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- 13h ago
मुंबई। देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कारोबारी समूहों में शामिल टाटा समूह के भीतर नेतृत्व को लेकर विवाद अब खुले कॉरपोरेट और कानूनी संघर्ष में बदलता दिखाई दे रहा है। टाटा संस के बोर्ड द्वारा एन चंद्रशेखरन को पांच वर्ष के एक और कार्यकाल के लिए कार्यकारी चेयरमैन बनाए जाने के कुछ ही घंटों बाद टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले को ‘अवैध’ और ‘कानूनी रूप से शून्य’ करार दिया है।
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा, जो टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों में से एक हैं, ने गुरुवार की बैठक में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इसके बावजूद प्रस्ताव चार निदेशकों के समर्थन से पारित हो गया। अब यही 4-1 का वोट टाटा समूह के भीतर चल रहे विवाद का केंद्र बन गया है।
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा संस के Articles of Association में मौजूद प्रावधानों के कारण दोनों ट्रस्ट-नामित निदेशकों की सहमति के बिना चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव वैध रूप से पारित नहीं किया जा सकता। ट्रस्ट्स के अनुसार, नोएल टाटा के विरोध के बाद प्रस्ताव ‘लीगल नलिटी’ यानी कानूनी रूप से प्रभावहीन हो गया।
दूसरी ओर, टाटा संस के बोर्ड ने बहुमत से प्रस्ताव पारित कर दिया है और कंपनी ने RBI से जुड़े नियामकीय अनुपालन की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत भी दिया है। यही वजह है कि अब मामला केवल चेयरमैन के कार्यकाल का नहीं रह गया है, बल्कि कॉरपोरेट गवर्नेंस, बोर्ड अधिकार, टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका, संभावित IPO और समूह के भविष्य के नेतृत्व तक फैल गया है।
17 सितंबर की बोर्ड बैठक में एन चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव रखा गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार चार निदेशकों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि नोएल टाटा ने इसके खिलाफ मतदान किया।
बोर्ड ने बहुमत के आधार पर चंद्रशेखरन को वर्तमान कार्यकाल समाप्त होने के बाद पांच वर्ष के लिए दोबारा कार्यकारी चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित कर दिया।
लेकिन बैठक के बाद टाटा ट्रस्ट्स की ओर से जारी बयान ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया।
ट्रस्ट्स ने कहा कि उसके चेयरमैन और नामित निदेशक नोएल टाटा ने प्रस्ताव का विरोध किया था और Articles of Association के प्रावधानों के कारण यह प्रस्ताव वैध नहीं माना जा सकता।
यही वह बिंदु है जहां से अब टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच कानूनी व्याख्या का सवाल पैदा हो गया है।
नोएल टाटा ने बोर्ड बैठक में अपने विरोध का आधार केवल मतदान तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने चंद्रशेखरन द्वारा 12 अगस्त को भेजे गए पत्र का भी उल्लेख किया।
नोएल टाटा के अनुसार, चंद्रशेखरन ने स्वयं बोर्ड को लिखकर कहा था कि उनका वर्तमान कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त होने के बाद वह चेयरमैन के रूप में एक और कार्यकाल नहीं लेना चाहते।
नोएल टाटा ने इसे चंद्रशेखरन का स्वतंत्र, स्वैच्छिक और स्पष्ट निर्णय बताया। उनके अनुसार यह फैसला बोर्ड की ओर से मांगा नहीं गया था और न ही किसी बोर्ड समीक्षा का परिणाम था।
टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि इस निर्णय के बाद ट्रस्ट्स ने उसे स्वीकार किया और उत्तराधिकारी की तलाश के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इसलिए अब उसी फैसले को पलटकर चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति करना उचित नहीं है।
ट्रस्ट्स के मुताबिक, कंपनी के कर्मचारी, ऋणदाता, कारोबारी साझेदार, बाजार और प्रमुख शेयरधारक पहले ही चंद्रशेखरन के पद छोड़ने की घोषणा के आधार पर आगे बढ़ चुके थे।
विवाद को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि नोएल टाटा ने बैठक में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ से प्राप्त कानूनी राय भी प्रस्तुत की।
टाटा ट्रस्ट्स के बयान के मुताबिक, इस कानूनी राय का इस्तेमाल ट्रस्ट्स के उस रुख के समर्थन में किया गया कि चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति से संबंधित बोर्ड प्रस्ताव Articles of Association के तहत वैध नहीं है।
ट्रस्ट्स ने कहा कि नोएल टाटा के विरोधी वोट के बाद प्रस्ताव को कानूनी आधार नहीं मिलता।
यहां यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि पूर्व CJI की राय न्यायालय का फैसला नहीं है। यह एक कानूनी राय है और इसके प्रभाव तथा Articles of Association की सही व्याख्या को लेकर आगे विवाद हो सकता है।
यानी अंतिम कानूनी स्थिति का निर्धारण केवल इस राय के आधार पर नहीं माना जा सकता।
पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी पक्ष टाटा संस के Articles of Association से जुड़ा है।
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति जैसे मामलों में ट्रस्ट्स के नामित दोनों निदेशकों की भूमिका विशेष है।
ट्रस्ट्स की ओर से कहा गया है कि ऐसे प्रस्ताव पर दोनों नामित निदेशकों की मौजूदगी और समर्थन आवश्यक है। चूंकि नोएल टाटा ने प्रस्ताव का विरोध किया, इसलिए ट्रस्ट्स का दावा है कि बोर्ड का बहुमत वोट इस विशेष प्रावधान को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।
यही व्याख्या अब पूरे विवाद का कानूनी केंद्र बन गई है।
यदि इस व्याख्या को मान्यता मिलती है तो 4-1 का बोर्ड बहुमत भी पर्याप्त नहीं माना जा सकता। यदि दूसरी व्याख्या लागू होती है, तो बोर्ड द्वारा पारित बहुमत प्रस्ताव को आगे की कॉरपोरेट प्रक्रिया में बढ़ाया जा सकता है।
इसलिए आगे Articles of Association की व्याख्या, संबंधित कॉरपोरेट कानून और संभावित शेयरधारक मंजूरियां बेहद महत्वपूर्ण होंगी।
चंद्रशेखरन के दोबारा चेयरमैन बनने के समर्थन में बोर्ड के भीतर नेतृत्व की निरंतरता का तर्क प्रमुख बताया गया है।
विशेष रूप से टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और RBI के नियामकीय ढांचे को देखते हुए बोर्ड के कुछ सदस्यों का मानना बताया गया कि इस समय नेतृत्व में अचानक बदलाव से अनिश्चितता बढ़ सकती है।
चंद्रशेखरन समूह का नेतृत्व 2017 से कर रहे हैं। ऐसे में संभावित IPO से पहले उनके बने रहने को रणनीतिक निरंतरता के नजरिए से देखा गया।
रॉयटर्स ने भी रिपोर्ट किया कि बोर्ड की पुनर्नियुक्ति और लिस्टिंग से जुड़ा निर्णय ऐसे समय आया है जब टाटा संस RBI के नियामकीय ढांचे के तहत आगे बढ़ने की स्थिति में है।
टाटा संस में यह पूरा घटनाक्रम RBI के एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद तेज हुआ।
