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- 13h ago
नई दिल्ली। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 10,000 करोड़ रुपये के एसएमई ग्रोथ फंड की स्थापना के फैसले का स्वागत करते हुए इसे देश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को विकास की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन के अनुसार, यह फंड भारतीय औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र में लंबे समय से मौजूद ‘मिसिंग मिडिल’ की समस्या को दूर करने में अहम भूमिका निभा सकता है। इससे उन छोटे और मध्यम उद्यमों को आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा, जिनमें बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों के रूप में विकसित होने की क्षमता तो है, लेकिन पर्याप्त दीर्घकालिक पूंजी के अभाव में वे अपने विस्तार की संभावनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते।
सीआईआई का मानना है कि भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए ऐसे उद्यमों को मजबूत करना जरूरी है, जो घरेलू बाजार की जरूरतों को पूरा करने के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी पहचान बना सकें। एसएमई ग्रोथ फंड इस दिशा में एक महत्वपूर्ण वित्तीय माध्यम बन सकता है। इसके जरिए योग्य उद्यमों को कारोबार बढ़ाने, आधुनिक मशीनरी लगाने, नई तकनीक अपनाने, उत्पादन क्षमता में वृद्धि करने और नए बाजारों तक पहुंच बनाने के लिए आवश्यक पूंजी उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने कहा कि भारत की विनिर्माण संबंधी महत्वाकांक्षाओं की सफलता काफी हद तक उन छोटे और मध्यम उद्यमों पर निर्भर करती है, जिनमें भविष्य की वैश्विक कंपनियां बनने की क्षमता मौजूद है। इन उद्यमों को सही समय पर पूंजी, तकनीक और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराना जरूरी है। उन्होंने कहा कि एसएमई ग्रोथ फंड उद्यमों के विकास की राह में आने वाली वित्तीय बाधाओं को कम करने के साथ उन्हें अधिक प्रतिस्पर्धी, उत्पादक और नवाचार आधारित बनाने में सहायक साबित हो सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई क्षेत्र का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। सीआईआई के अनुसार, ये उद्यम देश के विनिर्माण उत्पादन में एक-तिहाई से अधिक, निर्यात में करीब आधा और सकल घरेलू उत्पाद में लगभग एक-तिहाई योगदान देते हैं। देश के औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
छोटे और मध्यम उद्यम विभिन्न उद्योगों के लिए आवश्यक कलपुर्जे, मशीनरी, औद्योगिक सामग्री, तैयार उत्पाद और सेवाएं उपलब्ध कराते हैं। बड़े उद्योगों के साथ इनका मजबूत संबंध देश के समग्र औद्योगिक ढांचे को गति प्रदान करता है। इसके बावजूद कई उद्यम ऐसे हैं, जो एक निश्चित स्तर तक पहुंचने के बाद पूंजी की कमी, तकनीकी सीमाओं और बाजार तक सीमित पहुंच के कारण आगे नहीं बढ़ पाते।
इसी स्थिति को ‘मिसिंग मिडिल’ की समस्या के रूप में देखा जाता है। ऐसे उद्यम न तो छोटे स्तर पर काम करने वाले पारंपरिक कारोबार तक सीमित रहना चाहते हैं और न ही उनके पास बड़े स्तर पर विस्तार करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन होते हैं। परिणामस्वरूप, उनकी उत्पादन क्षमता, कारोबार और रोजगार सृजन की संभावनाएं पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं।
एसएमई ग्रोथ फंड इस अंतर को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। दीर्घकालिक इक्विटी पूंजी की उपलब्धता से उद्यमों को केवल अपने मौजूदा कारोबार को बनाए रखने के बजाय भविष्य की जरूरतों के अनुसार विस्तार की योजना तैयार करने का अवसर मिल सकता है।
छोटे और मध्यम उद्यमों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक कारोबार के विस्तार के लिए उपयुक्त वित्तीय संसाधन जुटाना है। बैंक ऋण और अन्य पारंपरिक वित्तीय साधन कई कारोबारों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होते हैं, लेकिन बड़े निवेश, नई उत्पादन इकाइयों की स्थापना और दीर्घकालिक विकास योजनाओं के लिए अतिरिक्त पूंजी की जरूरत पड़ सकती है।
