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- 12h ago
नई दिल्ली। भारत में प्रोस्टेट कैंसर को लेकर पुरुषों में जागरूकता की कमी एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के रूप में सामने आई है। हेल फाउंडेशन की ओर से 45 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 1,036 पुरुषों पर किए गए एक सर्वेक्षण में सामने आया कि 10 में से लगभग 6 पुरुषों को यह जानकारी ही नहीं है कि उन्होंने कभी प्रोस्टेट कैंसर की जांच कराई है या नहीं। सर्वेक्षण के अनुसार, 84 प्रतिशत पुरुष ऐसे हैं, जिन्होंने जांच नहीं कराई, अपनी जांच की स्थिति को लेकर अनिश्चित हैं या मानते हैं कि उन्हें ऐसी जांच की जरूरत नहीं है।
दिल्ली-एनसीआर सहित तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र में किए गए इस सर्वेक्षण ने प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम कारकों, जांच के विकल्पों और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेने को लेकर जागरूकता की कमी को उजागर किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित स्वास्थ्य जांच के बावजूद प्रोस्टेट स्वास्थ्य पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो रही है। इसके चलते पुरुषों को न तो अपने जोखिम की सही जानकारी मिल पाती है और न ही वे यह समझ पाते हैं कि उन्हें डॉक्टर से कब और किन जांचों के बारे में बात करनी चाहिए।
सर्वेक्षण के अनुसार, 68.9 प्रतिशत पुरुष प्रोस्टेट कैंसर का एक भी जोखिम कारक नहीं बता सके। वहीं, केवल 13.2 प्रतिशत पुरुषों ने पारिवारिक इतिहास को इस बीमारी का जोखिम कारक माना। करीब 75 प्रतिशत प्रतिभागियों का मानना था कि प्रोस्टेट कैंसर की निगरानी 50 वर्ष या उसके बाद ही शुरू होनी चाहिए।
ये आंकड़े बताते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ प्रोस्टेट स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आवश्यकता के बावजूद बड़ी संख्या में पुरुषों को यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें अपनी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार कब चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। खासतौर पर परिवार में प्रोस्टेट कैंसर का इतिहास होने जैसे पहलुओं की जानकारी और उनके महत्व को समझना जरूरी है।
मैक्स हेल्थकेयर, दिल्ली में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के वाइस चेयरमैन डॉ. देवव्रत आर्य ने कहा कि सर्वेक्षण के निष्कर्ष प्रोस्टेट कैंसर के प्रति बुनियादी जागरूकता की कमी को दर्शाते हैं। जब बड़ी संख्या में पुरुष जोखिम कारकों की पहचान नहीं कर पाते और उन्हें अपनी जांच की स्थिति तक मालूम नहीं होती, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि 45 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों के नियमित स्वास्थ्य संवाद में प्रोस्टेट स्वास्थ्य को प्रमुखता देने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि बीमारी के जोखिम, जांच की भूमिका और डॉक्टर से परामर्श लेने के सही समय की जानकारी बेहतर स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने की दिशा में पहला कदम है। पुरुषों को अपने स्वास्थ्य के बारे में सवाल पूछने और आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
सर्वेक्षण में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि लगभग दो-तिहाई पुरुष सालाना सामान्य स्वास्थ्य जांच कराते हैं, लेकिन इसके बावजूद 60.8 प्रतिशत पुरुषों को अपनी प्रोस्टेट कैंसर जांच की स्थिति का पता नहीं है। केवल लगभग छह में से एक पुरुष ने बताया कि उसने कभी प्रोस्टेट कैंसर की जांच कराई है।
इससे संकेत मिलता है कि सामान्य स्वास्थ्य जांच और प्रोस्टेट कैंसर की जांच के बीच का अंतर अनेक पुरुषों के लिए स्पष्ट नहीं है। नियमित रूप से ब्लड टेस्ट या अन्य सामान्य स्वास्थ्य परीक्षण कराना अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता कि प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम का भी मूल्यांकन किया गया है। इसके लिए डॉक्टर से विशेष रूप से चर्चा करना आवश्यक हो सकता है।
