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- 12h ago
नई दिल्ली। भारत में मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना को लेकर केंद्र सरकार ने इसके आर्थिक योगदान और उपलब्धियों का ब्योरा साझा किया है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, मोबाइल फोन विनिर्माण पीएलआई योजना के तहत सरकार ने करीब 19,000 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन दिया, जबकि संबंधित लाभार्थियों से 25,000 करोड़ रुपये प्रत्यक्ष कर और लगभग 3 लाख करोड़ रुपये वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में प्राप्त हुए। इस प्रकार कुल कर संग्रह करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये बताया गया है।
मंत्री ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर आंकड़े साझा करते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को प्रोत्साहन देने की सरकारी नीति का बचाव किया। उनका बयान ऐसे समय आया, जब एक मीडिया राय वीडियो में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र को सब्सिडी के जरिये बढ़ावा देने की नीति की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए गए थे।
सरकार का तर्क है कि उत्पादन आधारित प्रोत्साहन से देश में मोबाइल फोन निर्माण की क्षमता बढ़ाने, रोजगार के अवसर पैदा करने, आयात पर निर्भरता कम करने और निर्यात को बढ़ावा देने में मदद मिली है। मोबाइल फोन क्षेत्र में हुई वृद्धि को भारत की विनिर्माण क्षमता के विस्तार की प्रमुख उपलब्धियों में गिना जा रहा है।
हालांकि, कर संग्रह और प्रोत्साहन राशि की तुलना को योजना के शुद्ध आर्थिक लाभ के रूप में समझने से पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित कर आंकड़ों की गणना किस अवधि और दायरे के आधार पर की गई है। इसके साथ ही योजना के कारण पैदा हुए अतिरिक्त उत्पादन, रोजगार और निवेश का अलग-अलग आकलन भी महत्वपूर्ण है।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि मोबाइल विनिर्माण पीएलआई योजना के अंतर्गत सरकार ने लाभार्थियों को लगभग 19,000 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन दिया है। इसके मुकाबले लाभार्थियों से 25,000 करोड़ रुपये प्रत्यक्ष कर और करीब 3 लाख करोड़ रुपये जीएसटी के रूप में प्राप्त होने की जानकारी दी गई।
सरकार इन आंकड़ों को इस बात के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर रही है कि इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए दी गई सहायता के साथ देश में उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार हुआ है। योजना का उद्देश्य कंपनियों को भारत में उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना और देश को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति शृंखला में मजबूत स्थान दिलाना रहा है।
उत्पादन बढ़ने से विनिर्माण इकाइयों, आपूर्तिकर्ताओं, परिवहन, पैकेजिंग, उपकरणों और अन्य सहायक गतिविधियों में भी कारोबार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे व्यापक औद्योगिक तंत्र को लाभ मिलने की संभावना रहती है।
फिर भी, कर संग्रह की पूरी राशि को केवल पीएलआई योजना का प्रत्यक्ष परिणाम मानना उचित नहीं होगा। किसी योजना की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए यह भी समझना जरूरी है कि उसके बिना उत्पादन, निवेश और कर संग्रह किस स्तर पर होते। इसके अलावा, प्रोत्साहन राशि और कर संग्रह की अवधि तथा गणना का आधार समान होना भी तुलना के लिए महत्वपूर्ण है।
अश्विनी वैष्णव के अनुसार, देश के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र में करीब 25 लाख लोग कार्यरत हैं। इनमें से लगभग 12 लाख लोगों को अकेले मोबाइल विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार मिला है।
मोबाइल फोन निर्माण उद्योग में रोजगार केवल असेंबली इकाइयों तक सीमित नहीं रहता। इससे कलपुर्जों की आपूर्ति, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता जांच, वेयरहाउसिंग और अन्य सहायक सेवाओं में भी काम के अवसर पैदा हो सकते हैं। विनिर्माण गतिविधियों के विस्तार से इन क्षेत्रों में कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण की मांग भी बढ़ सकती है।
भारत के लिए इस क्षेत्र में रोजगार सृजन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मोबाइल फोन उद्योग बड़े पैमाने पर उत्पादन और आपूर्ति शृंखला से जुड़ा है। यदि स्थानीय स्तर पर अधिक कलपुर्जों का निर्माण होने लगे, तो रोजगार के अवसर और औद्योगिक गतिविधियों का दायरा आगे बढ़ सकता है।
हालांकि, रोजगार के आंकड़ों को समझते समय प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के बीच अंतर करना आवश्यक है। इसी तरह स्थायी, अस्थायी और अनुबंध आधारित रोजगार की जानकारी से क्षेत्र में पैदा हुए रोजगार की प्रकृति का अधिक स्पष्ट आकलन किया जा सकता है।
सरकार द्वारा मार्च में साझा किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 2 लाख करोड़ रुपये के मोबाइल फोन का निर्यात किया। यह उपलब्धि देश में मोबाइल विनिर्माण क्षमता बढ़ने और भारत में बने उत्पादों की विदेशी बाजारों तक पहुंच मजबूत होने का संकेत देती है।
