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- 13h ago
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का असर अभी भले ही पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों पर पूरी तरह दिखाई नहीं दे रहा हो, लेकिन इसका दबाव अब भारत की औद्योगिक सप्लाई चेन में साफ नजर आने लगा है। महंगे कच्चे तेल ने पेट्रोकेमिकल और दूसरे औद्योगिक कच्चे माल की लागत बढ़ानी शुरू कर दी है। इसका असर प्लास्टिक, पैकेजिंग, निर्माण सामग्री और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े कारोबारों तक पहुंच रहा है।
सरकारी पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2026 में इंडियन क्रूड बास्केट का औसत भाव 115.48 डॉलर प्रति बैरल रहा। 24 सितंबर को भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत 123.67 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी।
दूसरी ओर, दिल्ली में सितंबर के अंत तक पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों में बदलाव नहीं हुआ। PPAC के अनुसार 28 सितंबर को दिल्ली में पेट्रोल ₹102.12 और डीजल ₹95.20 प्रति लीटर था।
यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हो रहा है, लेकिन उसका तत्काल असर उपभोक्ता के पेट्रोल पंप बिल पर नहीं, बल्कि कारोबारियों की लागत और सप्लाई चेन में दिखाई देने लगा है।
इंडियाMART के सितंबर 2026 मार्केटप्लेस इनसाइट्स के मुताबिक जुलाई से सितंबर के बीच कई औद्योगिक इनपुट की कीमतों में तेजी आई। इनमें पॉलीप्रोपाइलीन (PP) ग्रेन्यूल्स की कीमत सबसे ज्यादा बढ़ी।
प्लेटफॉर्म पर PP ग्रेन्यूल्स की मीडियन कोटेड कीमत जुलाई में ₹95 प्रति किलोग्राम थी, जो सितंबर में बढ़कर ₹125 प्रति किलोग्राम हो गई। यानी करीब 32 फीसदी की वृद्धि।
यह बढ़ोतरी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पॉलीप्रोपाइलीन पेट्रोकेमिकल उत्पाद है और इसके उत्पादन में कच्चे तेल तथा प्राकृतिक गैस से जुड़े फीडस्टॉक की भूमिका होती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज उछाल का असर इसके लागत ढांचे पर पड़ सकता है।
PP ग्रेन्यूल्स का इस्तेमाल कई तरह के प्लास्टिक उत्पादों, पैकेजिंग सामग्री और औद्योगिक वस्तुओं में किया जाता है। इसकी कीमत बढ़ने का असर केवल प्लास्टिक निर्माता तक सीमित नहीं रहता।
पैकेजिंग बनाने वाली कंपनियों से लेकर उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माताओं तक लागत बढ़ सकती है। यदि कंपनियां बढ़ी हुई लागत को आगे ग्राहकों तक पहुंचाती हैं तो इसका असर तैयार उत्पादों की कीमतों में भी दिखाई दे सकता है।
यही वजह है कि कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव को केवल पेट्रोल-डीजल के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। तेल की कीमतों का असर अर्थव्यवस्था में कई अलग-अलग रास्तों से पहुंचता है।
इंडियाMART के आंकड़ों में केवल पेट्रोकेमिकल उत्पादों में ही तेजी नहीं दिखी। TMT स्टील बार की कीमत जुलाई से सितंबर के बीच 13 फीसदी बढ़कर ₹55,362 प्रति टन हो गई।
निर्माण क्षेत्र में TMT स्टील बार की बड़ी भूमिका होती है। ऐसे में इसकी कीमत में बढ़ोतरी से निर्माण परियोजनाओं की लागत पर असर पड़ सकता है।
इमारतों, इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरे निर्माण कार्यों में स्टील एक महत्वपूर्ण इनपुट है। यदि स्टील की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो इसका असर परियोजनाओं के लागत अनुमान और कंपनियों के मार्जिन पर पड़ सकता है।
