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- 13h ago
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के बीच आर्थिक सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि निर्यात प्रतिबंध, आर्थिक प्रतिबंध और टैरिफ अब केवल व्यापार नीति के साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि कई परिस्थितियों में इनका इस्तेमाल रणनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है और ये कभी-कभी हथियार की तरह भी इस्तेमाल हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध, समुद्री मार्गों में व्यवधान और भौगोलिक चोक-प्वाइंट दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए नए जोखिम पैदा कर रहे हैं।
नई दिल्ली में शनिवार को आयोजित पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में ‘ए वर्ल्ड प्राइस्ड फॉर रिस्क’ विषय पर बोलते हुए मिश्रा ने कहा कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए वैश्विक घटनाक्रम का सीधा असर पड़ सकता है। खासकर किसी प्रमुख समुद्री मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान आने पर ऊर्जा की उपलब्धता, कीमत और पूरी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
पीके मिश्रा ने कहा कि वैश्वीकरण की पारंपरिक आर्थिक व्यवस्था मुख्य रूप से विशेषज्ञता और कम लागत के सिद्धांत पर आधारित रही है। जिन देशों या क्षेत्रों में किसी वस्तु का उत्पादन सस्ता होता है, वहां से उसका आयात करना और उसे वैश्विक बाजार तक पहुंचाना सामान्य आर्थिक प्रक्रिया रही है।
लेकिन महामारी, युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के अनुभव ने इस मॉडल की कमजोरियों को भी सामने ला दिया है। सामान्य परिस्थितियों में अत्यधिक कुशल दिखाई देने वाली सप्लाई चेन किसी एक महत्वपूर्ण देश, कंपनी या भौगोलिक क्षेत्र पर निर्भर होने की वजह से संकट के समय अचानक बाधित हो सकती है।
मिश्रा के मुताबिक, इसी बदलते वातावरण में टैरिफ, निर्यात नियंत्रण और प्रतिबंधों का महत्व बढ़ा है। उन्होंने किसी एक देश का नाम लिए बिना कहा कि ये उपाय आर्थिक नीति के उपकरण बन चुके हैं और कई बार इनका रणनीतिक इस्तेमाल भी किया जाता है।
मिश्रा ने ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में होर्मुज जलडमरूमध्य का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में व्यवधान ने यह दिखाया है कि भूगोल किस तरह सीधे आर्थिक जोखिम में बदल सकता है।
किसी प्रमुख समुद्री रास्ते में रुकावट का असर केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने पर तेल की आपूर्ति, परिवहन लागत और कच्चे तेल की कीमतों पर असर पड़ सकता है। इसका प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर स्थित अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंच सकता है।
मिश्रा ने कहा कि सवाल केवल यह नहीं है कि किसी देश के पास पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध है या नहीं। यह भी महत्वपूर्ण है कि संकट की स्थिति में वह ऊर्जा सुरक्षित और समय पर अपने गंतव्य तक पहुंच सके।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत की रणनीति का उदाहरण देते हुए मिश्रा ने कहा कि देश ने कच्चे तेल के आयात के स्रोतों में विविधता बढ़ाई है। उनके अनुसार, भारत अब 43 देशों से कच्चा तेल आयात करता है, जबकि पहले यह संख्या 27 थी।
इसका उद्देश्य किसी एक देश, क्षेत्र या आपूर्ति मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। यदि किसी एक स्रोत से आपूर्ति बाधित होती है तो दूसरे स्रोतों से खरीद की गुंजाइश बनी रहे।
मिश्रा ने कहा कि भारत ने पर्याप्त ऊर्जा भंडार बनाए रखने, जहां संभव हो वहां घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों तथा आपूर्तिकर्ताओं को उपलब्ध रखने पर भी ध्यान दिया है।
मिश्रा ने ऊर्जा सुरक्षा को केवल कच्चे तेल की खरीद से जोड़कर नहीं देखा। उन्होंने कहा कि लंबे समय में बाहरी झटकों से जोखिम कम करने के लिए घरेलू ऊर्जा क्षमता को मजबूत करना भी जरूरी है।
उन्होंने अक्षय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और उनसे जुड़ी तकनीकों में घरेलू क्षमता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक ऊर्जा परिवर्तन केवल पर्यावरणीय स्थिरता का विषय नहीं है, बल्कि यह बाहरी ऊर्जा झटकों के प्रति अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता कम करने से भी जुड़ा है।
यानी भारत के सामने एक साथ दो लक्ष्य हैं—वर्तमान ऊर्जा जरूरतों के लिए भरोसेमंद आपूर्ति बनाए रखना और भविष्य के लिए घरेलू तथा वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को मजबूत करना।
पीके मिश्रा ने महत्वपूर्ण खनिजों को भी आर्थिक सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि आने वाले समय में लिथियम, कोबाल्ट, दुर्लभ मृदा तत्व और अन्य रणनीतिक खनिजों का महत्व बढ़ेगा।
