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नई दिल्ली। शिक्षक दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों से मुलाकात कर शिक्षा, बच्चों के समग्र विकास, डिजिटल लत, खेल, नशे के बढ़ते खतरे और शिक्षकों की सामाजिक जिम्मेदारी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। इस दौरान प्रधानमंत्री ने शिक्षकों के अनुभव सुने और बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में उनकी भूमिका को रेखांकित किया। पीएम मोदी ने इस मुलाकात का एक वीडियो भी जारी किया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शिक्षक दिवस के महत्व को साझा किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि शिक्षक दिवस समाज में शिक्षकों के महत्वपूर्ण योगदान को सम्मान देने का अवसर है। उन्होंने कहा कि यह दिन भारत के महान शिक्षाविद और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि देने के लिए भी मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन का जीवन शिक्षा, ज्ञान और शिक्षक की भूमिका के महत्व का प्रतीक रहा है।
पीएम मोदी ने राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित शिक्षकों के साथ बातचीत के दौरान शिक्षा के बदलते स्वरूप और बच्चों के सामने उभर रही नई चुनौतियों पर भी चर्चा की। बातचीत में कई ऐसे क्षण भी आए, जब गंभीर विषयों के बीच माहौल बेहद सहज और खुशनुमा दिखाई दिया।
शिक्षकों के साथ बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक शिक्षिका से अपने सार्वजनिक भाषण कौशल को बेहतर बनाने को लेकर सुझाव मांगा। उन्होंने सहज अंदाज में शिक्षिका से पूछा कि यदि मैं आपका विद्यार्थी होता और एक कुशल वक्ता बनना चाहता, तो आप मुझे क्या सुझाव देतीं? मुझे क्या करना चाहिए?
इस सवाल पर शिक्षिका ने जवाब दिया कि सबसे पहले आत्मविश्वास यानी कॉन्फिडेंस होना चाहिए।
शिक्षिका का यह जवाब सुनते ही वहां मौजूद शिक्षकों के बीच हंसी का माहौल बन गया। प्रधानमंत्री मोदी भी इस जवाब पर मुस्कुराते और हंसते नजर आए। इसके बाद शिक्षिका ने भी हंसते हुए कहा कि सर, आपका ऑरा इतना देखकर मुझे ही डाउट हो गया।
बातचीत का यह हिस्सा शिक्षकों और प्रधानमंत्री के बीच संवाद की सहजता को दर्शाता रहा। गंभीर विषयों पर चर्चा के बीच इस हल्के-फुल्के पल ने पूरे माहौल को खुशनुमा बना दिया।
प्रधानमंत्री ने बच्चों में बढ़ते स्क्रीन टाइम और डिजिटल उपकरणों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बच्चों को डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर करना समाधान नहीं है, लेकिन उनकी जिंदगी में वास्तविक दुनिया की गतिविधियों का संतुलन बेहद जरूरी है।
पीएम मोदी ने कहा कि अगर बच्चे खेलों में रुचि लेने लगें और खेल का मतलब केवल वीडियो गेम नहीं, बल्कि मैदान पर जाकर शारीरिक रूप से खेलना हो, तो वे धीरे-धीरे स्क्रीन की लत से बाहर निकल सकते हैं।
उन्होंने बच्चों को अधिक से अधिक रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने पर जोर दिया। उनका कहना था कि बच्चों की ऊर्जा को सही दिशा देने के लिए ऐसे कार्यक्रम होने चाहिए, जिनमें वे सक्रिय रूप से हिस्सा लें, कुछ नया सीखें और अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करें।
प्रधानमंत्री के अनुसार बच्चों के विकास को केवल डिजिटल संसाधनों और ऑनलाइन गतिविधियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों के बौद्धिक विकास के साथ-साथ उनके शारीरिक, सामाजिक और रचनात्मक विकास को भी सुनिश्चित करना है।
प्रधानमंत्री ने खेलों की भूमिका पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को मैदान में जाकर खेलने के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है। खेल न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर करते हैं, बल्कि बच्चों में अनुशासन, टीम भावना, नेतृत्व क्षमता और हार-जीत को स्वीकार करने का भाव भी विकसित करते हैं।
