यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 13h ago
नई दिल्ली। भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करने और देश को अंतरराष्ट्रीय निवेश के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और उद्योग जगत के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि भारत वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश का मजबूत औद्योगिक आधार, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई), स्टार्टअप, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर और उभरती प्रौद्योगिकियां इस विकास यात्रा के प्रमुख स्तंभ हैं।
उन्होंने कहा कि भारत अब केवल निवेश आकर्षित करने के प्रयास तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसा कारोबारी वातावरण तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहां अंतरराष्ट्रीय कंपनियां निवेश, उत्पादन, अनुसंधान और नवाचार के लिए भारत को एक महत्वपूर्ण गंतव्य के रूप में देख सकें। देश में डिजिटल बुनियादी ढांचे का विस्तार, विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन, व्यापार समझौतों का विस्तार और कारोबारी प्रक्रियाओं को सरल बनाने के प्रयास इस दिशा में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
पीयूष गोयल गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित 31वें सीआईआई पार्टनरशिप समिट के कर्टेन रेजर कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस वर्ष समिट का आयोजन 12 और 13 नवंबर को आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में किया जाएगा। सम्मेलन में भारत की वैश्विक आर्थिक भूमिका, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग और विभिन्न देशों के साथ औद्योगिक साझेदारियों को मजबूत करने जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी।
समिट को भारत की औद्योगिक क्षमताओं और निवेश संभावनाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, उद्योग जगत, निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श के जरिए व्यापार एवं आर्थिक सहयोग के नए रास्ते तलाशने पर जोर रहेगा।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को लगभग 30 लाख करोड़ डॉलर के स्तर तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षा भी सामने रखी गई है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाना, विनिर्माण क्षमता का विस्तार करना, निर्यात को प्रोत्साहित करना और देश में निवेश के नए अवसर पैदा करना आवश्यक होगा।
उन्होंने कहा कि डिजिटल इंडिया, जैम ट्रिनिटी और इंडिया स्टैक जैसी पहलों ने भारत में आर्थिक गतिविधियों के विस्तार और सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन सेवाओं और तकनीक आधारित प्रशासनिक प्रणालियों ने कारोबार करने के तरीकों में बदलाव लाने के साथ नागरिकों तथा उद्यमों के लिए नई संभावनाएं पैदा की हैं।
डिजिटल बुनियादी ढांचे के विस्तार से सरकारी सेवाओं तक पहुंच आसान बनाने, वित्तीय लेनदेन को अधिक व्यवस्थित करने और विभिन्न क्षेत्रों में तकनीक के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने में मदद मिली है। आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डेटा विश्लेषण, स्वचालन और अन्य उभरती प्रौद्योगिकियों का उपयोग भी उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
गोयल ने एमएसएमई क्षेत्र की भूमिका पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, देश में करीब 6.3 करोड़ एमएसएमई आर्थिक गतिविधियों, रोजगार और निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। छोटे और मध्यम उद्यमों की मजबूती भारत की आर्थिक वृद्धि को व्यापक आधार प्रदान करती है, क्योंकि ये उद्यम बड़े उद्योगों की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े होने के साथ स्थानीय स्तर पर भी रोजगार और कारोबार के अवसर पैदा करते हैं।
उन्होंने संकेत दिया कि विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए छोटे कारोबारों को आधुनिक तकनीक, पूंजी, कौशल और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराना आवश्यक है।
पीयूष गोयल ने मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को भारतीय उद्योगों के लिए नए बाजारों तक पहुंच बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि भारत द्वारा किए गए व्यापार समझौतों में संवेदनशील क्षेत्रों, विशेषकर कृषि, मछलीपालन और एमएसएमई के हितों की रक्षा करने पर ध्यान दिया गया है। साथ ही, इन समझौतों से भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नए अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
उन्होंने बताया कि भारत ने 38 विकसित देशों के साथ नौ एफटीए किए हैं, जिनके माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से तक भारतीय कारोबारों की पहुंच के अवसर बनते हैं। इन समझौतों से कृषि उत्पादों, समुद्री खाद्य पदार्थों, इंजीनियरिंग उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च-परिशुद्धता वाले विनिर्माण उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहन मिलने की संभावनाएं हैं।
