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- 13h ago
नई दिल्ली। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 2 अक्टूबर को जंतर-मंतर के आसपास हुए विरोध-प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस ने बड़ा कानूनी कदम उठाया है। पुलिस ने प्रदर्शन से जुड़े मामले में तीन प्राथमिकी दर्ज की हैं। इनमें दो FIR संसद मार्ग थाने में, जबकि एक FIR कनॉट प्लेस थाने में दर्ज की गई है। पुलिस के मुताबिक, मामले में फिलहाल किसी व्यक्ति या संगठन को नामजद आरोपी नहीं बनाया गया है। हालांकि FIR में प्रदर्शन का आह्वान करने वाले तथा उसमें शामिल संगठनों और आयोजकों से संबंधित विवरण दर्ज किए गए हैं।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, दर्ज मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत विधिवत जारी लोक सेवक के आदेश की कथित अवज्ञा का मामला शामिल है। पुलिस का कहना है कि नई दिल्ली जिले में पहले से लागू निषेधाज्ञा के बावजूद प्रदर्शनकारी निर्धारित प्रतिबंधों के बीच एकत्र होने और जंतर-मंतर की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहे थे।
यह प्रदर्शन मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहे विवाद की पृष्ठभूमि में हुआ। प्रदर्शन में छात्र संगठनों, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज से जुड़े कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की थी।
विरोध करने वाले समूहों ने SIR की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए और मतदाता सूची में संभावित अनियमितताओं तथा पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित होने से संबंधित चिंताएं उठाईं। हालांकि, इन आरोपों को लेकर निर्वाचन आयोग का अपना पक्ष है और आयोग ने विभिन्न मौकों पर प्रक्रिया से संबंधित स्पष्टीकरण दिए हैं। FIR में इन आरोपों पर निर्वाचन आयोग के पक्ष और उसके जवाबों का विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है।
इस तरह पुलिस की FIR मुख्य रूप से प्रदर्शन के दौरान लागू प्रशासनिक आदेशों के कथित उल्लंघन से संबंधित है, जबकि SIR को लेकर उठाए गए राजनीतिक और चुनावी सवाल इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि का हिस्सा हैं।
दिल्ली पुलिस ने 2 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए थे। इन आदेशों का उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखना, कानून-व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित करना और यातायात का सुचारू संचालन सुनिश्चित करना बताया गया था।
आदेश के तहत बिना पूर्व लिखित अनुमति के बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने, जुलूस निकालने, प्रदर्शन, धरना और नारेबाजी जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया था। पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और जंतर-मंतर तथा आसपास के इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किया गया था।
पुलिस का तर्क है कि जब निषेधाज्ञा लागू थी, तब उसके बावजूद प्रदर्शनकारियों द्वारा एकत्र होने या प्रदर्शन स्थल की ओर बढ़ने की कोशिश की गई। इसी आधार पर अब कानूनी कार्रवाई की गई है।
पुलिस अधिकारी के मुताबिक, प्रदर्शन से जुड़े अलग-अलग घटनाक्रम और थाना क्षेत्रों के आधार पर तीन प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। इनमें से दो संसद मार्ग थाने और एक कनॉट प्लेस थाने में दर्ज हुई है।
प्राथमिकी में BNS की धारा 223 के तहत सरकारी आदेश की कथित अवज्ञा का उल्लेख किया गया है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, FIR में किसी व्यक्ति या संगठन को आरोपी के तौर पर नामजद नहीं किया गया है। पुलिस ने हालांकि उन संगठनों और आयोजकों का विवरण केस रिकॉर्ड में शामिल किया है, जिन्होंने प्रदर्शन का आह्वान किया था या उसमें भाग लिया था।
इसका अर्थ यह है कि जांच के आगे बढ़ने के साथ पुलिस उपलब्ध वीडियो फुटेज, मौके की जानकारी और अन्य साक्ष्यों के आधार पर संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर सकती है।
2 अक्टूबर को गांधी जयंती के मौके पर नई दिल्ली इलाके में सुरक्षा व्यवस्था सामान्य दिनों की तुलना में काफी कड़ी रखी गई थी। जंतर-मंतर, संसद मार्ग, कनॉट प्लेस और आसपास के प्रमुख मार्गों पर बैरिकेडिंग की गई थी।
प्रस्तावित प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त बल तैनात किया था। यातायात को भी कुछ स्थानों पर नियंत्रित और डायवर्ट किया गया। दिल्ली पुलिस ने पहले ही लोगों को प्रतिबंधात्मक आदेशों का पालन करने की अपील की थी।
रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने के लिए पुलिस ने कई स्थानों पर बैरिकेड लगाए और बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया। अलग-अलग रिपोर्टों में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या अलग बताई गई है; इसलिए इसे लेकर एक ही निश्चित संख्या बताना उचित नहीं होगा।