आज जब मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और अन्य डिजिटल गतिविधियां बच्चों के दैनिक जीवन का हिस्सा बनती जा रही हैं, ऐसे में मैदान के खेल उनके लिए वास्तविक सामाजिक अनुभव का माध्यम बन सकते हैं।
शिक्षकों की भूमिका इस मामले में महत्वपूर्ण हो जाती है। स्कूल बच्चों को नियमित खेल गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, कला, संगीत, विज्ञान गतिविधियों और अन्य रचनात्मक कार्यों से जोड़ सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बच्चों के बचपन को बचाए रखने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा की तैयारी तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने शिक्षकों से कहा कि उन्हें बच्चों की जिंदगी से भी जुड़ना चाहिए और यह समझना चाहिए कि बच्चे किन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। बच्चों के व्यवहार में होने वाले छोटे बदलाव भी कई बार किसी बड़ी समस्या का संकेत हो सकते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि बचपन को खत्म नहीं होने देना चाहिए। बच्चों के भीतर खेल, जिज्ञासा, कल्पना, दोस्ती, रचनात्मकता और सीखने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को बनाए रखना जरूरी है।
उन्होंने इस दिशा में शिक्षकों की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताया। शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री ने कुछ बड़े शहरों और विश्वविद्यालयों में सामने आए ड्रेस कोड से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि कई बार नियमों को लेकर पर्याप्त जागरूकता या जानकारी नहीं होती और कभी-कभी नियम बिना पर्याप्त रूप से समझाए लागू कर दिए जाते हैं। ऐसे मामलों में बच्चों की चिंताओं और उनके व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना जरूरी है।
पीएम मोदी ने शिक्षकों से कहा कि उन्हें किसी भी निर्णय के केवल नियमों वाले पक्ष को नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि उस निर्णय का बच्चों पर क्या असर पड़ रहा है।
उन्होंने शिक्षकों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाने और उनकी बात सुनने की आवश्यकता पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है। शिक्षक बच्चों के जीवन से जुड़कर उनके व्यक्तित्व को बेहतर दिशा दे सकते हैं।
बच्चों की रुचि, व्यवहार, मानसिक स्थिति, सामाजिक परिस्थितियों और उनकी प्रतिभा को समझना भी शिक्षा का हिस्सा है।
उन्होंने शिक्षकों से आग्रह किया कि वे बच्चों को केवल अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए तैयार न करें, बल्कि उन्हें अच्छा नागरिक बनने के लिए भी तैयार करें।
प्रधानमंत्री के अनुसार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसा वातावरण बनाना है, जहां बच्चा सवाल पूछ सके, अपनी प्रतिभा विकसित कर सके और समाज के प्रति जिम्मेदारी समझ सके।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षकों से छात्रों को नशे के खतरे और उसके गंभीर दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि बड़े शहरों और विश्वविद्यालयों में कई बार यह समझना कठिन होता है कि कोई बच्चा नशे की चपेट में किस परिस्थिति में आया। ऐसे में शिक्षकों की सतर्कता और जागरूकता महत्वपूर्ण हो जाती है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को नशे से होने वाले नुकसान के बारे में समय रहते जानकारी दी जानी चाहिए। उन्हें यह समझाने की जरूरत है कि नशा उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवार और भविष्य को प्रभावित कर सकता है।
पीएम मोदी ने शिक्षकों से कहा कि वे बच्चों के व्यवहार में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर भी ध्यान दें।
किसी बच्चे का अचानक पढ़ाई से दूर होना, दोस्तों से अलग रहना, लगातार चिड़चिड़ापन, गतिविधियों में रुचि कम होना या व्यवहार में अचानक परिवर्तन कई बार किसी परेशानी की ओर संकेत कर सकता है।
