यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 13h ago
नई दिल्ली। सत्ता की ऊंची कुर्सियां बदलती रहीं, जिम्मेदारियां बढ़ती गईं और राजनीतिक सफर गुजरात से दिल्ली तक पहुंच गया, लेकिन करीब 25 साल पहले मां हीराबेन से मिली दो सीख नरेंद्र मोदी के जेहन में आज भी उसी तरह दर्ज हैं। यह सीख किसी राजनीतिक रणनीति या सत्ता के प्रबंधन की नहीं थी, बल्कि जीवन के उन मूल्यों की थी, जिन्हें एक मां ने अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनने के बाद याद दिलाया था। मां ने उनसे कहा था कि गरीबों की सेवा करना और कभी रिश्वत नहीं लेना।
7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। मुख्यमंत्री बनने के बाद जब वह अपनी मां का आशीर्वाद लेने पहुंचे तो हीराबेन ने उनसे कहा था कि उन्हें राजनीति की बारीकियों की ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन वह उनसे दो बातें चाहती हैं—गरीबों की सेवा करना और कभी रिश्वत नहीं लेना। नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक जीवन के लंबे सफर में कई बार इस प्रसंग को याद किया और बताया कि मां की ये सरल बातें उनके लिए किसी राजनीतिक भाषण से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थीं।
करीब 25 साल की सार्वजनिक सेवा की यात्रा के पड़ाव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जीवन, संघर्ष, सीख और देश के प्रति अपने संकल्पों को याद किया। दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम में देशभर के भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते समय उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि सार्वजनिक जीवन में एक दिन वह 25 वर्ष की सेवा का पड़ाव पूरा करेंगे।
उन्होंने इस उपलब्धि का श्रेय स्वयं को देने के बजाय देश की जनता के विश्वास, कार्यकर्ताओं के परिश्रम और लोकतंत्र की शक्ति को दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि जनता का विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा है और वह स्वयं को देशवासियों का सेवक मानते हैं।
प्रधानमंत्री के संबोधन में मां की सीख का उल्लेख विशेष रूप से भावनात्मक रहा। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद जब वह मां से मिलने पहुंचे थे तो मां ने उनसे राजनीति के बारे में कोई बड़ी सलाह नहीं दी। उन्होंने केवल इतना कहा कि गरीबों की सेवा करना और कभी रिश्वत नहीं लेना।
एक साधारण मां की ये बातें आगे चलकर नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के लिए एक नैतिक आधार बन गईं। प्रधानमंत्री ने अनेक अवसरों पर कहा है कि बचपन और परिवार से मिले संस्कार जीवन के कठिन दौर में रास्ता दिखाते हैं। उनके अनुसार, पद और परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन संस्कार व्यक्ति के निर्णयों और कार्यशैली पर लंबे समय तक प्रभाव डालते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में 25 वर्षों की यात्रा को केवल किसी व्यक्ति की उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह यात्रा करोड़ों लोगों के विश्वास, सहयोग और आशीर्वाद से संभव हुई है। उन्होंने कहा कि 25 वर्ष का जनविश्वास और 25 वर्ष का अनुभव एक बड़ी पूंजी है, लेकिन यह पूंजी किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि देश की है।
उन्होंने देशवासियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि भारत ने उन्हें बहुत कुछ दिया है। इसलिए देश ही उनके लिए सबकुछ है। प्रधानमंत्री ने कहा कि जनता जनार्दन उनके लिए ईश्वर का ही स्वरूप है और करोड़ों लोगों का विश्वास ही उन्हें लगातार काम करने की ऊर्जा देता है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने देश के 140 करोड़ भारतवासियों के लिए प्रार्थना की है। उनकी कामना है कि परमात्मा उन्हें इतनी शक्ति दें कि वह देश के लिए और अधिक ऊर्जा के साथ काम कर सकें।
उन्होंने कहा कि उनका प्रयास यही है कि दिन-रात देशवासियों की सेवा में जुटे रहें। उन्होंने कहा कि जीवन में पद या प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति को देश और समाज के लिए काम करने का अवसर मिले।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके लिए देश के नागरिकों का हित सबसे ऊपर है। जनता का विश्वास उनके लिए जिम्मेदारी भी है और प्रेरणा भी।
प्रधानमंत्री ने अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए कहा कि सीखने की इच्छा उनके जीवन का लगातार हिस्सा रही है। उन्होंने कहा कि वह आज भी स्वयं को विद्यार्थी मानते हैं और ईश्वर से यही प्रार्थना करते रहे हैं कि सीखने की उनकी इच्छा कभी कम न हो।
उन्होंने कहा कि पीछे मुड़कर देखने पर जीवन की प्रत्येक घटना कुछ न कुछ सिखाती दिखाई देती है। किसी ने गिराया तो उससे दोबारा खड़े होना सीखा, किसी ने विरोध किया तो लोकतंत्र की शक्ति समझ में आई और किसी संकट ने धैर्य की परीक्षा ली।