इक्विटी आधारित वित्तपोषण उद्यमों को इस दिशा में एक वैकल्पिक अवसर प्रदान करता है। इससे कंपनियों को अपनी विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने, नई परियोजनाओं में निवेश करने और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार होने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ फंड के संचालन की शर्तों, निवेश चयन की प्रक्रिया और पात्र उद्यमों तक इसकी पहुंच पर निर्भर करेगा।
सीआईआई के अनुसार, एसएमई ग्रोथ फंड से ऐसे उद्यमों को प्रोत्साहन मिल सकता है, जो अपने उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार करना चाहते हैं, उत्पादन प्रक्रिया को आधुनिक बनाना चाहते हैं अथवा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।
फंड की सहायता से उद्यमों को उत्पादन के मौजूदा स्तर से आगे बढ़ने और बड़े ऑर्डर पूरे करने की क्षमता विकसित करने में मदद मिल सकती है। इससे वे ग्राहकों की बढ़ती मांग को पूरा करने के साथ अधिक व्यवस्थित और टिकाऊ कारोबारी मॉडल की ओर बढ़ सकेंगे।
वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। कंपनियों को उत्पादों की गुणवत्ता, लागत नियंत्रण, समय पर आपूर्ति, तकनीकी दक्षता और नवाचार पर भी ध्यान देना पड़ता है। बदलती औद्योगिक जरूरतों के बीच आधुनिक मशीनों, डिजिटल प्रणालियों और बेहतर उत्पादन तकनीकों को अपनाना तेजी से आवश्यक होता जा रहा है।
कई छोटे उद्यमों के लिए तकनीकी उन्नयन में निवेश करना चुनौतीपूर्ण रहता है। सीमित पूंजी के कारण वे पुरानी मशीनरी और पारंपरिक उत्पादन प्रणालियों पर निर्भर बने रहते हैं। इससे उनकी उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है।
एसएमई ग्रोथ फंड से उपलब्ध होने वाली पूंजी ऐसे उद्यमों के लिए तकनीकी बदलाव की प्रक्रिया को आसान बनाने में सहायक हो सकती है। आधुनिक मशीनरी, स्वचालन, गुणवत्ता नियंत्रण, डिजिटल प्रबंधन और उत्पादन प्रक्रिया में सुधार जैसे क्षेत्रों में निवेश से कंपनियों की कार्यक्षमता बढ़ाने की संभावनाएं पैदा होंगी।
इसके साथ ही नए उत्पादों के विकास, अनुसंधान, डिजाइन और उत्पादन के बेहतर तरीकों को अपनाने में भी सहायता मिल सकती है। इससे भारतीय उद्यम घरेलू बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों की बदलती जरूरतों के अनुरूप उत्पाद तैयार कर सकेंगे।
भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के सामने वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अपनी भागीदारी बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर है। दुनिया भर की कंपनियां अपने उत्पादन नेटवर्क में विविधता लाने, आपूर्ति स्रोतों को मजबूत करने और नए विनिर्माण साझेदारों की तलाश करने पर ध्यान दे रही हैं। ऐसे माहौल में भारतीय एसएमई के लिए अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
हालांकि, वैश्विक बाजारों में प्रवेश करने के लिए कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों का पालन करना, उत्पादन की निरंतरता बनाए रखना, समय पर माल की आपूर्ति करना और आवश्यक प्रमाणन प्राप्त करना पड़ता है। इन प्रक्रियाओं के लिए निवेश और तकनीकी तैयारी की जरूरत होती है।
सीआईआई का मानना है कि एसएमई ग्रोथ फंड उद्यमों को अपनी क्षमता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए तैयार होने में मदद कर सकता है। बेहतर वित्तीय स्थिति वाले उद्यम नए ग्राहकों से जुड़ने, उत्पादन सुविधाओं का विस्तार करने और निर्यात की संभावनाओं का लाभ उठाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
इससे भारत की वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भागीदारी मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है। यदि अधिक भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति नेटवर्क का हिस्सा बनती हैं, तो इससे विनिर्माण क्षेत्र में निवेश, तकनीकी सहयोग और उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
सीआईआई ने औद्योगिक क्लस्टरों तथा टियर-2 और टियर-3 शहरों में संचालित उद्यमों तक फंड की पहुंच बढ़ाने के प्रस्ताव का स्वागत किया है। संगठन के अनुसार, इससे औद्योगिक विकास को कुछ बड़े शहरों तक सीमित रखने के बजाय देश के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक बनाने में मदद मिल सकती है।
