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- 13h ago
नई दिल्ली। ऐतिहासिक लालकिला मैदान में आयोजित लवकुश रामलीला के तीसरे दिन भक्ति, रोमांच, शौर्य और भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। रामलीला के मंच पर जैसे ही भगवान श्रीराम ने भगवान शिव के विशाल धनुष को उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ाई, धनुष के टूटने की गूंज के साथ पूरा मैदान ‘जय श्रीराम’ और ‘सियावर रामचंद्र की जय’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। हजारों दर्शकों की तालियों, ढोल-नगाड़ों की गूंज और फूलों की वर्षा के बीच सीता स्वयंवर का दृश्य अत्यंत भव्य और भावपूर्ण बन गया। इसके बाद माता सीता द्वारा भगवान श्रीराम के गले में वरमाला डालने के दृश्य ने उपस्थित रामभक्तों को भावविभोर कर दिया।
तीसरे दिन की रामलीला में सीता स्वयंवर, शिव धनुष भंग और भगवान परशुराम तथा लक्ष्मण के बीच हुए तीखे संवादों का प्रभावशाली मंचन किया गया। कलाकारों के सशक्त अभिनय, आकर्षक वेशभूषा, आधुनिक प्रकाश व्यवस्था और प्रभावशाली ध्वनि संयोजन ने प्राचीन रामायण के प्रसंगों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। मंच पर प्रस्तुत प्रत्येक दृश्य ने दर्शकों को त्रेतायुग की कथा से जोड़ने का प्रयास किया। बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं और रामभक्तों ने पूरे उत्साह के साथ मंचन का आनंद लिया।
लवकुश रामलीला कमेटी के अध्यक्ष अर्जुन कुमार ने बताया कि सीता स्वयंवर का प्रसंग रामलीला के सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक दृश्यों में से एक रहा। राजा जनक के दरबार में माता सीता के स्वयंवर के लिए देश-देशांतर से अनेक राजा और वीर पहुंचे थे। स्वयंवर की शर्त के अनुसार भगवान शिव के विशाल धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ानी थी। अनेक राजाओं ने अपनी शक्ति और पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए धनुष उठाने का प्रयास किया, लेकिन कोई भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका।
एक के बाद एक राजाओं की विफलता से राजा जनक निराश हो गए। उन्होंने व्यथित होकर कहा कि क्या पृथ्वी वीरों से खाली हो गई है, जो कोई भी इस धनुष को उठाने में समर्थ नहीं है। राजा जनक की चिंता और दरबार में छाए निराशा के वातावरण के बीच गुरु विश्वामित्र ने भगवान श्रीराम को आगे बढ़ने की आज्ञा दी।
गुरु की आज्ञा पाकर भगवान श्रीराम ने पूरी विनम्रता और सहजता के साथ शिव धनुष को उठाया। उन्होंने जैसे ही उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया, धनुष टूट गया। धनुष भंग होने की तेज ध्वनि के साथ ही रामलीला मैदान में उपस्थित दर्शकों ने जोरदार जयकारे लगाए। पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया और लोगों ने खड़े होकर भगवान श्रीराम के जयघोष किए।
इस दृश्य को मंच पर जिस भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया, उसने दर्शकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। प्रकाश और ध्वनि के संयोजन से धनुष टूटने के क्षण को प्रभावशाली बनाया गया। दर्शकों की तालियों और जयकारों ने आयोजन की रौनक को और बढ़ा दिया।
शिव धनुष भंग होने के बाद सीता स्वयंवर का सबसे भावपूर्ण क्षण आया, जब माता सीता ने भगवान श्रीराम के गले में वरमाला डालकर उनका वरण किया। इस दृश्य के साथ ही रामलीला परिसर में उत्सव जैसा माहौल बन गया। मंच पर सजे फूलों, रंग-बिरंगी रोशनी और आकर्षक सजावट ने विवाह प्रसंग को भव्य स्वरूप प्रदान किया।