ऐसी स्थिति में शिक्षक की संवेदनशीलता बच्चे की मदद करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
प्रधानमंत्री ने शिक्षकों से केवल अनुशासन बनाए रखने की भूमिका तक सीमित नहीं रहने, बल्कि बच्चों को समझने और जरूरत पड़ने पर उनका मार्गदर्शन करने की भावना के साथ काम करने की अपील की।
प्रधानमंत्री ने शिक्षा और स्वास्थ्य जागरूकता के बीच संबंध का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बच्चों और समाज को स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक करने में शिक्षण संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
स्कूल और कॉलेज केवल पढ़ाई के केंद्र नहीं हैं। वे स्वास्थ्य, स्वच्छता, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति, खेल और सामाजिक जागरूकता के लिए भी महत्वपूर्ण मंच बन सकते हैं।
यदि बच्चों को छोटी उम्र से ही स्वस्थ जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता दी जाए तो उसका प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है।
बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने काशी के सांसद रहते हुए शुरू किए गए स्तन कैंसर जागरूकता अभियान का भी उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि इस अभियान के माध्यम से महिलाओं में स्वास्थ्य जांच को लेकर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया। प्रधानमंत्री ने कहा कि समय के साथ स्थिति में बदलाव आया और महिलाएं स्वयं आगे आकर जांच कराने लगीं।
उन्होंने एक ही दिन में बड़ी संख्या में लोगों की जांच किए जाने और इससे जुड़े विश्व रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने इसे स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में सकारात्मक अनुभव के रूप में सामने रखा।
प्रधानमंत्री की शिक्षकों के साथ बातचीत का व्यापक संदेश बच्चों के समग्र विकास से जुड़ा रहा।
उन्होंने शिक्षा को केवल परीक्षा और डिग्री तक सीमित करने के बजाय बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण से जोड़ने की जरूरत बताई।
उनके संदेश में खेल, रचनात्मकता, स्वास्थ्य, डिजिटल संतुलन, नशे से बचाव, सामाजिक व्यवहार और आत्मविश्वास जैसे विषय प्रमुख रहे।
आज के दौर में बच्चों के सामने चुनौतियां भी बदल रही हैं। एक तरफ तकनीक ने सीखने के नए अवसर पैदा किए हैं, वहीं दूसरी तरफ अत्यधिक स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया की निर्भरता और वास्तविक सामाजिक गतिविधियों से दूरी जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं।
ऐसे में शिक्षक की भूमिका पहले से अधिक व्यापक हो गई है।
बच्चे अपने दिन का एक बड़ा हिस्सा स्कूल और शिक्षकों के साथ बिताते हैं। इसलिए शिक्षक कई बार बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलाव को परिवार के अन्य लोगों से पहले पहचान सकते हैं।
यदि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच भरोसे का संबंध मजबूत हो तो बच्चे अपनी समस्याओं को साझा करने में अधिक सहज महसूस कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री ने इसी व्यापक भूमिका की ओर संकेत करते हुए शिक्षकों को बच्चों की जिंदगी के करीब रहने का संदेश दिया।
तकनीक शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन सामग्री, डिजिटल पुस्तकालय और एआई आधारित शैक्षणिक उपकरणों ने सीखने की प्रक्रिया में कई नए अवसर पैदा किए हैं।
लेकिन प्रधानमंत्री के संदेश का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि डिजिटल शिक्षा के साथ वास्तविक जीवन के अनुभवों का संतुलन जरूरी है।
बच्चों को किताब और स्क्रीन के साथ-साथ मैदान, प्रयोगशाला, कला मंच, प्रकृति और सामाजिक गतिविधियों से भी जोड़ना होगा।
यही संतुलन बच्चों को अधिक आत्मविश्वासी, रचनात्मक और जिम्मेदार बनाने में मदद कर सकता है।
