यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 13h ago
नई दिल्ली। विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत को विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ तकनीकी क्षमता, कुशल मानव संसाधन, स्वदेशी तकनीक और वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करनी होगी। देश के इस औद्योगिक विस्तार में इस्पात क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है। इस्पात मंत्रालय के सचिव संदीप पौंड्रिक ने 29 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित सीआईआई मैन्युफैक्चरिंग कॉन्क्लेव-2026 के उद्घाटन सत्र में यह बात कही।
‘मैन्युफैक्चरिंग इंडिया 5.0 : स्मार्ट, स्केलेबल, सस्टेनेबल—अनलॉकिंग ग्रोथ’ विषय पर आयोजित सम्मेलन में देश के विनिर्माण क्षेत्र के भविष्य, तकनीकी बदलाव, निर्यात, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और औद्योगिक क्षमता विस्तार पर चर्चा हुई। सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि आने वाले वर्षों में भारत को केवल अधिक उत्पादन करने वाला देश बनने के बजाय उच्च गुणवत्ता और उच्च मूल्य वाले उत्पादों का प्रमुख वैश्विक केंद्र बनना होगा।
संदीप पौंड्रिक ने बताया कि भारत की स्टील क्षमता में पिछले कुछ दशकों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 1990 के आसपास देश की स्टील क्षमता करीब 22 मिलियन टन थी, जो अब बढ़कर लगभग 220 मिलियन टन हो चुकी है।
उन्होंने कहा कि देश में स्टील की खपत करीब 11 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जबकि उत्पादन क्षमता में वृद्धि 9 प्रतिशत से अधिक की गति से हो रही है। मांग और क्षमता के बीच इस अंतर को देखते हुए आने वाले वर्षों में नए संयंत्रों, आधुनिक तकनीक और उत्पादन क्षमता के विस्तार की जरूरत बनी रहेगी।
इस्पात क्षेत्र में क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ उत्पादन की गुणवत्ता और दक्षता में सुधार भी महत्वपूर्ण होगा। वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए भारतीय कंपनियों को ऊर्जा दक्षता, कम लागत, बेहतर गुणवत्ता और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन तकनीकों पर ध्यान देना होगा।
विकसित भारत@2047 के दीर्घकालिक लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक भारत की स्टील उत्पादन क्षमता 600 मिलियन टन से अधिक हो सकती है। वहीं घरेलू स्टील खपत भी 500 मिलियन टन से ज्यादा पहुंचने का अनुमान है।
इस बढ़ती क्षमता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा घरेलू मांग को पूरा करने के साथ-साथ निर्यात के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अनुमान के मुताबिक करीब 45 मिलियन टन स्टील या वैल्यू-एडेड स्टील उत्पादों का निर्यात संभव हो सकता है।
इसका मतलब यह होगा कि भारत को आने वाले वर्षों में केवल कच्चे या सामान्य स्टील के उत्पादन तक सीमित नहीं रहना होगा। उच्च गुणवत्ता वाले प्रसंस्कृत और विशेष उपयोग वाले स्टील उत्पादों की मांग को ध्यान में रखते हुए उद्योग को वैल्यू एडिशन पर अधिक ध्यान देना होगा।
सम्मेलन में स्पेशलिटी स्टील के उत्पादन को बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। ऑटोमोबाइल, रक्षा, एयरोस्पेस, ऊर्जा और आधुनिक इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में सामान्य स्टील की तुलना में विशेष गुणवत्ता और विशिष्ट तकनीकी गुणों वाले स्टील की जरूरत होती है।
भारत में ऑटोमोबाइल और रक्षा विनिर्माण के विस्तार के साथ ऐसे स्टील की घरेलू मांग भी बढ़ने की संभावना है। इससे आयात पर निर्भरता कम करने और देश में ही उच्च गुणवत्ता वाले स्टील के उत्पादन को बढ़ावा देने की जरूरत सामने आती है।
सरकार और उद्योग के सामने चुनौती यह होगी कि ऐसी तकनीक और उत्पादन क्षमता विकसित की जाए, जिससे भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप स्पेशलिटी स्टील तैयार कर सकें।
इस्पात उद्योग के विस्तार के लिए केवल उत्पादन संयंत्र बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। कच्चे माल की नियमित और प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
