यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 13h ago
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के शताब्दी समारोह में हिस्सा लिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि यूपीएससी के 100 वर्ष पूरे होना केवल एक संस्था की लंबी यात्रा का उत्सव नहीं है, बल्कि यह देश की प्रशासनिक व्यवस्था, उसकी विरासत और उन लाखों युवाओं की आकांक्षाओं का उत्सव है, जो हर वर्ष सिविल सेवाओं में जाने का सपना लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। यूपीएससी की स्थापना 1926 में हुई थी और एक अक्टूबर 2026 को आयोग ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि यूपीएससी ने अपनी एक सदी की यात्रा में देश की प्रशासनिक व्यवस्था को सक्षम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस दौरान देश में कई बड़े बदलाव आए। शासन की प्राथमिकताएं बदलीं, तकनीक बदली, काम करने के तरीके बदले और सरकारी सेवाओं का स्वरूप भी बदला, लेकिन यूपीएससी के प्रति लोगों का विश्वास बना रहा।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि 100 वर्षों की इस यात्रा में पीढ़ियां बदल गईं। सरकारी व्यवस्थाएं बदलीं, तकनीक बदली और सिलेबस में भी बदलाव आया, लेकिन यूपीएससी पर लोगों का भरोसा आज भी कायम है। उन्होंने कहा कि यह विश्वास आयोग की सबसे बड़ी पूंजी है।
उन्होंने इस ऐतिहासिक यात्रा से जुड़े सभी पूर्व अध्यक्षों, सदस्यों, अधिकारियों और कर्मचारियों को नमन करते हुए कहा कि इतने लंबे समय तक किसी संस्था के प्रति जनता का विश्वास बने रहना अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
शताब्दी समारोह के दौरान यूपीएससी की ऐतिहासिक यात्रा को दर्शाने वाली प्रदर्शनी भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रही। प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनी और गैलरी का अवलोकन करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन के दौर और यूपीएससी से जुड़े कई ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया।
प्रधानमंत्री ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जिक्र करते हुए कहा कि 1920 के दौर में वे भी इसी चयन प्रक्रिया से गुजरे थे। उन्होंने कहा कि उस समय देश पर अंग्रेजों का शासन था, इसके बावजूद परीक्षा में संस्कृत जैसे विषय भी शामिल थे और सुभाष बाबू ने संस्कृत का पेपर दिया था।
प्रधानमंत्री ने कहा कि यूपीएससी की यात्रा केवल परीक्षा और चयन तक सीमित नहीं है। इसके साथ देश के प्रशासनिक इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और आजाद भारत के निर्माण की कई महत्वपूर्ण स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।
यूपीएससी की शताब्दी के अवसर पर स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया गया। इसके अलावा आयोग की ऐतिहासिक यात्रा से जुड़े प्रकाशन को भी कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया। प्रधानमंत्री ने शताब्दी वर्ष के अवसर पर यूपीएससी की यात्रा और देश की सार्वजनिक सेवा व्यवस्था में उसके योगदान को रेखांकित किया।
आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार शताब्दी समारोह के तहत ‘100 Landmark Judgements- Shaping the Policies of UPSC and Public Service Commissions in India’ नामक पुस्तक भी जारी की गई।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में देश के पहले गृह मंत्री और लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को भी याद किया। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद सरदार पटेल के सामने केवल देश को स्वतंत्र बनाए रखने की चुनौती नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र भारत को चलाने और मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करने की भी चुनौती थी।
प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए जिस प्रशासनिक कौशल और व्यवस्था की जरूरत थी, उसे विकसित करने में सरदार पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने कहा कि सरदार पटेल ने प्रशासनिक संस्थाओं को मजबूत करने और उन्हें राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम बनाने पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज जिन युवाओं का चयन सरकारी सेवाओं के लिए हो रहा है, वे विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं। उन्होंने कहा कि चयन प्रक्रिया में दो कसौटियों को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए—‘देश पहले’ और ‘नागरिक पहले’।
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक सेवा में आने वाले युवाओं की सोच केवल सरकारी पद हासिल करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनमें समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि भर्ती परीक्षा केवल यह परखने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि उम्मीदवार कितना जानता है, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि वह सिविल सेवा में क्यों आना चाहता है और सार्वजनिक सेवा को लेकर उसकी सोच क्या है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को ऐसे युवाओं की जरूरत है जो पब्लिक ऑफिस से आकर्षित होने के बजाय पब्लिक सर्विस की भावना से प्रेरित होकर प्रशासन में आएं। उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारी का वास्तविक दायित्व नागरिकों की समस्याओं को समझना और उनका समाधान करने की दिशा में काम करना है।
