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- 13h ago
नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके, पार्टी के सह-संयोजक सौरव दास और राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका को रविवार को दिल्ली कैंट की मजिस्ट्रेट अदालत से राहत मिली। अदालत ने तीनों को शर्तों के साथ रिहा करने का आदेश दिया। सीजेपी की लीगल हेड रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर इसकी जानकारी देते हुए बताया कि अदालत ने एक वर्ष तक शांति भंग नहीं करने की शर्त पर जमानत दी है। इस घटनाक्रम के बाद चुनावी जवाबदेही को लेकर प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन और उसके दौरान की गई पुलिस कार्रवाई एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
पुलिस तीनों नेताओं को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के लिए अदालत लेकर पहुंची थी। सुनवाई के बाद उन्हें रिहाई की राहत मिली। पार्टी की ओर से इसे अपने नेताओं के लिए कानूनी राहत बताया गया है। हालांकि, अदालत के आदेश की प्रमाणित प्रति और उसमें दर्ज सभी शर्तों का विस्तृत विवरण उपलब्ध होने पर ही जमानत की शर्तों की पूरी कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
सीजेपी नेताओं को शनिवार को दिल्ली एयरपोर्ट पर हिरासत में लिया गया था। पार्टी के अनुसार, वे चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर अपनी मांगें उठाने के लिए दिल्ली पहुंचे थे। पार्टी ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की कोशिश कर रहे लोगों को रोकना लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है।
सीजेपी की लीगल हेड रत्ना सिंह ने एक्स पर पोस्ट कर बताया कि अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को मजिस्ट्रेट अदालत ने रिहा करने का आदेश दिया है। उनके अनुसार, अदालत ने एक वर्ष तक शांति भंग नहीं करने की शर्त पर जमानत दी है।
इससे पहले रत्ना सिंह ने जानकारी दी थी कि तीनों नेताओं को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना है। पुलिस की ओर से उन्हें अदालत में पेश किए जाने के बाद रिहाई का आदेश सामने आया।
इस घटनाक्रम से पार्टी को अपने नेताओं की हिरासत के मामले में राहत मिली है। हालांकि, शर्तों के साथ जमानत और मामले से पूरी तरह बरी किए जाने के बीच कानूनी अंतर होता है। जमानत का अर्थ अपने आप में यह नहीं है कि मामले की सभी कार्यवाहियां समाप्त हो गई हैं या अदालत ने आरोपों के गुण-दोष पर अंतिम फैसला दे दिया है।
अदालत के आदेश में दर्ज शर्तों का पालन करना संबंधित व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण होगा। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया क्या होगी, यह संबंधित प्रकरण के रिकॉर्ड और न्यायालय के निर्देशों पर निर्भर करेगा।
अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को शनिवार को दिल्ली एयरपोर्ट पर हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई थी। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया था कि उन्हें एयरपोर्ट से बाहर निकलने से पहले ही पुलिस ने रोक लिया।
सीजेपी का कहना था कि तीनों नेता दिल्ली में आयोजित होने वाले विरोध-प्रदर्शन में भाग लेने के लिए पहुंचे थे। पार्टी के मुताबिक, प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से संबंधित कथित अनियमितताओं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही की मांग था।
पार्टी ने हिरासत की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया था कि प्रदर्शनकारियों को अपनी बात रखने का अवसर देने के बजाय उन्हें रोकने की कोशिश की गई। सीजेपी नेताओं ने हिरासत के दौरान कानूनी प्रक्रिया और वकीलों से संपर्क के अधिकार को लेकर भी चिंता जताई थी।
हालांकि, पुलिस की ओर से हिरासत के संबंध में दर्ज औपचारिक आधार और सभी संबंधित परिस्थितियों का पूरा विवरण उपलब्ध होने पर ही कार्रवाई की वैधानिकता का आकलन किया जा सकता है।
जंतर-मंतर पर सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिए गए यूट्यूबर ध्रुव राठी को भी शनिवार देर रात रिहा कर दिया गया। एक पुलिस अधिकारी ने रविवार को उनकी रिहाई की जानकारी दी।
