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- 13h ago
नई दिल्ली। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने देश के लाइफ साइंसेज उद्योग और वैज्ञानिक समुदाय से ऐसी स्वास्थ्य तकनीक, दवाएं और उपचार विकसित करने का आह्वान किया है, जिनका सीधा लाभ मरीजों तक पहुंच सके। उन्होंने कहा कि किसी वैज्ञानिक खोज की सफलता केवल प्रयोगशाला में नए शोध या आविष्कार तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि वह खोज कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी ढंग से प्रयोगशाला से निकलकर मरीज के बिस्तर तक पहुंचती है।
एफआईसीसीआई और एली लिली एंड कंपनी (इंडिया) की ओर से आयोजित पहले भारत लाइफ साइंसेज अवॉर्ड समारोह में वीडियो संदेश के माध्यम से संबोधित करते हुए नड्डा ने कहा कि देश में वैज्ञानिक क्षमता, अनुसंधान प्रतिभा और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी औद्योगिक क्षमता लगातार मजबूत हो रही है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन क्षमताओं को मरीज-केंद्रित नवाचार से जोड़ा जाए।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक प्रगति का अंतिम उद्देश्य आम नागरिक के जीवन में सुधार लाना होना चाहिए। उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं समाज के अंतिम व्यक्ति तक समय पर, सुलभ और किफायती तरीके से पहुंचें, यही स्वास्थ्य क्षेत्र में होने वाले नवाचार का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।
नड्डा ने लाइफ साइंसेज क्षेत्र के लिए ‘बेंच से बेडसाइड’ की अवधारणा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रयोगशालाओं में होने वाली खोजों को केवल शोध पत्रों और वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। शोध का परिणाम नई दवाओं, बेहतर उपचार पद्धतियों, सस्ती चिकित्सा तकनीक, प्रभावी वैक्सीन और मरीजों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के रूप में सामने आना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत के पास दुनिया के बड़े वैज्ञानिक प्रतिभा समूहों में से एक है। देश में फार्मास्युटिकल निर्माण, वैक्सीन उत्पादन और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में मजबूत आधार तैयार हुआ है। ऐसे में अगला चरण वैज्ञानिक खोज और उसके व्यावसायिक तथा चिकित्सकीय इस्तेमाल के बीच की दूरी को कम करना है।
केंद्रीय मंत्री ने आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत पांच लाख रुपये के वार्षिक स्वास्थ्य कवर का उल्लेख करते हुए कहा कि इस योजना ने देश में स्वास्थ्य सुरक्षा के दायरे को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने 70 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक तक योजना के विस्तार का भी जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार की पहलों के साथ-साथ निजी क्षेत्र, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जब वैज्ञानिक क्षमता को स्पष्ट सार्वजनिक उद्देश्य के साथ जोड़ा जाता है, तो उसका प्रभाव समाज के बड़े हिस्से तक पहुंच सकता है।
नड्डा ने भारत की बढ़ती बायोइकोनॉमी, फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरिंग और वैक्सीन क्षमता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने यह साबित किया है कि मजबूत वैज्ञानिक आधार और स्पष्ट राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ बड़े स्तर पर उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। उन्होंने बायोफार्मा शक्ति जैसी पहलों को भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
पहले भारत लाइफ साइंसेज अवॉर्ड के लिए देशभर से 500 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए। पुरस्कारों के लिए वैज्ञानिक उत्कृष्टता, नवाचार, प्रमाण, भारत के लिए प्रासंगिकता और संभावित प्रभाव जैसे विभिन्न मानकों को आधार बनाया गया।
विजेताओं के चयन की प्रक्रिया में स्वतंत्र मूल्यांकन किया गया। पुरस्कारों के साथ कुल सात करोड़ रुपये की ग्रांट सहायता प्रदान की गई। प्रक्रिया सलाहकार के रूप में ग्रांट थॉर्नटन भारत की भागीदारी रही।
