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- 13h ago
नई दिल्ली। गॉल ब्लैडर यानी पित्ताशय की सर्जरी को आमतौर पर न्यूनतम इनवेसिव तकनीकों के जरिए किया जाता है, लेकिन कुछ मरीजों में ऑपरेशन के दौरान परिस्थितियां अपेक्षा से कहीं अधिक जटिल हो सकती हैं। गंभीर सूजन, पुराने संक्रमण के कारण बने निशान, घने एडहीजन और बदली हुई शारीरिक संरचना जैसी स्थितियां सर्जन के लिए चुनौती पैदा कर सकती हैं। ऐसे जटिल मामलों में रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी सर्जन को बेहतर दृश्यता, उपकरणों पर अधिक नियंत्रण और कठिन एनाटॉमी में सटीकता के साथ काम करने में सहायता दे सकती है।
एम्स नई दिल्ली के डिपार्टमेंट ऑफ सर्जिकल डिसिप्लिन्स के विशेषज्ञों के मुताबिक, संस्थान में अब तक 1,500 से अधिक रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी का अनुभव विकसित किया जा चुका है। विभिन्न प्रकार की सर्जरी में इस्तेमाल होने वाली इस तकनीक का उपयोग गॉल ब्लैडर से संबंधित चुनिंदा जटिल मामलों में भी किया जा रहा है।
प्रो. हेमंगा के. भट्टाचार्जी, डिपार्टमेंट ऑफ सर्जिकल डिसिप्लिन्स, एम्स नई दिल्ली ने बताया कि गॉल ब्लैडर की सर्जरी में वास्तविक स्थिति कई बार ऑपरेशन से पहले किए गए आकलन से अलग निकल सकती है। मरीज के शरीर के अंदर सूजन और चिपकाव की स्थिति कितनी गंभीर है, यह कई बार सर्जरी के दौरान ही पूरी तरह स्पष्ट होता है।
उन्होंने बताया कि गंभीर सूजन, पुराने संक्रमण और एडहीजन के कारण सामान्य शारीरिक संरचना बदल सकती है। ऐसी परिस्थितियों में आसपास के अंगों और महत्वपूर्ण संरचनाओं को पहचानते हुए सावधानीपूर्वक सर्जरी करना जरूरी होता है। रोबोटिक तकनीक बेहतर विजुअलाइजेशन और उपकरणों के नियंत्रण के जरिए सर्जन को ऐसी कठिन एनाटॉमी में काम करने में मदद कर सकती है।
रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी में इस्तेमाल होने वाला दा विंची सिस्टम सर्जन को हाई-डेफिनिशन 3-डी दृश्य उपलब्ध कराता है। इससे ऑपरेशन वाले हिस्से की संरचनाओं को अधिक स्पष्ट रूप से देखने में मदद मिल सकती है।
सिस्टम के साथ जुड़े ‘व्रिस्टेड’ यानी कलाई जैसी गति करने वाले उपकरणों को सर्जन अपने नियंत्रण के जरिए अलग-अलग कोणों पर संचालित कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर के किसी ऐसे हिस्से तक पहुंचने या उसे देखने में कठिनाई होने पर यह तकनीकी क्षमता उपयोगी हो सकती है, जहां पारंपरिक उपकरणों की गति सीमित हो।
हालांकि, विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि तकनीक का लाभ तभी प्रभावी तरीके से मिल सकता है, जब उसका इस्तेमाल प्रशिक्षित और अनुभवी सर्जिकल टीम द्वारा मरीज की स्थिति के अनुरूप किया जाए।
रोबोटिक सर्जरी को लेकर आम लोगों में यह धारणा हो सकती है कि ऑपरेशन मशीन द्वारा स्वत: किया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा नहीं है। रोबोटिक सिस्टम स्वयं निर्णय लेकर सर्जरी नहीं करता।
ऑपरेशन के दौरान रोबोटिक सिस्टम का नियंत्रण सर्जन के हाथ में रहता है। सर्जन ही यह तय करता है कि किस स्थान पर किस उपकरण का इस्तेमाल करना है और किस तरह की सर्जिकल प्रक्रिया अपनाई जानी है। रोबोटिक सिस्टम सर्जन की गतिविधियों को तकनीकी सहायता प्रदान करता है।
इस लिहाज से रोबोटिक सर्जरी को सर्जन की विशेषज्ञता का विकल्प नहीं, बल्कि एक तकनीकी साधन के रूप में देखा जाता है। एनाटॉमी की समझ, क्लिनिकल निर्णय, मरीज की स्थिति का आकलन और ऑपरेशन की रणनीति तय करने की जिम्मेदारी सर्जिकल टीम की ही रहती है।