मोबाइल फोन निर्यात में वृद्धि का महत्व केवल विदेशी बाजारों में बिक्री बढ़ने तक सीमित नहीं है। निर्यात से विनिर्माण इकाइयों को बड़े बाजार मिल सकते हैं, उत्पादन क्षमता का अधिक उपयोग हो सकता है और वैश्विक कंपनियों की आपूर्ति शृंखला में भारत की भागीदारी बढ़ सकती है।
यदि देश में उत्पादन के साथ स्थानीय कलपुर्जों और अन्य घटकों का निर्माण भी बढ़ता है, तो घरेलू उद्योग को अधिक व्यापक लाभ मिलने की संभावना रहती है। इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक घटकों की उपलब्धता, कुशल श्रमिकों, तकनीकी विशेषज्ञता और प्रतिस्पर्धी उत्पादन लागत पर लगातार काम करना होगा।
सरकार के अनुसार, मोबाइल फोन का आयात भी घरेलू मांग की तुलना में काफी कम हो गया है। वर्ष 2024-25 में आयात का हिस्सा घरेलू मांग का लगभग 0.02 प्रतिशत बताया गया, जबकि करीब दस वर्ष पहले यह लगभग 75 प्रतिशत था।
यह तुलना भारत में मोबाइल फोन निर्माण की क्षमता में आए बड़े बदलाव को दर्शाती है। हालांकि, आयात के इस आंकड़े की सही व्याख्या के लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसमें तैयार मोबाइल फोन का आयात शामिल है या अन्य इलेक्ट्रॉनिक घटकों का भी। तैयार मोबाइल फोन का आयात घटने का अर्थ यह नहीं है कि विनिर्माण में इस्तेमाल होने वाले सभी कलपुर्जों के आयात पर भी निर्भरता समाप्त हो गई है।
सरकार के साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत में इलेक्ट्रॉनिक सामान का उत्पादन वित्त वर्ष 2014-15 के लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 11.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इस अवधि में उत्पादन लगभग छह गुना बढ़ा।
मोबाइल फोन के उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2014-15 में मोबाइल फोन का उत्पादन करीब 0.18 लाख करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में बढ़कर लगभग 5.5 लाख करोड़ रुपये हो गया।
इलेक्ट्रॉनिक सामान का निर्यात भी इसी अवधि में लगभग 0.38 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 3.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। सरकार इन आंकड़ों को देश में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के विस्तार और निर्यात क्षमता में हुई वृद्धि के संकेत के रूप में पेश कर रही है।
उत्पादन में वृद्धि से यह स्पष्ट होता है कि भारत में मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग का आकार काफी बढ़ा है। लेकिन विनिर्माण क्षेत्र को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने के लिए केवल अंतिम उत्पादों की असेंबली पर्याप्त नहीं होगी। सेमीकंडक्टर, डिस्प्ले, कैमरा मॉड्यूल, बैटरी और अन्य महत्वपूर्ण घटकों के घरेलू उत्पादन की क्षमता बढ़ाना भी अहम होगा।
स्थानीय स्तर पर घटकों का निर्माण बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम करने, घरेलू आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाने और उत्पादों में भारतीय उद्योग की हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना का मूल उद्देश्य कंपनियों को भारत में उत्पादन बढ़ाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देना है। इस व्यवस्था में पात्र कंपनियों को निर्धारित शर्तों के अनुसार अतिरिक्त उत्पादन और संबंधित प्रदर्शन के आधार पर लाभ मिल सकता है।
मोबाइल फोन जैसे बड़े बाजार में उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश, तकनीक, कुशल श्रमिक, आपूर्तिकर्ताओं का नेटवर्क और निर्यात बाजारों तक पहुंच आवश्यक होती है। पीएलआई योजना के जरिये सरकार ने कंपनियों को भारत में विनिर्माण गतिविधियों का विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया।
सरकार की रणनीति का एक उद्देश्य भारत को केवल घरेलू मांग पूरी करने वाला बाजार बनाए रखने के बजाय वैश्विक उत्पादन और निर्यात केंद्र के रूप में विकसित करना है। इसके लिए बड़े विनिर्माताओं के साथ-साथ घरेलू घटक निर्माताओं और सहायक उद्योगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
इस नीति के परिणामों का मूल्यांकन करते समय उत्पादन और निर्यात में वृद्धि के साथ स्थानीय मूल्य संवर्धन, तकनीकी क्षमता, रोजगार की गुणवत्ता और घरेलू आपूर्तिकर्ताओं की भागीदारी जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा।
सरकार ने अब मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (एमपीएमएस) शुरू की है। खबर में दिए गए विवरण के अनुसार, इस योजना के तहत उपकरणों के स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कुल 62,500 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसका उद्देश्य भारतीय स्मार्टफोन के विकास और निर्माण को बढ़ावा देना है, जिन्हें स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित किया जा सके।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भारतीय स्मार्टफोन ब्रांड के लक्ष्य के लिए अक्टूबर 2028 की समय-सीमा तय की है। इस लक्ष्य के तहत भारत में ऐसे स्मार्टफोन विकसित करने पर जोर होगा, जिनके डिजाइन, तकनीकी विकास और निर्माण में घरेलू क्षमता की महत्वपूर्ण भूमिका हो।