मुक्त व्यापार समझौतों का महत्व केवल आयात शुल्क में संभावित कमी तक सीमित नहीं है। इनके जरिए कंपनियों को बाजार में प्रवेश की शर्तों, उत्पाद मानकों, व्यापार नियमों और निवेश के अवसरों के संबंध में अधिक स्पष्टता मिल सकती है। हालांकि, प्रत्येक समझौते का वास्तविक लाभ संबंधित उत्पाद, बाजार की मांग और लागू नियमों पर निर्भर करेगा।
एमएसएमई के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के अवसरों का लाभ उठाना कई बार चुनौतीपूर्ण होता है। छोटे कारोबारों के पास अक्सर विदेशी बाजारों के नियमों, दस्तावेजी प्रक्रियाओं, उत्पाद प्रमाणन और निर्यात संबंधी आवश्यकताओं की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। ऐसे में व्यापार समझौतों की जानकारी उपलब्ध कराना और उद्यमों को व्यावहारिक मार्गदर्शन देना महत्वपूर्ण हो जाता है।
केंद्रीय मंत्री ने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) से आग्रह किया कि वह अपनी राज्य परिषदों में एफटीए उपयोग डेस्क स्थापित करने की दिशा में काम करे। इन डेस्क का उद्देश्य छोटे और मध्यम उद्यमों को मुक्त व्यापार समझौतों के प्रावधानों की जानकारी देना तथा उन्हें नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचने में सहायता करना होगा।
विशेष रूप से ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ यानी मूल स्थान संबंधी नियमों की जानकारी निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण होती है। ये नियम निर्धारित करते हैं कि किसी उत्पाद को संबंधित व्यापार समझौते के तहत प्राथमिकता वाले शुल्क का लाभ प्राप्त करने के लिए किन शर्तों को पूरा करना होगा।
यदि एमएसएमई को इन नियमों, आवश्यक प्रमाणपत्रों और निर्यात प्रक्रिया के बारे में समय पर जानकारी मिलती है, तो वे व्यापार समझौतों के तहत उपलब्ध अवसरों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। इससे छोटे उद्यमों के लिए विदेशी बाजारों में प्रवेश की तैयारी करना आसान हो सकता है।
सीआईआई की राज्य परिषदों के माध्यम से उद्योगों तक जानकारी पहुंचाने से स्थानीय स्तर पर निर्यात संबंधी जागरूकता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है। इससे उन उद्यमों को विशेष लाभ मिलने की संभावना है, जो अभी तक मुख्य रूप से घरेलू बाजारों में कारोबार करते हैं, लेकिन भविष्य में अपने उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाना चाहते हैं।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने कारोबारी प्रक्रियाओं को तेज करने पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान समय में केवल ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ यानी कारोबार करने में सुगमता पर्याप्त नहीं है। अब ‘स्पीड ऑफ डूइंग बिजनेस’ यानी कारोबार से जुड़ी प्रक्रियाओं को समयबद्ध और तेज बनाना भी उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि निवेशकों के लिए मंजूरी, प्रोत्साहन, दस्तावेजी कार्रवाई और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में लगने वाला समय निवेश संबंधी निर्णयों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए राज्य सरकार का प्रयास होगा कि अनावश्यक प्रक्रियाओं को समाप्त किया जाए और कारोबारी सेवाओं को अधिक पारदर्शी तथा प्रभावी बनाया जाए।
नायडू ने घोषणा की कि आंध्र प्रदेश में औद्योगिक निवेशकों को मिलने वाले प्रोत्साहन ऑनलाइन उपलब्ध कराए जाएंगे और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार राशि वास्तविक समय में उनके एस्क्रो खातों में हस्तांतरित की जाएगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य निवेश प्रोत्साहन की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना और निवेशकों को भुगतान में होने वाली संभावित देरी कम करना है।
ऑनलाइन व्यवस्था से निवेशकों को अपने प्रोत्साहनों और संबंधित प्रक्रियाओं की जानकारी प्राप्त करने में सुविधा मिल सकती है। इसके साथ ही डिजिटल प्रणाली प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने और निवेश से संबंधित जानकारी को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद कर सकती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में निवेशकों के लिए ऐसा वातावरण विकसित करने पर ध्यान दिया जा रहा है, जहां कारोबारी योजनाओं को लागू करने में अनावश्यक बाधाओं का सामना न करना पड़े। इससे उद्योगों को अपनी परियोजनाओं की समयसीमा तय करने और निवेश संबंधी निर्णय लेने में सुविधा मिल सकती है।
एन. चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश में बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी आधारित औद्योगिक विकास की योजनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने विशाखापत्तनम में एआई सेंटर, स्टील सिटी और डेटा सेंटर विकसित होने की दिशा में चल रहे प्रयासों का जिक्र किया। इसके अलावा रामायपट्टनम में पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स के निर्माण का भी उल्लेख किया गया।
