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- 13h ago
नई दिल्ली। घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों से उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने प्रमुख आयातित कच्चे खाद्य तेलों पर मूल सीमा शुल्क (बीसीडी) में कटौती कर दी है। सरकार के इस फैसले का सीधा उद्देश्य आयातित खाद्य तेलों की लागत को कम करना, घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी के कारण पैदा हुए महंगाई के दबाव को नियंत्रित करना है। सरकार ने कच्चे खाद्य तेलों के साथ-साथ संबंधित परिष्कृत खाद्य तेलों पर लागू शुल्क में भी बदलाव किया है।
सरकार के निर्णय के बाद कच्चे सूरजमुखी तेल पर बीसीडी 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया गया है। वहीं कच्चे सोयाबीन तेल और कच्चे पाम तेल पर मूल सीमा शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ संबंधित परिष्कृत खाद्य तेलों पर भी शुल्क में कमी की गई है। सरकार ने कच्चे और परिष्कृत खाद्य तेलों के बीच शुल्क अंतर को 19.25 प्रतिशत पर बनाए रखा है।
खाद्य तेलों की घरेलू कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति का सीधा असर पड़ता है। भारत अपनी घरेलू मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर आयात लागत बढ़ती है और उसका असर घरेलू बाजार में भी दिखाई देता है।
हाल के समय में अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल बाजार में कीमतों में तेजी के कारण आयातित तेलों की लागत बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों पर दबाव बना। सरकार ने इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए आयात शुल्क में युक्तिकरण का फैसला किया है।
सरकार का मानना है कि आयात शुल्क में कमी से आयातित कच्चे खाद्य तेल की लागत कम होगी। इससे आयातकों और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला पर लागत का दबाव घट सकता है और इसका लाभ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचने की उम्मीद है।
इस फैसले में कच्चे सूरजमुखी तेल पर शुल्क में सबसे बड़ी कटौती की गई है। इसका मूल सीमा शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया गया है। इससे सूरजमुखी तेल के आयात की लागत में कमी आने की संभावना है।
सूरजमुखी तेल का इस्तेमाल देशभर में बड़ी संख्या में परिवारों में खाना पकाने के लिए किया जाता है। ऐसे में सरकार को उम्मीद है कि आयात लागत कम होने का असर घरेलू बाजार की कीमतों पर भी पड़ेगा।
हालांकि खुदरा बाजार में वास्तविक कीमतों में कमी कितनी होगी, यह अंतरराष्ट्रीय कीमतों, विनिमय दर, परिवहन लागत, घरेलू आपूर्ति, भंडारण और कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगा।
कच्चे सोयाबीन तेल और कच्चे पाम तेल पर भी बीसीडी में कमी की गई है। दोनों पर लागू मूल सीमा शुल्क को 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत किया गया है।
सोयाबीन और पाम तेल भारतीय खाद्य तेल बाजार के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इन दोनों तेलों के आयात की लागत में कमी से घरेलू खाद्य तेल बाजार में आपूर्ति और कीमतों पर असर पड़ सकता है।
सरकार की कोशिश है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी कीमतों का पूरा दबाव घरेलू उपभोक्ताओं पर न पड़े और शुल्क नीति के माध्यम से लागत में कुछ राहत दी जा सके।
सरकार ने शुल्क में कटौती करते समय घरेलू खाद्य तेल शोधन उद्योग के हितों को भी ध्यान में रखा है। इसी वजह से कच्चे और परिष्कृत खाद्य तेलों के बीच 19.25 प्रतिशत का शुल्क अंतर बरकरार रखा गया है।
इसका उद्देश्य केवल सस्ता परिष्कृत तेल आयात करके घरेलू रिफाइनरियों पर दबाव बढ़ने की स्थिति को रोकना है। कच्चे तेल के आयात और देश में उसके शोधन को प्रोत्साहन मिलने से घरेलू उद्योग में मूल्यवर्धन की प्रक्रिया जारी रहने की उम्मीद है।
सरकार के इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू घरेलू शोधन क्षमता का इस्तेमाल बढ़ाना भी है। यदि कच्चे खाद्य तेल को आयात करके देश में ही उसका शोधन किया जाता है तो इससे घरेलू रिफाइनिंग उद्योग, पैकेजिंग, परिवहन और संबंधित आपूर्ति श्रृंखला में आर्थिक गतिविधियां बनी रहती हैं।
सरकार ने परिष्कृत तेल के मुकाबले कच्चे तेल के आयात को अपेक्षाकृत प्रोत्साहन देने वाली शुल्क संरचना बनाए रखने की कोशिश की है। इससे घरेलू रिफाइनरों को प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मिल सकती है और देश में खाद्य तेल के क्षेत्र में मूल्यवर्धन को बढ़ावा मिल सकता है।