देश के अनेक छोटे शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में ऐसे उद्यम काम कर रहे हैं, जिनके पास स्थानीय स्तर पर अनुभव, कुशल श्रमिक और बाजार की समझ मौजूद है। ये कारोबार अपने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ आसपास के लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा करते हैं। लेकिन वित्तीय संस्थानों, निवेशकों और आधुनिक तकनीकी संसाधनों तक सीमित पहुंच के कारण उनकी विकास क्षमता कई बार प्रभावित होती है।
यदि एसएमई ग्रोथ फंड के माध्यम से इन क्षेत्रों के योग्य उद्यमों तक पूंजी पहुंचती है, तो स्थानीय औद्योगिक इकाइयों के विस्तार को बढ़ावा मिल सकता है। इससे छोटे शहरों में नई उत्पादन सुविधाओं की स्थापना, मौजूदा इकाइयों के आधुनिकीकरण और सहायक उद्योगों के विकास के अवसर पैदा हो सकते हैं।
इस तरह की पहल से क्षेत्रीय औद्योगिक असमानताओं को कम करने में भी मदद मिल सकती है। औद्योगिक क्लस्टरों में कंपनियों के बीच सहयोग बढ़ने से कच्चे माल की उपलब्धता, तकनीकी सेवाओं, परिवहन और आपूर्ति व्यवस्था में सुधार की संभावनाएं बन सकती हैं।
सीआईआई के मुताबिक, विनिर्माण के आधार को व्यापक बनाने के लिए यह जरूरी है कि वित्तीय सहायता का लाभ केवल स्थापित औद्योगिक केंद्रों तक सीमित न रहे, बल्कि विकास की संभावनाओं वाले छोटे शहरों और उभरते औद्योगिक क्षेत्रों तक भी पहुंचे।
विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार रोजगार के नए अवसर पैदा करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। जब कोई उद्यम अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाता है, नई इकाई स्थापित करता है या नए बाजारों में प्रवेश करता है, तो उसे अतिरिक्त कर्मचारियों, तकनीकी विशेषज्ञों, प्रबंधकीय कर्मियों और कुशल श्रमिकों की आवश्यकता पड़ सकती है।
एसएमई ग्रोथ फंड से कारोबारों के विस्तार को प्रोत्साहन मिलने पर रोजगार सृजन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। इसका लाभ उत्पादन इकाइयों तक सीमित न रहकर परिवहन, भंडारण, पैकेजिंग, मरम्मत, डिजिटल सेवाओं और अन्य सहायक क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा, आधुनिक तकनीक अपनाने वाले उद्यमों में कर्मचारियों को नए कौशल सीखने और तकनीकी दक्षता बढ़ाने के अवसर मिल सकते हैं। इससे उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कार्यबल तैयार करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, रोजगार पर वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि फंड से कितने उद्यम लाभान्वित होते हैं, वे किस स्तर पर विस्तार करते हैं और उनके निवेश से कितनी अतिरिक्त उत्पादन गतिविधियां शुरू होती हैं।
सीआईआई ने एसएमई ग्रोथ फंड के साथ सेल्फ-रिलायंट इंडिया फंड को जारी समर्थन तथा ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (टीआरईडीएस) के विस्तार से जुड़े उपायों का भी स्वागत किया है। संगठन के अनुसार, ये पहल छोटे कारोबारों की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने और कार्यशील पूंजी से जुड़ी समस्याओं को कम करने में उपयोगी साबित हो सकती हैं।
कार्यशील पूंजी किसी भी कारोबार के नियमित संचालन के लिए आवश्यक होती है। कच्चा माल खरीदने, कर्मचारियों को वेतन देने, बिजली और परिवहन का भुगतान करने तथा अन्य परिचालन खर्चों को पूरा करने के लिए कंपनियों को लगातार धन की जरूरत होती है। कई बार बिक्री पूरी होने और भुगतान प्राप्त होने के बीच समय का अंतर होने से छोटे उद्यमों के सामने नकदी की कमी पैदा हो जाती है।
टीआरईडीएस एक ऐसा मंच है, जिसके माध्यम से पात्र सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम अपने व्यापारिक प्राप्यों यानी खरीदारों से मिलने वाले भुगतान का वित्तपोषण प्राप्त कर सकते हैं। इससे स्वीकृत बिलों और चालानों के आधार पर समय से पहले धन उपलब्ध कराने की व्यवस्था में मदद मिल सकती है। इसके परिणामस्वरूप कारोबारों को भुगतान की लंबी अवधि के कारण होने वाली वित्तीय परेशानियों से राहत मिलने की संभावना रहती है।
वहीं, सेल्फ-रिलायंट इंडिया फंड का उद्देश्य एमएसएमई क्षेत्र में इक्विटी निवेश को प्रोत्साहित करने से जुड़ा रहा है। इसके माध्यम से छोटे उद्यमों को विकास के अगले चरण तक पहुंचाने और अतिरिक्त निवेश आकर्षित करने के अवसर मिल सकते हैं।
इन विभिन्न वित्तीय व्यवस्थाओं का महत्व इस बात में है कि वे कारोबारों की अलग-अलग जरूरतों को पूरा कर सकती हैं। जहां कार्यशील पूंजी से जुड़ी व्यवस्था दैनिक संचालन में सहायता देती है, वहीं इक्विटी निवेश और विकासोन्मुख फंड दीर्घकालिक विस्तार के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
