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- 13h ago
नई दिल्ली। ऊपरी पाचन तंत्र से जुड़े कैंसर की समय रहते पहचान को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली और फुजीफिल्म इंडिया ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। दोनों संस्थानों ने 24 सितंबर को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित एंडोस्कोपी पर बहुकेंद्रीय रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए।
यह अध्ययन कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) सहयोग के तहत किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह वैज्ञानिक रूप से जांचना है कि एआई की सहायता से की जाने वाली हाई-डेफिनिशन व्हाइट लाइट एंडोस्कोपी, सामान्य हाई-डेफिनिशन व्हाइट लाइट एंडोस्कोपी की तुलना में पेट, भोजन नली और ऊपरी जठरांत्र संबंधी मार्ग के कैंसर के शुरुआती संकेतों को पहचानने में कितनी प्रभावी है।
ऊपरी जठरांत्र संबंधी कैंसर में भोजन नली और पेट से जुड़े कैंसर शामिल हैं। ऐसे मामलों में बीमारी की शुरुआती अवस्था में पहचान उपचार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एंडोस्कोपी के जरिए डॉक्टर पाचन तंत्र के अंदरूनी हिस्से को सीधे देखकर संदिग्ध स्थानों की पहचान कर सकते हैं।
अब एआई तकनीक को इस प्रक्रिया से जोड़कर यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि कंप्यूटर आधारित विश्लेषण डॉक्टरों को ऐसे सूक्ष्म बदलावों को पहचानने में कितनी अतिरिक्त सहायता दे सकता है, जो शुरुआती स्तर पर आसानी से नजरअंदाज हो सकते हैं।
इस अध्ययन का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसका उद्देश्य केवल एआई तकनीक का इस्तेमाल करना नहीं, बल्कि उसके प्रभाव को वैज्ञानिक और नियंत्रित तरीके से मापना है।
अध्ययन के दौरान एआई-सहायता प्राप्त एंडोस्कोपी और पारंपरिक हाई-डेफिनिशन व्हाइट लाइट एंडोस्कोपी के परिणामों की तुलना की जाएगी।
शोधकर्ता यह देखने का प्रयास करेंगे कि दोनों तरीकों में संदिग्ध घावों या शुरुआती कैंसर के संकेतों की पहचान में क्या अंतर सामने आता है। इसके साथ ही अध्ययन से यह समझने में मदद मिलेगी कि एंडोस्कोपी करने वाले चिकित्सकों के लिए एआई किस तरह एक सहायक उपकरण के रूप में काम कर सकती है।
यहां एआई को डॉक्टर का विकल्प बनाने के बजाय चिकित्सक की निर्णय प्रक्रिया में तकनीकी सहायता देने वाले माध्यम के रूप में परखा जा रहा है।
यह एक पैन-इंडिया मल्टीसेंटर अध्ययन होगा। यानी शोध केवल एक अस्पताल या एक शहर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के अलग-अलग चिकित्सा केंद्रों से मरीजों और एंडोस्कोपी संबंधी आंकड़ों को शामिल किया जाएगा।
बहुकेंद्रीय अध्ययन का एक महत्वपूर्ण लाभ यह होता है कि अलग-अलग अस्पतालों, चिकित्सकों और मरीजों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर तकनीक के प्रदर्शन का व्यापक मूल्यांकन किया जा सकता है।
इससे यह समझने में भी सहायता मिल सकती है कि एआई आधारित एंडोस्कोपी का उपयोग विभिन्न चिकित्सा संस्थानों और अलग-अलग परिस्थितियों में कितना प्रभावी रहता है।
इस शोध परियोजना का नेतृत्व एम्स नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रो. विनीत आहूजा और डॉ. अमित यादव करेंगे।
गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विशेषज्ञों के नेतृत्व में होने वाले इस अध्ययन में एंडोस्कोपी, कैंसर की शुरुआती पहचान और एआई तकनीक के बीच संबंध का व्यवस्थित मूल्यांकन किया जाएगा।
शोध से प्राप्त परिणामों के आधार पर यह समझने की कोशिश होगी कि एआई तकनीक डॉक्टरों को संदिग्ध क्षेत्रों की पहचान करने में कितनी मदद करती है और क्या इससे शुरुआती स्तर पर बीमारी पकड़ने की क्षमता में सुधार हो सकता है।
एंडोस्कोपी के दौरान डॉक्टर कैमरे की मदद से भोजन नली, पेट और पाचन तंत्र के संबंधित हिस्सों को देखते हैं। कई बार शुरुआती बीमारी में दिखाई देने वाले बदलाव बहुत छोटे या सूक्ष्म हो सकते हैं।
एआई आधारित कंप्यूटर सिस्टम एंडोस्कोपी के दौरान प्राप्त तस्वीरों या वीडियो फ्रेम का विश्लेषण कर संदिग्ध क्षेत्रों की पहचान में सहायता कर सकता है। यदि किसी स्थान पर संभावित असामान्यता दिखाई देती है, तो तकनीक चिकित्सक का ध्यान उस क्षेत्र की ओर आकर्षित कर सकती है।
हालांकि, एआई द्वारा किसी क्षेत्र को संदिग्ध बताए जाने का अर्थ अपने आप कैंसर की पुष्टि होना नहीं है। अंतिम चिकित्सकीय निर्णय विशेषज्ञ द्वारा लिया जाता है और आवश्यक होने पर बायोप्सी तथा पैथोलॉजी जैसे परीक्षणों से बीमारी की पुष्टि की जाती है।
कैंसर के उपचार में बीमारी का चरण एक महत्वपूर्ण कारक होता है। शुरुआती अवस्था में बीमारी का पता चलने पर मरीज के लिए उपलब्ध उपचार विकल्प अलग हो सकते हैं।
इसी कारण चिकित्सा क्षेत्र में ऐसे उपकरणों पर लगातार शोध हो रहा है, जो डॉक्टरों को बीमारी के शुरुआती संकेतों को अधिक व्यवस्थित ढंग से पहचानने में मदद कर सकें।
एम्स और फुजीफिल्म का यह अध्ययन इसी सवाल पर केंद्रित है कि क्या एआई तकनीक एंडोस्कोपी के दौरान शुरुआती असामान्यताओं की पहचान में अतिरिक्त सहायता दे सकती है।
चिकित्सा में किसी नई तकनीक को व्यापक रूप से अपनाने से पहले उसका वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक होता है। केवल यह दिखना पर्याप्त नहीं है कि कोई एआई सिस्टम संदिग्ध स्थानों को पहचान सकता है। यह भी देखना जरूरी है कि वह कितनी बार सही पहचान करता है और कितने मामलों में गलत संकेत देता है।
इसी वजह से रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल महत्वपूर्ण है। इसमें शोधकर्ता निर्धारित वैज्ञानिक पद्धति के तहत एआई-सहायता प्राप्त प्रक्रिया और पारंपरिक प्रक्रिया के परिणामों की तुलना कर सकेंगे।
अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर एआई की वास्तविक उपयोगिता का आकलन किया जाएगा।
एआई के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद इस तरह की तकनीक का उद्देश्य चिकित्सकीय विशेषज्ञता को समाप्त करना नहीं है। एंडोस्कोपी की प्रक्रिया, मरीज की स्थिति का आकलन, संदिग्ध स्थान से नमूना लेना और अंतिम निदान जैसे महत्वपूर्ण निर्णय प्रशिक्षित चिकित्सा विशेषज्ञों की भूमिका में आते हैं।
एआई का संभावित फायदा यह हो सकता है कि यह डॉक्टर को अतिरिक्त डिजिटल सहायता प्रदान करे और जांच के दौरान संदिग्ध क्षेत्रों की ओर ध्यान आकर्षित करने में मदद करे।
इस प्रकार भविष्य में एआई को डॉक्टर और तकनीक के सहयोगात्मक मॉडल के रूप में देखा जा सकता है।