स्वदेशी स्मार्टफोन विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए केवल फोन की असेंबली करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए उत्पाद डिजाइन, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर इंजीनियरिंग, सुरक्षा, परीक्षण, घटकों की उपलब्धता और बिक्री के बाद सेवा जैसे कई पहलुओं पर काम करना होगा।
भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए उत्पाद की गुणवत्ता, कीमत, तकनीकी विशेषताओं और उपभोक्ताओं के भरोसे पर भी ध्यान देना होगा। घरेलू अनुसंधान एवं विकास में निवेश तथा कुशल तकनीकी प्रतिभाओं की उपलब्धता इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
यदि स्थानीय कंपनियां प्रतिस्पर्धी स्मार्टफोन विकसित करने में सफल होती हैं, तो भारत के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में अधिक मूल्य संवर्धन और तकनीकी क्षमता निर्माण के अवसर पैदा हो सकते हैं। हालांकि, अक्टूबर 2028 की समय-सीमा तक लक्ष्य हासिल करने की प्रगति का आकलन वास्तविक परियोजनाओं, निवेश और विकसित उत्पादों के आधार पर करना होगा।
मोबाइल फोन उत्पादन और निर्यात में हुई वृद्धि के बावजूद भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र के सामने कई चुनौतियां बनी हुई हैं। इनमें महत्वपूर्ण घटकों की घरेलू उपलब्धता, उन्नत तकनीक तक पहुंच, अनुसंधान एवं विकास, कुशल श्रमिकों की उपलब्धता और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी लागत बनाए रखना शामिल है।
मोबाइल फोन का अंतिम उत्पाद देश में तैयार होने के बावजूद यदि उसके प्रमुख घटकों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है, तो घरेलू उद्योग के लिए मूल्य संवर्धन बढ़ाने की चुनौती बनी रहती है। इसलिए अगला चरण स्थानीय आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने और अधिक घटकों के घरेलू उत्पादन पर केंद्रित हो सकता है।
इसके अलावा, वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों और तकनीकी बदलावों का असर भी निर्यात पर पड़ सकता है। ऐसे में भारत को उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ तकनीकी नवाचार और बाजारों में विविधता लाने पर ध्यान देना होगा।
सरकारी प्रोत्साहन औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने का एक माध्यम हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा के लिए उद्योग की उत्पादकता, तकनीकी क्षमता और बाजार की मांग भी निर्णायक होंगी।
सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़े मोबाइल विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन, निर्यात, रोजगार और कर संग्रह में वृद्धि की तस्वीर पेश करते हैं। ये संकेतक बताते हैं कि भारत का मोबाइल फोन उद्योग पिछले दशक में काफी विस्तारित हुआ है।
हालांकि, पीएलआई योजना की समग्र सफलता का आकलन करने के लिए यह देखना जरूरी है कि योजना के कारण कितना अतिरिक्त निवेश और उत्पादन हुआ, कितने नए रोजगार पैदा हुए और घरेलू उद्योग में कितना मूल्य संवर्धन बढ़ा। साथ ही, सरकारी प्रोत्साहन की लागत, संबंधित अवधि में प्राप्त करों और अन्य आर्थिक लाभों का तुलनात्मक विश्लेषण भी आवश्यक है।
कर संग्रह में वृद्धि सरकार के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी योजना का आर्थिक लाभ केवल कर राजस्व और प्रोत्साहन राशि के अंतर से निर्धारित नहीं किया जा सकता। यह भी समझना होगा कि इनमें से कितना राजस्व योजना के कारण अतिरिक्त रूप से प्राप्त हुआ और कितना सामान्य आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा था।
इस तरह का व्यापक मूल्यांकन यह समझने में मदद करेगा कि सरकारी सहायता ने देश की विनिर्माण क्षमता, रोजगार और तकनीकी आत्मनिर्भरता को किस हद तक मजबूत किया है।
मोबाइल पीएलआई योजना से जुड़े आंकड़े भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के विस्तार की ओर संकेत करते हैं। मोबाइल फोन उत्पादन, निर्यात और रोजगार में वृद्धि ने इस क्षेत्र को देश की औद्योगिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है।
अब चुनौती इस वृद्धि को दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता में बदलने की है। इसके लिए घरेलू घटक निर्माण, स्वदेशी डिजाइन, अनुसंधान एवं विकास, कुशल श्रमिकों और वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा पर जोर देना होगा।
सरकार की नई योजना और अक्टूबर 2028 तक भारतीय स्मार्टफोन ब्रांड विकसित करने का लक्ष्य इसी दिशा में अगला कदम माना जा रहा है। आने वाले समय में इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि भारत कितनी प्रभावी तरह से अपने डिजाइन और तकनीकी क्षमताओं का विकास करता है, घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाता है और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी उत्पाद पेश करता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