सर्जिकल यूनिट-4 के प्रमुख प्रो. असुरी कृष्ण ने रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी के प्रशिक्षण संबंधी पहलू पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार, न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी सीख रहे युवा सर्जनों के लिए रोबोटिक प्लेटफॉर्म एक अलग तरह का प्रशिक्षण अनुभव उपलब्ध करा सकता है।
रोबोटिक सिस्टम के जरिए एनाटॉमी को अलग तरीके से देखने और सर्जिकल मूवमेंट को नियंत्रित करने का अभ्यास किया जा सकता है। इससे प्रशिक्षण के दौरान कौशल विकसित करने और कठिन प्रक्रियाओं को समझने में सहायता मिल सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञता हासिल करने के लिए केवल रोबोटिक सिस्टम का इस्तेमाल पर्याप्त नहीं है। सर्जिकल प्रशिक्षण में मरीज की सुरक्षा, एनाटॉमी की समझ, निर्णय लेने की क्षमता और पारंपरिक तथा न्यूनतम इनवेसिव तकनीकों का ज्ञान भी महत्वपूर्ण रहता है।
गॉल ब्लैडर सर्जरी की तकनीक में पिछले कई दशकों के दौरान उल्लेखनीय बदलाव आया है। एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ सर्जिकल डिसिप्लिन्स के प्रमुख डॉ. सुनील चुम्बर ने इस बदलाव को लंबे समय से देखा है।
उनके अनुभव में ओपन सर्जरी से लेकर मिनी-लैपरोटॉमी, फिर पारंपरिक लैप्रोस्कोपिक सर्जरी और अब रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी तक का सफर शामिल है।
एक समय में गॉल ब्लैडर को निकालने के लिए अपेक्षाकृत बड़ा चीरा लगाने की जरूरत होती थी। इसके बाद छोटे चीरे के जरिए की जाने वाली लैप्रोस्कोपिक तकनीक ने सर्जरी के क्षेत्र में बड़ा बदलाव किया। अब रोबोटिक प्लेटफॉर्म ने न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी में उपकरणों की गतिशीलता और दृश्यता को और बेहतर करने की संभावना पैदा की है।
लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के आने से मरीज के शरीर पर बड़े चीरे की जरूरत काफी हद तक कम हुई। छोटे चीरे के जरिए कैमरा और विशेष उपकरण डालकर सर्जरी की जाने लगी। इसके चलते कई मरीजों में पोस्ट-ऑपरेटिव रिकवरी और अस्पताल में रहने की अवधि में लाभ देखने को मिला।
लेकिन लैप्रोस्कोपिक उपकरणों की अपनी तकनीकी सीमाएं भी हैं। उपकरणों की गति और सर्जिकल क्षेत्र की दृश्यता कुछ जटिल परिस्थितियों में चुनौती बन सकती है। रोबोटिक तकनीक इन्हीं क्षेत्रों में अतिरिक्त क्षमताएं उपलब्ध कराने का प्रयास करती है।
डॉ. सुनील चुम्बर के अनुसार, लंबे समय तक लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करने के अनुभव के आधार पर रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी को इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण अगला तकनीकी कदम माना जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सर्जरी की प्रत्येक नई तकनीक पिछली तकनीक की उपलब्धियों के आधार पर विकसित होती है। ओपन सर्जरी से मिनी-लैपरोटॉमी और फिर लैप्रोस्कोपी तक पहुंचने के बाद रोबोटिक्स को न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी की अगली तकनीकी दिशा के रूप में देखा जा रहा है।
उनके अनुसार, आने वाले समय में रोबोटिक सर्जरी का इस्तेमाल बढ़ सकता है और विशेष रूप से जटिल मामलों में इसका उपयोग अधिक देखने को मिल सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर गॉल ब्लैडर मरीज के लिए रोबोटिक सर्जरी जरूरी या उपयुक्त होगी।