एम्स और फुजीफिल्म का यह समझौता केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं है। फुजीफिल्म भारत में उन्नत एंडोस्कोपी तकनीक के विस्तार पर भी काम कर रही है।
कंपनी की ओर से हाल ही में अपना पहला ‘मेड इन इंडिया’ ईपी-6000 एंडोस्कोपी सिस्टम एम्स नई दिल्ली को समर्पित किया गया है। इससे भारत में चिकित्सा उपकरणों के स्थानीय निर्माण और उन्नत एंडोस्कोपी तकनीक की उपलब्धता से जुड़े प्रयासों को भी बल मिलता है।
नई तकनीक और क्लिनिकल रिसर्च के बीच सहयोग इस क्षेत्र में भविष्य के चिकित्सा अनुसंधान के लिए उपयोगी आधार तैयार कर सकता है।
भारत जैसे बड़े देश में कैंसर की जांच और उपचार की जरूरत बहुत व्यापक है। अलग-अलग क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता और विशेषज्ञ सेवाओं में अंतर को देखते हुए ऐसी तकनीकों का विकास महत्वपूर्ण माना जाता है, जो डॉक्टरों की क्षमता को बढ़ाने में मदद कर सकें।
यदि एआई आधारित एंडोस्कोपी की उपयोगिता शोध में प्रभावी साबित होती है, तो भविष्य में इसके इस्तेमाल को लेकर और अधिक अध्ययन किए जा सकते हैं। हालांकि, इसके व्यापक इस्तेमाल से पहले इसकी सटीकता, लागत, प्रशिक्षण, तकनीकी बुनियादी ढांचे और अलग-अलग चिकित्सा केंद्रों में प्रदर्शन जैसे पहलुओं का मूल्यांकन भी जरूरी होगा।
एआई आधारित चिकित्सा तकनीक का एक संभावित लाभ यह हो सकता है कि विशेषज्ञों को डिजिटल सहायता उपलब्ध कराई जा सके। हालांकि, इसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षित चिकित्सक, उच्च गुणवत्ता वाले एंडोस्कोपी उपकरण, इंटरनेट या डिजिटल बुनियादी ढांचा और विश्वसनीय तकनीकी व्यवस्था आवश्यक होगी।
यदि भविष्य में ऐसी प्रणालियां अलग-अलग स्तर के अस्पतालों में प्रभावी ढंग से लागू की जा सकीं, तो शुरुआती जांच की पहुंच बड़े शहरों से बाहर भी बढ़ाई जा सकती है।
फिलहाल यह अध्ययन इस दिशा में वैज्ञानिक प्रमाण जुटाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
एआई आधारित एंडोस्कोपी का सबसे महत्वपूर्ण संभावित प्रभाव जांच की प्रक्रिया में हो सकता है। यदि तकनीक डॉक्टर को छोटे या संदिग्ध घावों की पहचान में सहायता देती है, तो ऐसे क्षेत्रों की आगे जांच करने का अवसर बढ़ सकता है।
लेकिन मरीजों के लिए इसका वास्तविक लाभ अध्ययन के परिणामों पर निर्भर करेगा। केवल एआई उपलब्ध होने से कैंसर की पुष्टि या उपचार स्वतः संभव नहीं हो जाता। बीमारी की पुष्टि के लिए चिकित्सकीय जांच और आवश्यकता के अनुसार पैथोलॉजिकल परीक्षण जरूरी रहेंगे।
इसलिए इस तकनीक को स्क्रीनिंग और डायग्नोस्टिक प्रक्रिया में सहायक साधन के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
यदि बहुकेंद्रीय अध्ययन से सकारात्मक और विश्वसनीय परिणाम सामने आते हैं, तो भविष्य में एआई-सहायता प्राप्त एंडोस्कोपी पर बड़े स्तर पर अतिरिक्त शोध का रास्ता खुल सकता है।
इससे चिकित्सा संस्थानों को यह तय करने में भी मदद मिल सकती है कि किन परिस्थितियों में एआई आधारित एंडोस्कोपी को नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस में शामिल किया जा सकता है।
इसके विपरीत, यदि अध्ययन में तकनीक की सीमाएं सामने आती हैं, तो वे भी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी होंगी। इससे तकनीक को और बेहतर बनाने और उसके इस्तेमाल की उपयुक्त परिस्थितियां तय करने में मदद मिलेगी।
