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- 10h ago
नई दिल्ली। डॉक्टरों और अस्पतालों की ओर से दी जाने वाली चिकित्सा सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे से बाहर करने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। शीर्ष अदालत की पांच जजों की पीठ ने उस क्यूरेटिव याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 1995 के ऐतिहासिक फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की गई थी। इस फैसले के बाद मरीजों के लिए चिकित्सा सेवा में कमी या सेवा से जुड़ी शिकायतों के मामले में उपभोक्ता कानून के तहत उपलब्ध कानूनी रास्ता बरकरार है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पांच सदस्यीय पीठ ने याचिका पर विचार करते हुए कहा कि क्यूरेटिव याचिका पर विचार करने के लिए निर्धारित मापदंडों के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। यह याचिका मेडिको लीगल सोसायटी ऑफ इंडिया की ओर से डॉ. राजीव डी. जोशी ने दाखिल की थी।
मामला सुप्रीम कोर्ट के 1995 के चर्चित इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम वीपी शांता फैसले से जुड़ा है। 13 नवंबर 1995 को दिए गए इस फैसले में अदालत ने यह सवाल तय किया था कि किन परिस्थितियों में डॉक्टर या अस्पताल की ओर से दी जाने वाली चिकित्सा सेवा को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत ‘सेवा’ माना जा सकता है।
इस फैसले के बाद ऐसे मरीज, जो निर्धारित परिस्थितियों में चिकित्सा सेवा प्राप्त करते हैं, सेवा में कमी की शिकायत को उपभोक्ता कानून के तहत उठा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि मरीज और अस्पताल के बीच चिकित्सा सेवा से संबंधित विवादों के लिए उपभोक्ता कानून के तहत कानूनी उपाय उपलब्ध रह सकता है।
मेडिको लीगल सोसायटी ऑफ इंडिया की ओर से दाखिल याचिका में 1995 के फैसले को फिर से देखने की मांग की गई थी। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के बाद के एक ऐसे फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें कानूनी पेशेवरों की सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे से बाहर रखने का सवाल आया था।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब अदालत ने एक पेशे को उपभोक्ता कानून के दायरे से बाहर रखने की स्थिति स्वीकार की है तो चिकित्सा पेशे से संबंधित 1995 के फैसले पर भी दोबारा विचार किया जाना चाहिए। हालांकि, पांच जजों की पीठ ने इस आधार को क्यूरेटिव हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त नहीं माना।
पीठ ने क्यूरेटिव याचिका खारिज करते हुए कहा कि क्यूरेटिव अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप के लिए तय मानदंड पूरे नहीं होते। यानी अदालत ने 1995 के फैसले को दोबारा खोलने का आधार नहीं पाया। इसके साथ ही चिकित्सा सेवाओं के संबंध में उपभोक्ता कानून के तहत जवाबदेही का मौजूदा कानूनी ढांचा बरकरार रहा।
इसका व्यावहारिक महत्व मरीजों के लिए इसलिए है क्योंकि चिकित्सा सेवा को लेकर विवाद होने पर उपलब्ध कानूनी विकल्पों में उपभोक्ता मंच भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वहीं डॉक्टरों और अस्पतालों के लिए यह फैसला चिकित्सा सेवाओं में निर्धारित मानकों और मरीजों के अधिकारों के प्रति कानूनी जवाबदेही की अहमियत को रेखांकित करता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस घटनाक्रम का सबसे सीधा संबंध मरीजों के उस अधिकार से है, जिसके तहत वे चिकित्सा सेवा में कमी का आरोप होने पर उपलब्ध कानूनी उपाय अपना सकते हैं। हालांकि, हर प्रतिकूल चिकित्सा परिणाम अपने आप में ‘सेवा में कमी’ साबित नहीं करता। किसी मामले में वास्तविक तथ्य, चिकित्सा परिस्थितियां और लागू कानूनी मानक महत्वपूर्ण होते हैं।
इसलिए इलाज के दौरान किसी मरीज को परेशानी होने या अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने मात्र से डॉक्टर को स्वत: दोषी नहीं माना जा सकता। शिकायत की कानूनी स्थिति मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करती है।