विशाखापत्तनम को राज्य के प्रमुख औद्योगिक और तकनीकी केंद्र के रूप में विकसित करने की योजनाओं में डिजिटल बुनियादी ढांचे, औद्योगिक निवेश और आधुनिक सेवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। डेटा सेंटरों के विकास से डिजिटल सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा प्रबंधन और तकनीकी कंपनियों के लिए अवसर पैदा हो सकते हैं।
इसी प्रकार, एआई से जुड़े केंद्रों के माध्यम से अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और उद्योगों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग को प्रोत्साहित करने की संभावनाएं बन सकती हैं। हालांकि, इन योजनाओं का वास्तविक प्रभाव परियोजनाओं के क्रियान्वयन, निवेश की उपलब्धता और कुशल मानव संसाधन तैयार करने पर निर्भर करेगा।
रामायपट्टनम में पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स का विकास भी राज्य की औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। पेट्रोकेमिकल उद्योग प्लास्टिक, रसायन, पैकेजिंग, औद्योगिक सामग्री और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों की आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ा होता है। इस क्षेत्र में निवेश से सहायक उद्योगों और लॉजिस्टिक्स सेवाओं के लिए भी अवसर बन सकते हैं।
राज्य सरकार की रणनीति में औद्योगिक निवेश के साथ परिवहन, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी और अन्य बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना भी शामिल है। इन क्षेत्रों में समन्वित विकास होने पर उद्योगों की परिचालन लागत और कारोबार संबंधी चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है।
पीयूष गोयल ने कहा कि आंध्र प्रदेश क्वांटम कंप्यूटिंग और डिजिटल गवर्नेंस जैसे उभरते क्षेत्रों में आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है। इन क्षेत्रों में विकास से राज्य को तकनीक आधारित उद्योगों, अनुसंधान और नवाचार के नए अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
क्वांटम कंप्यूटिंग को भविष्य की महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में गिना जाता है। इसके संभावित उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान, जटिल गणनाओं और कुछ विशेष प्रकार की औद्योगिक समस्याओं के समाधान से जुड़े हैं। इस क्षेत्र में क्षमता विकसित करने के लिए अनुसंधान संस्थानों, तकनीकी कंपनियों, कुशल विशेषज्ञों और दीर्घकालिक निवेश के बीच सहयोग आवश्यक होगा।
डिजिटल गवर्नेंस के विस्तार से सरकारी सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने, कारोबारी प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करने और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय सुधारने की संभावनाएं हैं। उद्योगों के लिए यह व्यवस्था विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, क्योंकि निवेश संबंधी जानकारी और प्रशासनिक सेवाओं तक आसान पहुंच कारोबारी निर्णयों को गति दे सकती है।
हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग के विकास के लिए तकनीकी निवेश के साथ कुशल कर्मचारियों की उपलब्धता, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और गुणवत्ता संबंधी मानकों का पालन भी जरूरी होगा। आंध्र प्रदेश में इन पहलुओं को ध्यान में रखकर औद्योगिक विकास को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा की गई।
कृषि और बागवानी क्षेत्र को आधुनिक विनिर्माण तथा निर्यात से जोड़ने की दिशा में भी आंध्र प्रदेश की योजनाओं का उल्लेख किया गया। राज्य में करीब दस जिलों को जोड़कर हॉर्टिकल्चर हब विकसित करने की योजना है। इसमें एग्रो-प्रोसेसिंग, प्राकृतिक खेती और वैश्विक ट्रेसेबिलिटी मानकों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई।
हॉर्टिकल्चर हब का उद्देश्य बागवानी उत्पादों के उत्पादन, प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग और विपणन से जुड़ी गतिविधियों को बेहतर तरीके से जोड़ना हो सकता है। इससे किसानों को बाजार से जोड़ने और कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन के अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है।
एग्रो-प्रोसेसिंग के माध्यम से फल, सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों को प्रसंस्कृत वस्तुओं में बदला जा सकता है। इससे उत्पादों की उपयोग अवधि बढ़ाने, कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने और उपभोक्ताओं तक बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद पहुंचाने की संभावनाएं बनती हैं।
वैश्विक ट्रेसेबिलिटी मानकों का पालन भी निर्यात के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से उत्पादों की उत्पत्ति, उत्पादन प्रक्रिया, प्रसंस्करण और आपूर्ति श्रृंखला से संबंधित जानकारी को व्यवस्थित तरीके से दर्ज किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में ऐसी व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।
