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- 13h ago
नई दिल्ली। भारत का जेम्स एंड ज्वैलरी उद्योग वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुका है। कच्चे सोने को छोड़कर वैश्विक जेम्स एंड ज्वैलरी निर्यात में भारत की करीब 8 प्रतिशत हिस्सेदारी देश की मजबूत विनिर्माण क्षमता, कुशल कारीगरी और लंबे समय से विकसित कारोबारी नेटवर्क को दर्शाती है। हालांकि, उद्योग के सामने अगली बड़ी चुनौती केवल उत्पादन और निर्यात का आकार बढ़ाना नहीं, बल्कि अधिक मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करना, डिजाइन क्षमता मजबूत करना, उत्पादों में विविधता लाना और भारतीय ज्वैलरी को वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित करना है।
नीति आयोग के कार्यक्रम निदेशक डॉ. प्रवाकर साहू ने बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित ‘जेम्स एंड ज्वैलरी कॉन्फ्रेंस 2026’ के उद्घाटन सत्र में यह बात कही। सम्मेलन में उद्योग की वर्तमान स्थिति, वैश्विक बाजार में बदलते रुझान, तकनीकी बदलाव, उपभोक्ता विश्वास, प्राकृतिक और लैब-ग्रोन् डायमंड, कारीगरों की भूमिका तथा निर्यात बढ़ाने की संभावनाओं पर व्यापक चर्चा हुई।
सम्मेलन का आयोजन कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने उपभोक्ता मामले विभाग, उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के सहयोग से किया। इस वर्ष सम्मेलन की थीम ‘भारत का ज्वेलरी मोमेंट: क्राफ्ट से कॉमर्स तक, इनोवेशन से इम्पैक्ट तक’ रखी गई।
डॉ. साहू ने कहा कि कच्चे सोने को छोड़कर वैश्विक जेम्स एंड ज्वैलरी निर्यात में भारत की लगभग 8 प्रतिशत हिस्सेदारी यह बताती है कि देश ने इस क्षेत्र में उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात के स्तर पर महत्वपूर्ण क्षमता विकसित की है।
भारत लंबे समय से हीरा कटिंग और पॉलिशिंग तथा आभूषण निर्माण के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता के लिए जाना जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में लाखों कारीगर इस क्षेत्र से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।
हालांकि, आने वाले दौर में वैश्विक बाजार की जरूरतें बदल रही हैं। ग्राहक अब केवल पारंपरिक आभूषण नहीं देखता, बल्कि डिजाइन, गुणवत्ता, प्रमाणन, ट्रेसेबिलिटी, टिकाऊपन और ब्रांड की विश्वसनीयता जैसे पहलुओं को भी महत्व देता है। ऐसे में भारतीय उद्योग को अपनी पारंपरिक ताकत के साथ नई तकनीक और डिजाइन क्षमताओं को जोड़ना होगा।
भारत ने जेम्स एंड ज्वैलरी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उत्पादन और प्रसंस्करण की क्षमता विकसित की है। लेकिन उद्योग की अगली विकास यात्रा में केवल मात्रा बढ़ाने के बजाय वैल्यू एडिशन महत्वपूर्ण होगा।
इसका मतलब है कि समान मात्रा में अधिक मूल्य वाले उत्पाद तैयार किए जाएं। डिजाइन, फिनिशिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और ग्राहक अनुभव के माध्यम से उत्पाद का मूल्य बढ़ाया जा सकता है।
भारतीय कंपनियों के सामने अवसर है कि वे वैश्विक बाजार के लिए केवल विनिर्माता या सप्लायर बनने के बजाय अपने स्वयं के डिजाइन और ब्रांड विकसित करें। इससे वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भारत की भूमिका और मजबूत हो सकती है।
सीआईआई रत्न एवं आभूषण टास्कफोर्स के चेयरमैन जी.आर. आनंद अनंतपद्मनाभन ने कहा कि भारतीय समाज में आभूषणों का महत्व केवल सजावट तक सीमित नहीं है। यह लंबे समय से परिवारों की बचत, संपत्ति और वित्तीय सुरक्षा से जुड़ा रहा है।
आर्थिक कठिनाइयों के समय भी कई परिवारों के लिए सोना और आभूषण एक महत्वपूर्ण वित्तीय संपत्ति का काम करते रहे हैं। इस सामाजिक और आर्थिक महत्व को देखते हुए उद्योग को उपभोक्ताओं के विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