विशेषज्ञों की बातों से यह भी स्पष्ट होता है कि सर्जरी की तकनीक का चयन मरीज की स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए। सामान्य गॉल ब्लैडर सर्जरी और जटिल मामलों की परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं।
मरीज की बीमारी, सूजन की स्थिति, पहले हुए ऑपरेशन, एडहीजन, शरीर की एनाटॉमी, सर्जिकल टीम की विशेषज्ञता और उपलब्ध संसाधनों जैसे कई कारक यह तय करने में भूमिका निभा सकते हैं कि किस तकनीक से सर्जरी की जाए।
इसलिए रोबोटिक सर्जरी को हर स्थिति में लैप्रोस्कोपी का स्वत: विकल्प मानना उचित नहीं होगा। अंतिम निर्णय सर्जन द्वारा मरीज की चिकित्सकीय स्थिति का आकलन करने के बाद लिया जाता है।
रोबोटिक तकनीक की चर्चा में सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में बेहतर दृश्यता और उपकरणों पर नियंत्रण शामिल है। विशेष रूप से ऐसी जगह जहां छोटी-सी संरचना को पहचानना और उसके आसपास सावधानी से काम करना जरूरी हो, वहां 3-डी विजुअलाइजेशन और कलाई जैसी गति वाले उपकरण सर्जन के लिए मददगार हो सकते हैं।
इसका उद्देश्य सर्जन को अधिक तकनीकी सुविधा देना है, ताकि वह कठिन परिस्थितियों में उपलब्ध दृश्य और उपकरण नियंत्रण का बेहतर इस्तेमाल कर सके।
भारत में रोबोटिक सर्जरी का इस्तेमाल धीरे-धीरे विभिन्न सर्जिकल क्षेत्रों में बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जैसे-जैसे तकनीक का अनुभव बढ़ेगा, प्रशिक्षण के अवसर विकसित होंगे और अस्पतालों में रोबोटिक सिस्टम की उपलब्धता बढ़ेगी, वैसे-वैसे इसके उपयोग का दायरा भी बढ़ सकता है।
हालांकि, रोबोटिक सिस्टम की लागत, प्रशिक्षित टीम की आवश्यकता और अस्पताल में आवश्यक तकनीकी ढांचे जैसे पहलू भी इसके व्यापक इस्तेमाल में महत्वपूर्ण हैं।
गॉल ब्लैडर सर्जरी कराने वाले मरीजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऑपरेशन की तकनीक का चुनाव केवल नई या आधुनिक तकनीक के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। मरीज की बीमारी और उसकी शारीरिक स्थिति के अनुसार सर्जन द्वारा तय की गई तकनीक ही महत्वपूर्ण होती है।
रोबोटिक सर्जरी कुछ जटिल परिस्थितियों में सर्जन को अतिरिक्त तकनीकी क्षमताएं दे सकती है, लेकिन इसका लाभ मरीज की विशिष्ट स्थिति और सर्जिकल टीम के अनुभव पर निर्भर करता है।
गॉल ब्लैडर सर्जरी का सफर ओपन सर्जरी से लेकर लैप्रोस्कोपी और अब रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी तक पहुंच चुका है। इस पूरी यात्रा में तकनीक लगातार विकसित हुई है, लेकिन मरीज की सुरक्षा और सर्जन का चिकित्सकीय निर्णय आज भी सबसे महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
रोबोटिक सिस्टम सर्जन के हाथों को तकनीकी रूप से अधिक सक्षम बनाने का माध्यम है। यह न तो सर्जन की जगह लेता है और न ही हर मरीज के लिए अनिवार्य समाधान है। विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले समय में इसका इस्तेमाल विशेष रूप से जटिल और चुनौतीपूर्ण मामलों में बढ़ सकता है।
इस बदलाव को गॉल ब्लैडर सर्जरी में तकनीकी विकास की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है—जहां छोटे चीरे और न्यूनतम इनवेसिव दृष्टिकोण के साथ अब बेहतर विजुअलाइजेशन और उपकरण नियंत्रण पर भी जोर बढ़ रहा है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


