यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 13h ago
नई दिल्ली। ‘मेक इन इंडिया’ पहल के 12 वर्ष पूरे होने के साथ भारतीय विनिर्माण क्षेत्र एक ऐसे चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं माना जा रहा। अब जोर इस बात पर है कि भारत में बनने वाले उत्पादों में घरेलू मूल्यवर्धन कितना है, उत्पादन प्रक्रिया में अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कितना बढ़ रहा है, भारतीय कंपनियां वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से किस स्तर पर जुड़ रही हैं और देश किस हद तक महत्वपूर्ण तकनीकों एवं घटकों के लिए आत्मनिर्भर क्षमता विकसित कर पा रहा है।
भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के अनुसार, पिछले एक दशक से अधिक समय में भारत के विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। देश की पहचान केवल एक बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में नहीं, बल्कि उत्पादन, निवेश, तकनीकी क्षमता, नवाचार और वैश्विक मूल्य सृजन के संभावित केंद्र के रूप में भी मजबूत हुई है। CII का कहना है कि अब विनिर्माण की अगली छलांग ‘स्केल’ से ‘डेप्थ’ की ओर होनी चाहिए।
CII के अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने कहा कि बड़ा बाजार कंपनियों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन प्रतिस्पर्धी उत्पादन आधार व्यवसायों को विकसित और टिकाऊ बनाता है। उनके अनुसार तकनीक, प्रतिभा, बुनियादी ढांचे और पूंजी को एक साथ जोड़ने की क्षमता किसी देश को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम बनाती है।
मेक इन इंडिया के शुरुआती दौर में देश के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक भारत को वैश्विक कंपनियों के लिए उत्पादन का आकर्षक केंद्र बनाना था। इसके लिए निवेश, कारोबारी माहौल, बुनियादी ढांचे और उत्पादन क्षमता को बढ़ाने पर जोर दिया गया।
अब परिस्थितियां बदल रही हैं। वैश्विक कंपनियां केवल यह नहीं देखतीं कि किसी देश में कारखाना लगाया जा सकता है या नहीं, बल्कि यह भी देखती हैं कि वहां कच्चा माल, पुर्जे, कुशल श्रमिक, तकनीक, लॉजिस्टिक्स, अनुसंधान एवं विकास और निर्यात की पूरी व्यवस्था कितनी मजबूत है।
यही वजह है कि भारत के लिए अगला लक्ष्य केवल ‘भारत में उत्पादन’ नहीं बल्कि ‘भारत में पूरी वैल्यू चेन का विकास’ करना बनता जा रहा है।
विनिर्माण क्षेत्र को गति देने में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI योजनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। CII के अनुसार जून 2026 तक पीएलआई योजनाओं के तहत 2.58 लाख करोड़ रुपये का वास्तविक निवेश, 23.79 लाख करोड़ रुपये का उत्पादन एवं बिक्री और 15.53 लाख करोड़ रुपये का निर्यात दर्ज किया गया।
इन योजनाओं से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 14.57 लाख से अधिक रोजगार को समर्थन मिलने की बात भी CII ने कही है।
पीएलआई का उद्देश्य कंपनियों को अतिरिक्त उत्पादन के लिए प्रोत्साहन देना और देश में नई उत्पादन क्षमता स्थापित करने के साथ मौजूदा क्षमता के विस्तार को बढ़ावा देना रहा है।
CII के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में पीएलआई योजनाओं ने स्थानीयकरण को बढ़ाने में भूमिका निभाई है। स्थानीयकरण का अर्थ केवल किसी उत्पाद को भारत में असेंबल करना नहीं है, बल्कि उसके अधिक से अधिक पुर्जों, घटकों और उत्पादन प्रक्रियाओं को देश के भीतर विकसित करना है।
यदि किसी मोबाइल फोन या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का अंतिम असेंबली भारत में हो, लेकिन उसके महत्वपूर्ण घटक और तकनीक पूरी तरह विदेश से आती हो, तो घरेलू मूल्यवर्धन सीमित रह सकता है। इसलिए अगले चरण में भारत के सामने चुनौती है कि वह उत्पादन के साथ-साथ घटक निर्माण और तकनीकी क्षमताओं को भी देश में विकसित करे।
CII के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी के अनुसार भारत का विनिर्माण अवसर अब केवल आयात के विकल्प तैयार करने तक सीमित नहीं रह सकता। लक्ष्य ऐसी गहरी क्षमताएं विकसित करना है जो भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाएं।
इसका मतलब है कि भारत को ऐसे उत्पाद और घटक भी बनाने होंगे जिनकी मांग दूसरे देशों में हो। इससे ‘मेक इन इंडिया’ का फोकस घरेलू बाजार से आगे बढ़कर निर्यात और वैश्विक बाजारों पर जा सकता है।
