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- 11h ago
नई दिल्ली: जन्म से ही जटिल हृदय रोग से जूझ रही तन्वी की मौत के मामले में अब जांच का दायरा बढ़ गया है। मामले को लेकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ने एक विशेषज्ञ जांच समिति गठित कर दी है। समिति तन्वी के इलाज से जुड़े पूरे रिकॉर्ड, डॉक्टरों की राय, बीमारी की स्थिति, उपचार के दौरान लिए गए फैसलों और मौत से पहले की परिस्थितियों की विस्तार से समीक्षा करेगी। वहीं, तन्वी के पिता ने मामले में एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी शुरू कर दी है।
तन्वी के पिता का आरोप है कि उनकी बेटी की सर्जरी वर्षों पहले होनी थी, लेकिन कई बार तारीख बदलने और प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने के कारण इलाज में देरी हुई। उनका कहना है कि वर्ष 2014-15 के दौरान ऑपरेशन के लिए आवश्यक तैयारी की गई थी। पैसे और खून की व्यवस्था होने के बावजूद सर्जरी आगे नहीं बढ़ सकी। अब बेटी की मौत के बाद परिवार पूरे मामले की कानूनी जांच कराने की तैयारी में है।
तन्वी के पिता ने बुधवार को एनबीटी से बातचीत में कहा कि उनकी बेटी का पोस्टमार्टम हो चुका है, लेकिन उन्होंने अभी तक शव नहीं लिया है। उन्होंने बताया कि वह अपने वकील के माध्यम से मामले में एफआईआर दर्ज कराने जा रहे हैं और उसके बाद ही शव लेने की प्रक्रिया पूरी करेंगे।
परिवार का यह कदम मामले को नया कानूनी मोड़ दे सकता है। पिता का आरोप है कि अगर समय रहते उनकी बेटी की बीमारी को लेकर उचित फैसला लिया जाता और इलाज की प्रक्रिया में देरी नहीं होती, तो शायद परिस्थितियां अलग हो सकती थीं।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। मामले में मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विशेषज्ञ समिति की जांच महत्वपूर्ण होगी।
तन्वी की मौत के बाद AIIMS प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच समिति गठित की है। समिति यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि तन्वी की बीमारी की वास्तविक स्थिति क्या थी, अलग-अलग समय पर डॉक्टरों ने क्या राय दी, कौन-कौन से उपचार विकल्प उपलब्ध थे और इलाज के दौरान क्या निर्णय लिए गए।
समिति मेडिकल रिकॉर्ड और विशेषज्ञों की राय के साथ-साथ मौत से पहले की घटनाओं का भी अध्ययन करेगी। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि इलाज की पूरी प्रक्रिया मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुरूप थी या नहीं।
AIIMS का कहना है कि अभी किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विशेषज्ञ समिति की जांच पूरी होने के बाद ही मौत के कारणों और उपचार से जुड़े सवालों पर स्पष्ट निष्कर्ष सामने आएगा।
AIIMS के अनुसार तन्वी को पहली बार 10 अक्टूबर 2012 को कार्डियोलॉजी ओपीडी में लाया गया था। जांच के दौरान डॉक्टरों ने उसे जन्मजात हृदय की एक गंभीर और जटिल बीमारी से पीड़ित पाया।
तन्वी में Ventricular Septal Defect (VSD) के साथ Pulmonary Atresia की समस्या बताई गई थी। दोनों स्थितियों का एक साथ होना हृदय की संरचना और शरीर में रक्त के प्रवाह को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
AIIMS के मुताबिक, तन्वी की स्थिति को समझने के लिए समय-समय पर जांच और विशेषज्ञों की राय ली गई।
Ventricular Septal Defect यानी VSD दिल के दो निचले कक्षों के बीच मौजूद दीवार में छेद होने की स्थिति है। यह जन्मजात हृदय रोगों में शामिल है।
सामान्य स्थिति में दिल के दोनों वेंट्रिकल अलग-अलग रहते हैं, लेकिन VSD में इनके बीच असामान्य छेद होने के कारण रक्त के प्रवाह में बदलाव हो सकता है। इसकी गंभीरता छेद के आकार और हृदय की अन्य समस्याओं पर निर्भर करती है।
तन्वी के मामले में VSD के साथ Pulmonary Atresia भी बताई गई थी, जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो गई थी।
Pulmonary Atresia जन्मजात हृदय रोग की गंभीर स्थिति है, जिसमें फेफड़ों तक रक्त पहुंचाने वाले रास्ते में सामान्य विकास नहीं हो पाता या वह अवरुद्ध रहता है।
तन्वी के मामले में केवल एक साधारण हृदय दोष नहीं था, बल्कि कई जटिलताएं एक साथ मौजूद थीं। यही कारण है कि इलाज और संभावित सर्जरी को लेकर विशेषज्ञों के सामने चुनौती थी।