RBI ने सितंबर 2026 में टाटा संस की उस अर्जी को खारिज कर दिया जिसमें कंपनी अपने NBFC/Core Investment Company पंजीकरण से बाहर निकलना चाहती थी। इससे कंपनी के नियामकीय ढांचे के तहत बने रहने और लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का मुद्दा फिर सामने आया।
2022 में RBI ने टाटा संस को ‘अपर लेयर’ NBFC के रूप में वर्गीकृत किया था। इस वर्गीकरण के साथ लिस्टिंग से जुड़े अतिरिक्त नियामकीय दायित्व पैदा हुए।
टाटा संस ने इस स्थिति से बाहर निकलने की कोशिश की थी, लेकिन RBI से राहत नहीं मिलने के बाद कंपनी के सामने नियामकीय अनुपालन का रास्ता अधिक महत्वपूर्ण हो गया।
टाटा संस ने लिस्टिंग की बाध्यता से बचने के लिए अपनी नियामकीय स्थिति बदलने के प्रयास में बड़ी मात्रा में कर्ज का भुगतान किया था।
आपकी दी गई जानकारी के अनुसार, कंपनी ने 21,000 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया कर्ज भी चुकाया था। हालांकि, RBI की ओर से पंजीकरण सरेंडर की अर्जी स्वीकार नहीं किए जाने के बाद कंपनी के सामने लिस्टिंग संबंधी प्रश्न फिर खड़ा हो गया।
इस घटनाक्रम ने टाटा संस की भविष्य की कॉरपोरेट संरचना को लेकर चर्चा तेज कर दी।
टाटा संस की संभावित लिस्टिंग केवल नियामकीय मुद्दा नहीं है। इसके पीछे शेयरधारिता और नियंत्रण का सवाल भी जुड़ा है।
टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है और वह बहुमत शेयरधारक है।
दूसरी ओर, शापूरजी पालोनजी समूह की टाटा संस में करीब 18 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई जाती है। सार्वजनिक रिपोर्टों में SP Group की ओर से लंबे समय से टाटा संस की हिस्सेदारी के मूल्यांकन और liquidity को लेकर लिस्टिंग की मांग का उल्लेख मिलता रहा है।
ऐसे में IPO का मुद्दा केवल पूंजी जुटाने का मामला नहीं है। इससे शेयरधारकों की हिस्सेदारी की liquidity और कंपनी के मूल्यांकन की सार्वजनिक बाजार में खोज भी जुड़ी हुई है।
टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर बाजार में लंबे समय से बड़े मूल्यांकन के अनुमान लगाए जाते रहे हैं।
हालांकि, 20 लाख करोड़ रुपये या इससे अधिक का मूल्यांकन अभी आधिकारिक IPO valuation नहीं है। यह बाजार विश्लेषण और संभावित मूल्यांकन से जुड़े अनुमान हैं।
वास्तविक IPO valuation तभी स्पष्ट होगा जब कंपनी औपचारिक रूप से इश्यू की संरचना, शेयरों की संख्या, कीमत और अन्य विवरणों के साथ प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी।
इसी तरह एक प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर 15,000-20,000 करोड़ रुपये जुटने का अनुमान भी वर्तमान समय में एक आकलन है, न कि कंपनी द्वारा घोषित IPO आकार।
इस अंतर को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि संभावित लिस्टिंग को लेकर बाजार में कई बड़े आंकड़े सामने आ रहे हैं।
यदि टाटा संस का IPO भविष्य में बहुत बड़े मूल्यांकन और पर्याप्त इश्यू आकार के साथ आता है, तो यह भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक निर्गमों में शामिल हो सकता है।
लेकिन अभी इसे निश्चित रूप से भारत का सबसे बड़ा IPO कहना जल्दबाजी होगी। इसके लिए कंपनी की वास्तविक IPO संरचना, इश्यू का आकार और उस समय का बाजार मूल्यांकन सामने आना जरूरी होगा।
इसलिए फिलहाल इसे संभावित रूप से बहुत बड़ा IPO कहना अधिक तथ्यात्मक है।
जब चंद्रशेखरन ने अगस्त में संकेत दिया कि वह अगला कार्यकाल नहीं लेंगे, तब टाटा समूह में उत्तराधिकारी की तलाश की प्रक्रिया शुरू होने की चर्चा सामने आई।