उन्होंने भारतीय ज्वैलरी को वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाई तक पहुंचाने के लिए उद्योग, सरकार और उपभोक्ताओं के बीच सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।
टास्क फोर्स के सह-अध्यक्ष संदीप कोहली ने उद्योग की अगली विकास यात्रा को ‘स्केल से वैल्यू’ और ‘मैन्युफैक्चरिंग से डिजाइन’ की दिशा में आगे बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
उनके मुताबिक भारतीय कंपनियों को केवल दूसरों के लिए उत्पाद बनाने तक सीमित रहने के बजाय ओईएम से ओडीएम और ग्लोबल ब्रांड की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
इस बदलाव में डिजाइनरों, तकनीकी विशेषज्ञों, कारीगरों और कारोबारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। भारतीय पारंपरिक कला और आधुनिक डिजाइन के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सकता है।
भारत की ज्वैलरी इंडस्ट्री की सबसे बड़ी ताकतों में उसकी पारंपरिक कारीगरी शामिल है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में आभूषण बनाने की विशिष्ट शैलियां और तकनीकें मौजूद हैं।
लेकिन नई पीढ़ी के उपभोक्ता की पसंद तेजी से बदल रही है। वह हल्के, आधुनिक, व्यक्तिगत पसंद के अनुरूप और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले आभूषणों की ओर भी आकर्षित हो रहा है।
ऐसे में पारंपरिक कारीगरी को खत्म करने के बजाय उसे आधुनिक डिजाइन, तकनीक और बाजार की जरूरतों से जोड़ना जरूरी होगा। इससे एक ओर विरासत संरक्षित रह सकती है और दूसरी ओर कारीगरों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं।
जेम्स एंड ज्वैलरी उद्योग में तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। डिजाइन तैयार करने से लेकर उत्पादन, गुणवत्ता जांच, ग्राहक सेवा और बिक्री तक डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है।
कंप्यूटर आधारित डिजाइन, डिजिटल मॉडलिंग, स्वचालित उत्पादन प्रक्रियाएं, डिजिटल टेस्टिंग और ऑनलाइन बिक्री जैसे माध्यम उद्योग के कामकाज को बदल रहे हैं।
तकनीक का उद्देश्य केवल उत्पादन की गति बढ़ाना नहीं, बल्कि गलतियों को कम करना, गुणवत्ता में एकरूपता लाना और ग्राहक को उत्पाद के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध कराना भी है।
डी बीयर्स ग्रुप की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, गवर्नमेंट अफेयर्स और इंडस्ट्री रिलेशंस एम्मा वेद-स्मिथ ओबीई ने प्राकृतिक और लैब-ग्रोन् डायमंड खरीदने वाले उपभोक्ताओं के लिए पारदर्शी और एकरूप जानकारी की आवश्यकता पर जोर दिया।
डायमंड बाजार में उपभोक्ता के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि वह किस प्रकार का डायमंड खरीद रहा है और उससे संबंधित प्रमाणन एवं जानकारी कितनी विश्वसनीय है।
मानक, बेहतर संचार, तकनीक और ट्रेसेबिलिटी को मजबूत करने से ग्राहक का भरोसा बढ़ सकता है। इससे उद्योग में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ-साथ भारत की वैश्विक डायमंड क्षेत्र में स्थिति को भी मजबूती मिल सकती है।
लैब-ग्रोन् डायमंड ने पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक ज्वैलरी बाजार में नई चर्चा पैदा की है। तकनीक के माध्यम से तैयार किए जाने वाले इन डायमंड के कारण उपभोक्ताओं के सामने एक अतिरिक्त विकल्प मौजूद है।
ऐसे बदलते बाजार में उद्योग के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय स्पष्ट जानकारी और उपभोक्ता जागरूकता है। ग्राहक को उत्पाद की प्रकृति, गुणवत्ता और प्रमाणन से जुड़ी जानकारी स्पष्ट रूप से मिलनी चाहिए।
उद्योग के सामने चुनौती यह है कि प्राकृतिक और लैब-ग्रोन् डायमंड से संबंधित जानकारी को सरल, सटीक और पारदर्शी तरीके से उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाए।
वैश्विक ज्वैलरी बाजार में ट्रेसेबिलिटी का महत्व लगातार बढ़ रहा है। ग्राहक यह जानना चाहता है कि उसके द्वारा खरीदा गया उत्पाद किस स्रोत से आया, उसकी गुणवत्ता की जांच कैसे हुई और उसकी पूरी आपूर्ति श्रृंखला कितनी पारदर्शी है।