कोविड-19 महामारी और उसके बाद वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने कंपनियों को आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने पर मजबूर किया है। इससे भारत के सामने वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का अवसर पैदा हुआ है।
हालांकि इस अवसर का लाभ उठाने के लिए केवल कम लागत पर्याप्त नहीं होगी। कंपनियों को समय पर डिलीवरी, गुणवत्ता, कुशल मानव संसाधन, स्थिर नीतियां, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी क्षमता भी चाहिए।
भारत की चुनौती अब इन सभी तत्वों को एक साथ मजबूत करने की है।
तकनीक आधारित विनिर्माण को आने वाले वर्षों में विशेष महत्व मिलने की संभावना है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल, बैटरी, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन और नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण जैसे क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है।
CII के 2026 के नीति दस्तावेजों में भी इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर क्षेत्र में सप्लाई चेन की मजबूती और क्षेत्र-विशिष्ट रणनीति की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
इसका उद्देश्य भारत को केवल अंतिम उत्पाद का निर्माता बनाने के बजाय महत्वपूर्ण तकनीकी घटकों के निर्माण का आधार तैयार करना है।
भारत के विनिर्माण विस्तार में बड़ी कंपनियों के साथ-साथ सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी MSME की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बड़ी कंपनियों के लिए पुर्जे और सेवाएं उपलब्ध कराने वाली हजारों छोटी इकाइयां सप्लाई चेन का हिस्सा बनती हैं।
यदि एमएसएमई को सस्ती वित्तीय सुविधा, आधुनिक तकनीक, गुणवत्ता प्रमाणन, डिजिटल सिस्टम और बड़े बाजार तक पहुंच मिलती है, तो घरेलू सप्लाई चेन अधिक मजबूत हो सकती है।
इसलिए मेक इन इंडिया के अगले चरण में बड़े औद्योगिक संयंत्रों के साथ छोटे और मध्यम विनिर्माण उद्यमों की क्षमता बढ़ाना भी महत्वपूर्ण होगा।
विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार तभी व्यापक रोजगार पैदा कर सकता है जब उद्योग की जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध हो। आधुनिक कारखानों में ऑटोमेशन, रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग का इस्तेमाल बढ़ रहा है।
इस बदलाव के साथ पारंपरिक औद्योगिक कौशल के अलावा नए तकनीकी कौशल की मांग भी बढ़ रही है।
CII लंबे समय से उद्योग और सरकार के बीच कौशल विकास में साझेदारी पर जोर देता रहा है। संगठन के दस्तावेजों में भी उद्योग की भागीदारी के जरिए कौशल विकास और क्षमता निर्माण को महत्वपूर्ण बताया गया है।
विनिर्माण के लिए बिजली, सड़क, रेलवे, बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है। पिछले वर्षों में भारत में भौतिक बुनियादी ढांचे के साथ डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का भी विस्तार हुआ है।
पीएम गतिशक्ति जैसे कार्यक्रमों के जरिए विभिन्न बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की एकीकृत योजना पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करके परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन को अधिक प्रभावी बनाना है।
राष्ट्रीय औद्योगिक कॉरिडोर कार्यक्रम के तहत विभिन्न क्षेत्रों में औद्योगिक केंद्र और स्मार्ट औद्योगिक शहर विकसित किए जा रहे हैं।
ऐसे औद्योगिक केंद्रों का उद्देश्य कंपनियों को जमीन, बिजली, सड़क, पानी, लॉजिस्टिक्स और अन्य आवश्यक सुविधाएं एक ही औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र में उपलब्ध कराना है।
‘प्लग एंड प्ले’ जैसी अवधारणाएं भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण हैं, जहां उद्योगों के लिए पहले से विकसित बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों और उन्हें परियोजना शुरू करने में कम समय लगे।
विनिर्माण केवल फैक्टरी लगाने तक सीमित नहीं है। उत्पादों को बाजार तक पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
ONDC जैसे डिजिटल कॉमर्स प्लेटफॉर्म छोटे कारोबारियों और निर्माताओं को व्यापक बाजारों से जोड़ने की क्षमता रखते हैं। डिजिटल माध्यमों से छोटे उद्यम स्थानीय बाजार से बाहर निकलकर दूसरे शहरों और क्षेत्रों में भी ग्राहकों तक पहुंच सकते हैं।