प्रधानमंत्री ने कहा कि सफलता भी अपने साथ सीख लेकर आती है। सफलता व्यक्ति को बड़े लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें हासिल करने के लिए और अधिक मेहनत करने की प्रेरणा देती है।
प्रधानमंत्री ने देश की विभिन्न घटनाओं और चुनौतियों को अपने लिए सीख का माध्यम बताया। उन्होंने चंद्रयान अभियान का उदाहरण देते हुए कहा कि असफलता के बाद भी प्रयास नहीं रुकना चाहिए।
कोरोना महामारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस संकट ने सामूहिक चेतना और मिलकर काम करने की ताकत का पाठ पढ़ाया। उनके मुताबिक संकट की परिस्थितियां समाज की सामूहिक शक्ति को सामने लाती हैं।
उन्होंने गांवों, गरीबों और आम लोगों से मिले अनुभवों का भी उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के गांवों और गरीबों ने उन्हें यह सिखाया कि साधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन सपने कभी छोटे नहीं होने चाहिए। हौसला ऊंचा हो तो कठिन परिस्थितियों में भी रास्ता बनाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की सभ्यता और संस्कृति ने हजारों वर्षों से मानवता को रास्ता दिखाया है। वेदों से लेकर स्वामी विवेकानंद तक भारत की परंपरा में सेवा, त्याग और मानव कल्याण की भावना रही है।
उन्होंने कहा कि ऐसे राष्ट्र में काम करते हुए उन्हें कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ। उन्होंने कार्यकर्ताओं को संदेश दिया कि वे स्वयं को सत्ता का हिस्सा नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम मानें।
प्रधानमंत्री ने कहा कि हम सेवक हैं और सेवा हमारा धर्म है। गरीब, वंचित और दीन-दुखियों की सेवा करना केवल राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का हिस्सा है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि 25 वर्षों की यात्रा केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है। यह आने वाले वर्षों के लिए संकल्प को नई ऊर्जा देने का समय है।
उन्होंने कहा कि हमें उस संकल्प को दोहराना है कि जो लक्ष्य देश ने तय किए हैं, उन्हें हासिल करके रहेंगे। इसी भावना के साथ उन्होंने कार्यकर्ताओं से 'वी विल डू इट' का संदेश दोहराया।
उन्होंने कहा कि लाल किले से उन्होंने 'सबका प्रयास' की बात कही थी। भारत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने के लिए केवल सरकार का प्रयास पर्याप्त नहीं है। इसके लिए देश के हर नागरिक, हर युवा, हर किसान, हर श्रमिक, हर उद्यमी और समाज के प्रत्येक वर्ग का योगदान जरूरी है।
प्रधानमंत्री ने कार्यकर्ताओं के बीच जोश भरते हुए कहा—
विकसित भारत बाय 2047—वी विल डू इट।
तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी—वी विल डू इट।
आत्मनिर्भर भारत—वी विल डू इट।
ओलिंपिक्स का आयोजन—वी विल डू इट।
अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयां—वी विल डू इट।
उन्होंने कहा कि जब यह ऊर्जा और आत्मविश्वास देशवासियों की रगों में दौड़ता है तो किसी भी लक्ष्य को हासिल करना असंभव नहीं रहता।
प्रधानमंत्री ने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन को याद करते हुए कहा कि उनकी भूमिका संगठन के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता की रही। उन्होंने चुनाव लड़वाए, लेकिन स्वयं चुनाव नहीं लड़ा था।
उन्होंने कहा कि यदि चुनावी राजनीति में चमकने की इच्छा होती तो बहुत पहले चुनावी मैदान में उतर सकते थे, लेकिन उनका स्वभाव ऐसा नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि उनका अपना भविष्य क्या होगा।
उनके मुताबिक बचपन से मिले संस्कारों ने उन्हें महत्वाकांक्षा से अधिक मिशन को महत्व देना सिखाया। उन्होंने कहा कि वह एंबीशन के लिए नहीं, बल्कि मिशन के लिए जीने वाले व्यक्ति रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि कर्म उनके जीवन का आधार रहा है। उनके लिए कर्म ही धर्म है और देश के लिए निस्वार्थ कर्म करना जीवन का ध्येय है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपना कर्म पूरी क्षमता के साथ करते रहना चाहिए। परिणाम की चिंता किए बिना निरंतर प्रयास करना ही जीवन का मार्ग होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि काम रुकना नहीं चाहिए और प्रयास भी रुकना नहीं चाहिए। देशवासियों की सेवा करने का अवसर उनके लिए केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साधना है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि जब व्यक्ति अपने कर्म को देश के प्रति समर्पण मानकर करता है तो पद, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत उपलब्धियां पीछे छूट जाती हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि 25 साल की यात्रा का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह स्वयं कहां पहुंचे। असली सवाल यह है कि देश कहां पहुंचा।