सितंबर के मार्केटप्लेस डेटा में MS पाइप और स्ट्रेच फिल्म की कीमतों में भी 8-8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
MS पाइप का इस्तेमाल निर्माण, औद्योगिक गतिविधियों और विभिन्न इंजीनियरिंग कार्यों में होता है। वहीं स्ट्रेच फिल्म पैकेजिंग और माल की पैकिंग से जुड़े कामों में इस्तेमाल होती है।
इस तरह अलग-अलग क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले इनपुट की कीमतों में एक साथ बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि लागत का दबाव केवल एक उद्योग तक सीमित नहीं है।
खुदरा बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहने से आम उपभोक्ता को तत्काल राहत जरूर मिल रही है, लेकिन दूसरी तरफ तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल की खुदरा बिक्री पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों और घरेलू खुदरा दरों के अंतर के कारण करीब ₹530 करोड़ प्रतिदिन के मार्केटिंग नुकसान का सामना कर रही हैं।
इस दबाव का एक और संकेत यह है कि कुछ निजी ईंधन विक्रेताओं ने डीजल की बिक्री पर सीमाएं लगाई थीं, क्योंकि औद्योगिक और थोक खरीदार खुदरा पंपों से अपेक्षाकृत सस्ता डीजल खरीदने लगे थे।
तेल बाजार में मौजूदा स्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू खुदरा और थोक डीजल कीमतों के बीच बढ़ता अंतर भी है। जब खुदरा पंप पर कीमत थोक बाजार की तुलना में कम हो जाती है तो औद्योगिक खरीदार खुदरा चैनल की ओर जा सकते हैं।
इससे पेट्रोल पंपों पर मांग और स्टॉक प्रबंधन का दबाव बढ़ सकता है। कुछ निजी कंपनियों द्वारा बिक्री सीमित करने की खबरें इसी दबाव से जुड़ी रही हैं।
केंद्र सरकार ने निजी ईंधन कंपनियों द्वारा बिक्री राशनिंग खत्म करने को कहा है। Reuters के अनुसार, सरकार ने 1 अक्टूबर को कहा कि ईंधन की बिक्री सीमित करना स्वीकार्य नहीं है और पहले से लागू निर्देशों का पालन होना चाहिए।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल रिफाइनरी या पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। तेल और गैस कई औद्योगिक प्रक्रियाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस्तेमाल होते हैं।
कच्चा तेल महंगा होने पर पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक की लागत बढ़ सकती है। इसके बाद प्लास्टिक, रबर, पैकेजिंग और विभिन्न औद्योगिक रसायनों की कीमतों पर असर पड़ सकता है।
इसके अलावा परिवहन लागत बढ़ने पर तैयार माल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की लागत भी बढ़ सकती है। इस तरह एक शुरुआती तेल झटका धीरे-धीरे कई उद्योगों के लागत ढांचे में फैल सकता है।
कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बढ़ी हुई लागत को किस हद तक ग्राहकों तक पहुंचाया जाए।
यदि कंपनी तैयार उत्पाद की कीमत बढ़ाती है तो मांग प्रभावित होने का जोखिम रहता है। लेकिन यदि वह कीमत नहीं बढ़ाती तो कच्चे माल की बढ़ी लागत उसके मुनाफे के मार्जिन को प्रभावित कर सकती है।
इसी वजह से लंबे समय तक ऊंचे इनपुट कॉस्ट रहने पर कंपनियों के सामने कीमत, उत्पादन और मार्जिन के बीच संतुलन बनाने की चुनौती पैदा हो सकती है।
बड़े उद्योगों के मुकाबले छोटे और मध्यम कारोबारियों के पास लागत बढ़ने की स्थिति से निपटने के विकल्प सीमित हो सकते हैं। कच्चे माल की कीमत अचानक बढ़ने पर उनके लिए सप्लायर से बेहतर दर हासिल करना या ग्राहक पर तुरंत कीमत बढ़ाना हमेशा आसान नहीं होता।
प्लास्टिक उत्पाद, पैकेजिंग, पाइप, इंजीनियरिंग सामान और निर्माण सामग्री से जुड़े छोटे कारोबारी बढ़ती इनपुट लागत के कारण अपने मार्जिन पर दबाव महसूस कर सकते हैं।