सीआईआई का मानना है कि वित्त, तकनीक और बाजार तक बेहतर पहुंच से संबंधित सरकारी पहल एक-दूसरे की पूरक बन सकती हैं। केवल पूंजी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा; उद्यमों को उसके प्रभावी उपयोग, आधुनिक उत्पादन तकनीकों, प्रबंधन क्षमता और बाजार संबंधों को मजबूत करने की भी जरूरत होगी।
यदि वित्तीय संसाधनों के साथ उद्यमों को सही व्यावसायिक मार्गदर्शन और बाजार संबंधी अवसर मिलते हैं, तो वे अपने कारोबार को अधिक व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं। इससे उत्पादकता बढ़ाने, लागत कम करने और ग्राहकों को बेहतर उत्पाद उपलब्ध कराने में सहायता मिल सकती है।
भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। कंपनियों को लागत, गुणवत्ता, तकनीकी दक्षता और आपूर्ति की विश्वसनीयता के आधार पर प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। ऐसे में छोटे और मध्यम उद्यमों की क्षमता बढ़ाना देश की व्यापक औद्योगिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
सीआईआई अध्यक्ष आर. मुकुंदन ने कहा कि एसएमई ग्रोथ फंड और सरकार की अन्य पहलों के संयुक्त प्रभाव से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय विनिर्माण उद्यमों का अपना ‘मिटलस्टैंड’ तैयार करने की क्षमता विकसित हो सकती है। इस संदर्भ में ‘मिटलस्टैंड’ से आशय उन मजबूत मध्यम आकार की कंपनियों से है, जो छोटे उद्यमों से आगे बढ़कर बड़े उद्योगों की आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं और समय के साथ वैश्विक बाजार में अपनी जगह बना सकती हैं।
10,000 करोड़ रुपये के एसएमई ग्रोथ फंड की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन और वास्तविक जरूरत वाले उद्यमों तक पहुंच पर निर्भर करेगी। इसके लिए पात्रता संबंधी स्पष्ट नियम, पारदर्शी निवेश प्रक्रिया और उद्यमों की विकास क्षमता का उचित आकलन महत्वपूर्ण होंगे।
यह भी आवश्यक होगा कि फंड का लाभ उन कंपनियों तक पहुंचे, जिनके पास विस्तार की व्यावहारिक योजना, मजबूत कारोबारी संभावनाएं और रोजगार तथा उत्पादन बढ़ाने की क्षमता मौजूद है। औद्योगिक क्लस्टरों और छोटे शहरों के उद्यमों तक जानकारी पहुंचाना भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
इसके साथ ही फंड के उपयोग और उससे प्राप्त परिणामों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। उत्पादन क्षमता में वृद्धि, नई तकनीक को अपनाने, अतिरिक्त निवेश आकर्षित करने, निर्यात बढ़ाने और रोजगार सृजन जैसे संकेतकों के आधार पर इसकी प्रभावशीलता को समझा जा सकता है।
दीर्घकालिक सफलता के लिए यह भी जरूरी होगा कि उद्यमों को पूंजी उपलब्ध कराने के साथ उनके प्रबंधन, कौशल विकास, गुणवत्ता प्रमाणन और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच से जुड़ी चुनौतियों पर ध्यान दिया जाए। इससे निवेश का लाभ केवल अल्पकालिक कारोबार वृद्धि तक सीमित न रहकर उद्योगों की स्थायी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में बदल सकता है।
सीआईआई ने कहा कि वह उद्योग जगत की सिफारिशों को आगे बढ़ाने और एसएमई ग्रोथ फंड के प्रभावी क्रियान्वयन में सरकार के साथ मिलकर काम करेगा। संगठन के अनुसार, छोटे और मध्यम उद्यमों को विकास के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराना भारत की विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
उद्योग जगत को उम्मीद है कि दीर्घकालिक पूंजी, तकनीकी उन्नयन, बाजार तक पहुंच और वित्तीय सहायता से जुड़ी पहलों के माध्यम से भारतीय एसएमई अपने कारोबार का विस्तार कर सकेंगे। इससे घरेलू उत्पादन क्षमता मजबूत होने, नए निवेश आकर्षित होने और भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बेहतर होने की संभावनाएं बनेंगी।
कुल मिलाकर, एसएमई ग्रोथ फंड को भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। यदि इसका क्रियान्वयन प्रभावी तरीके से होता है और योग्य उद्यमों तक इसका लाभ पहुंचता है, तो यह छोटे और मध्यम कारोबारों को विकास के अगले चरण तक ले जाने में सहायक हो सकता है। इससे देश में मजबूत मध्यम आकार की औद्योगिक कंपनियों का आधार तैयार करने, क्षेत्रीय औद्योगिक विकास को गति देने और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