डिजिटल तकनीक और प्रमाणन प्रणालियां इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इससे उपभोक्ता को उत्पाद के बारे में अधिक भरोसेमंद जानकारी मिल सकती है।
बुलियनएक्स (बुलियन मार्केट वर्टिकल), इंडिया गोल्ड मेटावर्स के प्रबंध निदेशक निराकर चंद ने सोना और ज्वैलरी इकोसिस्टम में तकनीक के माध्यम से भरोसा, पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने की जरूरत बताई।
उन्होंने डिजिटल टेस्टिंग, इंटीग्रेटेड बुलियन ट्रेडिंग, वर्चुअल मार्केटप्लेस और ब्लॉकचेन आधारित समाधानों को संभावित उपयोगी माध्यमों के रूप में रेखांकित किया।
ऐसे डिजिटल समाधान बाजार में लेन-देन को अधिक व्यवस्थित करने, जानकारी साझा करने और आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
भारत के जेम्स एंड ज्वैलरी क्षेत्र में बड़ी कंपनियों के साथ बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम कारोबारी भी जुड़े हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म इन कारोबारियों के लिए नए बाजारों तक पहुंच का माध्यम बन सकते हैं।
ऑनलाइन कैटलॉग, डिजिटल भुगतान, सोशल मीडिया मार्केटिंग और ई-कॉमर्स के माध्यम से स्थानीय कारोबारी देश के दूसरे हिस्सों के ग्राहकों तक पहुंच सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार से निर्यात के नए अवसर भी बन सकते हैं।
हालांकि, इसके लिए गुणवत्ता, प्रमाणन, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और ग्राहक सेवा के मानकों को मजबूत करना जरूरी होगा।
डॉ. साहू ने वैश्विक व्यापार परिदृश्य में बदलाव के बीच भारत के निर्यात और आयात बाजारों में विविधता लाने की जरूरत बताई।
किसी सीमित संख्या में बाजारों पर अधिक निर्भरता से वैश्विक आर्थिक बदलावों का असर बढ़ सकता है। इसलिए भारतीय ज्वैलरी उद्योग के लिए नए बाजारों की पहचान करना और वहां स्थानीय उपभोक्ताओं की पसंद के अनुसार उत्पाद विकसित करना महत्वपूर्ण होगा।
दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया, यूरोप, उत्तरी अमेरिका और अन्य उभरते बाजारों में अलग-अलग तरह की उपभोक्ता प्राथमिकताएं हैं। भारतीय कंपनियां स्थानीय मांग के अनुरूप डिजाइन और उत्पाद तैयार करके अपनी पहुंच बढ़ा सकती हैं।
भारत की पहचान मुख्य रूप से डायमंड और गोल्ड ज्वैलरी के साथ रही है। अब उद्योग के सामने उत्पादों की श्रेणी बढ़ाने का अवसर है।
रत्न आधारित आभूषण, रंगीन पत्थरों की ज्वैलरी, हल्के वजन के आभूषण, आधुनिक डिजाइन, व्यक्तिगत पसंद के अनुसार तैयार किए गए उत्पाद और युवा उपभोक्ताओं के लिए नई श्रेणियां विकसित की जा सकती हैं।
उत्पाद विविधीकरण से बाजार में नए ग्राहक समूहों को जोड़ा जा सकता है और किसी एक श्रेणी पर निर्भरता कम हो सकती है।
भारत दुनिया के प्रमुख ज्वैलरी विनिर्माण केंद्रों में शामिल है, लेकिन वैश्विक उपभोक्ता स्तर पर भारतीय ब्रांडों की पहचान को और मजबूत करने की संभावना है।
कई भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार करती हैं, लेकिन उद्योग स्तर पर भारत को ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ के साथ-साथ ‘डिजाइन और ब्रांड हब’ के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
इसके लिए भारतीय डिजाइन, सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक फैशन के बीच नया मेल तैयार किया जा सकता है।
जेम्स एंड ज्वैलरी उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता में कुशल कारीगरों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। हाथ से काम करने वाली पारंपरिक तकनीकों के साथ आधुनिक मशीनरी और डिजिटल डिजाइन को समझने वाले नए कारीगरों की आवश्यकता भी बढ़ रही है।
नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देकर उन्हें आधुनिक तकनीक, डिजाइन सॉफ्टवेयर, गुणवत्ता जांच और अंतरराष्ट्रीय मानकों से परिचित कराया जा सकता है।
