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- 13h ago
नई दिल्ली। दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग गतिविधियों पर अंकुश लगाने और चिकित्सकों को अनुचित प्रलोभन देने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार ने फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों की समीक्षा और निगरानी के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। नीति आयोग के सदस्य डॉ. एम. श्रीनिवास की अध्यक्षता में गठित यह समिति मौजूदा कानूनी और नियामक व्यवस्था की प्रभावशीलता का आकलन करेगी तथा व्यवस्था में सुधार के लिए अपनी सिफारिशें देगी।
इस पहल को दवा उद्योग में पारदर्शिता बढ़ाने, चिकित्सकों के पेशेवर निर्णयों को अनुचित व्यावसायिक प्रभाव से बचाने और मरीजों के हितों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समिति यह भी देखेगी कि दवा कंपनियों की प्रचार गतिविधियों पर निगरानी रखने और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मौजूदा व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
समिति के गठन का आदेश केंद्र सरकार ने गुरुवार को जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने गत आठ अक्टूबर को दिए गए अपने आदेश में केंद्र सरकार को दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग और उसे नियंत्रित करने वाली मौजूदा कानूनी एवं नियामक व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करने के लिए दो सप्ताह के भीतर समिति गठित करने का निर्देश दिया था।
सरकार की ओर से गठित समिति की अध्यक्षता नीति आयोग के सदस्य डॉ. एम. श्रीनिवास करेंगे। समिति के अन्य दो सदस्यों में पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूदन और मेदांता के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक डॉ. नरेश त्रेहन शामिल हैं।
समिति को फार्मा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले मौजूदा नियमों, निगरानी व्यवस्था और उनके क्रियान्वयन की व्यापक समीक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके साथ ही यह भी आकलन किया जाएगा कि मौजूदा व्यवस्था में कहां कमियां हैं और उन्हें दूर करने के लिए किस तरह के सुधारों की जरूरत है।
समिति अनैतिक मार्केटिंग से जुड़े सभी प्रमुख पहलुओं पर विचार करेगी। इसमें दवा कंपनियों की प्रचार रणनीतियों, चिकित्सकों को दिए जाने वाले कथित अनुचित लाभों, नियमों के अनुपालन और उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई की व्यवस्था जैसे विषय शामिल होंगे।
समिति का उद्देश्य केवल मौजूदा नियमों की समीक्षा करना ही नहीं, बल्कि ऐसा प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करने के लिए सुझाव देना भी है, जिससे नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके और अनैतिक गतिविधियों पर समय रहते रोक लगाई जा सके।
फार्मा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग को लेकर लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि कुछ कंपनियां अपने उत्पादों का अधिक से अधिक प्रचार कराने के लिए चिकित्सकों को महंगे उपहार, यात्रा संबंधी सुविधाएं, आतिथ्य या अन्य आर्थिक और गैर-आर्थिक लाभ देने का प्रयास करती हैं। ऐसे आरोपों का संबंध इस आशंका से है कि व्यावसायिक हित चिकित्सकों के दवा लिखने संबंधी निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, किसी डॉक्टर को दिया गया प्रत्येक लाभ अपने आप में अनैतिक या गैरकानूनी नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में लाभ की प्रकृति, उसका उद्देश्य, लागू नियम और संबंधित परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं। समिति इन मुद्दों की समीक्षा करते हुए यह देख सकती है कि अनुचित प्रलोभनों और वैध पेशेवर गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर करने के लिए नियमों में किस तरह की स्पष्टता आवश्यक है।
दवा कंपनियों की मार्केटिंग का सीधा संबंध चिकित्सकों तक दवाओं की जानकारी पहुंचाने से भी है। इसलिए चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें दवाओं के बारे में वैज्ञानिक और प्रमाण-आधारित जानकारी के प्रसार में बाधा न आए, लेकिन किसी भी प्रकार का अनुचित व्यावसायिक प्रभाव चिकित्सकीय निर्णयों को प्रभावित न कर सके।
दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को लेकर सबसे बड़ी चिंता मरीजों के हितों से जुड़ी है। यदि किसी दवा का चयन उसकी गुणवत्ता, सुरक्षा, प्रभावशीलता और मरीज की जरूरत के बजाय व्यावसायिक प्रलोभन से प्रभावित होता है, तो इससे उपचार की उपयुक्तता पर सवाल उठ सकते हैं।
