ago
नई दिल्ली। दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने के बाद लोगों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। करीब 33 लाख मतदाताओं को नोटिस दिए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। इन नोटिसों में मतदाता रिकॉर्ड में अलग-अलग तरह की विसंगतियों और पुराने रिकॉर्ड से मौजूदा विवरण के मेल न खाने जैसे कारण शामिल हैं। हालांकि, निर्वाचन अधिकारियों की ओर से स्पष्ट किया गया है कि नोटिस मिलना अपने आप में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मतलब नहीं है। सत्यापन और जरूरी दस्तावेजों की प्रक्रिया के बाद पात्र मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में बनाए रखे जा सकते हैं।
इसी बीच चुनाव आयोग के सूत्रों के हवाले से एक 20 दिन की समाधान प्रक्रिया की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक मामूली विसंगतियों वाले मामलों को अपेक्षाकृत सरल प्रक्रिया के जरिए निपटाने की तैयारी है, जबकि पुराने SIR रिकॉर्ड से मैपिंग नहीं होने या दूसरी बड़ी विसंगति वाले मामलों में घोषणा और मान्य दस्तावेजों के आधार पर सत्यापन किया जा सकता है।
दिल्ली में SIR के दौरान मतदाताओं के वर्तमान विवरण की पुराने SIR रिकॉर्ड से तुलना की जा रही है। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में ऐसे रिकॉर्ड सामने आए, जिनमें या तो पुराने रिकॉर्ड से सीधा मिलान नहीं हो पाया या विवरण में कोई तार्किक असमानता दिखाई दी।
रिपोर्टों के अनुसार करीब 33.13 लाख मतदाताओं को ऐसे मामलों में नोटिस जारी किए गए हैं। इनमें दो प्रमुख श्रेणियां बताई गई हैं—“Unmapped with Last SIR” और “Logical Discrepancy”।
एक रिपोर्ट के अनुसार 33.13 लाख मामलों में लगभग 19.33 लाख को ‘logical discrepancies’ और करीब 13.79 लाख को ‘no mapping’ की श्रेणी में रखा गया था।
इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि इन सभी मतदाताओं को अपात्र मान लिया गया है। इन मामलों में रिकॉर्ड की जांच और मतदाता की पात्रता का सत्यापन किया जाना है।
SIR को लेकर मतदाताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि नोटिस मिलने के बाद क्या उनका नाम वोटर लिस्ट से हट जाएगा?
निर्वाचन अधिकारियों के मुताबिक नोटिस अपने आप में नाम हटाने का आदेश नहीं है। जिन मतदाताओं को नोटिस मिला है, उन्हें अपनी पात्रता और रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी स्पष्ट करने का अवसर दिया जा रहा है। आवश्यक दस्तावेजों और तथ्यों के सत्यापन के बाद अंतिम मतदाता सूची में नाम बनाए रखने की प्रक्रिया होगी।
यही वजह है कि नोटिस मिलने वाले मतदाताओं के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे नोटिस में दिए गए निर्देशों और समयसीमा को ध्यान से देखें तथा मांगी गई जानकारी या दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराएं।
चुनाव आयोग के सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, सभी मामलों को एक जैसी प्रक्रिया से नहीं देखा जाएगा।
जिन मामलों में मतदाता के नाम में मामूली अंतर, स्पेलिंग की गलती या रिकॉर्ड से जुड़ी छोटी विसंगति है, उन्हें अपेक्षाकृत सरल प्रक्रिया के जरिए ठीक करने की योजना बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे मामलों में बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO से मौजूदा नाम और रिकॉर्ड की पुष्टि कराई जा सकती है।
सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे करीब 15 लाख मामलों को 10 दिनों के भीतर निपटाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद अन्य मामलों पर कार्रवाई की जाएगी।
जिन मतदाताओं का नाम पुराने SIR रिकॉर्ड से सीधे मैप नहीं हो पा रहा है, उनके मामले में भी प्रक्रिया खत्म नहीं हो जाती।
रिपोर्ट के अनुसार ऐसे मामलों में मतदाता से घोषणा यानी declaration लेने और उपलब्ध मान्य दस्तावेजों के आधार पर उसकी पात्रता की जांच करने की व्यवस्था बताई गई है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि संबंधित व्यक्ति मतदाता सूची में बने रहने के लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करता है या नहीं।
पहले की जानकारी के अनुसार नोटिस पाने वाले मतदाताओं को निर्वाचन आयोग की ओर से निर्धारित दस्तावेजों में से उपयुक्त दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा जा सकता है। इनमें जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, जाति प्रमाणपत्र और स्थायी निवास प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेजों का उल्लेख रिपोर्टों में किया गया है।
यह सवाल भी बड़ी संख्या में मतदाताओं के सामने है कि अगर किसी व्यक्ति का नाम पुराने SIR रिकॉर्ड में नहीं था या उसका रिकॉर्ड मौजूदा नाम से लिंक नहीं हो पा रहा है, तो क्या उसका नाम सीधे हटा दिया जाएगा?