प्रोस्टेट-स्पेसिफिक एंटीजन यानी पीएसए रक्त जांच के बारे में भी जानकारी सीमित पाई गई। सर्वेक्षण में केवल 31 प्रतिशत पुरुषों ने इस जांच के बारे में सुन रखा था, जबकि महज 14 प्रतिशत ने स्वयं इसकी मांग की थी।
फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफएमआरआई) में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के प्रिंसिपल डायरेक्टर डॉ. नितेश रोहतगी ने कहा कि सामान्य स्वास्थ्य जांच कराने के बावजूद प्रोस्टेट स्वास्थ्य नियमित चिकित्सकीय बातचीत का हिस्सा नहीं बन पा रहा है। उनके अनुसार, 84 प्रतिशत पुरुषों का जांच से वंचित होना, अपनी स्थिति को लेकर अनिश्चित रहना या जांच को गैर-जरूरी मानना जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि विशेष रूप से बुजुर्ग मरीजों और उनके परिवारों में बीमारी से जुड़े लक्षणों को उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया समझकर नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति निदान में देरी का कारण बन सकती है। बीमारी का पता चलने के बाद भी कई मरीज और उनके परिजन रेडियोलिगैंड थेरेपी जैसे उन्नत उपचार विकल्पों से परिचित नहीं होते। इसलिए बीमारी की रोकथाम संबंधी जागरूकता, शुरुआती मूल्यांकन और निदान के बाद उपलब्ध उपचार विकल्पों की जानकारी पर समान रूप से ध्यान देना जरूरी है।
प्रोस्टेट-स्पेसिफिक एंटीजन (पीएसए) एक रक्त जांच है, जिसका उपयोग प्रोस्टेट से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के मूल्यांकन में किया जाता है। पीएसए का स्तर बढ़ने पर प्रोस्टेट कैंसर की संभावना सहित कई कारणों पर विचार किया जा सकता है, लेकिन केवल पीएसए जांच के आधार पर कैंसर की पुष्टि नहीं होती।
जांच कराने या न कराने का निर्णय व्यक्ति की उम्र, पारिवारिक इतिहास, स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों और संभावित लाभ तथा सीमाओं को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर के साथ मिलकर लेना चाहिए। हर व्यक्ति के लिए जांच की जरूरत और उसका सही समय एक जैसा नहीं होता। इसलिए किसी तय उम्र तक इंतजार करने या बिना चिकित्सकीय सलाह के जांच कराने के बजाय व्यक्तिगत जोखिम के आधार पर मार्गदर्शन लेना महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुषों को डॉक्टर से यह स्पष्ट रूप से पूछना चाहिए कि क्या उनकी उम्र और स्वास्थ्य इतिहास को देखते हुए प्रोस्टेट कैंसर की जांच पर चर्चा करना उचित है। यदि पहले कोई जांच हुई है, तो उसकी रिपोर्ट और आगे की जरूरतों के बारे में भी जानकारी लेनी चाहिए।
सर्वेक्षण में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के स्रोतों को लेकर भी महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए। लगभग 67 प्रतिशत पुरुषों ने कहा कि वे स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए डॉक्टरों पर सबसे अधिक भरोसा करते हैं। हालांकि, केवल 36 प्रतिशत पुरुष सही ढंग से पहचान सके कि प्रोस्टेट कैंसर के मूल्यांकन और उपचार के लिए यूरोलॉजिस्ट यानी मूत्र एवं पुरुष प्रजनन तंत्र संबंधी रोगों के विशेषज्ञ से परामर्श लेना उपयुक्त है।
इसके अलावा, 44 प्रतिशत पुरुषों ने कहा कि वे उपचार शुरू करने से पहले दूसरी चिकित्सकीय राय लेना चाहेंगे। यह आंकड़ा बताता है कि उपचार संबंधी निर्णयों में सही जानकारी, विशेषज्ञ की सलाह और भरोसे की महत्वपूर्ण भूमिका है।
फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम में न्यूक्लियर मेडिसिन की प्रिंसिपल डायरेक्टर डॉ. इशिता बी. सेन ने कहा कि सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता और प्रोस्टेट स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। अनेक पुरुष नियमित जांच तो कराते हैं, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि प्रोस्टेट कैंसर की जांच पर चर्चा हुई थी या उन्होंने कभी पीएसए टेस्ट कराया था।
उन्होंने कहा कि लोगों को जोखिम कारकों, जांच की भूमिका और अपनी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के अनुरूप डॉक्टर से परामर्श लेने के महत्व के बारे में शिक्षित करना जरूरी है। सही जानकारी मिलने से मरीज अपने स्वास्थ्य के बारे में अधिक जागरूक होकर निर्णय ले सकते हैं।