इस्पात उत्पादन के लिए जरूरी लौह अयस्क, कोयला और अन्य कच्चे माल की आपूर्ति को मजबूत करना होगा। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स और परिवहन व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता होगी, ताकि कच्चा माल उत्पादन केंद्रों तक और तैयार उत्पाद घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक कम लागत में पहुंच सकें।
सम्मेलन में घरेलू तकनीक विकसित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। वैश्विक विनिर्माण प्रतिस्पर्धा के दौर में किसी भी देश की औद्योगिक ताकत केवल उत्पादन क्षमता से तय नहीं होती। तकनीक पर नियंत्रण, अनुसंधान और विकास तथा नवाचार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह विदेशी तकनीक का उपयोग करने के साथ-साथ अपनी परिस्थितियों के अनुरूप स्वदेशी तकनीक विकसित करे। इससे उत्पादन लागत कम करने, दक्षता बढ़ाने और रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
सम्मेलन में केवल बड़े औद्योगिक केंद्रों को ही निर्यात की गतिविधियों का आधार बनाने के बजाय देश के अधिक से अधिक जिलों को निर्यात से जोड़ने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।
वाणिज्य मंत्रालय के डीजीएफटी के अतिरिक्त सचिव एवं महानिदेशक लव अग्रवाल ने कहा कि प्रतिस्पर्धी निर्यात क्षेत्र केवल विदेशी मुद्रा अर्जित करने का माध्यम नहीं है, बल्कि इससे रोजगार, विनिर्माण क्षमता, नवाचार और वैश्विक वैल्यू चेन में भारत की भागीदारी भी बढ़ती है।
उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितताओं के बावजूद अप्रैल-जून 2026 के दौरान भारत के वस्तु एवं सेवा निर्यात में 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
लव अग्रवाल ने कहा कि भारत के निर्यात में जिलों की भागीदारी बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। फिलहाल देश के कुल निर्यात में केवल 10 जिले करीब 35 प्रतिशत योगदान देते हैं।
ऐसे में निर्यात को अधिक व्यापक बनाने के लिए छोटे और मध्यम औद्योगिक केंद्रों तथा जिलों को वैश्विक बाजार से जोड़ने की आवश्यकता है। इसके लिए स्थानीय उत्पादों की पहचान, गुणवत्ता सुधार, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और बाजार तक पहुंच को मजबूत किया जा सकता है।
‘डिस्ट्रिक्ट्स ऐज एक्सपोर्ट हब्स’ पहल को मजबूत करने की आवश्यकता भी सम्मेलन में सामने आई। इस पहल का उद्देश्य अलग-अलग जिलों में मौजूद उत्पादों और विनिर्माण क्षमताओं को पहचानकर उन्हें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने की दिशा में काम करना है।
यदि स्थानीय उद्योगों को निर्यात संबंधी प्रक्रियाओं, गुणवत्ता मानकों, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विदेशी बाजारों की मांग की जानकारी बेहतर तरीके से उपलब्ध कराई जाती है तो अधिक जिले निर्यात गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं।
निर्यात बढ़ाने के लिए ई-कॉमर्स को भी महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए छोटे और मध्यम उद्यम सीधे विदेशी ग्राहकों और बाजारों तक पहुंच बना सकते हैं।
इसके लिए उत्पादों की डिजिटल प्रस्तुति, अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था, लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग और ग्राहक सेवा को मजबूत करना होगा। ई-कॉमर्स के विस्तार से उन छोटे उद्यमों को भी वैश्विक बाजार में प्रवेश का अवसर मिल सकता है, जिनके पास पारंपरिक निर्यात नेटवर्क सीमित है।
भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए केवल कीमत और गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर भी ध्यान देना होगा।
विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप पैकेजिंग, लेबलिंग और उत्पाद प्रस्तुति विकसित करें। इससे भारतीय उत्पादों की पहचान मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
