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- 13h ago
नई दिल्ली। भारत की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं में रामलीला का विशेष स्थान है। भगवान श्रीराम के जीवन, उनके आदर्शों, संघर्षों और मर्यादा को मंच के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने वाली यह परंपरा अब देश की सीमाओं से आगे अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक मंचों पर भी अपनी पहचान बना रही है। इसी कड़ी में दिल्ली की 103 वर्ष पुरानी श्री धार्मिक लीला समिति की विशेष रामलीला प्रस्तुति ने शुक्रवार को रूसी हाउस, नई दिल्ली में भारत और रूस के बीच सांस्कृतिक संवाद को नई अभिव्यक्ति दी।
रूसी हाउस के सहयोग से आयोजित इस विशेष सांस्कृतिक संध्या में भगवान श्रीराम के जीवन और आदर्शों पर आधारित संक्षिप्त रामलीला का मंचन किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न देशों के राजनयिकों, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रतिनिधियों, सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों और विशिष्ट अतिथियों ने भाग लिया। मंच पर प्रस्तुत रामकथा के माध्यम से भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को सामने रखा गया, जो धर्म, कर्तव्य, सत्य, त्याग, करुणा, साहस और मर्यादा जैसे मूल्यों को केंद्र में रखती है।
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि रामलीला को केवल धार्मिक प्रस्तुति के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता के माध्यम के तौर पर प्रस्तुत किया गया। रामायण की कथा में निहित मानवीय मूल्यों को मंच पर इस तरह प्रस्तुत किया गया कि विभिन्न देशों से आए अतिथि भारतीय संस्कृति की इस परंपरा से परिचित हो सकें।
आयोजकों के अनुसार, भारत और रूस के बीच लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में संबंध रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कार्यक्रम लोगों के बीच संपर्क और आपसी समझ को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इस सांस्कृतिक संध्या में अनेक देशों के राजनयिकों और प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। सूरीनाम की राजदूत सुश्री हनीशा जयराम, रूसी हाउस की निदेशक डॉ. एलेना रेमिज़ोवा तथा रूस के उप व्यापार आयुक्त एवगेनी ग्रिवा सहित कई गणमान्य अतिथि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
इसके अलावा ब्राजील, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, मंगोलिया, मॉरीशस, फिलिस्तीन, रूस, श्रीलंका और ताजिकिस्तान के दूतावासों के राजनयिक एवं प्रतिनिधियों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया।
इस अंतरराष्ट्रीय भागीदारी ने यह दिखाया कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के बीच भी रुचि और संवाद की संभावनाएं मौजूद हैं।
रूसी हाउस की निदेशक डॉ. एलेना रेमिज़ोवा ने श्री धार्मिक लीला समिति द्वारा 103 वर्षों से रामलीला की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को निरंतर बनाए रखने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने रूसी हाउस और समिति के सहयोग से पहली बार आयोजित इस आयोजन को भारतीय सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण पहल बताया।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी देश की संस्कृति को समझने के लिए केवल पुस्तकों और औपचारिक संवादों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि कला और परंपराओं के प्रत्यक्ष अनुभव से भी लोगों के बीच समझ विकसित होती है।
श्री धार्मिक लीला समिति के अध्यक्ष सुरेश गोयल ने कहा कि एक सदी से अधिक पुरानी रामलीला परंपरा को राजनयिकों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच प्रस्तुत किया जाना समिति के लिए महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पड़ाव है।
उन्होंने कहा कि रामलीला केवल मंच पर प्रस्तुत की जाने वाली धार्मिक कथा नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति और जीवन मूल्यों से जुड़ी परंपरा है। अलग-अलग पीढ़ियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया है और आज इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया जाना इसके विस्तार का एक नया अध्याय है।
उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन भारतीय विरासत के संरक्षण के साथ-साथ विभिन्न देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद को भी मजबूत करते हैं।
समिति के महासचिव धीरज धर गुप्ता ने रूसी हाउस के सहयोग और आतिथ्य के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संस्कृति, परंपरा और साझा मानवीय मूल्यों के माध्यम से भारत और रूस के लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने का यह महत्वपूर्ण अवसर है।
उनके अनुसार, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की विशेषता यह है कि इनमें औपचारिकताओं की जगह कला और परंपरा सीधे लोगों तक पहुंचती है। रामलीला इसी प्रकार का माध्यम है, जिसमें कथा, संगीत, अभिनय और भावनाओं के जरिए भारतीय जीवन-दृष्टि को समझने का अवसर मिलता है।
समिति के सचिव प्रदीप शरण ने विभिन्न देशों से आए राजनयिकों, विशिष्ट अतिथियों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रतिनिधियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक कार्यक्रम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों को एक-दूसरे की परंपराओं, कला और विरासत को समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि जब किसी सांस्कृतिक परंपरा को उसके मूल संदर्भ के साथ अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाता है तो वह केवल एक कार्यक्रम नहीं रह जाती, बल्कि संवाद का माध्यम बन जाती है।