इससे छोटे निर्माताओं के लिए बाजार विस्तार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
विनिर्माण के अगले चरण में पर्यावरणीय स्थिरता भी महत्वपूर्ण होगी। वैश्विक कंपनियां अब सप्लायर चुनते समय कार्बन उत्सर्जन, ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यावरणीय मानकों को भी महत्व दे रही हैं।
इसलिए भारत के उद्योगों के लिए कम कार्बन वाली उत्पादन तकनीक, ऊर्जा दक्ष मशीनरी, रीसाइक्लिंग और सर्कुलर इकोनॉमी से जुड़ी क्षमताएं विकसित करना भी जरूरी होगा।
CII की 2026 की ऊर्जा संबंधी रिपोर्ट में भी ऊर्जा सुरक्षा, दक्षता, लचीलापन और घरेलू क्षमता को भविष्य के औद्योगिक विकास से जोड़ा गया है।
अगले चरण में केवल विदेश से तकनीक खरीदकर उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को अपने अनुसंधान एवं विकास यानी R&D आधार को भी मजबूत करना होगा।
नई उत्पादन तकनीक, सामग्री विज्ञान, रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर डिजाइन, बायोटेक्नोलॉजी और उन्नत इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में घरेलू शोध क्षमता विकसित करने से भारतीय उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकता है।
इस दिशा में उद्योग, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।
वैश्विक बाजार में उत्पाद बेचने के लिए लागत के साथ गुणवत्ता भी निर्णायक होती है। भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उत्पाद तैयार करने, प्रमाणन हासिल करने और लगातार गुणवत्ता बनाए रखने की क्षमता विकसित करनी होगी।
एक बार वैश्विक आपूर्ति शृंखला में शामिल होने के बाद कंपनियों के सामने समय, गुणवत्ता और विश्वसनीयता के कठोर मानक होते हैं। इसलिए ‘मेक इन इंडिया’ के अगले चरण में ‘मेड इन इंडिया’ की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
भारत ने विभिन्न देशों और क्षेत्रों के साथ व्यापार समझौतों के माध्यम से बाजार पहुंच बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। CII के अनुसार भारत ने 38 देशों को कवर करने वाले नौ प्रमुख व्यापार समझौते किए हैं और कई अन्य समझौते बातचीत के चरण में हैं।
व्यापार समझौतों से भारतीय निर्माताओं को कुछ बाजारों में बेहतर पहुंच मिल सकती है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब भारतीय उद्योग वैश्विक कीमत, गुणवत्ता और समय पर डिलीवरी के मानकों पर प्रतिस्पर्धा कर सके।
कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिनका संबंध केवल व्यापार से नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा से भी है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, दवा, रसायन, ऊर्जा उपकरण और महत्वपूर्ण औद्योगिक घटकों में घरेलू क्षमता बढ़ाने से बाहरी झटकों के समय आपूर्ति शृंखला अधिक लचीली हो सकती है।
CII के 2026-27 के नीति विश्लेषण में फार्मा, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और कंटेनर निर्माण जैसे क्षेत्रों के लिए विभिन्न नीतिगत पहलों का उल्लेख किया गया है।
भारत में औद्योगिक निवेश केवल केंद्र सरकार की नीतियों पर निर्भर नहीं करता। जमीन, बिजली, स्थानीय अनुमति, श्रम संबंधी प्रक्रियाएं, पानी और स्थानीय बुनियादी ढांचा जैसे कई विषय राज्यों के स्तर पर भी महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए अलग-अलग राज्यों के बीच निवेश आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा और बेहतर औद्योगिक वातावरण तैयार करने की क्षमता भारत की विनिर्माण रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।
उद्योग के लिए नियमों की संख्या और अनुपालन की लागत भी निवेश संबंधी फैसलों को प्रभावित करती है। CII का कहना है कि अगले चरण में अनुपालन प्रक्रियाओं को और सरल बनाने तथा केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत होगी।
यदि कंपनियों को अनुमति, लाइसेंस और नियामकीय प्रक्रियाओं में अधिक स्पष्टता और समयबद्धता मिलती है, तो परियोजनाओं को जमीन पर उतारने में लगने वाला समय कम किया जा सकता है।
मेक इन इंडिया की सफलता का एक पहलू यह भी है कि भारत में विदेशी कंपनियों की मौजूदगी के साथ भारतीय कंपनियां भी वैश्विक उत्पादन नेटवर्क का हिस्सा बनें।
बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ भारतीय आपूर्तिकर्ताओं का जुड़ना, तकनीकी साझेदारी, संयुक्त अनुसंधान और भारतीय कंपनियों का विदेशों में विस्तार घरेलू औद्योगिक क्षमता को गहरा कर सकता है।
विनिर्माण की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि किसी देश में कितने उत्पाद बने। यह भी देखना होगा कि उन उत्पादों में देश के भीतर कितना मूल्य जोड़ा गया।
कच्चे माल से लेकर डिजाइन, इंजीनियरिंग, घटक निर्माण, असेंबली, सॉफ्टवेयर, ब्रांडिंग और बिक्री के बाद की सेवाओं तक यदि अधिक गतिविधियां भारत में होती हैं तो घरेलू अर्थव्यवस्था में विनिर्माण का योगदान और गहरा होता है।
यही वह बदलाव है जिसे CII ‘मैन्युफैक्चरिंग डेप्थ’ के रूप में रेखांकित कर रहा है।
भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार एक महत्वपूर्ण ताकत है, लेकिन वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए केवल घरेलू मांग पर्याप्त नहीं होगी।
भारतीय उद्योग को उत्पादन लागत, ऊर्जा लागत, लॉजिस्टिक्स, वित्त की उपलब्धता, श्रम उत्पादकता और तकनीक जैसे क्षेत्रों में लगातार सुधार करना होगा। इसके साथ उच्च गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति की क्षमता भी विकसित करनी होगी।
मेक इन इंडिया के पहले 12 वर्षों में भारत ने उत्पादन क्षमता और औद्योगिक बुनियादी ढांचे के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अब अगले चरण में देश के सामने अधिक जटिल लेकिन महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं—उच्च तकनीक वाले उत्पादों का निर्माण, घरेलू घटक उद्योग का विस्तार, वैश्विक कंपनियों की सप्लाई चेन में अधिक हिस्सेदारी, अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार का सृजन।
CII के अनुसार, भारत को अब विनिर्माण में केवल मात्रा बढ़ाने के बजाय तकनीकी गहराई, घरेलू मूल्यवर्धन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर ध्यान देना होगा।
आने वाले समय में भारत की औद्योगिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू घरेलू बाजार के लिए उत्पादन से आगे बढ़कर दुनिया के लिए उत्पादन करना हो सकता है।
भारतीय कंपनियां यदि वैश्विक गुणवत्ता मानकों पर उत्पाद तैयार करती हैं, लागत प्रतिस्पर्धी बनाए रखती हैं और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं में भरोसेमंद भागीदार बनती हैं, तो भारत की विनिर्माण भूमिका और व्यापक हो सकती है।
यह बदलाव केवल बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। एमएसएमई, स्टार्टअप, तकनीकी कंपनियां और सेवा क्षेत्र भी औद्योगिक मूल्य शृंखला का हिस्सा बन सकते हैं।
विनिर्माण के अगले चरण में सरकार और उद्योग के बीच लगातार संवाद महत्वपूर्ण होगा। नीति स्थिरता, बुनियादी ढांचा, कौशल विकास, व्यापार समझौते, अनुसंधान एवं विकास और वित्तीय पहुंच जैसे विषयों पर संयुक्त प्रयास की आवश्यकता होगी।
CII ने भी सरकार के साथ मिलकर निवेश, प्रतिस्पर्धा, रोजगार और भविष्य के लिए तैयार अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई है। संगठन के अनुसार उद्योग की भूमिका भारत को विकसित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे ले जाने में महत्वपूर्ण है।
‘मेक इन इंडिया’ के 12 वर्ष पूरे होने के साथ भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के सामने अगला सवाल यह नहीं है कि देश में कितना उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, बल्कि यह है कि भारत कितना जटिल, तकनीक-प्रधान और उच्च मूल्य वाला उत्पादन अपने यहां कर सकता है।
पीएलआई से निवेश और उत्पादन को गति मिली है, औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी ढांचे का विस्तार हुआ है तथा वैश्विक कंपनियों की भारत में रुचि बढ़ी है। अब इन उपलब्धियों को गहरी घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं, मजबूत एमएसएमई नेटवर्क, बेहतर कौशल, अनुसंधान एवं विकास और वैश्विक निर्यात क्षमता में बदलना अगला बड़ा कदम होगा।
सीआईआई का संकेत स्पष्ट है कि भारत के विनिर्माण का अगला चरण ‘ज्यादा उत्पादन’ से ‘बेहतर और अधिक मूल्य वाला उत्पादन’ की ओर बढ़ना चाहिए। पैमाने ने जिस औद्योगिक आधार को तैयार किया है, अब तकनीक, नवाचार, कौशल और घरेलू मूल्यवर्धन उस आधार को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बदलने की कुंजी बन सकते हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