AIIMS का कहना है कि विस्तृत जांच के बाद विशेषज्ञों ने वर्ष 2017 में यह निष्कर्ष निकाला कि तन्वी के दिल की जटिल बनावट के कारण सर्जरी संभव नहीं थी।
AIIMS के अनुसार, वर्ष 2017 में विशेषज्ञों ने तन्वी की हृदय संरचना का विस्तार से मूल्यांकन किया। इसके बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि दिल की जटिल बनावट के कारण सर्जिकल उपचार संभव नहीं था।
इसके बाद परिवार को दवाओं के माध्यम से उपचार जारी रखने की सलाह दी गई।
यहीं से इस मामले में दो अलग-अलग दावे सामने आते हैं। परिवार का कहना है कि पहले सर्जरी की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई थी और 2014-15 के दौरान ऑपरेशन को लेकर तैयारी भी हुई थी। दूसरी तरफ AIIMS का कहना है कि बाद की विशेषज्ञ जांच में बीमारी की जटिल संरचना को देखते हुए सर्जरी संभव नहीं पाई गई।
अब जांच समिति के सामने सबसे अहम सवाल यही होगा कि इन दोनों चरणों के बीच क्या हुआ और बीमारी की स्थिति में क्या बदलाव आया।
तन्वी के पिता का कहना है कि वर्ष 2014-15 में उनकी बेटी की सर्जरी होनी थी। इसके लिए उन्होंने पैसे की व्यवस्था की और खून भी जमा कराया था।
परिवार का आरोप है कि इसके बावजूद सर्जरी की तारीख बार-बार बदलती रही। उनका सवाल है कि जब ऑपरेशन की तैयारी की जा रही थी, तब उसे समय पर क्यों नहीं किया गया और किन कारणों से तारीखें आगे बढ़ती रहीं।
यही आरोप अब पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। अगर सर्जरी उस समय चिकित्सकीय रूप से संभव थी, तो उसके टलने के कारणों की जांच जरूरी होगी। वहीं अगर बीमारी की जटिलता के कारण सर्जरी जोखिमपूर्ण थी, तो उस समय डॉक्टरों की राय और परिवार को दी गई जानकारी भी जांच का विषय होगी।
AIIMS के अनुसार, वर्ष 2018 तक तन्वी की शारीरिक स्थिति ऐसी हो गई थी कि सर्जरी नहीं की जा सकती थी।
अस्पताल का यह पक्ष परिवार के आरोपों से अलग तस्वीर पेश करता है। परिवार वर्षों की देरी को सवालों के घेरे में रख रहा है, जबकि AIIMS इलाज के दौरान बीमारी की जटिलता और बाद की स्थिति को सामने रख रहा है।
इसलिए अब मेडिकल रिकॉर्ड की टाइमलाइन इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण होगी। वर्ष 2012 से लेकर तन्वी की मृत्यु तक हर जांच, हर विशेषज्ञ की राय, उपचार में हुए बदलाव और सर्जरी को लेकर लिए गए निर्णयों को एक साथ देखने से ही पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकती है।
AIIMS के अनुसार, 1 सितंबर की सुबह करीब 2:50 बजे तन्वी को अचानक कमजोरी महसूस हुई। उनकी स्थिति तेजी से बिगड़ गई।
अस्पताल के अनुसार, उस समय उनका ऑक्सीजन स्तर गिरकर 48 प्रतिशत रह गया था। इसके बाद डॉक्टरों की टीम ने उन्हें बचाने के लिए लंबे समय तक पुनर्जीवन यानी रिससिटेशन का प्रयास किया।
चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद तन्वी को बचाया नहीं जा सका।
अस्पताल का कहना है कि तन्वी की हालत अचानक गंभीर हुई और ऑक्सीजन स्तर बेहद कम हो गया। डॉक्टरों ने तत्काल चिकित्सा हस्तक्षेप किया और लंबे समय तक पुनर्जीवन की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
हालांकि, AIIMS ने स्पष्ट किया है कि मौत के संबंध में अंतिम निष्कर्ष पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विशेषज्ञ समिति की जांच पूरी होने के बाद ही निकाला जाएगा।
यानी फिलहाल अस्पताल ने घटना के दौरान हुई चिकित्सकीय स्थिति की जानकारी दी है, लेकिन मौत की अंतिम वजह पर जांच पूरी होने तक किसी निष्कर्ष को अंतिम नहीं माना जा रहा है।
तन्वी मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि परिवार और अस्पताल के दावों में जो अंतर दिखाई दे रहा है, उसका वास्तविक कारण क्या है।
परिवार का आरोप है कि:
वहीं AIIMS का पक्ष है कि:
अब इन दोनों पक्षों के बीच की कड़ियां जांच समिति को जोड़नी होंगी।
विशेषज्ञ समिति के सामने सबसे अहम सवाल यह होगा कि तन्वी की बीमारी की स्थिति अलग-अलग वर्षों में कैसी थी और उस समय उपलब्ध मेडिकल विकल्प क्या थे।
इसके अलावा समिति यह भी देख सकती है कि:
क्या 2014-15 में सर्जरी वास्तव में संभव थी?
अगर संभव थी तो वह क्यों नहीं हुई?
सर्जरी की तारीखें किन कारणों से बदली गईं?
क्या परिवार को हर चरण पर बीमारी और जोखिम की पूरी जानकारी दी गई?