चिकित्सा क्षेत्र में डॉक्टरों को जटिल और कई बार आपात परिस्थितियों में निर्णय लेने पड़ते हैं। दूसरी ओर, मरीज यह अपेक्षा करता है कि उसे उचित चिकित्सा सेवा, आवश्यक जानकारी और निर्धारित पेशेवर मानकों के अनुरूप उपचार मिले।
इसी वजह से चिकित्सा लापरवाही और सेवा में कमी से जुड़े मामलों में तथ्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा रुख यह बताता है कि चिकित्सा सेवा को उपभोक्ता कानून के तहत मिलने वाले कानूनी संरक्षण से फिलहाल बाहर नहीं किया गया है।
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक जानकारी को आम लोगों तक अधिक सरल भाषा में पहुंचाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की घोषणा की है। 14 सितंबर, हिंदी दिवस के अवसर पर शीर्ष अदालत ने हिंदी में ‘जन सूचना सेवा’ शुरू करने की घोषणा की। इसके तहत चयनित महत्वपूर्ण फैसलों और आदेशों का सरल हिंदी में सार उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही रोजाना लगभग 15 से 30 मिनट के हिंदी ऑडियो और वीडियो बुलेटिन भी उपलब्ध कराने की योजना है।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इस सेवा का उद्देश्य आम नागरिकों, वादकारियों और विशेष रूप से दिव्यांग लोगों के लिए महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों को समझना आसान बनाना है। फैसले के सरल सार के साथ संबंधित आधिकारिक निर्णय का लिंक भी उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि इच्छुक व्यक्ति मूल आदेश या निर्णय तक पहुंच सके।
सुप्रीम कोर्ट के ज्यादातर महत्वपूर्ण फैसले विस्तृत कानूनी भाषा में होते हैं। ऐसे में जिन लोगों की कानूनी शब्दावली या अंग्रेजी पर पकड़ सीमित है, उनके लिए निर्णय को पूरी तरह समझना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
‘जन सूचना सेवा’ के माध्यम से अदालत का प्रयास है कि महत्वपूर्ण फैसले के मुख्य बिंदु, उसका प्रभाव और आगे की प्रक्रिया आम नागरिक अपनी परिचित भाषा में समझ सकें। ऑडियो और वीडियो प्रारूप के जुड़ने से उन लोगों को भी सुविधा मिल सकती है, जिन्हें लंबे कानूनी दस्तावेज पढ़ने में कठिनाई होती है।
सुप्रीम कोर्ट की घोषणा के अनुसार यह सेवा शुरुआत में हिंदी में उपलब्ध कराई जाएगी। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से इसे अन्य भारतीय भाषाओं में भी विस्तार देने की योजना है। इससे अलग-अलग भाषाई क्षेत्रों के नागरिकों तक अदालत के महत्वपूर्ण निर्णयों की जानकारी उनकी परिचित भाषा में पहुंचाने का रास्ता तैयार होगा।
सुप्रीम कोर्ट की यह पहल केवल भाषा से जुड़ी व्यवस्था नहीं है, बल्कि न्यायिक जानकारी को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में भी देखी जा रही है। किसी फैसले का प्रभाव केवल अदालत में मौजूद पक्षकारों तक सीमित नहीं रहता। कई फैसले आम नागरिकों के अधिकारों, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक व्यवस्था और रोजमर्रा के जीवन से जुड़े मुद्दों को प्रभावित करते हैं।
ऐसे में अगर महत्वपूर्ण फैसलों का सरल सार नागरिकों को उनकी परिचित भाषा में उपलब्ध हो, तो अदालत के निर्णयों को समझने की प्रक्रिया अधिक सहज हो सकती है। साथ ही, मूल निर्णय का आधिकारिक लिंक उपलब्ध रहने से पाठक सरल सार के साथ विस्तृत न्यायिक दस्तावेज भी देख सकेंगे।
डॉक्टरों की उपभोक्ता कानून के तहत जवाबदेही से जुड़े मामले और हिंदी में ‘जन सूचना सेवा’ की घोषणा अलग-अलग विषय हैं, लेकिन दोनों का संबंध आम नागरिक और न्याय व्यवस्था के बीच सीधे जुड़ाव से है।
एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सा सेवाओं को लेकर 1995 से चले आ रहे कानूनी ढांचे को दोबारा खोलने से इनकार किया है, वहीं दूसरी ओर अदालत के महत्वपूर्ण फैसलों को सरल हिंदी में उपलब्ध कराने की पहल की गई है। इससे मरीजों, वादकारियों और आम नागरिकों के लिए न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी जानकारी तक पहुंच का महत्व और बढ़ जाता है।
कानूनी मामलों में अंतिम स्थिति हमेशा संबंधित कानून, अदालत के आदेश और मामले के विशिष्ट तथ्यों पर निर्भर करती है। इसलिए किसी फैसले के सरल सार को समझने के साथ जरूरत पड़ने पर मूल न्यायिक आदेश को देखना भी महत्वपूर्ण रहेगा।


