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- 12h ago
मेरठ। बहुचर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड, जिसे नीला ड्रम केस के नाम से जाना जाता है, में अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई। जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत में बुधवार को सजा के बिंदु पर सुनवाई हुई। जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए दोनों दोषियों से अदालत ने पूछा कि सजा सुनाए जाने से पहले वे कुछ कहना चाहते हैं या नहीं। दोनों ने जवाब दिया कि उन्हें कुछ नहीं कहना है।
लंच के बाद दोनों को दोबारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश किया गया। इसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुनाया। जेल प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, फैसला सुनते समय मुस्कान ने हाथ जोड़ रखे थे और बाद में वह रोने लगी। साहिल शुक्ला की आंखें भी नम हो गईं।
इस मामले में अभियोजन पक्ष ने वारदात की गंभीरता, हत्या के तरीके और शव को छिपाने के लिए अपनाए गए कथित तौर-तरीकों का हवाला देते हुए दोनों दोषियों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी। वहीं, बचाव पक्ष ने मुस्कान की दो बेटियों के भविष्य और उनकी परवरिश का उल्लेख करते हुए अदालत से सजा में नरमी बरतने की अपील की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सजा सुनाई।
सजा पर फैसला सुनाने से पहले मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जिला जज के सामने अलग-अलग पेश किया गया। अदालत ने दोनों को अपनी बात रखने का अवसर दिया और पूछा कि क्या वे सजा के संबंध में कुछ कहना चाहते हैं। दोनों ने कहा कि उन्हें कुछ नहीं कहना है।
सीनियर जेल सुपरिटेंडेंट वीरेश राज शर्मा के मुताबिक, सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों से विभिन्न मुद्दों पर सवाल किए। इनमें फॉरेंसिक रिपोर्ट से जुड़े पहलू भी शामिल थे। उन्होंने सवालों का विस्तृत ब्योरा साझा नहीं किया, लेकिन बताया कि दोनों ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा।
जेल प्रशासन के अनुसार, फैसला सुनाए जाने से पहले दोनों बेचैन नजर आ रहे थे। बताया गया कि उन्होंने रात और सुबह के भोजन में कम खाना खाया था और ठीक से सो भी नहीं पा रहे थे। यह जानकारी जेल प्रशासन के हवाले से सामने आई है।
मामले की सुनवाई के दौरान मुस्कान की दोनों बेटियों का मुद्दा भी उठा। सीनियर जेल सुपरिटेंडेंट वीरेश राज शर्मा के मुताबिक, मुस्कान पिछले तीन-चार दिनों से अपनी बड़ी बेटी से मिलने की गुजारिश कर रही थी। बच्ची की उम्र करीब सात वर्ष बताई गई है। हालांकि, जेल अधीक्षक के अनुसार, बच्ची को उससे मिलवाने के लिए जेल नहीं लाया गया था।
सजा पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की अधिवक्ता रेखा जैन ने मुस्कान की दोनों बेटियों के भविष्य और उनके पालन-पोषण का हवाला दिया। बचाव पक्ष की ओर से अदालत से अनुरोध किया गया कि सजा तय करते समय बच्चों के भविष्य और पारिवारिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाए।
दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता और वारदात के तरीके को आधार बनाते हुए कठोरतम सजा की मांग की। इस तरह सुनवाई में एक ओर अपराध की प्रकृति और गंभीरता का सवाल था, तो दूसरी ओर दोषियों की पारिवारिक परिस्थितियों को लेकर बचाव पक्ष की दलीलें थीं।
जिला शासकीय अधिवक्ता कृष्ण कुमार चौबे ने अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में पैरवी की। अभियोजन के अनुसार, मुस्कान ने अपने पति सौरभ राजपूत की हत्या में साहिल शुक्ला के साथ मिलकर भूमिका निभाई। आरोपों के मुताबिक, हत्या के बाद शव के टुकड़े किए गए और उसे नीले ड्रम में छिपाने के लिए सीमेंट का इस्तेमाल किया गया।
अभियोजन पक्ष ने वारदात की प्रकृति, शव को ठिकाने लगाने के लिए अपनाए गए तरीके और अपराध की गंभीरता को अपनी दलीलों का आधार बनाया। अभियोजन का कहना था कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए दोनों दोषियों को कठोरतम सजा दी जानी चाहिए।