इन खनिजों का इस्तेमाल बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, अक्षय ऊर्जा, आधुनिक विनिर्माण और दूसरी उन्नत तकनीकों में होता है। समस्या यह है कि इनका खनन, प्रसंस्करण और रिफाइनिंग कुछ चुनिंदा भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित है।
ऐसे में किसी एक क्षेत्र में राजनीतिक अस्थिरता, व्यापार प्रतिबंध या आपूर्ति बाधित होने पर इसका असर दूसरे देशों के उद्योगों पर पड़ सकता है। मिश्रा ने कहा कि यही वह क्षेत्र है जहां सामान्य समय की दक्षता और संकट के समय की मजबूती के बीच संतुलन जरूरी हो जाता है।
भारत ने महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति से जुड़े जोखिम को देखते हुए खोज, खनन, प्रसंस्करण और रीसाइक्लिंग पर जोर बढ़ाया है। राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण खनिजों की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत विकसित करना है। ऐसे खनिज भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था और उच्च तकनीक आधारित उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
इस क्षेत्र में चुनौती केवल खनिज हासिल करने की नहीं है। खनिज मिलने के बाद उनका प्रसंस्करण, शुद्धिकरण और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए जरूरी तकनीकी क्षमता विकसित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
मिश्रा ने कहा कि महामारी और हाल के भू-राजनीतिक संघर्षों ने सप्लाई चेन को लेकर सोच बदल दी है।
सामान्य परिस्थितियों में कंपनियां अक्सर ऐसी सप्लाई चेन बनाती हैं जिसमें लागत सबसे कम हो और सामान सबसे तेजी से उपलब्ध हो। लेकिन संकट की स्थिति में यही व्यवस्था कमजोर साबित हो सकती है।
यदि किसी एक सप्लायर, बंदरगाह, समुद्री मार्ग या भौगोलिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता हो और वह अचानक उपलब्ध न रहे, तो पूरी उत्पादन व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
इसलिए अब आर्थिक नीति में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कौन सा विकल्प सबसे सस्ता है। यह भी देखना होगा कि संकट आने पर वैकल्पिक व्यवस्था कितनी जल्दी तैयार की जा सकती है।
पीके मिश्रा ने आर्थिक लचीलेपन को आत्मनिर्भरता या वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलगाव के रूप में देखने से सावधान किया। उन्होंने कहा कि लचीलापन का अर्थ दुनिया से खुद को अलग करना नहीं है।
उनके मुताबिक भारत को वैश्विक बाजारों, व्यापार और निवेश से जुड़ा रहना चाहिए, लेकिन किसी एक देश, सप्लायर या मार्ग पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचना चाहिए।
मिश्रा ने यह भी कहा कि घरेलू उत्पादन विकसित करने की लागत कभी-कभी सबसे सस्ते वैश्विक आयात से अधिक हो सकती है। लेकिन संकट के समय घरेलू क्षमता का महत्व सामने आता है। इसलिए घरेलू क्षमता विकसित करने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन जरूरी है।
बाहरी संकट से निपटने के लिए केवल ऊर्जा और सप्लाई चेन मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। सरकार के पास आर्थिक झटके का सामना करने के लिए पर्याप्त वित्तीय गुंजाइश भी होनी चाहिए।
मिश्रा ने व्यापक आर्थिक मजबूती के संदर्भ में राजकोषीय क्षमता, विदेशी मुद्रा भंडार, मजबूत वित्तीय व्यवस्था और भरोसेमंद आर्थिक संस्थानों के महत्व पर जोर दिया।
उनके मुताबिक भारत सार्वजनिक निवेश को बनाए रखते हुए राजकोषीय समेकन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अचानक किसी बड़े बाहरी संकट की स्थिति में सरकार के पास प्रतिक्रिया देने के लिए पर्याप्त गुंजाइश मौजूद रहे।
मिश्रा की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजारों में प्रतिबंध तथा टैरिफ को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, हाल में अमेरिका ने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंध कानून में ऐसे प्रावधान किए हैं जिनके तहत रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है। रिपोर्टों में भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों के संभावित प्रभाव का उल्लेख किया गया है। हालांकि ऐसे प्रावधान का अर्थ यह नहीं है कि 100 प्रतिशत टैरिफ स्वतः लागू हो जाता है।
इस घटनाक्रम से यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि ऊर्जा आयात करने वाले देशों को बदलते व्यापार और प्रतिबंधों के माहौल में अपनी खरीद रणनीति किस तरह विविध बनानी चाहिए।
मिश्रा ने कहा कि एक समय माना गया था कि तकनीक और वैश्वीकरण के कारण भूगोल का आर्थिक महत्व कम हो जाएगा। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इसके उलट तस्वीर दिखाई है।
आज किसी बंदरगाह, समुद्री जलडमरूमध्य, खनिज उत्पादक क्षेत्र या ऊर्जा आपूर्ति केंद्र में व्यवधान का असर दूर-दराज की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।