वरमाला उत्सव के दौरान फूलों की वर्षा की गई और ढोल-नगाड़ों की ध्वनि के बीच दर्शकों ने जय श्रीराम के उद्घोष किए। भगवान श्रीराम और माता सीता के स्वरूप में सजे कलाकारों ने अपने अभिनय से प्रसंग की गरिमा को बनाए रखा। दर्शकों ने तालियां बजाकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।
सीता स्वयंवर का यह प्रसंग रामायण में धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन मूल्यों का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। मंचन के माध्यम से भगवान श्रीराम की विनम्रता, गुरु के प्रति सम्मान और माता सीता के स्वयंवर की परंपरा को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया।
रामलीला के इस दृश्य ने बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी दर्शकों को आकर्षित किया। परिवारों के साथ पहुंचे लोगों ने पूरे उत्साह के साथ आयोजन देखा और कलाकारों के अभिनय की सराहना की।
सीता स्वयंवर के बाद रामलीला का वातावरण उस समय और अधिक रोमांचक हो गया, जब शिव धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम जनक दरबार पहुंच गए। भगवान शिव के धनुष के भंग होने की जानकारी मिलते ही उनका क्रोध प्रकट हुआ। इसके बाद भगवान परशुराम और लक्ष्मण के बीच तीखे संवादों का मंचन किया गया।
लक्ष्मण ने अपने निर्भीक स्वभाव और व्यंग्यपूर्ण उत्तरों से परशुराम के क्रोध को और बढ़ा दिया। दोनों पात्रों के बीच संवादों का आदान-प्रदान दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा। कलाकारों ने अपने हाव-भाव, संवाद अदायगी और प्रभावशाली अभिनय के जरिए इस प्रसंग में मौजूद तनाव और नाटकीयता को जीवंत कर दिया।
भगवान परशुराम के क्रोध और लक्ष्मण के साहस के बीच भगवान श्रीराम ने विनम्रता और संयम का परिचय दिया। उन्होंने मधुर वाणी तथा सम्मानपूर्ण व्यवहार से स्थिति को शांत करने का प्रयास किया। इस दृश्य में जहां लक्ष्मण के आत्मविश्वास और निर्भीकता को दर्शाया गया, वहीं श्रीराम के आचरण के माध्यम से धैर्य, विवेक और मर्यादा का महत्व भी सामने आया।
परशुराम-लक्ष्मण संवाद रामलीला के उन प्रसंगों में शामिल है, जिनमें वीरता के साथ वाणी के प्रभाव और परिस्थितियों को समझने की क्षमता का भी विशेष महत्व है। मंचन के दौरान कलाकारों के संवादों पर दर्शकों की प्रतिक्रियाएं लगातार मिलती रहीं। कहीं तालियां बजीं तो कहीं दर्शक संवादों की प्रभावशाली प्रस्तुति में पूरी तरह डूबे नजर आए।
लालकिला मैदान में आयोजित लवकुश रामलीला में पारंपरिक धार्मिक प्रसंगों को आधुनिक तकनीक के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है। आकर्षक मंच सज्जा, रंगीन रोशनी, प्रभावशाली ध्वनि व्यवस्था और कलाकारों की वेशभूषा ने आयोजन को विशेष स्वरूप दिया।
सीता स्वयंवर के दौरान मंच पर दिखाई गई राजदरबार की भव्यता और शिव धनुष भंग के दृश्य में ध्वनि प्रभावों ने दर्शकों को आकर्षित किया। वहीं परशुराम-लक्ष्मण संवाद में कलाकारों की संवाद अदायगी और मंचीय प्रस्तुति ने नाटकीय प्रभाव को और गहरा किया।
आयोजन की खासियत यह रही कि धार्मिक आस्था और मनोरंजन के साथ रामायण के प्रसंगों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। आधुनिक मंच तकनीक के माध्यम से पारंपरिक कथा को इस तरह प्रस्तुत किया गया कि दर्शक उसके भावनात्मक और सांस्कृतिक पक्ष से जुड़ सकें।