इस संबंध में सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, केवल पुराने SIR में मैपिंग न होने को अंतिम रूप से नाम हटाने का आधार मानने के बजाय संबंधित मतदाता से घोषणा और दस्तावेज लेकर पात्रता का सत्यापन करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम अंतिम मतदाता सूची में रहेगा या नहीं, यह निर्धारित प्रक्रिया में पात्रता और दस्तावेजों के सत्यापन पर निर्भर करेगा। इसलिए मतदाताओं के लिए नोटिस को नजरअंदाज करने के बजाय निर्धारित प्रक्रिया में शामिल होना महत्वपूर्ण है।
SIR के तहत विभिन्न केंद्रों पर सुनवाई और दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया भी चल रही है। सूत्रों के हवाले से आई जानकारी में कहा गया है कि मामूली गलतियों वाले मामलों में अनावश्यक पूछताछ से बचते हुए सरल तरीके से समाधान करने की योजना है।
इसका उद्देश्य यह है कि बड़ी संख्या में आने वाले मामलों का निपटारा व्यवस्थित और समयबद्ध तरीके से किया जा सके।
20 दिन की समाधान प्रक्रिया से जुड़ी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि किसी मतदाता के रिकॉर्ड की समस्या दूर होने के बाद उसे इसकी जानकारी मैसेज के माध्यम से देने की योजना है। यानी प्रक्रिया पूरी होने के बाद मतदाता को अपडेट मिलने की व्यवस्था की जा सकती है।
इससे लोगों को बार-बार संबंधित कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत कम हो सकती है और वे अपने आवेदन या रिकॉर्ड की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और पात्र मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच करना है। दिल्ली में इस प्रक्रिया के दौरान मौजूदा मतदाता विवरण की पुराने SIR रिकॉर्ड से तुलना की गई है।
इस तुलना में नाम, रिश्तेदार का नाम, उम्र तथा अन्य विवरणों में असंगति या पुराने रिकॉर्ड से लिंक न होने जैसी स्थितियां सामने आने पर रिकॉर्ड को आगे सत्यापन के लिए चिन्हित किया गया है।
निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर पुराने SIR रिकॉर्ड में नाम खोजने के लिए अलग सुविधा भी उपलब्ध है। इसमें राज्य, जिला, विधानसभा क्षेत्र, मतदान केंद्र और मतदाता के नाम जैसी जानकारी के आधार पर खोज की जा सकती है। आयोग ने यह भी बताया है कि पुराने और नए रिकॉर्ड में स्पेलिंग अलग हो सकती है, इसलिए नाम की अलग-अलग वर्तनी से भी खोज करने की जरूरत पड़ सकती है।
नोटिस मिलने वाले मतदाताओं को सबसे पहले नोटिस में दर्ज कारण को देखना चाहिए। यदि उसमें नाम, उम्र, रिश्तेदार के नाम या किसी अन्य विवरण में विसंगति बताई गई है, तो संबंधित रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए।
इसके बाद उपलब्ध और मांगे गए दस्तावेज तैयार रखना जरूरी होगा। नोटिस में जिस तरीके से जवाब देने या दस्तावेज जमा करने के लिए कहा गया है, उसी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
समयसीमा समाप्त होने का इंतजार करने के बजाय जल्द प्रक्रिया पूरी करना मतदाता के लिए व्यावहारिक रूप से उपयोगी रहेगा।
चुनाव आयोग के नागरिक सेवा पोर्टल पर “Search your name in last SIR E-Roll” सुविधा उपलब्ध है। इसमें मतदाता पुराने SIR रिकॉर्ड में अपना नाम खोज सकते हैं। आयोग ने यह सुविधा पुराने रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी तलाशने के लिए उपलब्ध कराई है।
यदि नाम पहली बार में नहीं मिलता है तो आयोग की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार अलग-अलग स्पेलिंग और अतिरिक्त विवरण के साथ दोबारा खोज की जा सकती है।
33 लाख से अधिक नोटिसों के कारण यह प्रक्रिया प्रशासन के लिए भी बड़ी चुनौती है। इतने बड़े स्तर पर रिकॉर्ड की जांच, दस्तावेजों का सत्यापन और सुनवाई करना समय लेने वाला काम है।
ऐसे में मामलों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर समाधान करने की योजना से छोटे और गंभीर मामलों के लिए अलग प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। मामूली नाम संबंधी अंतर को जल्दी ठीक करना और जटिल मामलों में दस्तावेजों के आधार पर जांच करना इसी दिशा में बताया जा रहा है।
SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी मामला पहुंचा है। 23 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने दिल्ली में जारी कुछ SIR नोटिसों को लेकर प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए चुनाव आयोग से जवाब मांगा और यह पूछा कि क्या प्रक्रिया को अधिक सटीक बनाने के लिए अतिरिक्त फिल्टर की जरूरत है।
अदालत के समक्ष याचिका में नोटिस पाने वाले मतदाताओं के नाम और नोटिस जारी करने के कारणों को अधिक पारदर्शी तरीके से उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई गई है।
इस न्यायिक प्रक्रिया और चुनाव आयोग की प्रशासनिक प्रक्रिया को अलग-अलग समझना जरूरी है। एक ओर मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा है, वहीं दूसरी ओर इस प्रक्रिया से जुड़ी पारदर्शिता और कानूनी सवालों पर अदालत में सुनवाई हो रही है।
SIR की प्रक्रिया में केवल आम मतदाता ही नहीं, बल्कि कई चर्चित लोगों के नाम भी नोटिस पाने वालों की सूची में सामने आए हैं। रिपोर्टों में केंद्रीय मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कई अन्य प्रमुख लोगों के नामों का उल्लेख किया गया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि नोटिस जारी होना केवल किसी एक वर्ग तक सीमित प्रक्रिया नहीं है। रिकॉर्ड में चिन्हित विसंगतियों के आधार पर अलग-अलग मतदाताओं को नोटिस जारी किए जा रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के रिकॉर्ड में भी एक विसंगति के कारण नोटिस जारी हुआ था। आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने के बाद उनका रिकॉर्ड सत्यापित कर दिया गया और अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने की पुष्टि की गई।
यह उदाहरण बताता है कि नोटिस मिलने के बाद दस्तावेज और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करने का महत्व है।
नोटिस मिलने के बाद सबसे पहले उसे पढ़े बिना नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। किसी अनधिकृत व्यक्ति को अपने मूल दस्तावेज सौंपने से भी बचना चाहिए। निर्वाचन कार्यालय, BLO या आधिकारिक पोर्टल से ही प्रक्रिया की जानकारी लेना उचित रहेगा।
किसी भी व्यक्ति को केवल मौखिक जानकारी के आधार पर यह नहीं मान लेना चाहिए कि उसका नाम निश्चित रूप से सूची में रहेगा या हट जाएगा। अंतिम स्थिति संबंधित सत्यापन और निर्धारित निर्वाचन प्रक्रिया के आधार पर तय होगी।
दिल्ली में SIR की प्रक्रिया के दौरान ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी हो चुकी है और नोटिस तथा दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया चल रही है। पहले जारी कार्यक्रम के अनुसार दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया 31 अगस्त से 29 अक्टूबर तक चलनी है और अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर को प्रकाशित की जानी है।
इसलिए वर्तमान समय में नोटिस मिलने वाले मतदाताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण चरण अपना जवाब और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराना है। अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले निर्धारित प्रक्रिया के तहत रिकॉर्ड की जांच और सुधार का अवसर मौजूद है।
SIR नोटिस मिलने का अर्थ यह नहीं है कि मतदाता का नाम तत्काल वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। मौजूदा रिपोर्टों के अनुसार नोटिस रिकॉर्ड की विसंगति या पुराने SIR से मैपिंग की समस्या के कारण जारी किए गए हैं।
चुनाव आयोग के सूत्रों के हवाले से सामने आई 20 दिन की योजना में छोटे मामलों को जल्दी सुलझाने और अन्य मामलों में घोषणा व मान्य दस्तावेजों के आधार पर सत्यापन करने की बात कही गई है। समस्या का समाधान होने पर मतदाता को संदेश के जरिए जानकारी देने की योजना भी बताई गई है।
ऐसे में मतदाताओं के लिए सबसे जरूरी है कि वे नोटिस का कारण देखें, समयसीमा जांचें, आवश्यक दस्तावेज तैयार रखें और आधिकारिक निर्वाचन माध्यम से अपनी स्थिति स्पष्ट करें। इससे SIR प्रक्रिया में अपने रिकॉर्ड के सत्यापन को पूरा कराने में मदद मिलेगी।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