विशेष रामलीला प्रस्तुति में रामायण के प्रमुख प्रसंगों और भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े आदर्शों को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुति के माध्यम से सत्य, धर्म, कर्तव्य, सम्मान, करुणा, साहस और मर्यादा जैसे मूल्यों को सामने रखा गया।
रामकथा का यही पक्ष इसे अलग-अलग समाजों और संस्कृतियों के लिए प्रासंगिक बनाता है। कथा में परिवार, समाज, कर्तव्य, संघर्ष और नैतिक निर्णयों से जुड़े प्रसंग हैं, जिन्हें विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के दर्शक भी अपने-अपने दृष्टिकोण से समझ सकते हैं।
कार्यक्रम में यह संदेश भी उभरकर सामने आया कि कला और संस्कृति की अपनी एक सार्वभौमिक भाषा होती है। अभिनय, संगीत, भाव-भंगिमा और कथा के माध्यम से ऐसी बातों को भी दर्शकों तक पहुंचाया जा सकता है, जिनके लिए किसी एक भाषा की जानकारी आवश्यक नहीं होती।
रामलीला की प्रस्तुति ने इसी सांस्कृतिक शक्ति को प्रदर्शित किया। भारतीय परंपरा में गहराई से जुड़ी रामकथा जब अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने मंचित हुई तो यह आयोजन सांस्कृतिक आदान-प्रदान का अवसर बन गया।
समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. गौरव गुप्ता ने आयोजन को महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अवसर बताते हुए कहा कि भारत और रूस के बीच लंबे समय से मैत्रीपूर्ण संबंध रहे हैं। ऐसे में रूसी हाउस जैसे मंच पर रामलीला की प्रस्तुति दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों को एक अलग स्वरूप देने वाली पहल है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की विविध परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत करने से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के लोगों को भारत की सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने का अवसर मिलता है।
दिल्ली की श्री धार्मिक लीला समिति की रामलीला परंपरा 103 वर्षों से चली आ रही है। लाल किले से जुड़ी इसकी वार्षिक रामलीला दिल्ली की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। लंबे समय से चली आ रही इस परंपरा में समय के साथ मंच, तकनीक और प्रस्तुति के तरीके बदले हैं, लेकिन रामकथा के मूल संदेश को आगे बढ़ाने का सिलसिला जारी रहा है।
रूसी हाउस में विशेष प्रस्तुति इसी निरंतर यात्रा का एक नया पड़ाव रही। पारंपरिक रामलीला का अंतरराष्ट्रीय राजनयिक और सांस्कृतिक मंच पर पहुंचना इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय और पारंपरिक कला रूप आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संवाद का हिस्सा भी बन सकते हैं।
रामलीला जैसी परंपराओं के सामने एक ओर अपनी मूल पहचान और परंपरागत स्वरूप को बनाए रखने की चुनौती है, तो दूसरी ओर बदलते समय और नई पीढ़ी के दर्शकों तक पहुंचने का अवसर भी है। ऐसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन इस परंपरा को नए दर्शक वर्ग से परिचित कराने का माध्यम बन सकते हैं।
डिजिटल माध्यमों और आधुनिक मंच तकनीक के दौर में भी प्रत्यक्ष रंगमंच का महत्व बना हुआ है। रामलीला की जीवंत प्रस्तुति दर्शकों को कथा से भावनात्मक रूप से जोड़ती है और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को अनुभव करने का अवसर देती है।
किसी देश की संस्कृति, कला, साहित्य, संगीत और परंपराएं अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संवाद के अनौपचारिक माध्यम के रूप में भी काम करती हैं। इस दृष्टि से रूसी हाउस में रामलीला का आयोजन सांस्कृतिक कूटनीति के एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।
कार्यक्रम में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने इसे केवल भारत-रूस कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सहभागिता का स्वरूप दिया।
आयोजन ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत की विविधता और उसकी निरंतरता को सामने रखा। 103 वर्षों से चली आ रही रामलीला परंपरा का नए मंच पर प्रस्तुतीकरण इस बात को रेखांकित करता है कि परंपराएं समय के साथ नए मंचों और नए दर्शकों तक पहुंच सकती हैं।
रामलीला के माध्यम से प्रस्तुत मूल्यों को कार्यक्रम में किसी एक क्षेत्र या समुदाय तक सीमित न रखते हुए व्यापक मानवीय संदर्भ में सामने रखा गया। सत्य, कर्तव्य, करुणा, सम्मान और साहस जैसे मूल्य विभिन्न समाजों में अलग-अलग रूपों में महत्व रखते हैं।
समारोह के समापन पर भारत और रूस के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों, सांस्कृतिक सद्भाव और जन-जन के संपर्क को मजबूत करने का संदेश सामने आया। आयोजन ने यह भी रेखांकित किया कि देशों के बीच संबंध केवल सरकारी और राजनयिक स्तर तक सीमित नहीं होते, बल्कि लोगों की संस्कृति, कला और परंपराओं के माध्यम से भी मजबूत होते हैं।
रूसी हाउस में रामलीला की यह प्रस्तुति 103 वर्ष पुरानी परंपरा के लिए एक नया मंच लेकर आई। लाल किले की पारंपरिक रामलीला से लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनयिक समुदाय के बीच विशेष प्रस्तुति तक की यह यात्रा भारतीय सांस्कृतिक विरासत के निरंतर विस्तार की कहानी भी बताती है।
कार्यक्रम में मौजूद विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने भारतीय रामकथा के मंचन के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक परंपरा का एक जीवंत रूप देखा। इस अवसर ने यह संदेश दिया कि संस्कृति संवाद का माध्यम है, परंपरा पीढ़ियों को जोड़ती है और कला भौगोलिक सीमाओं से आगे जाकर लोगों के बीच संपर्क स्थापित कर सकती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