सर्वेक्षण में बीमारी से जुड़े विषयों पर खुलकर बात करने में पुरुषों की झिझक भी सामने आई। देशभर में 59.5 प्रतिशत पुरुषों ने कहा कि वे डॉक्टर से प्रोस्टेट कैंसर की जांच या उपचार के बारे में चर्चा करने में असहज महसूस करते हैं। वहीं, केवल करीब 18 प्रतिशत पुरुषों ने बताया कि वे स्वयं पहल करके इस विषय पर बातचीत शुरू करेंगे।
इसके विपरीत, 84 प्रतिशत पुरुषों ने स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए ऑनलाइन खोज करने की बात कही। वहीं, 48 प्रतिशत ने बताया कि परिवार या मित्रों ने प्रोस्टेट कैंसर के बारे में उनकी पहली बातचीत को प्रभावित किया।
यह स्थिति दर्शाती है कि इंटरनेट और परिचित लोगों के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने की प्रवृत्ति बढ़ने के बावजूद विशेषज्ञों से सीधे सवाल पूछने में झिझक बनी हुई है। ऑनलाइन उपलब्ध जानकारी शुरुआती समझ विकसित करने में सहायक हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति के जोखिम, जांच की आवश्यकता या उपचार का निर्णय केवल इंटरनेट पर मिली जानकारी के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
परिवार के सदस्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि घर में स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर खुलकर चर्चा की जाए और पुरुषों को नियमित जांच के दौरान अपनी समस्याएं बताने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो चिकित्सकीय परामर्श लेने में उनकी झिझक कम करने में मदद मिल सकती है।
सर्वेक्षण के अनुसार, 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के पुरुषों में भी प्रोस्टेट कैंसर से संबंधित जानकारी की कमी स्पष्ट रूप से सामने आई। इस आयु वर्ग में लगभग 72 प्रतिशत पुरुष अपनी जांच की स्थिति को लेकर अनिश्चित थे, जबकि उपचार संबंधी जानकारी की कमी करीब 80 प्रतिशत रही।
अलग-अलग आयु वर्गों में पारिवारिक इतिहास को जोखिम कारक मानने वाले पुरुषों का अनुपात भी केवल 11 से 14 प्रतिशत के बीच रहा। इससे पता चलता है कि उम्र बढ़ने के साथ भी बीमारी के जोखिम और जांच से जुड़ी जानकारी अपने आप बेहतर नहीं हो रही है।
बुजुर्गों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को अक्सर उम्र का सामान्य हिस्सा मान लिया जाता है। ऐसे में परिवार के सदस्यों और देखभाल करने वालों की जिम्मेदारी है कि वे स्वास्थ्य में होने वाले बदलावों को गंभीरता से लें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से परामर्श लेने में सहयोग करें। हालांकि, केवल उम्र या किसी एक लक्षण के आधार पर प्रोस्टेट कैंसर का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि प्रोस्टेट कैंसर के प्रति जागरूकता की चुनौती किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं है। जोखिम कारकों की जानकारी, पीएसए जांच की समझ, अपनी जांच की स्थिति का पता होना और समय रहते चिकित्सकीय परामर्श लेना ऐसे प्रमुख क्षेत्र हैं, जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जागरूकता बढ़ाने के लिए स्वास्थ्य संस्थानों, चिकित्सकों, परिवारों और जनस्वास्थ्य अभियानों को मिलकर काम करना होगा। पुरुषों को यह समझाना जरूरी है कि सामान्य हेल्थ चेकअप और प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम का आकलन अलग-अलग विषय हो सकते हैं। साथ ही, जांच की आवश्यकता पर व्यक्तिगत स्वास्थ्य इतिहास के आधार पर डॉक्टर से चर्चा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
प्रोस्टेट कैंसर को लेकर खुली बातचीत, सही जानकारी और समय पर विशेषज्ञ की सलाह बीमारी के मूल्यांकन तथा उपयुक्त उपचार की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती है। सर्वेक्षण का मुख्य संदेश यही है कि पुरुषों को अपने प्रोस्टेट स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना चाहिए और नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान इस विषय को भी चिकित्सकीय चर्चा का हिस्सा बनाना चाहिए।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


