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नई दिल्ली। दशकों से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर मंगलवार को एक महत्वपूर्ण अंतरराज्यीय समझौता हुआ। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की उपस्थिति में छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने किशाऊ परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली शामिल हैं। इस मौके पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी मौजूद रहे।
किशाऊ परियोजना के तहत उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाया जाएगा। परियोजना में करीब 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल संग्रहण की क्षमता प्रस्तावित है। इससे लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होने और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन की संभावना बताई गई है।
परियोजना को लेकर हुए समझौते को उत्तर भारत में जल प्रबंधन, सिंचाई, पेयजल उपलब्धता, पर्यावरणीय प्रवाह और जलविद्युत उत्पादन के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है।
किशाऊ परियोजना का स्वरूप बहु-राज्यीय है। टोंस नदी के जल के उपयोग और परियोजना से मिलने वाले लाभों को लेकर संबंधित राज्यों के बीच लंबे समय से विभिन्न स्तरों पर चर्चा होती रही है।
समझौते के बाद परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए राज्यों के बीच जल बंटवारे, वित्तीय हिस्सेदारी और परियोजना से संबंधित अन्य पहलुओं पर सहमति का आधार तैयार हुआ है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समझौते को अंतरराज्यीय सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि परियोजना के पूरा होने के बाद यह देश के जल प्रबंधन के इतिहास में महत्वपूर्ण अध्याय बनेगी। उनके अनुसार इससे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली अलग-अलग रूपों में लाभान्वित होंगे।
किशाऊ परियोजना का सबसे प्रमुख हिस्सा टोंस नदी पर बनने वाला बांध है। प्रस्तावित बांध की ऊंचाई 232.6 मीटर होगी। यह कंक्रीट ग्रेविटी डैम होगा।
परियोजना में 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल भंडारण की व्यवस्था होगी। इतने बड़े जलाशय के कारण जल को नियंत्रित एवं निर्धारित व्यवस्था के तहत विभिन्न उपयोगों के लिए उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।
जलाशय से सिंचाई और अन्य जल आवश्यकताओं के साथ जलविद्युत उत्पादन को भी जोड़ा गया है। परियोजना से 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत मिलने का अनुमान बताया गया है।
परियोजना से लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होने की बात कही गई है। सिंचाई क्षमता में वृद्धि का सीधा संबंध कृषि क्षेत्र से है। नियमित जल उपलब्धता से उन क्षेत्रों को लाभ मिलने की संभावना है, जहां खेती वर्षा अथवा सीमित जल संसाधनों पर निर्भर रहती है।
सिंचाई सुविधा बढ़ने से कृषि उत्पादन, फसल विविधीकरण और किसानों की जल उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों पर असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक लाभ परियोजना के निर्माण, नहर एवं जल अंतरण व्यवस्था और निर्धारित जल वितरण प्रणाली के प्रभावी संचालन पर निर्भर करेगा।
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि किशाऊ परियोजना से सबसे बड़ा लाभ दिल्ली को होगा। दिल्ली की जल आवश्यकताओं और यमुना नदी के प्रवाह को लेकर लंबे समय से विभिन्न स्तरों पर चर्चा होती रही है।
शाह ने यमुना जल बंटवारे की व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय नदी के पर्यावरणीय प्रवाह को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा गया। उनके अनुसार उपलब्ध जल को राज्यों के बीच बांटने की व्यवस्था में नदी के लिए आवश्यक प्रवाह का मुद्दा पीछे रह गया।
किशाऊ परियोजना से आने वाले अतिरिक्त जल के संदर्भ में उन्होंने कहा कि करीब 25 प्रतिशत जल दिल्ली और यमुना दोनों के लिए लाभकारी होगा। उनके अनुसार इससे यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह और नदी के संरक्षण में भी मदद मिल सकती है।
किसी नदी के लिए केवल जल का उपयोग ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि नदी में न्यूनतम आवश्यक प्रवाह बनाए रखना भी नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अहम होता है। यमुना के संदर्भ में पर्यावरणीय प्रवाह का मुद्दा लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है।