रिपोर्टों में टाटा स्टील के CEO टीवी नरेंद्रन और टाटा संस के CFO सौरभ अग्रवाल समेत कुछ नामों पर चर्चा का उल्लेख हुआ।
लेकिन अब चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के बोर्ड प्रस्ताव के बाद इस उत्तराधिकार प्रक्रिया का भविष्य भी विवाद का हिस्सा बन गया है।
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि उत्तराधिकारी की चयन प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।
इसका अर्थ यह है कि बोर्ड और ट्रस्ट्स के बीच विवाद केवल वर्तमान चेयरमैन तक सीमित नहीं है, बल्कि अगली नेतृत्व व्यवस्था को लेकर भी अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं।
टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में संकेत दिया है कि वह Articles of Association के अनुसार उत्तराधिकारी चयन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के पक्ष में है।
ट्रस्ट्स का रुख यह है कि चंद्रशेखरन का 12 अगस्त का निर्णय अंतिम था और उसी आधार पर उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
इसलिए बोर्ड द्वारा चंद्रशेखरन को फिर से पांच वर्ष का कार्यकाल देने का प्रस्ताव ट्रस्ट्स की नजर में उस प्रक्रिया को पलटने के बराबर है।
यही कारण है कि ट्रस्ट्स ने केवल बोर्ड के फैसले पर असहमति जताने के बजाय उसे ‘कानूनी रूप से शून्य’ बताया है।
उपलब्ध रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और लिस्टिंग से जुड़े बोर्ड के फैसलों के लिए आगे शेयरधारक स्तर पर आवश्यक मंजूरियां महत्वपूर्ण होंगी।
ऐसे में यदि टाटा ट्रस्ट्स अपनी आपत्ति पर कायम रहता है तो आने वाले समय में मामला शेयरधारक बैठक, कंपनी कानून के प्रावधानों अथवा संभावित कानूनी चुनौती तक जा सकता है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि विवाद किस मंच पर और किस रूप में आगे बढ़ेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि टाटा संस के भीतर बोर्ड और उसके सबसे बड़े शेयरधारक के बीच मतभेद अब सार्वजनिक हो चुके हैं।
टाटा ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशकों में नोएल टाटा के साथ वेणु श्रीनिवासन भी शामिल हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि नोएल टाटा ने इसका विरोध किया। यही वजह है कि 4-1 का वोट संभव हुआ।
यह स्थिति टाटा ट्रस्ट्स के भीतर भी मतभेद की ओर संकेत करती है, हालांकि किसी भी निदेशक के वोट को उसकी स्वतंत्र कॉरपोरेट जिम्मेदारियों और संबंधित नियमों के संदर्भ में देखना होगा।
ऊपरी तौर पर यह विवाद एन चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच मतभेद जैसा दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे इससे कहीं बड़े मुद्दे हैं।
एक तरफ सवाल है कि टाटा संस की रणनीतिक दिशा कौन तय करेगा।
दूसरी तरफ यह सवाल है कि कंपनी का बहुमत शेयरधारक बोर्ड के फैसलों पर कितना प्रभाव डाल सकता है।
तीसरा सवाल है कि Articles of Association में मौजूद विशेष अधिकारों की व्याख्या क्या होगी।
चौथा सवाल संभावित IPO और उसके बाद टाटा संस की शेयरधारिता तथा नियंत्रण व्यवस्था का है।
और पांचवां सवाल यह है कि टाटा समूह की अगली पीढ़ी का नेतृत्व किस मॉडल के तहत तय होगा।
टाटा संस की लिस्टिंग होने की स्थिति में कंपनी के शेयर सार्वजनिक बाजार में उपलब्ध होंगे। इससे शेयरों की liquidity बढ़ सकती है और कंपनी के मूल्य का बाजार आधारित आकलन संभव होगा।
लेकिन इसके साथ शेयरधारिता संरचना और नियंत्रण को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठेंगे।