2017 में विशेषज्ञों ने सर्जरी को असंभव क्यों माना?
2018 तक मरीज की स्थिति में क्या बदलाव आया?
क्या इलाज के दौरान मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन हुआ?
मौत से पहले अचानक ऑक्सीजन स्तर गिरने के पीछे क्या चिकित्सकीय कारण था?
क्या मौत बीमारी की स्वाभाविक जटिलता का परिणाम थी या उपचार में किसी स्तर पर चूक हुई?
इन सवालों के जवाब मेडिकल रिकॉर्ड, विशेषज्ञों की राय और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर सामने आ सकते हैं।
यह मामला केवल इस सवाल तक सीमित नहीं है कि तन्वी की मौत किस वजह से हुई। इससे बड़ा सवाल यह है कि उनकी बीमारी का इलाज वर्षों के दौरान किस तरह आगे बढ़ा।
यदि परिवार के आरोप सही पाए जाते हैं तो सवाल उठेगा कि सर्जरी में देरी क्यों हुई और क्या इस देरी का मरीज की बाद की स्थिति पर कोई प्रभाव पड़ा।
दूसरी ओर यदि मेडिकल रिकॉर्ड यह दिखाता है कि बीमारी की जटिल संरचना के कारण सर्जरी लंबे समय तक व्यवहारिक विकल्प नहीं थी, तो अस्पताल के पक्ष को मजबूती मिलेगी।
इसीलिए इस मामले में केवल अंतिम मेडिकल रिपोर्ट ही नहीं, बल्कि 2012 से 2026 तक की पूरी मेडिकल हिस्ट्री महत्वपूर्ण होगी।
बेटी की मौत के बाद तन्वी के पिता ने मामले को कानूनी रूप देने का फैसला किया है। उनका कहना है कि वह अपने वकील के माध्यम से एफआईआर कराने जा रहे हैं।
परिवार की ओर से एफआईआर की मांग के बाद पुलिस जांच भी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अगर प्राथमिकी दर्ज होती है तो मेडिकल दस्तावेज, अस्पताल के रिकॉर्ड, सर्जरी से संबंधित कागजात, डॉक्टरों की राय और पोस्टमार्टम रिपोर्ट जांच का हिस्सा बन सकते हैं।
हालांकि, एफआईआर दर्ज होना अपने आप में किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी साबित नहीं करता। वास्तविक जिम्मेदारी का निर्धारण जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।
तन्वी के मामले में पोस्टमार्टम हो चुका है। अब उसकी रिपोर्ट भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पोस्टमार्टम से मृत्यु के चिकित्सकीय कारणों को समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि जन्मजात जटिल हृदय रोग जैसे मामलों में अंतिम चिकित्सकीय निष्कर्ष के लिए पोस्टमार्टम के साथ मेडिकल हिस्ट्री और विशेषज्ञों की राय को जोड़कर देखना जरूरी हो सकता है।
AIIMS ने भी कहा है कि अंतिम निष्कर्ष पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच समिति की रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा।
तन्वी का मामला केवल एक मरीज की मौत तक सीमित नहीं है। इसके साथ अस्पतालों में लंबी अवधि के इलाज, सर्जरी की प्रतीक्षा, विशेषज्ञों की राय, मरीजों को जानकारी देने और मेडिकल निर्णयों की जवाबदेही जैसे बड़े सवाल भी जुड़े हैं।
खासकर ऐसे मरीज जिनकी बीमारी जटिल हो और जिनके इलाज में कई वर्षों तक विशेषज्ञों की निगरानी की जरूरत हो, उनके लिए उपचार की निरंतरता बेहद महत्वपूर्ण होती है।
यदि किसी सर्जरी का विकल्प उपलब्ध हो और वह किसी कारण से टलता है, तो मरीज और परिवार को उसके कारणों, जोखिमों और वैकल्पिक उपचार की स्पष्ट जानकारी मिलना महत्वपूर्ण है।
तन्वी मामले में फिलहाल दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं आगे बढ़ रही हैं। एक तरफ AIIMS ने विशेषज्ञ जांच समिति गठित की है, जो इलाज और मौत से जुड़ी परिस्थितियों की जांच करेगी। दूसरी तरफ तन्वी के पिता एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी में हैं।
ऐसे में आने वाले दिनों में मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच समिति की रिपोर्ट इस मामले की दिशा तय कर सकती है।
फिलहाल AIIMS ने तन्वी की मौत से पहले अचानक ऑक्सीजन स्तर गिरने और उसे बचाने के लिए किए गए प्रयासों की जानकारी दी है, लेकिन अस्पताल ने भी अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने तक सुरक्षित रखा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तन्वी की मौत उसकी जटिल जन्मजात हृदय बीमारी का परिणाम थी, या इलाज की लंबी प्रक्रिया में कहीं ऐसी देरी या चूक हुई जिसने उसकी स्थिति को प्रभावित किया?
इसका जवाब जांच समिति की रिपोर्ट और आगे होने वाली कानूनी जांच से ही सामने आएगा।