इसके साथ ही पारंपरिक कारीगरों के कौशल को दस्तावेजीकृत और संरक्षित करने की जरूरत है, ताकि सदियों से चली आ रही भारतीय कला भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंच सके।
डॉ. साहू ने उद्योग में मौजूद विखंडन को दूर करने और बुनियादी ढांचे तथा वित्त तक पहुंच मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
छोटे कारोबारियों के लिए पूंजी की उपलब्धता, आधुनिक उपकरणों में निवेश और डिजिटल तकनीक अपनाना कई बार चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में वित्तीय पहुंच और कारोबारी प्रक्रियाओं को आसान बनाने से उद्योग के व्यापक हिस्से को लाभ मिल सकता है।
ज्वैलरी कारोबार सीधे उपभोक्ता के भरोसे से जुड़ा हुआ है। सोना, हीरा और कीमती रत्नों की खरीद में ग्राहक बड़ी राशि खर्च करता है। ऐसे में शुद्धता, वजन, प्रमाणन, कीमत और उत्पाद की जानकारी में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है।
तकनीक आधारित टेस्टिंग, प्रमाणन और डिजिटल रिकॉर्ड इस भरोसे को मजबूत करने में भूमिका निभा सकते हैं। उपभोक्ता को जितनी स्पष्ट जानकारी मिलेगी, खरीद का अनुभव उतना ही बेहतर हो सकता है।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में सीआईआई की रिपोर्ट ‘भारत का हीरा अवसर: प्राकृतिक और प्रयोगशाला में उगाए गए हीरों में विकास को सक्षम बनाना’ का भी विमोचन किया गया।
रिपोर्ट का फोकस प्राकृतिक और लैब-ग्रोन् डायमंड से जुड़े बाजार के विकास, उद्योग के अवसरों और भविष्य की संभावनाओं पर रहा। इससे डायमंड क्षेत्र में बदलते बाजार और तकनीकी परिस्थितियों के बीच भारत के लिए संभावित अवसरों पर चर्चा को आगे बढ़ाने का आधार मिला।
कार्यक्रम में भारतीय राष्ट्रीय रत्न एवं आभूषण परिषद के चेयरमैन प्रमोद अग्रवाल तथा रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद के वाइस चेयरमैन शौनक पारिख सहित उद्योग जगत के प्रमुख प्रतिनिधि मौजूद रहे।
सम्मेलन में विभिन्न वक्ताओं ने उद्योग के भविष्य को लेकर अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा की। इनमें तकनीक, उपभोक्ता विश्वास, कारीगरी, वैश्विक व्यापार, डिजाइन, ट्रेसेबिलिटी और डिजिटल बाजार जैसे विषय प्रमुख रहे।
भारतीय जेम्स एंड ज्वैलरी उद्योग के लिए आने वाला दौर पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक तकनीक के बीच बेहतर तालमेल बनाने का हो सकता है। भारत के पास मजबूत कारीगर आधार, उत्पादन क्षमता और अंतरराष्ट्रीय बाजार का अनुभव है।
अब आवश्यकता इस क्षमता को उच्च मूल्य वाले उत्पादों, आधुनिक डिजाइन, विश्वसनीय ब्रांड और तकनीक आधारित कारोबारी मॉडल से जोड़ने की है।
यदि उद्योग अपने पारंपरिक कौशल को आधुनिक डिजाइन, डिजिटल तकनीक, बेहतर गुणवत्ता, पारदर्शिता और वैश्विक ब्रांडिंग के साथ जोड़ता है तो भारतीय ज्वैलरी की अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान और मजबूत हो सकती है।
सम्मेलन की थीम ‘क्राफ्ट से कॉमर्स तक, इनोवेशन से इम्पैक्ट तक’ इसी बदलाव की ओर संकेत करती है। भारतीय ज्वैलरी की सदियों पुरानी कारीगरी को आधुनिक व्यापार और तकनीक के साथ जोड़कर नई पीढ़ी के उपभोक्ताओं तक पहुंचाना उद्योग की महत्वपूर्ण प्राथमिकता बन सकती है।
भारत के सामने अब केवल अधिक ज्वैलरी बनाने का लक्ष्य नहीं है। चुनौती यह है कि भारतीय उद्योग अधिक मूल्य, बेहतर डिजाइन, विश्वसनीयता, तकनीकी दक्षता और वैश्विक पहचान के साथ आगे बढ़े।
वैश्विक जेम्स एंड ज्वैलरी निर्यात में करीब 8 प्रतिशत हिस्सेदारी भारत की मौजूदा ताकत को दर्शाती है, जबकि उत्पाद विविधीकरण, डिजाइन, ब्रांडिंग, ट्रेसेबिलिटी और तकनीक भविष्य में इस क्षेत्र के विस्तार के प्रमुख आधार बन सकते हैं। सम्मेलन में उभरा व्यापक संदेश यही रहा कि भारत को अपनी पारंपरिक कारीगरी की ताकत को आधुनिक तकनीक और वैश्विक व्यापार रणनीति के साथ जोड़कर जेम्स एंड ज्वैलरी क्षेत्र में अगला विकास चरण तैयार करना होगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