पुलिस सूत्र के हवाले से बताया गया कि यदि ध्रुव राठी निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद जंतर-मंतर जाने का प्रयास करते हैं, तो उन्हें दोबारा हिरासत में लिया जा सकता है या उनके खिलाफ आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
ध्रुव राठी को शनिवार को गुरुग्राम के सेक्टर-56 स्थित उनके आवास से हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई थी। यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई, जब दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई थी।
राठी की रिहाई के बाद भी पुलिस की ओर से निषेधाज्ञा के उल्लंघन की संभावित स्थिति में कार्रवाई की बात कही गई। इससे स्पष्ट है कि रिहाई और किसी निर्धारित स्थान पर प्रदर्शन करने की अनुमति दो अलग-अलग विषय हैं। किसी व्यक्ति की रिहाई से अपने आप यह साबित नहीं होता कि उस पर लागू अन्य कानूनी प्रतिबंध समाप्त हो गए हैं।
ध्रुव राठी की हिरासत और रिहाई को लेकर विस्तृत आदेश या संबंधित कानूनी दस्तावेज उपलब्ध होने पर मामले की परिस्थितियों को अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा।
दिल्ली में सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले व्यापक सुरक्षा व्यवस्था किए जाने की जानकारी सामने आई थी। पुलिस सूत्रों के अनुसार, विभिन्न स्थानों से 7,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
प्रदर्शनकारी विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से संबंधित कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना चाहते थे। पुलिस ने राष्ट्रीय राजधानी में सुरक्षा बढ़ाई थी, ताकि निषेधाज्ञा और निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखी जा सके।
प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए गए। सीजेपी नेताओं का कहना था कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखने आए लोगों को रोकने के बजाय उनसे संवाद किया जाना चाहिए था।
वहीं, पुलिस की ओर से सुरक्षा व्यवस्था और निषेधाज्ञा के संदर्भ में कार्रवाई की बात सामने आई। इस मामले में हिरासत में लिए गए लोगों की सटीक संख्या, विभिन्न स्थानों पर हुई कार्रवाई और हिरासत के बाद छोड़े गए लोगों का आधिकारिक विवरण महत्वपूर्ण होगा।
बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने के दावे के बीच यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों का आधार क्या था और संबंधित कार्रवाई में लागू कानूनी प्रक्रिया का किस तरह पालन किया गया।
सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके के लिए यह घटनाक्रम व्यक्तिगत रूप से भी कठिन रहा। उनकी दादी सावित्रीबाई दीपके का निधन हो गया था और उनकी अनुपस्थिति में अंतिम संस्कार किए जाने की जानकारी सामने आई।
दीपके ने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए बताया कि वह दुख की इस घड़ी में अपने परिवार के साथ रहने के लिए गांव लौट रहे हैं। परिवार में मृत्यु जैसी घटना के समय मौजूद न रह पाने की परिस्थिति को लेकर उनके समर्थकों और पार्टी के भीतर संवेदना का विषय सामने आया।
इससे पहले सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने आरोप लगाया था कि हिरासत में रहने के दौरान अभिजीत दीपके अपने परिवार से संपर्क करना चाहते थे, ताकि उन्हें घर में हुई घटना की जानकारी मिल सके। रांका ने पुलिस के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए कहा था कि ऐसी परिस्थितियों में मानवीय संवेदनशीलता का ध्यान रखा जाना चाहिए।
परिवार में शोक और कानूनी कार्रवाई के बीच दीपके का गांव लौटना इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण मानवीय पहलू है। हालांकि, हिरासत के दौरान परिवार से संपर्क को लेकर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित रिकॉर्ड और पुलिस का पक्ष सामने आना आवश्यक है।
अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा। उन्होंने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री के लिए बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उनकी आलोचना की।