कई मामलों में मरीज चिकित्सक की सलाह पर पूरी तरह भरोसा करके दवाएं खरीदते हैं। उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि किसी दवा की सिफारिश के पीछे कौन-कौन से चिकित्सकीय और व्यावसायिक कारक काम कर रहे हैं। ऐसे में चिकित्सक की स्वतंत्रता, दवा की वैज्ञानिक उपयोगिता और उपचार की लागत से जुड़े प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
यदि अनावश्यक रूप से महंगी दवाएं लिखे जाने या कम लागत वाले उपयुक्त विकल्पों की अनदेखी की स्थिति पैदा होती है, तो मरीजों और उनके परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। विशेष रूप से लंबे समय तक इलाज कराने वाले मरीजों के लिए दवाओं का खर्च परिवार के बजट पर भारी पड़ सकता है।
हालांकि, किसी महंगी दवा का इस्तेमाल अपने आप में अनैतिकता का प्रमाण नहीं है। कई बार नई दवाओं, विशेष उपचार या मरीज की विशिष्ट स्थिति के कारण अधिक कीमत वाली दवा आवश्यक हो सकती है। इसलिए महत्वपूर्ण यह है कि दवा का चयन चिकित्सकीय जरूरत और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर हो, न कि किसी अनुचित व्यावसायिक लाभ से प्रभावित होकर।
इस पूरे मामले में सबसे अहम मुद्दा दवा कंपनियों की जवाबदेही और नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन का है। सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि यदि चिकित्सकों के लिए अनुचित लाभ स्वीकार करने पर कार्रवाई का प्रावधान है, तो ऐसे लाभ देने वाली कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए समान रूप से प्रभावी वैधानिक व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में असमानता है। उसके अनुसार, कथित अनुचित लाभ स्वीकार करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन उन्हें ऐसे लाभ देने वाली दवा कंपनियों को नियंत्रित करने या दंडित करने के लिए समान स्तर की वैधानिक व्यवस्था का अभाव है।
याचिका में प्रभावी कानून बनने तक सुप्रीम कोर्ट से फार्मा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग को नियंत्रित करने और उसके नियमन के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करने का अनुरोध किया गया है।
यही वजह है कि सरकार की ओर से गठित समिति की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। समिति मौजूदा नियमों की समीक्षा करते हुए यह आकलन करेगी कि स्वैच्छिक आचार संहिता, नियामक प्रावधानों और संबंधित निगरानी व्यवस्थाओं के माध्यम से अनैतिक मार्केटिंग पर कितना प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है तथा कहां अतिरिक्त कानूनी प्रावधानों की जरूरत पड़ सकती है।
समिति के विचारार्थ विषयों में अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपायों पर विचार करना भी शामिल है। इसके तहत यह देखा जाएगा कि निगरानी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने, शिकायतों के निपटारे और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की प्रक्रिया में किस तरह सुधार किया जा सकता है।
दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों की निगरानी तभी प्रभावी हो सकती है, जब नियम स्पष्ट हों, उनकी जानकारी संबंधित पक्षों तक पहुंचे और उल्लंघन की शिकायतों पर समयबद्ध तरीके से कार्रवाई हो। इसके साथ ही जांच की प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए, ताकि किसी कंपनी या चिकित्सक के खिलाफ लगाए गए आरोपों का मूल्यांकन तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जा सके।
समिति इस उद्देश्य से संबंधित हितधारकों, तकनीकी विशेषज्ञों, पेशेवर विशेषज्ञों और संबंधित क्षेत्रों के संस्थानों एवं निकायों के साथ विचार-विमर्श भी करेगी। इस प्रक्रिया से दवा उद्योग, चिकित्सा समुदाय और मरीजों के हितों से जुड़े विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद मिल सकती है।
समिति की सिफारिशें दवा कंपनियों की प्रचार गतिविधियों और चिकित्सकों के साथ उनके व्यावसायिक संबंधों को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं। यदि समीक्षा में मौजूदा नियमों की कमियां सामने आती हैं, तो सरकार के सामने उन्हें दूर करने के लिए नियामक सुधारों या अतिरिक्त कानूनी प्रावधानों पर विचार करने का आधार होगा।