किशाऊ परियोजना को लेकर हुई सहमति में जल उपलब्धता और यमुना के प्रवाह को जोड़कर देखा जा रहा है। परियोजना से मिलने वाले अतिरिक्त जल का एक हिस्सा यमुना में प्रवाह को बनाए रखने के लिए उपयोगी होने की बात कही गई है।
इससे नदी के पर्यावरणीय संतुलन, जल गुणवत्ता और उससे जुड़े पारिस्थितिक तंत्र पर संभावित सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव परियोजना संचालन और जल आवंटन की व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
अमित शाह ने किशाऊ परियोजना की पृष्ठभूमि में 12 मई 1994 के समझौते का उल्लेख किया। उनके अनुसार उस समझौते में यह व्यवस्था बनी थी कि बेसिन में आने वाली प्रत्येक भंडारण परियोजना के लिए अलग-अलग समझौते किए जाएंगे।
यही व्यवस्था आगे चलकर किशाऊ परियोजना को लेकर राज्यों के बीच बातचीत का आधार बनी। अलग-अलग परियोजनाओं के संबंध में राज्यों की सहमति और जल हिस्सेदारी को लेकर चर्चा होती रही।
शाह के अनुसार यदि 1994 में ऐसी व्यवस्था नहीं बनी होती तो किशाऊ जैसी परियोजना को आगे बढ़ाना कठिन होता।
किशाऊ परियोजना की दिशा में आगे बढ़ने से पहले ऊपरी यमुना बेसिन से जुड़ी अन्य परियोजनाओं को लेकर भी राज्यों के बीच सहमति बनी।
अमित शाह ने वर्ष 2018 में लखवार बहुउद्देशीय परियोजना और वर्ष 2019 में रेणुकाजी बहुउद्देशीय बांध परियोजना से संबंधित विवादों के समाधान का उल्लेख किया। उनके अनुसार इन समझौतों के बाद किशाऊ परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए परिस्थितियां बनीं।
उन्होंने कहा कि बीते वर्षों में कई अंतरराज्यीय जल विवादों को समाधान तक पहुंचाने की दिशा में काम हुआ है। इसी क्रम में किशाऊ परियोजना पर भी राज्यों के बीच सहमति बनाई गई।
किशाऊ परियोजना को केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय परियोजना घोषित किए जाने की जानकारी दी गई है। इससे परियोजना के वित्तीय ढांचे में केंद्र की बड़ी भूमिका तय होती है।
अमित शाह के अनुसार परियोजना की लागत का लगभग 90 प्रतिशत वित्तीय भार भारत सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत राशि 1994 के समझौते के अनुसार भागीदार राज्यों द्वारा वहन की जाएगी।
इस वित्तीय व्यवस्था को परियोजना को लंबे समय से लंबित स्थिति से आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बड़े बांध और बहुउद्देशीय जल परियोजनाओं में निर्माण लागत काफी अधिक होती है। ऐसे में केंद्र की बड़ी वित्तीय भागीदारी से राज्यों पर तत्काल वित्तीय दबाव कम करने का प्रयास किया गया है।
किशाऊ परियोजना से संबंधित राज्यों में उत्तराखंड की भूमिका महत्वपूर्ण है। परियोजना क्षेत्र और टोंस नदी से जुड़े भौगोलिक पहलुओं के कारण राज्य की अपनी कुछ चिंताएं और आवश्यकताएं रही हैं।
अमित शाह ने कहा कि उत्तराखंड सरकार की कुछ कठिनाइयां थीं। केंद्र सरकार की ओर से राज्य को आश्वस्त किया गया है कि उसकी मांगों को भारत सरकार की योजनाओं के अंतर्गत समाहित करने का प्रयास किया जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में उत्तराखंड पर आने वाले वित्तीय भार को वहन करने में भी केंद्र सरकार उसकी मदद करेगी।
गृह मंत्री के अनुसार किशाऊ परियोजना को लेकर 16 जून को औपचारिक सहमति बनी थी। इसके बाद जल शक्ति मंत्रालय ने विभिन्न स्तरों पर प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
राज्यों की सहमति, परियोजना के तकनीकी पहलुओं और आर्थिक पक्षों पर विचार करने के बाद समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में काम हुआ। इसमें संबंधित राज्यों के हितों को ध्यान में रखने की बात भी कही गई।
अब छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद परियोजना के अगले चरण की प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ है।
अमित शाह ने किशाऊ समझौते को पिछले कुछ वर्षों में अंतरराज्यीय जल विवादों के समाधान की कड़ी से जोड़ते हुए कई परियोजनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने लखवार बहुउद्देशीय परियोजना, शाहपुर कंडी बांध परियोजना, रेणुकाजी बहुउद्देशीय बांध परियोजना और केन-बेतवा लिंक परियोजना का उदाहरण दिया।
केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर वर्ष 2021 में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच समझौते का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इससे बुंदेलखंड जैसे जल संकट वाले क्षेत्र को लाभ पहुंचाने की दिशा में काम हुआ।