उन्होंने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य केवल नियमों को लागू करना नहीं बल्कि लोगों के जीवन को आसान बनाना भी होना चाहिए। विशेष रूप से गरीब, वंचित और जरूरतमंद लोगों की समस्याओं को समझने वाली कार्य-संस्कृति को बढ़ावा देने की जरूरत है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि देश ने वह दौर भी देखा है जब सरकार को ‘माई-बाप’ समझा जाता था। लेकिन आज शासन की सोच बदल रही है और नागरिक को केंद्र में रखा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि आज का मंत्र ‘नागरिक देवो भव:’ होना चाहिए। नागरिकों की सेवा सर्वोपरि है और प्रशासन की सफलता का आकलन इस बात से होना चाहिए कि आम आदमी को सरकारी व्यवस्था से कितनी सुविधा और राहत मिल रही है।
उन्होंने कहा कि 21वीं सदी का भारत नई कार्य-संस्कृति के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे में प्रशासनिक सेवाओं में आने वाले युवाओं को भी बदलती जरूरतों के अनुरूप स्वयं को तैयार करना होगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को ऐसे प्रोफेशनल अधिकारियों की आवश्यकता है, जो गरीबों और सामान्य नागरिकों की वास्तविक समस्याओं को समझ सकें। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी को फाइलों और आंकड़ों से आगे जाकर जमीन पर लोगों की जरूरतों को समझना चाहिए।
उन्होंने बदलती तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल व्यवस्था के दौर में प्रशासनिक सेवाओं के सामने आने वाली नई चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। भविष्य के अधिकारियों से तकनीकी समझ के साथ संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की अपेक्षा होगी।
यूपीएससी की शताब्दी के अवसर पर दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन 30 सितंबर और एक अक्टूबर को भारत मंडपम में किया गया। कार्यक्रम को ‘मंथन’ नाम दिया गया। इसमें सिविल सेवाओं के बदलते स्वरूप, सार्वजनिक प्रशासन में नवाचार और संवैधानिक मूल्यों जैसे विषयों पर चर्चा हुई। यूपीएससी अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने आयोग की आगे की यात्रा के लिए ‘ट्रस्ट, ट्रांसपेरेंसी और टेक्नोलॉजी’ यानी विश्वास, पारदर्शिता और तकनीक को प्रमुख मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में रेखांकित किया।
समारोह में देशभर के राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्य, केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद, यूपीएससी के अधिकारी और अन्य संबंधित लोग शामिल हुए।
प्रधानमंत्री के संबोधन में सिविल सेवाओं को बदलते भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने का संदेश भी प्रमुख रहा। भारत तेजी से डिजिटल और तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारियों के सामने पहले की तुलना में अलग तरह की चुनौतियां हैं।
आने वाले समय में अधिकारियों से तकनीकी दक्षता के साथ-साथ डेटा आधारित निर्णय, नवाचार, पारदर्शिता और नागरिकों के प्रति संवेदनशील व्यवहार की अपेक्षा बढ़ेगी। यूपीएससी की शताब्दी का आयोजन इसी बदलती प्रशासनिक जरूरतों पर विचार करने का अवसर भी बना।
प्रधानमंत्री ने युवाओं को संबोधित करते हुए यह संदेश दिया कि सिविल सेवा केवल एक प्रतिष्ठित करियर नहीं, बल्कि बड़ी जिम्मेदारी भी है। परीक्षा पास करने के बाद असली चुनौती जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की होती है।
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में आने वाले युवाओं में राष्ट्रहित और नागरिक हित को प्राथमिकता देने की भावना होनी चाहिए। प्रशासन में निर्णय लेने वाले अधिकारियों को समाज के अलग-अलग वर्गों की आवश्यकताओं और चुनौतियों को समझना होगा।
यूपीएससी की 100 वर्ष की यात्रा देश के प्रशासनिक इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है। 1926 में स्थापित हुई यह संस्था समय के साथ विकसित होती गई और स्वतंत्र भारत में संघ लोक सेवा आयोग के रूप में संवैधानिक संस्था की भूमिका निभाने लगी।
शताब्दी समारोह ने आयोग की इस पूरी यात्रा को याद करने के साथ-साथ भविष्य की दिशा पर चर्चा का अवसर दिया। समारोह में अतीत की उपलब्धियों के साथ भविष्य की प्रशासनिक जरूरतों पर भी मंथन हुआ।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में फ्लायदुबई के विमान में हुई चाकूबाजी और विमान को हाईजैक करने की साजिश का भी उल्लेख किया। उन्होंने संकट की स्थिति में यात्रियों की सुरक्षा के लिए साहस दिखाने वाले भारतीय पायलट स्मित मच्छार की सराहना की।
प्रधानमंत्री ने कहा कि पायलट के पराक्रम और सूझबूझ ने देश को गौरवान्वित किया। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने पायलट के माता-पिता और पत्नी से बातचीत की है।
यूपीएससी के शताब्दी समारोह से देश के लाखों प्रतियोगी छात्रों और सिविल सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भी एक संदेश सामने आया। प्रधानमंत्री ने चयन और नियुक्ति को केवल व्यक्तिगत सफलता के रूप में देखने के बजाय इसे देश और समाज की सेवा से जोड़ने पर जोर दिया।
यूपीएससी की परीक्षा हर वर्ष बड़ी संख्या में युवाओं को आकर्षित करती है। ऐसे में आयोग की शताब्दी केवल एक संस्थागत उपलब्धि नहीं बल्कि उन करोड़ों सपनों से भी जुड़ी हुई है, जिन्हें देश के युवा प्रशासनिक सेवाओं के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाली पीढ़ी के अधिकारी विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसलिए यह जरूरी है कि उनमें ज्ञान के साथ संवेदनशीलता, कर्तव्यबोध, तकनीकी समझ और नागरिकों की सेवा की भावना भी हो।
इस तरह यूपीएससी का शताब्दी समारोह अतीत की उपलब्धियों को याद करने के साथ भविष्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर विचार करने का अवसर भी बना। एक सदी पूरी कर चुका आयोग अब बदलते भारत की जरूरतों, नई तकनीकों और नागरिक-केंद्रित शासन व्यवस्था के अनुरूप अपनी अगली यात्रा की दिशा तय करने की ओर बढ़ रहा है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