प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहन देने के प्रयासों से कृषि उत्पादन की गुणवत्ता, संसाधनों के उपयोग और पर्यावरणीय प्रभाव से जुड़े विषयों पर भी ध्यान दिया जा सकता है। हालांकि, इन योजनाओं के लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षण, बाजार संपर्क, भंडारण सुविधाओं और प्रसंस्करण इकाइयों का विकास महत्वपूर्ण रहेगा।
सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि के मजबूत स्तंभों में ‘मेक इन इंडिया’ प्रमुख है। उन्होंने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं, औद्योगिक गलियारों और क्षेत्र-विशेष नीतियों को देश में प्रतिस्पर्धी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मास्युटिकल्स और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता का विस्तार भारत की औद्योगिक संभावनाओं को मजबूत कर सकता है। इन क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ तकनीकी दक्षता, गुणवत्ता और निर्यात प्रतिस्पर्धा को भी महत्व देना होगा।
पीएलआई योजनाओं का उद्देश्य पात्र क्षेत्रों में उत्पादन और निवेश को प्रोत्साहित करना है। औद्योगिक गलियारों के विकास से विनिर्माण इकाइयों को परिवहन, लॉजिस्टिक्स और अन्य औद्योगिक सुविधाओं तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराने की संभावनाएं बनती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में निवेश से उपकरणों, कलपुर्जों और संबंधित उत्पादों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन मिल सकता है। ऑटोमोबाइल उद्योग में पारंपरिक वाहनों के साथ इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और आधुनिक तकनीक से जुड़े क्षेत्रों में नए अवसर पैदा हो सकते हैं। वहीं, फार्मास्युटिकल्स और टेक्सटाइल जैसे उद्योगों में उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता मानकों और निर्यात बाजारों तक पहुंच का महत्व बना हुआ है।
मुकुंदन के अनुसार, भारत को वैश्विक विनिर्माण व्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ऐसी नीतियों की आवश्यकता है, जो निवेश को आकर्षित करने के साथ उद्यमों की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बढ़ाएं। इसमें बड़े उद्योगों के साथ एमएसएमई की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि छोटे उद्यम कई क्षेत्रों में कलपुर्जों, सेवाओं और सहायक उत्पादों की आपूर्ति करते हैं।
भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार भी आर्थिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण विषय है। जीसीसी के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में तकनीकी सेवाओं, अनुसंधान, इंजीनियरिंग, वित्तीय कार्यों और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए केंद्र स्थापित करती हैं।
इन केंद्रों के विस्तार से कुशल पेशेवरों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके साथ ही भारतीय कंपनियों और स्टार्टअप को अंतरराष्ट्रीय कारोबारों के साथ सहयोग, तकनीकी ज्ञान और नवाचार से जुड़े अवसर मिल सकते हैं।
स्टार्टअप नए उत्पादों, डिजिटल सेवाओं और तकनीकी समाधानों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इन उद्यमों को पूंजी, बाजार और उद्योगों के साथ सहयोग के अवसर मिलते हैं, तो वे नई व्यावसायिक संभावनाओं को विकसित कर सकते हैं।
हालांकि, स्टार्टअप और जीसीसी की वृद्धि का व्यापक आर्थिक लाभ सुनिश्चित करने के लिए कौशल विकास, अनुसंधान सुविधाओं, बौद्धिक संपदा संरक्षण और घरेलू उद्योगों के साथ बेहतर संपर्क आवश्यक होंगे। इससे तकनीकी विकास का लाभ अर्थव्यवस्था के अधिक क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने बताया कि 31वें पार्टनरशिप समिट में 42 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों, करीब 20 देशों के मंत्रियों तथा 34 से अधिक अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और वक्ताओं के भाग लेने की योजना है।
उन्होंने कहा कि भारत ने वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करने और आर्थिक सहयोग के नए रास्ते खोलने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। समिट का उद्देश्य व्यापार, निवेश और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए नए अवसर तलाशना है।
सम्मेलन में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के बीच संवाद से औद्योगिक सहयोग, निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, कृषि, निर्यात और कारोबारी संपर्कों से संबंधित मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। ऐसे मंचों के माध्यम से कंपनियों को नए बाजारों और संभावित साझेदारों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की भागीदारी से भारत के औद्योगिक और तकनीकी क्षेत्रों की संभावनाओं को प्रस्तुत करने के साथ विदेशी निवेशकों की आवश्यकताओं को समझने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि, सम्मेलन से वास्तविक निवेश और व्यापारिक समझौतों के परिणाम संबंधित पक्षों के बीच आगे होने वाली बातचीत तथा परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर निर्भर करेंगे।