इसके अलावा पार्वती-कालीसिंध-चंबल रिवर लिंक योजना, हथिनीकुंड से भूमिगत पाइपलाइन के माध्यम से यमुना तक जल अंतरण की योजना, नर्मदा परियोजना से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास तथा सोन बेसिन में बिहार और झारखंड के बीच जल बंटवारे से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया गया।
किशाऊ परियोजना को केवल जल भंडारण योजना के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसमें सिंचाई और जलविद्युत दोनों को जोड़ा गया है।
एक ओर जलाशय के माध्यम से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने की क्षमता विकसित होगी, वहीं दूसरी ओर परियोजना से 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य है।
जलविद्युत उत्पादन का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह ऊर्जा उत्पादन के लिए जल संसाधन का उपयोग करता है और बिजली व्यवस्था में एक अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध करा सकता है।
किशाऊ परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसका बहु-राज्यीय स्वरूप है। एक राज्य में स्थित नदी और परियोजना का लाभ कई राज्यों तक पहुंचने के कारण ऐसी योजनाओं के लिए राज्यों के बीच सहमति आवश्यक होती है।
जल का बंटवारा, परियोजना की लागत, बिजली उत्पादन, सिंचाई, पर्यावरणीय आवश्यकताएं और भविष्य की जल जरूरतें—इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर व्यवस्था बनाई जाती है।
मंगलवार को हुआ समझौता इसी अंतरराज्यीय समन्वय की प्रक्रिया का परिणाम है। परियोजना के निर्माण और संचालन के दौरान भी राज्यों के बीच लगातार समन्वय की आवश्यकता रहेगी।
दिल्ली देश की सबसे बड़ी आबादी वाले महानगरीय क्षेत्रों में शामिल है और यहां पेयजल की मांग लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। ऐसे में अतिरिक्त जल स्रोतों की उपलब्धता राजधानी के लिए रणनीतिक महत्व रखती है।
किशाऊ परियोजना से जुड़े जल आवंटन को दिल्ली की भविष्य की जल आवश्यकताओं और यमुना के प्रवाह के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। परियोजना से उपलब्ध होने वाला जल किस तरह और किन व्यवस्थाओं के माध्यम से दिल्ली तक पहुंचेगा, इसकी प्रभावशीलता संबंधित जल अंतरण एवं वितरण ढांचे पर निर्भर करेगी।
इतनी बड़ी जल परियोजना के निर्माण के साथ पर्यावरणीय और सामाजिक पहलू भी महत्वपूर्ण होंगे। बड़े बांधों के निर्माण में भूमि, स्थानीय आबादी, वन क्षेत्र, जैव विविधता और नदी के प्राकृतिक प्रवाह जैसे विषयों पर व्यापक अध्ययन की आवश्यकता होती है।
परियोजना को आगे बढ़ाते समय पुनर्वास, पर्यावरणीय स्वीकृतियों, निर्माण की गुणवत्ता, जलाशय क्षेत्र से जुड़े प्रभावों और स्थानीय हितों का समुचित प्रबंधन परियोजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
छह राज्यों के बीच समझौते के बाद किशाऊ परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में अब तकनीकी, वित्तीय, पर्यावरणीय और निर्माण संबंधी चरण महत्वपूर्ण होंगे। परियोजना के लिए विस्तृत तकनीकी व्यवस्थाओं, वित्तीय प्रबंधन, निर्माण एजेंसी और समयसीमा से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाया जाना होगा।
बांध निर्माण जैसी बड़ी परियोजना में डिजाइन, भूगर्भीय अध्ययन, पर्यावरणीय मंजूरी, भूमि एवं पुनर्वास संबंधी व्यवस्थाएं तथा निर्माण कार्य सभी चरणबद्ध तरीके से पूरे किए जाते हैं।
समझौते ने परियोजना के लिए राज्यों के बीच सहमति का आधार तैयार कर दिया है। अब इसकी वास्तविक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि आगे के प्रशासनिक और तकनीकी चरण कितनी तेजी से पूरे होते हैं।
किशाऊ परियोजना के माध्यम से एक ही योजना में जल भंडारण, सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और नदी के पर्यावरणीय प्रवाह जैसे कई पहलुओं को जोड़ने की कोशिश की गई है।
232.6 मीटर ऊंचा बांध, 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल भंडारण, 97 हजार हेक्टेयर सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत इसके प्रमुख प्रस्तावित परिणाम हैं।
छह राज्यों के बीच हुए समझौते के बाद अब परियोजना लंबे समय से चली आ रही चर्चा से आगे निकलकर क्रियान्वयन की दिशा में बढ़ने की स्थिति में है। केंद्र की वित्तीय भागीदारी और राज्यों की सहमति के साथ परियोजना को आगे बढ़ाने का लक्ष्य है। यदि निर्धारित तकनीकी, पर्यावरणीय और प्रशासनिक प्रक्रियाएं सफलतापूर्वक पूरी होती हैं, तो किशाऊ परियोजना उत्तर भारत में जल संसाधन प्रबंधन और अंतरराज्यीय सहयोग की एक महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में सामने आ सकती है।