आयोजकों के मुताबिक, पुरस्कारों का उद्देश्य केवल वैज्ञानिकों और संस्थानों को सम्मानित करना नहीं है, बल्कि ऐसे अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना भी है, जिनका वास्तविक प्रभाव स्वास्थ्य सेवाओं और मरीजों के जीवन पर पड़ सके।
रामानुजन आरोग्य उड़ान सम्मान (युवा वैज्ञानिक):
डॉ. वामसी मल्लाजोस्युला, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज को यह सम्मान दिया गया। डॉ. भारती भाटिया रनर-अप रहीं।
चरक आरोग्य सम्मान (अनसुलझी मरीज जरूरतों के समाधान में नवाचार):
पैसिफाई मेडिकल टेक्नोलॉजीज को सम्मानित किया गया।
सुश्रुत आरोग्य सम्मान (ट्रांसलेशनल एवं क्लिनिकल प्रगति):
भारत सीरम्स एंड वैक्सीन्स (बीएसवी-मैनकाइंड) को यह सम्मान मिला।
नालंदा आरोग्य विज्ञान सम्मान (वैज्ञानिक उत्कृष्टता संस्थान):
ब्रिक-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स को सम्मान मिला, जबकि एलवी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट रनर-अप रहा।
जीवक आरोग्य नवप्रवर्तन गौरव:
साइवर्स सॉल्यूशंस को यह सम्मान दिया गया।
सराभाई आरोग्य दृष्टि गौरव:
डॉ. रत्नेश जैन, इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी, मुंबई बायोक्लस्टर को सम्मानित किया गया।
नीति आयोग के सदस्य प्रो. गोबर्धन दास ने कहा कि भारत को नई दवाओं और वैक्सीन की मजबूत पाइपलाइन तैयार करने की दिशा में और तेजी से काम करना होगा। उन्होंने कहा कि देश में वैज्ञानिक शोध के स्तर पर महत्वपूर्ण काम हो रहा है, लेकिन प्रयोगशाला में विकसित होने वाली कई खोजें उत्पादन और बाजार तक नहीं पहुंच पातीं।
उन्होंने अकादमिक संस्थानों और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी को इस चुनौती का समाधान बताया। उनके मुताबिक, वैज्ञानिक संस्थानों में मौजूद ज्ञान और उद्योग की उत्पादन क्षमता को एक साथ लाने से नई तकनीकों और उत्पादों को मरीजों तक पहुंचाने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भारतीय क्षमता का इस्तेमाल लाइफ साइंसेज और ड्रग डिस्कवरी के क्षेत्र में करने पर भी जोर दिया। एआई आधारित तकनीकों से दवा खोज, डेटा विश्लेषण, संभावित उपचारों की पहचान और अनुसंधान की गति बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
फार्मास्युटिकल्स विभाग के सचिव मनोज जोशी ने लाइफ साइंस मैन्युफैक्चरिंग सत्र में भारत में बायोलॉजिक्स निर्माण की बढ़ती क्षमता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पिछले दो-तीन वर्षों में देश में बायोलॉजिक्स संयंत्रों की संख्या बढ़ी है और वैश्विक कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में भी अवसर बढ़ रहे हैं।
हालांकि, उन्होंने लाइफ साइंस उद्योग की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि मीडिया, रेजिन, सेल लाइन और एंजाइम जैसे महत्वपूर्ण इनपुट के लिए भारत की यूरोपीय आपूर्तिकर्ताओं पर भारी निर्भरता एक चुनौती है।
उन्होंने कहा कि देश में मजबूत और आत्मनिर्भर बायोफार्मा वैल्यू चेन तैयार करने की जरूरत है। बायोफार्मा शक्ति के तहत नियामकीय मंजूरियों, विनिर्माण क्षमता और आवश्यक इनपुट समेत पूरी वैल्यू चेन को समर्थन देने पर जोर दिया जाएगा।
ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी ने कहा कि भारत को केवल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में अपनी पहचान मजबूत करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि देश को इनोवेशन हब बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
उन्होंने नवाचार और सहयोग को जरूरी बताते हुए कहा कि उद्योग और नियामक के बीच शुरुआती स्तर पर संवाद होना चाहिए। उनके मुताबिक, नियामकीय रणनीति को किसी उत्पाद के विकास की अंतिम प्रक्रिया नहीं, बल्कि शुरुआत से ही विकास की मूल रणनीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
इससे नए उत्पादों और उपचार तकनीकों के विकास में समय कम करने और नियामकीय प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट तथा पूर्वानुमेय बनाने में मदद मिल सकती है।
एफआईसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष पंकज पटेल ने भारत की स्वास्थ्य और फार्मास्युटिकल क्षमता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश पर दुनिया के बीमारी के बोझ का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि वैश्विक क्लिनिकल ट्रायल में भारत की हिस्सेदारी करीब चार प्रतिशत है।
उन्होंने कहा कि भारत मात्रा के लिहाज से दुनिया की फार्मेसी के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है, लेकिन खोज और नवाचार के क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं मौजूद हैं। उन्होंने अनुसंधान एवं विकास पर निवेश बढ़ाने की जरूरत बताई।
पटेल ने आरएंडडी निवेश को करीब पांच प्रतिशत से बढ़ाकर 8-10 प्रतिशत करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने 200 प्रतिशत आरएंडडी टैक्स डिडक्शन बहाल करने, तेज और पूर्वानुमेय नियामकीय प्रक्रियाएं विकसित करने तथा भारत में विकसित नवाचारों के लिए सरकार को शुरुआती ग्राहक बनाने की दिशा में कदम उठाने का सुझाव दिया।
उनके मुताबिक, भारत में विकसित नई तकनीकों और उत्पादों को शुरुआती स्तर पर घरेलू बाजार उपलब्ध होने से शोधकर्ताओं और कंपनियों को अपने नवाचार को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
एली लिली के चेयरमैन एवं सीईओ डेविड ए. रिक्स ने भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा की सराहना करते हुए कहा कि देश वैश्विक लाइफ साइंसेज नवाचार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने भारत में मौजूद वैज्ञानिक प्रतिभा, तकनीकी क्षमता और अनुसंधान के अवसरों को वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक, भारत की भूमिका केवल दवाओं के निर्माण तक सीमित न रहकर नई खोज और नवाचार के क्षेत्र में भी बढ़ सकती है।
एफआईसीसीआई के महासचिव अनंत स्वरूप ने कहा कि भारत लाइफ साइंसेज अवॉर्ड का उद्देश्य वैज्ञानिक उपलब्धियों और नवाचार को पहचान देने के साथ-साथ अगली पीढ़ी के वैज्ञानिकों और उद्यमियों को प्रेरित करना भी है।
इनोवेशन समिट में 50 से अधिक वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, 100 से ज्यादा सीईओ और करीब 1,200 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन में लाइफ साइंसेज क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।
मैन्युफैक्चरिंग, एआई आधारित ड्रग डिस्कवरी, वैक्सीन प्लेटफॉर्म, वैज्ञानिक अनुसंधान, क्लिनिकल विकास, नियामकीय व्यवस्था और भारत में लाइफ साइंस उद्योग के विस्तार जैसे विषय चर्चा के केंद्र में रहे।
विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि आने वाले वर्षों में लाइफ साइंसेज क्षेत्र में भारत की भूमिका केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। नई दवाओं की खोज, अत्याधुनिक वैक्सीन, जैविक उपचार, डिजिटल हेल्थ और एआई आधारित वैज्ञानिक अनुसंधान में भी देश की क्षमता का विस्तार आवश्यक है।
केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि लाइफ साइंसेज के क्षेत्र में हो रही प्रगति का अंतिम लाभ देश के नागरिकों तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक समुदाय, उद्योग, सरकार और नियामक संस्थाओं को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जिसमें प्रयोगशाला में विकसित होने वाली खोजें मरीजों के लिए उपयोगी उत्पाद और उपचार में बदल सकें।
उन्होंने कहा कि भारत के सामने अवसर केवल अपनी वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षमता बढ़ाने का नहीं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करने का भी है जिसमें बेहतर उपचार अधिक लोगों तक पहुंच सके।
नड्डा के मुताबिक, लाइफ साइंसेज में सामूहिक जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि अनुसंधान और नवाचार से पैदा होने वाली प्रगति देश के नागरिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर पहुंच और बेहतर परिणाम में परिवर्तित हो।
यही वह कड़ी है जो प्रयोगशाला की वैज्ञानिक उपलब्धि को मरीज के जीवन में वास्तविक बदलाव से जोड़ती है। भारत की लाइफ साइंसेज यात्रा में अब चुनौती केवल नई खोज करना नहीं, बल्कि उस खोज को तेजी से विकसित कर मरीज तक पहुंचाना भी है।