टाटा ट्रस्ट्स की मौजूदा बहुमत हिस्सेदारी यदि लिस्टेड कंपनी में बनी रहती है तो उसका नियंत्रण बरकरार रह सकता है, लेकिन बाजार में शेयरों के कारोबार से कंपनी की ownership structure और valuation को लेकर पारदर्शिता बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, यदि मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा बेचते हैं, तो liquidity और ownership में बदलाव की संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।
यही वजह है कि टाटा संस की लिस्टिंग का मुद्दा समूह के लिए सामान्य IPO से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यदि टाटा संस भविष्य में सार्वजनिक कंपनी बनती है, तो निवेशकों को टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी में प्रत्यक्ष निवेश का अवसर मिल सकता है।
इससे टाटा संस के पास मौजूद विभिन्न टाटा कंपनियों की हिस्सेदारी का मूल्य बाजार के सामने अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।
लेकिन साथ ही निवेशकों को होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट, पूंजी आवंटन, समूह की विभिन्न कंपनियों के प्रदर्शन, ऋण, नियामकीय दायित्व और कॉरपोरेट गवर्नेंस जैसे मुद्दों को भी देखना होगा।
अर्थात IPO अपने आप में किसी निवेश निर्णय का संकेत नहीं होगा; वास्तविक मूल्यांकन और कंपनी की वित्तीय संरचना महत्वपूर्ण होगी।
यदि बोर्ड का प्रस्ताव आगे की आवश्यक मंजूरियां हासिल करता है और उनका कार्यकाल जारी रहता है, तो चंद्रशेखरन के सामने कई बड़े मुद्दे होंगे।
उनमें प्रमुख हैं—
पहला, RBI से जुड़ी नियामकीय आवश्यकताओं का अनुपालन।
दूसरा, टाटा संस की संभावित लिस्टिंग की प्रक्रिया।
तीसरा, समूह की विभिन्न कंपनियों के बीच पूंजी आवंटन और रणनीतिक निवेश।
चौथा, एयर इंडिया और अन्य बड़े कारोबारों का प्रदर्शन।
पांचवां, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और नई तकनीक जैसे नए क्षेत्रों में निवेश।
छठा, टाटा समूह के भीतर नेतृत्व और कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर स्पष्टता।
टाटा समूह ने हाल के वर्षों में एयर इंडिया के अधिग्रहण के बाद विमानन क्षेत्र में बड़े निवेश किए हैं। इसके अलावा सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और डिजिटल कारोबार जैसे नए क्षेत्रों में विस्तार की रणनीति भी सामने आई है।
रॉयटर्स ने चंद्रशेखरन के नए कार्यकाल के घटनाक्रम के संदर्भ में एयर इंडिया और Jaguar Land Rover जैसे कारोबारों की चुनौतियों का भी उल्लेख किया है।
ऐसे में टाटा संस के नेतृत्व को आने वाले वर्षों में पुराने और नए दोनों कारोबारों के बीच संतुलन बनाना होगा।
चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और संभावित लिस्टिंग की खबरों के बाद टाटा समूह की कई सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में तेजी की रिपोर्ट सामने आई।
रिपोर्टों के अनुसार, निवेशकों ने नेतृत्व में निरंतरता और टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को सकारात्मक बाजार संकेत के रूप में लिया। हालांकि शेयर बाजार की एक दिन की प्रतिक्रिया को कंपनी के दीर्घकालिक प्रदर्शन का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
आगे की दिशा RBI, बोर्ड, ट्रस्ट्स और शेयरधारक स्तर पर होने वाले फैसलों से प्रभावित होगी।
पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल अब यही है कि टाटा संस के Articles of Association में ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की शक्तियों और चेयरमैन की नियुक्ति से जुड़े प्रावधानों की कानूनी व्याख्या क्या होगी।
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि दोनों नामित निदेशकों की सहमति आवश्यक है।
वहीं बोर्ड ने बहुमत से प्रस्ताव पारित किया है।
यानी दोनों पक्ष एक ही दस्तावेज और कॉरपोरेट ढांचे के भीतर अपने-अपने अधिकारों की अलग व्याख्या कर रहे हैं।
यदि विवाद आगे कानूनी मंच पर जाता है तो Articles of Association, कंपनी कानून, बोर्ड के अधिकार और शेयरधारक अधिकारों की व्याख्या महत्वपूर्ण होगी।
टाटा समूह का कॉरपोरेट ढांचा लंबे समय से ट्रस्ट्स, टाटा संस और विभिन्न ऑपरेटिंग कंपनियों के बीच एक विशिष्ट व्यवस्था पर आधारित रहा है।
ऐसे में बहुमत शेयरधारक और होल्डिंग कंपनी के बोर्ड के बीच किसी चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति को लेकर सार्वजनिक विवाद असाधारण घटनाक्रम है।
यह विवाद केवल वर्तमान नियुक्ति के परिणाम को प्रभावित नहीं कर सकता, बल्कि भविष्य में टाटा संस के शासन ढांचे और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी असर डाल सकता है।
आने वाले दिनों और हफ्तों में कई घटनाक्रम महत्वपूर्ण हो सकते हैं—
इनमें से प्रत्येक घटनाक्रम टाटा संस की भविष्य की दिशा के लिए महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल टाटा संस के बोर्ड ने अपना फैसला सुना दिया है और एन चंद्रशेखरन को पांच वर्ष के नए कार्यकाल के लिए पुनर्नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया है।
लेकिन टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया है।
नोएल टाटा का विरोध, 4-1 का बोर्ड वोट, पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ की कानूनी राय, 12 अगस्त को चंद्रशेखरन का पद छोड़ने का फैसला, RBI का नियामकीय रुख और संभावित IPO—इन सभी घटनाओं ने मामले को बेहद जटिल बना दिया है।
इसलिए फिलहाल यह कहना कि चंद्रशेखरन का 2032 तक कार्यकाल पूरी तरह निश्चित हो गया है, उचित नहीं होगा। बोर्ड ने पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव पारित किया है, लेकिन उसके खिलाफ प्रमुख शेयरधारक की आपत्ति और कानूनी सवाल अभी खुले हुए हैं।
टाटा संस में मौजूदा विवाद अब केवल इस सवाल तक सीमित नहीं है कि एन चंद्रशेखरन चेयरमैन बने रहेंगे या नहीं। इसके साथ टाटा समूह के कॉरपोरेट गवर्नेंस मॉडल, टाटा ट्रस्ट्स के अधिकार, बोर्ड की निर्णय लेने की शक्ति, RBI के नियामकीय निर्देश, संभावित IPO और भविष्य के उत्तराधिकार मॉडल जैसे प्रश्न भी जुड़ चुके हैं।
बोर्ड ने जहां बहुमत से चंद्रशेखरन को आगे बढ़ाने का फैसला किया है, वहीं टाटा ट्रस्ट्स ने उसी फैसले को कानूनी रूप से शून्य बताया है।
अब अगला अध्याय इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख को किस मंच पर और किस प्रक्रिया के माध्यम से आगे ले जाते हैं। यदि विवाद कानूनी या शेयरधारक स्तर तक पहुंचता है, तो टाटा संस के Articles of Association और संबंधित कॉरपोरेट कानूनों की व्याख्या पूरे मामले की दिशा तय करने में केंद्रीय भूमिका निभा सकती है।
एक बात हालांकि स्पष्ट है—टाटा समूह के इतिहास में यह नेतृत्व और गवर्नेंस से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक टकरावों में से एक बन चुका है और इसका असर केवल चेयरमैन पद तक सीमित रहने की संभावना नहीं है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