होर्मुज इसका एक उदाहरण है। इसी तरह महत्वपूर्ण खनिजों की भौगोलिक एकाग्रता और कुछ खास क्षेत्रों पर उत्पादन निर्भरता भी वैश्विक उद्योगों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
मिश्रा के भाषण का केंद्रीय संदेश यह रहा कि आने वाले समय में आर्थिक विकास के साथ-साथ जोखिम प्रबंधन को भी समान महत्व देना होगा।
महामारी ने स्वास्थ्य संकट के साथ वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित किया। युद्धों ने ऊर्जा और खाद्य बाजारों में अस्थिरता पैदा की। समुद्री मार्गों में व्यवधान ने परिवहन और व्यापार की लागत को प्रभावित किया। वहीं टैरिफ और प्रतिबंधों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के निर्णयों को और जटिल बनाया है।
ऐसे वातावरण में किसी देश की आर्थिक ताकत का आकलन केवल सामान्य परिस्थितियों में विकास दर या उत्पादन क्षमता से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि अचानक आने वाले बाहरी झटके के दौरान अर्थव्यवस्था कितनी देर तक स्थिर रह सकती है।
मिश्रा के वक्तव्य से भारत के सामने आर्थिक सुरक्षा के तीन प्रमुख आयाम उभरते हैं।
पहली चुनौती ऊर्जा की है। भारत की बड़ी ऊर्जा जरूरतों के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और समुद्री आपूर्ति मार्गों में होने वाले बदलाव महत्वपूर्ण हैं।
दूसरी चुनौती महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीक की है। बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और आधुनिक विनिर्माण के विस्तार के साथ लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ खनिजों की जरूरत बढ़ेगी।
तीसरी चुनौती वैश्विक सप्लाई चेन की है। कम लागत वाली लेकिन अत्यधिक केंद्रित आपूर्ति व्यवस्था संकट की स्थिति में कमजोर पड़ सकती है।
इन तीनों क्षेत्रों में विविधता, घरेलू क्षमता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को साथ लेकर चलना आर्थिक लचीलेपन की रणनीति का हिस्सा बन सकता है।
मिश्रा ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की रणनीति वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग होने की नहीं, बल्कि उससे जुड़े रहते हुए जोखिम को नियंत्रित करने की होनी चाहिए।
उनके मुताबिक, आने वाला समय उन अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौतीपूर्ण होगा जो किसी एक स्रोत, एक बाजार या एक मार्ग पर अत्यधिक निर्भर हैं। इसके विपरीत, विविध आपूर्ति स्रोत, पर्याप्त भंडार, मजबूत वित्तीय संस्थान और घरेलू उत्पादन क्षमता संकट के दौरान विकल्प उपलब्ध करा सकते हैं।
उन्होंने आर्थिक लचीलेपन को इस रूप में पेश किया कि देश दुनिया के लिए खुला रहे, लेकिन बाहरी झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील न बने।
कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में मिश्रा की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अर्थव्यवस्था को केवल दक्षता के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।
सामान्य समय में सबसे सस्ता और तेज विकल्प चुनना आर्थिक रूप से लाभकारी हो सकता है। लेकिन यदि संकट आने पर वही विकल्प पूरी तरह बंद हो जाए तो उसकी वास्तविक लागत कहीं अधिक हो सकती है।
इसीलिए ऊर्जा, खाद्य, महत्वपूर्ण खनिज, तकनीक और वित्तीय व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में कुछ अतिरिक्त क्षमता बनाए रखना भविष्य के संकटों के खिलाफ सुरक्षा कवच का काम कर सकता है।
मिश्रा ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के अगले चरण में स्थिरता और खुलेपन के बीच संतुलन महत्वपूर्ण होगा। उन्होंने भविष्य के लिए ऐसे दृष्टिकोण की जरूरत बताई जिसमें देश दुनिया से जुड़े रहें, लेकिन बाहरी जोखिमों को समझते हुए अपनी कमजोरियों को कम करते रहें।
पीके मिश्रा का संदेश मूल रूप से इस सवाल के इर्द-गिर्द रहा कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत अपनी आर्थिक वृद्धि को बाहरी झटकों से कैसे सुरक्षित रखे। टैरिफ, प्रतिबंध और निर्यात नियंत्रण से लेकर युद्ध, समुद्री मार्गों और महत्वपूर्ण खनिजों तक—अब आर्थिक नीति और भू-राजनीति एक-दूसरे से तेजी से जुड़ रहे हैं।
भारत की ओर से तेल आयात के स्रोतों को 27 से बढ़ाकर 43 देशों तक करना, ऊर्जा भंडार बनाए रखना, वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों पर जोर देना, घरेलू ऊर्जा क्षमता बढ़ाना और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में क्षमता विकसित करना इसी व्यापक रणनीति के हिस्से के रूप में सामने आया है।
मिश्रा के मुताबिक, आर्थिक लचीलापन का अर्थ दुनिया से दूरी बनाना नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सक्रिय रहते हुए ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जो संकट के समय भी काम करती रहे।