एम्स और फुजीफिल्म के बीच हुआ समझौता चिकित्सा अनुसंधान में क्लिनिकल विशेषज्ञता, अत्याधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक मूल्यांकन को एक साथ लाने की पहल के रूप में देखा जा सकता है।
एक ओर एम्स के विशेषज्ञ एंडोस्कोपी और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के क्षेत्र में चिकित्सकीय अनुभव और शोध क्षमता उपलब्ध कराएंगे, वहीं दूसरी ओर फुजीफिल्म की तकनीकी विशेषज्ञता एआई आधारित एंडोस्कोपी प्रणाली के मूल्यांकन में सहयोग देगी।
इस तरह दोनों पक्षों का सहयोग यह जानने पर केंद्रित रहेगा कि वास्तविक मरीजों की जांच में एआई तकनीक किस हद तक उपयोगी साबित होती है।
चिकित्सा क्षेत्र में एआई का उपयोग केवल बीमारी की पहचान तक सीमित नहीं है। भविष्य में मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड, इमेजिंग, पैथोलॉजी और अन्य जांचों से प्राप्त जानकारी का विश्लेषण कर उपचार को अधिक व्यक्तिगत बनाने की दिशा में भी तकनीक का उपयोग बढ़ सकता है।
हालांकि, ऊपरी जठरांत्र संबंधी कैंसर के संदर्भ में फिलहाल एम्स-फुजीफिल्म अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य एंडोस्कोपी के दौरान शुरुआती संदिग्ध संकेतों की पहचान में एआई की भूमिका का मूल्यांकन करना है।
किसी भी एआई आधारित चिकित्सा तकनीक के लिए सटीकता के साथ-साथ सुरक्षा और विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण है। गलत तरीके से किसी सामान्य क्षेत्र को संदिग्ध बताने पर अनावश्यक जांच हो सकती है, जबकि किसी वास्तविक संदिग्ध क्षेत्र को पहचानने में विफलता भी महत्वपूर्ण समस्या हो सकती है।
इसी कारण ऐसे अध्ययनों में एआई की क्षमता का व्यापक और नियंत्रित मूल्यांकन आवश्यक होता है। एम्स का बहुकेंद्रीय ट्रायल इसी वैज्ञानिक मूल्यांकन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेजी से स्वास्थ्य सेवाओं के विभिन्न क्षेत्रों में इस्तेमाल की जा रही है। मेडिकल इमेजिंग, रेडियोलॉजी, पैथोलॉजी और अब एंडोस्कोपी जैसे क्षेत्रों में एआई आधारित प्रणालियों की भूमिका पर शोध हो रहा है।
एम्स और फुजीफिल्म का यह सहयोग भारत में मेडिकल एआई के क्लिनिकल मूल्यांकन की दिशा में एक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहां नई तकनीक को सीधे मरीजों की देखभाल से जुड़े वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से परखा जाएगा।
एम्स और फुजीफिल्म का यह सहयोग इस बात का अध्ययन करेगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एंडोस्कोपी के दौरान कैंसर के शुरुआती संकेतों की पहचान में डॉक्टरों की कितनी सहायता कर सकती है। इस अध्ययन से मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़े यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होंगे कि एआई आधारित तकनीक को नियमित चिकित्सा व्यवस्था में किस प्रकार और किन परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
फिलहाल इस पहल को कैंसर की शुरुआती पहचान के क्षेत्र में एक अनुसंधान-आधारित प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। अध्ययन पूरा होने और उसके वैज्ञानिक परिणाम सामने आने के बाद ही इसकी वास्तविक प्रभावशीलता और व्यापक क्लिनिकल उपयोगिता को लेकर ठोस निष्कर्ष निकाला जा सकेगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