दवा कंपनियों के लिए स्पष्ट नियमों का अर्थ यह होगा कि उन्हें अपने उत्पादों के प्रचार में निर्धारित मानकों का पालन करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी गतिविधियां चिकित्सकीय निर्णयों की स्वतंत्रता को प्रभावित न करें।
चिकित्सकों के लिए भी पारदर्शी व्यवस्था महत्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि कंपनियों से किसी प्रकार का सहयोग या लाभ किन परिस्थितियों में स्वीकार्य है और किन परिस्थितियों में वह अनुचित माना जाएगा। इससे चिकित्सा पेशे में नैतिक मानकों और मरीजों के भरोसे को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।
मरीजों के दृष्टिकोण से ऐसी व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि उपचार संबंधी फैसले उनकी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों, दवाओं की सुरक्षा, प्रभावशीलता और उचित लागत को ध्यान में रखकर किए जाएं।
सरकार के आदेश के अनुसार, समिति मामले की व्यापक समीक्षा करेगी और संबंधित पक्षों से प्राप्त सुझावों पर विचार करने के बाद अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करेगी। समिति अनैतिक मार्केटिंग पर अंकुश लगाने से जुड़े अन्य प्रासंगिक मुद्दों पर भी विचार कर सकेगी।
समिति को अपनी पहली बैठक की तारीख से दो महीने के भीतर औषधि विभाग को सिफारिशें सौंपनी हैं। इसके बाद केंद्र सरकार समिति की रिपोर्ट पर विचार करेगी और उस पर उचित निर्णय लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी।
यह समयसीमा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार से मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर ठोस कदम उठाने को कहा है। समिति की रिपोर्ट से सरकार को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि मौजूदा नियामक ढांचे में सुधार पर्याप्त होंगे या अधिक प्रभावी वैधानिक व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता होगी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, समिति की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद केंद्र सरकार उसकी सिफारिशों पर विचार करेगी। सरकार को समिति की सिफारिशें हलफनामे के माध्यम से अदालत के रिकॉर्ड पर रखनी होंगी और उन पर लिए गए निर्णय से सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराना होगा।
इस मामले में अगली सुनवाई 29 जनवरी, 2027 को निर्धारित है। ऐसे में समिति की समीक्षा और उसकी सिफारिशें आगे की न्यायिक कार्यवाही में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
फिलहाल समिति के गठन का उद्देश्य मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करना और अनैतिक मार्केटिंग पर नियंत्रण के लिए आवश्यक सुधार सुझाना है। समिति की रिपोर्ट आने और सरकार के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा कि दवा कंपनियों की जवाबदेही बढ़ाने के लिए किस तरह के ठोस कदम उठाए जाएंगे।
दवाओं का बाजार केवल व्यावसायिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे लोगों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा है। इसलिए इस क्षेत्र में मार्केटिंग के नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन विशेष महत्व रखता है। दवा कंपनियों को अपने उत्पादों के प्रचार का अधिकार है, लेकिन यह प्रचार वैज्ञानिक तथ्यों, पारदर्शिता और निर्धारित नैतिक मानकों के अनुरूप होना चाहिए।
इसी तरह, चिकित्सकों की स्वतंत्रता और मरीजों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। किसी दवा का चयन उसके चिकित्सकीय लाभ, सुरक्षा, गुणवत्ता और मरीज की जरूरत के आधार पर होना चाहिए। यदि किसी भी स्तर पर अनुचित प्रलोभन निर्णयों को प्रभावित करता है, तो इससे चिकित्सा व्यवस्था में लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है।
केंद्र सरकार की ओर से गठित तीन सदस्यीय समिति से उम्मीद की जा रही है कि वह इन सभी पहलुओं की व्यापक समीक्षा कर ऐसी सिफारिशें देगी, जिनसे निगरानी तंत्र मजबूत हो, नियमों के अनुपालन में सुधार आए और अनैतिक मार्केटिंग पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने का रास्ता साफ हो। हालांकि, अंतिम परिणाम समिति की रिपोर्ट, सरकार के निर्णय और लागू किए जाने वाले उपायों पर निर्भर करेगा।
इस पूरे मामले का केंद्रीय प्रश्न यही है कि दवा कंपनियों की व्यावसायिक गतिविधियों और मरीजों के स्वास्थ्य हितों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद गठित समिति की समीक्षा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