सम्मेलन में मुक्त व्यापार समझौतों यानी एफटीए के बेहतर इस्तेमाल की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। भारत द्वारा विभिन्न देशों और क्षेत्रों के साथ किए गए व्यापार समझौतों से मिलने वाले अवसरों का उद्योग को अधिक प्रभावी तरीके से उपयोग करना होगा।
इसके लिए निर्यातकों को अलग-अलग देशों में उत्पादों की मांग, शुल्क व्यवस्था, नियमों और गुणवत्ता मानकों की जानकारी हासिल करनी होगी। उद्योग और सरकार के बीच बेहतर समन्वय से एफटीए से मिलने वाले अवसरों का उपयोग बढ़ाया जा सकता है।
सीआईआई के उपाध्यक्ष शाश्वत गोयनका ने विनिर्माण क्षेत्र में मौजूद ‘मिसिंग मिडिल’ की चुनौती को दूर करने की जरूरत बताई। उनका जोर ऐसे अधिक से अधिक उद्यमों को मजबूत करने पर रहा, जो छोटे स्तर से आगे बढ़कर बड़े और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उद्यम बन सकते हैं।
इसके लिए तकनीक, उत्पादकता, पूंजी, कुशल श्रम और वैश्विक वैल्यू चेन से जुड़ाव को मजबूत करना जरूरी होगा। यदि अधिक भारतीय कंपनियां मध्यम स्तर से बड़े औद्योगिक उद्यमों में बदलती हैं तो इससे उत्पादन और रोजगार दोनों में विस्तार हो सकता है।
सीआईआई मैन्युफैक्चरिंग काउंसिल के सह-अध्यक्ष राहुल गर्ग ने घरेलू ई-कॉमर्स क्षमता को वैश्विक निर्यात से जोड़ने की आवश्यकता बताई। भारत में तेजी से विकसित हो रहे डिजिटल बाजार और ई-कॉमर्स नेटवर्क को अंतरराष्ट्रीय बिक्री के लिए भी इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर जोर दिया गया।
इससे छोटे व्यवसायों को पारंपरिक निर्यात व्यवस्था की जटिलताओं से बाहर निकलकर डिजिटल माध्यम से विदेशी ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है।
विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार के साथ कुशल श्रमिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की मांग भी बढ़ेगी। आधुनिक स्टील संयंत्रों, ऑटोमोबाइल, रक्षा, एयरोस्पेस और अन्य उच्च तकनीकी उद्योगों के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन जरूरी होगा।
इसलिए औद्योगिक विस्तार के साथ कौशल विकास कार्यक्रमों को भी उद्योग की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना होगा। प्रशिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाकर ऐसे युवाओं को तैयार किया जा सकता है, जो आधुनिक विनिर्माण तकनीकों पर काम कर सकें।
भविष्य के विनिर्माण मॉडल में पर्यावरणीय स्थिरता भी महत्वपूर्ण होगी। स्टील जैसे ऊर्जा-गहन उद्योगों में ऊर्जा दक्षता बढ़ाना, उत्सर्जन कम करना, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल और नई उत्पादन तकनीकों को अपनाना महत्वपूर्ण चुनौती रहेगी।
‘स्मार्ट, स्केलेबल और सस्टेनेबल’ विनिर्माण मॉडल का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाने के साथ संसाधनों का अधिक कुशल इस्तेमाल करना भी है।
सीआईआई मैन्युफैक्चरिंग कॉन्क्लेव-2026 में हुई चर्चा से यह संदेश सामने आया कि विकसित भारत@2047 का लक्ष्य केवल बड़े कारखानों की संख्या या कुल उत्पादन बढ़ाने से हासिल नहीं होगा। इसके लिए तकनीक, उत्पादन क्षमता, स्वदेशी अनुसंधान, कुशल मानव संसाधन, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला, बेहतर कारोबारी प्रक्रियाओं और वैश्विक बाजार तक पहुंच को एक साथ विकसित करना होगा।
स्टील क्षेत्र में 2047 तक 600 मिलियन टन से अधिक क्षमता का लक्ष्य इस व्यापक औद्योगिक विस्तार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। साथ ही स्पेशलिटी स्टील, वैल्यू-एडेड उत्पाद और निर्यात पर बढ़ता जोर भारत को वैश्विक विनिर्माण श्रृंखला में अधिक मजबूत भूमिका देने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।
आने वाले वर्षों में भारत के सामने चुनौती केवल यह नहीं होगी कि वह कितना उत्पादन करता है, बल्कि यह भी होगी कि वह कितनी उच्च गुणवत्ता, कितनी तकनीकी दक्षता, कितनी प्रतिस्पर्धी लागत और कितनी वैश्विक पहुंच के साथ उत्पादन करता है। सम्मेलन में वक्ताओं के संदेश का व्यापक सार यही रहा कि विकसित भारत के औद्योगिक लक्ष्य के लिए उत्पादन के साथ तकनीक, कौशल और बाजार—तीनों को समान महत्व देना होगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