पैकेजिंग लागत का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि लगभग हर क्षेत्र में किसी न किसी रूप में पैकेजिंग की जरूरत होती है।
खाद्य पदार्थ, दवाएं, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े और ई-कॉमर्स से भेजे जाने वाले सामान तक में पैकेजिंग सामग्री का इस्तेमाल होता है।
अगर पैकेजिंग से जुड़े कच्चे माल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो कंपनियों के लिए यह एक अतिरिक्त लागत बन सकती है। हालांकि अंतिम उत्पाद की कीमतों पर कितना असर पड़ेगा, यह कंपनियों की लागत संरचना, प्रतिस्पर्धा और मांग की स्थिति पर निर्भर करेगा।
स्टील और अन्य निर्माण सामग्री की कीमतों में बढ़ोतरी का असर निर्माण क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। TMT बार के साथ पाइप और अन्य औद्योगिक सामग्री महंगी होने से परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है।
रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निर्माण सामग्री की लागत एक बड़ा हिस्सा होती है। इसलिए लंबे समय तक कीमतों में बढ़ोतरी रहने पर नई परियोजनाओं के लागत अनुमान की समीक्षा करनी पड़ सकती है।
सितंबर के अंत तक दिल्ली में पेट्रोल ₹102.12 और डीजल ₹95.20 प्रति लीटर पर था। सरकारी PPAC के आंकड़ों में यह दर 28 सितंबर तक स्थिर दर्ज हुई।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो तेल विपणन कंपनियों के वित्तीय दबाव का सवाल महत्वपूर्ण बना रहेगा। इससे भविष्य में घरेलू ईंधन कीमतों, कंपनियों के मार्जिन और सरकारी नीति पर चर्चा बढ़ सकती है।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत के अलावा रुपये-डॉलर विनिमय दर, टैक्स, रिफाइनिंग मार्जिन और घरेलू मूल्य निर्धारण जैसे कई कारक अंतिम पेट्रोल-डीजल कीमतों को प्रभावित करते हैं।
मौजूदा तस्वीर का सबसे अहम पहलू यही है कि कच्चे तेल की तेजी का प्रभाव सीधे पेट्रोल पंप पर दिखाई देने के बजाय पहले औद्योगिक कच्चे माल में नजर आ रहा है।
PP ग्रेन्यूल्स में 32 फीसदी की वृद्धि, TMT बार में 13 फीसदी और MS पाइप व स्ट्रेच फिल्म में 8 फीसदी की बढ़ोतरी बताती है कि लागत का दबाव सप्लाई चेन के भीतर बढ़ रहा है। इंडियाMART खुद इन आंकड़ों को विक्रेताओं की कोटेड कीमतों पर आधारित संकेतक बताता है, इसलिए इन्हें पूरे भारतीय अर्थव्यवस्था के आधिकारिक मूल्य सूचकांक के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।
फिर भी ये आंकड़े यह दिखाते हैं कि तेल की महंगाई का असर कई बार पेट्रोल पंप तक पहुंचने से पहले ही उद्योगों के कच्चे माल, उत्पादन लागत और कारोबारी मार्जिन में दिखाई देने लगता है।
आने वाले दिनों में बाजार की नजर मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रुपये की विनिमय दर, घरेलू पेट्रोल-डीजल कीमतों, तेल कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन और औद्योगिक इनपुट की कीमतों पर रहेगी।
यदि कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो इसका असर धीरे-धीरे और अधिक क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। वहीं यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी आती है तो सप्लाई चेन पर बढ़ रहा लागत दबाव भी कम हो सकता है।
फिलहाल तस्वीर यह है कि पेट्रोल पंप पर कीमतें स्थिर हैं, लेकिन कारोबारियों के लिए कच्चे माल की बढ़ती लागत एक अलग मोर्चे पर दबाव बना रही है। यानी तेल की महंगाई का असर दिखाई जरूर दे रहा है—बस उसकी पहली दस्तक पेट्रोल पंप पर नहीं, बल्कि फैक्ट्री और सप्लाई चेन में सुनाई दे रही है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