केवल आयात शुल्क घटाने के साथ सरकार ने यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि शुल्क कटौती का लाभ बाजार में दिखाई दे। इसके लिए खाद्य तेल संघों और उद्योग के हितधारकों को सलाह जारी की गई है।
सरकार ने उद्योग से कहा है कि लागत में आई कमी के अनुरूप डिस्ट्रीब्यूटर के लिए कीमत (पीटीडी) और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) में तत्काल संशोधन किया जाए।
खाद्य तेल संघों से भी अपने सदस्यों को संबंधित मूल्य कटौती बिना देरी लागू करने की सलाह देने का अनुरोध किया गया है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सरकार द्वारा शुल्क में दी गई राहत केवल आयात और थोक स्तर तक सीमित न रहे, बल्कि खुदरा बाजार में भी उसका लाभ उपभोक्ताओं को मिले।
खाद्य तेल आम परिवारों के दैनिक घरेलू खर्च का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए खाद्य तेलों की कीमतों में बदलाव का असर सीधे घरेलू बजट पर पड़ता है। कीमतों में बढ़ोतरी से न केवल खाना पकाने की लागत बढ़ती है, बल्कि इससे समग्र खाद्य मुद्रास्फीति पर भी दबाव पड़ सकता है।
सरकार का यह कदम खाद्य कीमतों में वृद्धि से उत्पन्न दबाव को कम करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। आयात लागत में कमी से बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि खाद्य तेलों पर शुल्क नीति बनाते समय केवल उपभोक्ताओं के हित को ही नहीं, बल्कि किसानों और घरेलू खाद्य तेल उद्योग के हितों को भी ध्यान में रखा जाएगा।
भारत में तिलहन उत्पादन बढ़ाना सरकार की दीर्घकालिक प्राथमिकताओं में रहा है। वहीं घरेलू खाद्य तेल प्रसंस्करण और रिफाइनिंग उद्योग भी आयात शुल्क व्यवस्था से प्रभावित होता है। ऐसे में शुल्क संरचना में बदलाव करते समय उपभोक्ता कीमतों, घरेलू उद्योग और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
सरकार ने संकेत दिया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार और घरेलू कीमतों पर लगातार निगरानी रखी जाएगी। परिस्थितियों में बदलाव होने पर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।
आयात शुल्क में कमी का पहला असर आयातित कच्चे खाद्य तेल की लागत पर पड़ने की संभावना है। इसके बाद इसका प्रभाव थोक बाजार और फिर खुदरा कीमतों पर दिखाई दे सकता है। हालांकि अंतिम खुदरा कीमत केवल सीमा शुल्क से तय नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमत, डॉलर-रुपया विनिमय दर, बंदरगाह से परिवहन, भंडारण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और वितरण लागत भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इसलिए शुल्क में कटौती से कीमतों में राहत की संभावना जरूर बनती है, लेकिन खुदरा बाजार में इसका वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
सरकार के इस फैसले से सबसे बड़ी उम्मीद घरेलू उपभोक्ताओं को राहत मिलने की है। यदि आयातित कच्चे तेल की लागत में कमी का पूरा लाभ आपूर्ति श्रृंखला के माध्यम से आगे पहुंचता है तो खाद्य तेल की खुदरा कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
विशेषज्ञों और बाजार से जुड़े कारोबारियों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि कंपनियां आयात लागत में कमी के बाद अपने थोक और खुदरा मूल्य में किस स्तर तक बदलाव करती हैं।
केंद्र सरकार ने कहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल बाजार में होने वाले घटनाक्रम और घरेलू बाजार की कीमतों पर लगातार नजर रखेगी। यदि वैश्विक कीमतों में फिर तेजी आती है या घरेलू बाजार में उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त दबाव बनता है तो परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।
सरकार की ओर से जारी सलाह का एक अहम उद्देश्य यह भी है कि शुल्क में कटौती का लाभ कंपनियों और वितरकों के स्तर पर अटकने के बजाय खुदरा उपभोक्ताओं तक पहुंचे।
कुल मिलाकर, आयात शुल्क में यह बदलाव खाद्य तेल की आयात लागत कम करने, घरेलू कीमतों पर दबाव घटाने और उपभोक्ताओं को राहत देने के साथ-साथ घरेलू रिफाइनिंग उद्योग को बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया है। अब इसकी वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतरराष्ट्रीय कीमतें किस दिशा में जाती हैं और शुल्क कटौती का लाभ बाजार की पूरी आपूर्ति श्रृंखला में कितनी तेजी से स्थानांतरित होता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