उन्होंने कहा कि भारत में जन्म लेना अपने आप में अमृत जैसा एहसास है। इसके सामने सत्ता का सुख कुछ भी नहीं है। पद और प्रतिष्ठा कहीं भी मिल सकती है, लेकिन भारत जैसी पुण्यभूमि नहीं मिल सकती।
उन्होंने भारत की सभ्यता, ज्ञान परंपरा और मानवता के प्रति योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस देश ने कठिन दौर में भी दुनिया को ज्ञान और मूल्यों का प्रकाश दिया, उसकी सेवा करने का अवसर अमूल्य है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो प्रशासनिक व्यवस्था का बहुत अधिक अनुभव उनके पास नहीं था। उनके पास सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास था।
उन्होंने कहा कि उन्होंने जनता को साथ लेकर निर्णय लिए, नीतियां बनाईं और उन्हें लागू करने का प्रयास किया। यही उनकी कार्यशैली का आधार बना।
प्रधानमंत्री ने गुजरात के विकास का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य ने विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति की, उससे उन्हें काफी कुछ सीखने को मिला। गुजरात में मिले अनुभव आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर भी उनके काम आए।
प्रधानमंत्री ने 2014 के दौर को याद करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी मिलने के बाद उनका दायरा काफी बढ़ गया। उस समय देश अनेक चुनौतियों से गुजर रहा था।
उन्होंने कहा कि उस दौर में देश के सामने आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां थीं। भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर दुनिया में निराशा की बातें हो रही थीं और देश का आम नागरिक नए रास्ते की तलाश में था।
उन्होंने कहा कि उस समय उन्होंने वही किया जो वह पहले से करते आए थे—लोगों के साथ मिलकर काम किया और उन्हें विश्वास दिलाया कि देश मिलकर आगे बढ़ सकता है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि जब जनता साथ होती है तो बड़े से बड़ा परिवर्तन संभव होता है।
प्रधानमंत्री ने देश में आए बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज भारत में बने मोबाइल फोन दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। उन्होंने ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव का भी जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि एक समय बिजली कटौती सुर्खियां बनती थी, जबकि आज देश में सौर ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा की चर्चा हो रही है।
खेती के क्षेत्र का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 2015 से 2025 के दशक में कृषि वृद्धि दर को लेकर उन्होंने इसे आजादी के बाद के दशकों में उल्लेखनीय बताया। उन्होंने कहा कि विकास के लिए नीयत साफ और नीति स्पष्ट होना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सबका साथ और सबका विकास उनके लिए सुशासन का आधार रहा है। यदि समस्या सबकी है तो समाधान भी सबके लिए होना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को लंबे समय तक वोटों के हिसाब से अलग-अलग हिस्सों में देखने की प्रवृत्ति रही। लेकिन उनका मानना है कि विकास का लाभ हर नागरिक तक पहुंचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि गरीब, किसान, महिला, युवा, मजदूर, मध्यम वर्ग और उद्यमी—हर वर्ग देश की विकास यात्रा का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाओं का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाएं पहुंचाना होना चाहिए। यही समावेशी विकास की भावना है।
प्रधानमंत्री ने भारत के इतिहास को याद करते हुए कहा कि देश ने लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों का सामना किया। विदेशी आक्रमण, गुलामी, अकाल और अनेक विभीषिकाओं के बावजूद भारत की आत्मा और उसके लोगों का साहस नहीं टूटा।
उन्होंने कहा कि जिस देश ने कभी दुनिया की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसे लंबे समय तक शोषण और गुलामी का सामना करना पड़ा। ज्ञान और संस्कृति के अनेक केंद्र नष्ट किए गए, लेकिन भारत की सभ्यता की चेतना बनी रही।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनता और उसकी जीवंत सांस्कृतिक चेतना रही है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज की पीढ़ी के सामने केवल वर्तमान को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत भारत तैयार करने की भी जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि भारत के गौरव को पुनर्जीवित करना केवल अतीत की बात करना नहीं है। इसका अर्थ है कि आधुनिक भारत को विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, खेल और अंतरिक्ष सहित हर क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जाए।
उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य केवल सरकार का लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पूरे समाज का सामूहिक संकल्प बनना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में हर दौर एक जैसा नहीं होता। कभी सफलता मिलती है तो कभी असफलता का सामना करना पड़ता है। कभी प्रशंसा होती है तो कभी आलोचना।
लेकिन उन्होंने कहा कि हर परिस्थिति से कुछ न कुछ सीखने की कोशिश की। विरोध ने लोकतंत्र को समझने का अवसर दिया, संकट ने धैर्य सिखाया और सफलता ने जिम्मेदारी बढ़ाई।
उन्होंने कहा कि जीवन की यात्रा में व्यक्ति को अपने अनुभवों से लगातार सीखते रहना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने भाजपा के कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को भी अपनी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक और राजनीतिक जीवन के हर पड़ाव पर हजारों कार्यकर्ताओं ने बिना किसी अपेक्षा के संगठन और देश के लिए काम किया।
उन्होंने ऐसे सभी कार्यकर्ताओं को नमन करते हुए कहा कि संगठन की शक्ति केवल कार्यालयों या पदों से नहीं आती, बल्कि जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं से आती है।
उन्होंने कहा कि 25 वर्ष पूरे होने का अवसर कार्यकर्ताओं को पुराने अनुभवों से ऊर्जा लेकर भविष्य के लिए नए संकल्प करने का अवसर देता है।
प्रधानमंत्री के संबोधन में युवाओं के लिए भी संदेश रहा। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं को अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखना चाहिए और बड़े लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए।
उन्होंने कहा कि संसाधनों की कमी कभी सपनों की सीमा नहीं बननी चाहिए। भारत का युवा यदि आत्मविश्वास और मेहनत के साथ आगे बढ़े तो देश नई ऊंचाइयों को हासिल कर सकता है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाला समय भारत का है और इस यात्रा में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में बार-बार सेवा की भावना पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में आने वाले व्यक्ति के लिए पद अपने आप में लक्ष्य नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पद केवल जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है। असली संतोष तब मिलता है जब किसी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके।
इसी भावना को उन्होंने अपनी मां की सीख से भी जोड़ा—गरीबों की सेवा और ईमानदारी।
कार्यक्रम से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली स्थित श्री विनायक मंदिर पहुंचकर भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की। उन्होंने भगवान श्री गणेश के दर्शन किए और विधिवत पूजा की।
प्रधानमंत्री ने मंदिर परिसर में विभिन्न स्थलों पर प्रार्थना की और प्रसाद ग्रहण किया। इस दौरान उन्होंने देशवासियों की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और कल्याण की कामना की।
धार्मिक आस्था के इस अवसर के बाद प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के मौके पर देश और कार्यकर्ताओं को संबोधित किया।
प्रधानमंत्री के पूरे संबोधन का सार यही रहा कि सार्वजनिक जीवन में लंबी यात्रा केवल पद हासिल करने से नहीं बनती। इसके लिए निरंतर परिश्रम, धैर्य, सीखने की इच्छा और जनता के प्रति जवाबदेही जरूरी है।
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुई यात्रा ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुंचाया। लेकिन प्रधानमंत्री के मुताबिक इस यात्रा का वास्तविक मूल्यांकन उनके व्यक्तिगत राजनीतिक सफर से नहीं, बल्कि देश की प्रगति से होना चाहिए।
मां हीराबेन की दो सरल बातें—गरीबों की सेवा करना और कभी रिश्वत नहीं लेना—इस पूरे सफर में एक नैतिक सूत्र की तरह दिखाई देती हैं।
25 वर्षों के इस पड़ाव पर प्रधानमंत्री ने अतीत को याद करने के साथ भविष्य की ओर देखने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अब समय केवल उपलब्धियों पर संतोष करने का नहीं, बल्कि नए संकल्पों को पूरा करने का है।
उनका संदेश था कि देश के विकास की यात्रा में सरकार, संगठन और जनता सभी की भूमिका है। यदि 140 करोड़ भारतीय मिलकर प्रयास करें तो विकसित भारत का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
उन्होंने कार्यकर्ताओं और देशवासियों में विश्वास जगाते हुए कहा कि लक्ष्य बड़ा हो सकता है, चुनौतियां कठिन हो सकती हैं, लेकिन यदि संकल्प मजबूत हो तो रास्ता निकाला जा सकता है।
25 साल की यात्रा में पद बदलते रहे, जिम्मेदारियां बढ़ती रहीं, लेकिन मां की सीख और देशसेवा का संकल्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में आज भी उसी तरह कायम है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