कर्टेन रेजर कार्यक्रम के दौरान हुई चर्चा में वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया। इसके साथ प्रौद्योगिकी, व्यापार और कृषि के क्षेत्र में नए अवसर तलाशने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ देशों के लिए अपने औद्योगिक आधार को मजबूत करना, आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक सक्षम बनाना और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भरोसेमंद साझेदार के रूप में अपनी स्थिति विकसित करना महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत के लिए यह अवसर घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाने, निर्यात उत्पादों में विविधता लाने और आधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाने से जुड़ा है। इसके साथ ही व्यापार समझौतों का प्रभावी उपयोग और छोटे कारोबारों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना भी आवश्यक होगा।
केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय को इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया। केंद्र सरकार जहां व्यापक व्यापार नीति, अंतरराष्ट्रीय समझौतों और राष्ट्रीय स्तर की औद्योगिक योजनाओं पर काम करती है, वहीं राज्य सरकारें भूमि, स्थानीय बुनियादी ढांचे, निवेश प्रोत्साहन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से औद्योगिक परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाती हैं।
यदि इन स्तरों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होता है, तो निवेशकों को परियोजनाओं की योजना बनाने और उन्हें लागू करने में सुविधा मिल सकती है। श्रम सुधारों, कौशल विकास और कारोबारी माहौल में सुधार जैसे विषय भी इस व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।
विशाखापत्तनम में होने वाला 31वां सीआईआई पार्टनरशिप समिट आंध्र प्रदेश की औद्योगिक और तकनीकी विकास योजनाओं को सामने रखने का अवसर होगा। राज्य में डिजिटल बुनियादी ढांचे, डेटा सेंटर, एआई, विनिर्माण, पेट्रोकेमिकल उद्योग और कृषि प्रसंस्करण से संबंधित योजनाएं निवेशकों के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में संभावनाएं प्रस्तुत कर सकती हैं।
राज्य की कारोबारी रणनीति में निवेश प्रोत्साहन को डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को तेज करने पर दिया गया जोर भी महत्वपूर्ण है। निवेशकों के लिए समयबद्ध निर्णय, पारदर्शी प्रोत्साहन और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता परियोजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, निवेश योजनाओं को ठोस औद्योगिक परिणामों में बदलने के लिए समयबद्ध क्रियान्वयन, कुशल मानव संसाधन, ऊर्जा एवं परिवहन सुविधाएं और उद्योगों के लिए अनुकूल आपूर्ति श्रृंखला आवश्यक होगी। परियोजनाओं की प्रगति और निवेश के वास्तविक परिणामों से ही राज्य की रणनीति के प्रभाव का आकलन किया जा सकेगा।
31वें सीआईआई पार्टनरशिप समिट का प्रमुख उद्देश्य भारत और अन्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को मजबूत करना तथा व्यापार और निवेश के नए अवसरों की पहचान करना है। सम्मेलन में सरकार, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच संवाद के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों की संभावनाओं और चुनौतियों पर चर्चा की जाएगी।
पीयूष गोयल ने भारत के वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही, जबकि एन. चंद्रबाबू नायडू ने कारोबारी प्रक्रियाओं की गति और निवेश सुविधा को महत्व दिया। वहीं, सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाने और प्रतिस्पर्धी औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इन विचारों में साझा विषय यह है कि भारत की आर्थिक वृद्धि को आगे बढ़ाने के लिए निवेश, व्यापार, प्रौद्योगिकी और औद्योगिक उत्पादन के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। एमएसएमई को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच, आधुनिक विनिर्माण को प्रोत्साहन और राज्य स्तर पर कारोबार संबंधी प्रक्रियाओं में सुधार इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यदि घोषित पहलों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है, तो इससे उद्योगों की उत्पादकता, निवेशकों की भागीदारी और निर्यात की संभावनाओं को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में औद्योगिक परियोजनाओं का विकास क्षेत्रीय रोजगार और सहायक उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है।
कुल मिलाकर, 31वां सीआईआई पार्टनरशिप समिट भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं, वैश्विक व्यापार संबंधों और राज्य स्तरीय निवेश रणनीतियों पर चर्चा के लिए महत्वपूर्ण मंच बनने जा रहा है। भारत के लिए चुनौती केवल निवेश आकर्षित करना नहीं, बल्कि उसे उत्पादन, नवाचार, रोजगार और निर्यात में बदलना भी है। इसी संदर्भ में ‘स्पीड ऑफ डूइंग बिजनेस’, एमएसएमई की भागीदारी, तकनीकी विकास और वैश्विक साझेदारियों को आने वाले समय में विशेष महत्व मिलने की संभावना है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