प्रदर्शन में छात्र संगठनों के साथ राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता भी शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि मतदाता सूची में बदलाव और SIR की प्रक्रिया को लेकर उनके सवालों का समाधान होना चाहिए।
दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान कई राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई। इनमें आम आदमी पार्टी से जुड़े नेता तथा नागरिक समाज और छात्र संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।
हालांकि, पुलिस की कार्रवाई का तत्काल आधार प्रदर्शन का राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि लागू निषेधाज्ञा और प्रशासनिक आदेशों के कथित उल्लंघन को बताया गया है।
इस पूरे मामले में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के दृष्टिकोण अलग हैं। पुलिस का कहना है कि बिना अनुमति और प्रतिबंधात्मक आदेशों के बीच प्रदर्शन या भीड़ जुटाने की कोशिश कानून-व्यवस्था और यातायात व्यवस्था को प्रभावित कर सकती थी। इसी वजह से पहले से प्रतिबंध लगाए गए थे और उल्लंघन होने पर FIR दर्ज की गई।
दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे SIR और मतदाता सूचियों से जुड़े मुद्दों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाना चाहते थे। उनकी प्रमुख मांग मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की रही।
इसलिए अब जांच में यह महत्वपूर्ण होगा कि मौके पर किस प्रकार की गतिविधियां हुईं, किसने किन निर्देशों का उल्लंघन किया और अलग-अलग मामलों में किन लोगों की प्रत्यक्ष भूमिका सामने आती है।
तीनों FIR में फिलहाल किसी व्यक्ति या संगठन को आरोपी के रूप में नामजद नहीं किया गया है। पुलिस ने केस में प्रदर्शन से जुड़े संगठनों और आयोजकों का विवरण जरूर दर्ज किया है।
कानूनी प्रक्रिया के लिहाज से आगे की जांच में पुलिस घटनास्थल के वीडियो, पुलिस रिकॉर्ड, उपलब्ध फुटेज और अन्य साक्ष्यों का इस्तेमाल कर सकती है। यदि जांच के दौरान किसी व्यक्ति की भूमिका स्पष्ट होती है तो उसके संबंध में आगे कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
यानी अभी दर्ज FIR को लेकर सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि मामले दर्ज हो चुके हैं, लेकिन किसी व्यक्ति या संगठन को FIR में नामजद आरोपी नहीं बनाया गया है।
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। 2 अक्टूबर को मुंबई में भी मतदाता सूची में बदलाव और SIR को लेकर प्रदर्शन हुआ। वहां प्रदर्शनकारियों ने भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई।
राष्ट्रीय स्तर पर SIR को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है। विरोध करने वाले समूह प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं, जबकि निर्वाचन आयोग अपनी प्रक्रिया और मतदाता सूची से संबंधित कदमों के बारे में स्पष्टीकरण देता रहा है। इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक और नागरिक समूहों के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं।
तीन FIR दर्ज होने के बाद मामले की जांच आगे बढ़ेगी। पुलिस के सामने एक ओर प्रदर्शन के दौरान लागू प्रतिबंधात्मक आदेशों के उल्लंघन की जांच होगी, वहीं दूसरी ओर यह भी देखा जाएगा कि किन लोगों ने आयोजन की तैयारी की, किन लोगों ने मौके पर हिस्सा लिया और क्या किसी विशेष व्यक्ति की ओर से पुलिस या अन्य सरकारी अधिकारियों के काम में बाधा डालने जैसी गतिविधि हुई।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के मुताबिक FIR में किसी व्यक्ति या संगठन को आरोपी के तौर पर नामजद नहीं किया गया है। इसलिए आने वाले दिनों में पुलिस की जांच और उसके आधार पर होने वाली आगे की कार्रवाई इस मामले की दिशा तय करेगी।
जंतर-मंतर का यह घटनाक्रम अब केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह गया है। CEC के इस्तीफे की राजनीतिक मांग, SIR को लेकर उठाए जा रहे सवाल और पुलिस की ओर से लागू की गई निषेधाज्ञा—तीनों पहलू इस मामले में जुड़े हुए हैं।
पुलिस की ओर से दर्ज तीन FIR में तत्काल कानूनी आधार प्रतिबंधात्मक आदेशों के कथित उल्लंघन को बनाया गया है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों का मुद्दा मतदाता सूचियों की SIR प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। ऐसे में अब जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया यह स्पष्ट करेगी कि प्रदर्शन से जुड़े मामलों में पुलिस किन व्यक्तियों की भूमिका निर्धारित करती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