शिक्षक दिवस सामान्य रूप से शिक्षकों के सम्मान का अवसर है, लेकिन प्रधानमंत्री की बातचीत में सम्मान के साथ जिम्मेदारी का संदेश भी दिखाई दिया।
शिक्षक समाज की नई पीढ़ी तैयार करते हैं। उनके सामने चुनौती केवल ज्ञान प्रदान करने की नहीं, बल्कि ऐसे बच्चों को तैयार करने की है जो तेजी से बदलती दुनिया में सही और गलत के बीच अंतर समझ सकें, तकनीक का जिम्मेदारी से उपयोग कर सकें और समाज के प्रति अपनी भूमिका को पहचान सकें।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल शिक्षा और इंटरनेट के दौर में जानकारी हासिल करना पहले की तुलना में आसान हो गया है। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका केवल जानकारी देने वाले व्यक्ति की नहीं रह जाती।
अब शिक्षक को बच्चों में सोचने, सवाल पूछने, विश्लेषण करने और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी होगी।
शिक्षक बच्चों को यह सिखा सकते हैं कि इंटरनेट और डिजिटल दुनिया में उपलब्ध जानकारी का सही उपयोग कैसे किया जाए और गलत जानकारी से कैसे बचा जाए।
प्रधानमंत्री के संवाद से यह संदेश सामने आया कि शिक्षा का लक्ष्य बच्चों को केवल परीक्षा में सफल बनाना नहीं होना चाहिए। उन्हें जीवन की चुनौतियों के लिए भी तैयार करना जरूरी है।
खेल उन्हें अनुशासन सिखा सकता है, रचनात्मक गतिविधियां उनकी कल्पना को मजबूत कर सकती हैं, सामाजिक गतिविधियां जिम्मेदारी की भावना पैदा कर सकती हैं और शिक्षक का मार्गदर्शन उन्हें सही दिशा दे सकता है।
इसलिए बच्चों की शिक्षा को जीवन से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री का शिक्षकों के साथ संवाद इस बात को रेखांकित करता है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल उसकी आर्थिक या तकनीकी क्षमता से तय नहीं होता। भविष्य का निर्माण उस पीढ़ी से होता है जिसे आज स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में तैयार किया जा रहा है।
इस प्रक्रिया में शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
वे बच्चों को ज्ञान देते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ उनमें संस्कार, आत्मविश्वास, अनुशासन, जिज्ञासा और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित कर सकते हैं।
शिक्षक दिवस पर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातचीत में शिक्षा व्यवस्था के कई महत्वपूर्ण पहलू सामने आए। सार्वजनिक भाषण से लेकर बच्चों के स्क्रीन टाइम तक, खेल से लेकर रचनात्मक गतिविधियों तक, नशे के खतरे से लेकर स्वास्थ्य जागरूकता तक और ड्रेस कोड जैसे संवेदनशील मुद्दों से लेकर बच्चों के बचपन को बचाने तक—प्रधानमंत्री ने शिक्षकों की भूमिका को व्यापक संदर्भ में रेखांकित किया।
इस संवाद का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि शिक्षक केवल कक्षा में पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं है। वह बच्चे के व्यक्तित्व, व्यवहार और भविष्य को आकार देने वाली महत्वपूर्ण शक्ति है।
बच्चों को डिजिटल दुनिया के साथ वास्तविक दुनिया से जोड़ना, उन्हें खेल और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करना, नशे जैसी बुराइयों से दूर रखना, उनके व्यवहार में बदलाव को समझना और उनकी चिंताओं को सुनना—ये सभी जिम्मेदारियां शिक्षा के व्यापक उद्देश्य का हिस्सा हैं।
शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को सम्मानित करने के साथ-साथ उनकी इस बड़ी जिम्मेदारी को याद करना भी जरूरी है। क्योंकि आज की कक्षा में बैठा बच्चा ही कल का नागरिक, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार, उद्यमी, अधिकारी और समाज का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति बनेगा।
इसलिए शिक्षक का योगदान केवल आज तक सीमित नहीं रहता। एक शिक्षक जिस बच्चे को आज दिशा देता है, उसका प्रभाव आने वाली पूरी पीढ़ियों तक दिखाई दे सकता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