इसके विपरीत, बचाव पक्ष ने मुस्कान की पारिवारिक परिस्थितियों और उसकी दो बेटियों की जिम्मेदारी का उल्लेख करते हुए कम सजा देने की अपील की। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सजा पर फैसला सुनाया।
सौरभ राजपूत की गुमशुदगी की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की थी। जांच अधिकारी और तत्कालीन ब्रह्मपुरी थाना प्रभारी रमाकांत पचौरी के मुताबिक, 18 मार्च 2025 को सौरभ के भाई बबलू ने उसके लापता होने की सूचना दी थी। शिकायत में मुस्कान और साहिल पर संदेह जताया गया था।
शिकायत के आधार पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई। पूछताछ और अन्य साक्ष्यों की कड़ियां जोड़ने के बाद मामले का खुलासा हुआ। इसके बाद घर में रखे नीले ड्रम से सौरभ का शव बरामद किया गया। शव की बरामदगी के बाद मामला देशभर में चर्चा का विषय बन गया।
जांच अधिकारी के अनुसार, पूछताछ के दौरान मुस्कान के बयान और सामने आए तथ्यों के आधार पर पुलिस ने मामले की गहन जांच की। पुलिस ने घटनाक्रम से जुड़े साक्ष्य जुटाए और उनकी कड़ियों को जोड़कर आगे की कार्रवाई की।
पुलिस जांच के अनुसार, वारदात वाली रात सौरभ अपनी मां रेनू देवी के घर से कोफ्ते की सब्जी लेकर आया था। आरोप था कि मुस्कान ने सब्जी में नशीली दवा मिला दी थी। सौरभ के बेसुध होने के बाद साहिल को घर बुलाया गया। पुलिस के मुताबिक, इसके बाद सौरभ की हत्या की गई और वॉशरूम में उसके शव के टुकड़े किए गए।
जांच में सामने आए घटनाक्रम के अनुसार, शव को पहले ब्रीफकेस में रखने की कोशिश की गई, लेकिन ब्रीफकेस का हुक टूटने के बाद उसे बेड में रखा गया। बाद में शव को नीले ड्रम में छिपाया गया। शव को छिपाने के लिए सीमेंट के इस्तेमाल की बात भी जांच में सामने आई थी।
पुलिस ने मामले से जुड़े तथ्यों, परिस्थितियों और अन्य साक्ष्यों को संकलित कर अभियोजन पक्ष के सामने रखा। अदालत में इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर मामले की सुनवाई हुई। मामले की गंभीरता और शव को छिपाने के तरीके के कारण यह घटना लंबे समय तक चर्चा में रही।
पुलिस जांच में परिस्थितिजन्य, इलेक्ट्रॉनिक और फॉरेंसिक साक्ष्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। मामले में कोई प्रत्यक्ष चश्मदीद गवाह नहीं होने के कारण जांच एजेंसी ने घटनाक्रम से जुड़े विभिन्न तथ्यों और रिकॉर्ड की पड़ताल की।
पुलिस ने उस कैब चालक से पूछताछ की, जिसके वाहन से मुस्कान और साहिल के वारदात के बाद घूमने जाने की जानकारी सामने आई थी। जिस होटल में दोनों के ठहरने की बात कही गई, वहां से भी संबंधित बयान और सीसीटीवी फुटेज जुटाए गए।
इसके अलावा मोबाइल फोन की कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन, होटल के रजिस्टर और फॉरेंसिक रिपोर्ट जैसे साक्ष्यों की कड़ियां जोड़ी गईं। जिला शासकीय अधिवक्ता कृष्ण कुमार चौबे के मुताबिक, इन साक्ष्यों ने अभियोजन पक्ष के मामले को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों वाले मामलों में घटनाक्रम की अलग-अलग कड़ियों का आपस में मेल खाना महत्वपूर्ण होता है। इस मामले में पुलिस ने उपलब्ध रिकॉर्ड और जांच से सामने आए तथ्यों को जोड़कर अदालत के सामने अपना पक्ष रखा।
सौरभ राजपूत हत्याकांड शव को छिपाने के लिए नीले ड्रम के इस्तेमाल और जांच में सामने आए घटनाक्रम के कारण देशभर में चर्चा में रहा। मामले में पुलिस की जांच, फॉरेंसिक साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य तथ्यों को लेकर लगातार ध्यान बना रहा।
सजा पर सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता के आधार पर मृत्युदंड की मांग की, जबकि बचाव पक्ष ने मुस्कान की दोनों बेटियों के भविष्य और पालन-पोषण का मुद्दा उठाया। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
कानूनी प्रक्रिया का अगला पहलू: मृत्युदंड के मामलों में भारतीय कानून के तहत संबंधित उच्च न्यायालय की पुष्टि की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। इसलिए सजा सुनाए जाने और उसके अंतिम रूप से लागू होने की स्थिति में अंतर समझना आवश्यक है। इस मामले में आगे की अपील या पुष्टि संबंधी प्रक्रिया की नवीनतम स्थिति आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड से सत्यापित की जानी चाहिए।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