रामलीला देखने पहुंचे दर्शकों के लिए यह आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर भी बना। मंच पर प्रस्तुत प्रसंगों ने परिवारों के साथ आए बच्चों और युवाओं को रामायण की महत्वपूर्ण घटनाओं से परिचित कराने में भूमिका निभाई।
लवकुश रामलीला कमेटी के महासचिव सुभाष गोयल ने बताया कि तीसरे दिन केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले सहित कई गणमान्य अतिथियों ने रामलीला में पहुंचकर मंचन देखा। इस अवसर पर आयोजन की भव्यता और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व आकर्षण का केंद्र रहा।
सुभाष गोयल ने कहा कि कमेटी का उद्देश्य आधुनिक तकनीक और भव्य प्रस्तुतियों के माध्यम से नई पीढ़ी को भगवान श्रीराम के आदर्शों, भारतीय संस्कृति और रामायण की शिक्षाओं से जोड़ना है। उन्होंने बताया कि रामलीला की परंपरा भारतीय समाज में लंबे समय से धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करती रही है।
उनके अनुसार, रामलीला के माध्यम से भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े आदर्शों को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है, ताकि दर्शक कथा के साथ-साथ उसके नैतिक और सामाजिक संदेशों को भी समझ सकें। वर्तमान समय में आधुनिक तकनीक के उपयोग से इन प्रस्तुतियों को अधिक आकर्षक बनाया जा रहा है, जिससे युवाओं और बच्चों की रुचि भी बढ़े।
रामलीला भारतीय लोकनाट्य परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके माध्यम से रामायण की कथा को अभिनय, संवाद, संगीत और मंचन के जरिए जन-जन तक पहुंचाया जाता है। भगवान श्रीराम का जीवन सत्य, कर्तव्य, विनम्रता, त्याग और मर्यादा जैसे आदर्शों से जुड़ा हुआ है, जबकि लक्ष्मण का चरित्र साहस, निष्ठा और भाई के प्रति समर्पण का संदेश देता है।
सीता स्वयंवर का प्रसंग गुरु के प्रति सम्मान और विनम्रता के महत्व को सामने लाता है। वहीं परशुराम-लक्ष्मण संवाद यह दर्शाता है कि कठिन परिस्थितियों में साहस के साथ विवेक और संयम बनाए रखना भी आवश्यक है। भगवान श्रीराम का व्यवहार यह संदेश देता है कि शक्ति और पराक्रम के साथ विनम्रता का होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
लालकिला मैदान में आयोजित रामलीला में इन प्रसंगों की प्रस्तुति ने दर्शकों को धार्मिक आस्था के साथ जीवन मूल्यों पर विचार करने का अवसर दिया। कलाकारों के अभिनय और मंच की भव्यता ने कथा के भावनात्मक पक्ष को प्रभावशाली बनाया।
लवकुश रामलीला के तीसरे दिन शिव धनुष भंग, सीता स्वयंवर और परशुराम-लक्ष्मण संवाद दर्शकों के लिए प्रमुख आकर्षण बने रहे। भगवान श्रीराम के धनुष तोड़ते ही गूंजे जयकारों से लेकर माता सीता के वरमाला उत्सव और परशुराम-लक्ष्मण के तीखे संवादों तक, पूरे मंचन में भक्ति और रोमांच का वातावरण बना रहा।
बड़ी संख्या में पहुंचे रामभक्तों ने कलाकारों के अभिनय और आयोजन की भव्यता का आनंद लिया। फूलों की सजावट, रोशनी, ध्वनि प्रभाव और मंच संचालन ने धार्मिक प्रसंगों को प्रभावशाली रूप दिया।
लवकुश रामलीला कमेटी की ओर से आधुनिक तकनीक के माध्यम से भारतीय संस्कृति और रामायण की शिक्षाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास जारी है। लालकिला मैदान में आयोजित यह रामलीला एक बार फिर धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक रंगमंच के संगम के रूप में सामने आई।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