दीपके की टिप्पणी उनके राजनीतिक विरोध और मौजूदा घटनाक्रम के प्रति असंतोष को दर्शाती है। सीजेपी नेताओं ने इससे पहले भी चुनावी जवाबदेही, मतदाता सूची और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए थे।
राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर से सार्वजनिक पदाधिकारियों की आलोचना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हो सकती है। हालांकि, किसी बयान की राजनीतिक या कानूनी व्याख्या उसके पूरे संदर्भ, इस्तेमाल किए गए शब्दों और लागू कानूनों के आधार पर की जानी चाहिए।
दीपके की पोस्ट के संबंध में यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर व्यक्त विचार संबंधित व्यक्ति का अपना राजनीतिक वक्तव्य है। इसे किसी स्वतंत्र जांच या न्यायालय के निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
खबर के अंतिम हिस्से में यह दावा किया गया है कि कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद तीनों नेता पुलिस स्टेशन से अकेले निकले और उस समय उनका स्वागत करने के लिए कोई समर्थक वहां मौजूद नहीं था।
इस विवरण को लेकर सावधानी जरूरी है। पुलिस स्टेशन के बाहर किसी विशेष समय पर समर्थकों की अनुपस्थिति से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पार्टी के पास जनसमर्थन नहीं है या आंदोलन का प्रभाव सीमित है। ऐसी स्थिति के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें रिहाई के समय की जानकारी, समर्थकों की आवाजाही और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियां शामिल हैं।
इसी तरह, पुलिस अधिकारियों की ओर से यह कहे जाने का उल्लेख किया गया है कि कानूनी कार्रवाई से संदेश जाता है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। इस कथन को पुलिस अधिकारियों के दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए। किसी मामले में कानून का पालन हुआ या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित तथ्यों, कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक आदेशों के आधार पर किया जाता है।
तीनों नेताओं की रिहाई के बाद मामले का अगला चरण अदालत की शर्तों, संबंधित पुलिस कार्रवाई और पार्टी की आगे की गतिविधियों पर निर्भर करेगा।
सीजेपी ने पहले कहा था कि हिरासत और पुलिस कार्रवाई के बावजूद वह चुनावी जवाबदेही की मांग से पीछे नहीं हटेगी। पार्टी का प्रमुख मुद्दा एसआईआर से संबंधित कथित अनियमितताओं, मतदाता सूची और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की भूमिका पर जवाब मांगना रहा है।
तीनों नेताओं को अदालत से राहत मिलने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी अपनी आगे की रणनीति किस तरह तय करती है। यदि आंदोलन जारी रखा जाता है, तो प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान, लागू प्रतिबंधों और अदालत की शर्तों का ध्यान रखना आवश्यक होगा।
चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों पर तथ्यात्मक निष्कर्ष के लिए आधिकारिक आंकड़ों, मतदाता सूची के रिकॉर्ड, संबंधित शिकायतों और निर्वाचन आयोग की प्रतिक्रिया की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार, हिरासत और पुलिस कार्रवाई के मामले में अदालत के आदेश तथा पुलिस रिकॉर्ड सामने आने से कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
कुल मिलाकर, रविवार को मजिस्ट्रेट अदालत से अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को शर्तों के साथ रिहाई मिलने तथा ध्रुव राठी के छोड़े जाने से हिरासत संबंधी घटनाक्रम में नया मोड़ आया है। सीजेपी ने चुनावी जवाबदेही के मुद्दे पर अपना विरोध जारी रखने की बात कही है, जबकि पुलिस की ओर से सुरक्षा व्यवस्था और निषेधाज्ञा का संदर्भ सामने आया है। अब आगे की स्थिति अदालत की शर्तों, संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाओं और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों पर उपलब्ध होने वाले तथ्यों से तय होगी।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


