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- 13h ago
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध-प्रदर्शन और पुलिस की ओर से लागू की गई पाबंदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में रविवार को विशेष सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने बैरिकेडिंग की व्यवस्था की तत्काल समीक्षा करने, इंटरनेट सेवाओं को कानून के मुताबिक बिना बाधा जारी रखने और सार्वजनिक परिवहन को सामान्य रूप से संचालित करने से संबंधित निर्देश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिकों की आवाजाही और न्याय तक पहुंच अनावश्यक रूप से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
सीजेआई ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और पाबंदियों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत का रुख किया था। याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि शनिवार को प्रदर्शनकारियों और विपक्षी दलों के कई नेताओं को हिरासत में लिया गया तथा राजधानी के विभिन्न हिस्सों में आवाजाही पर प्रतिबंध लगाए गए।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जे. बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इंटरनेट सेवाओं, मेट्रो और रेल परिचालन, बैरिकेडिंग, शांतिपूर्ण सभा और हिरासत की कानूनी प्रक्रिया से जुड़े विषयों पर निर्देश दिए। अदालत ने अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था के कारण लोगों को अदालतों तक पहुंचने में परेशानी न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में लगाए गए बैरिकेड्स के संबंध में अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कानून-व्यवस्था और यातायात की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस व्यवस्था की तत्काल समीक्षा करें।
अदालत के निर्देश का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सुरक्षा व्यवस्था के कारण आम नागरिकों की आवाजाही अनावश्यक रूप से बाधित न हो। राजधानी में विरोध-प्रदर्शन के दौरान कई स्थानों पर सुरक्षा प्रबंध किए जाने की खबरों के बीच बैरिकेडिंग का मुद्दा अदालत के सामने आया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए थे। उनका कहना था कि प्रतिबंधों के कारण लोगों को आने-जाने और अपनी बात रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बैरिकेडिंग की समीक्षा करने पर जोर दिया। इसका अर्थ यह है कि अधिकारियों को सुरक्षा की जरूरत और आम लोगों की आवाजाही के बीच उचित संतुलन बनाना होगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इंटरनेट सेवाओं को कानून के मुताबिक बिना किसी रुकावट के जारी रखने से संबंधित निर्देश दिए। इंटरनेट आज संचार, समाचार, शिक्षा, कारोबार और सार्वजनिक सूचनाओं तक पहुंच का प्रमुख माध्यम है। ऐसे में इंटरनेट सेवा प्रभावित होने से आम नागरिकों के दैनिक जीवन पर भी असर पड़ सकता है।
दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के दौरान लागू प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिकाओं में इंटरनेट सेवाओं का मुद्दा भी उठाया गया था। अदालत ने निर्देश दिया कि इंटरनेट सेवाओं को बाधित न किया जाए और कानून के अनुरूप उनका संचालन सुनिश्चित किया जाए।
इस निर्देश के साथ अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी प्रशासनिक कदम को लागू कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए। सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की आवश्यकता और उनके प्रभाव पर भी विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि, इंटरनेट सेवा को लेकर अदालत के निर्देशों का सटीक दायरा समझने के लिए लिखित आदेश की प्रमाणित प्रति देखना महत्वपूर्ण होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो और रेल सेवाओं को सामान्य रूप से चलाने पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक परिवहन का संचालन सामान्य रहना चाहिए, जब तक कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण प्रतिबंध लगाना आवश्यक न हो।
दिल्ली में मेट्रो और रेल सेवाएं लाखों लोगों की दैनिक आवाजाही का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके संचालन में बाधा आने से नौकरीपेशा लोगों, विद्यार्थियों, मरीजों और अन्य यात्रियों को परेशानी हो सकती है।
प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक परिवहन के संचालन को लेकर उठे सवालों के बीच अदालत ने निर्देश दिया कि सुरक्षा संबंधी जरूरतों का आकलन करते हुए सेवाओं को सामान्य बनाए रखने का प्रयास किया जाए।
अदालत के निर्देश का उद्देश्य सुरक्षा व्यवस्था और नागरिकों की सुविधाओं के बीच संतुलन बनाए रखना है। कानून-व्यवस्था की स्थिति में वास्तविक खतरा होने पर आवश्यक प्रतिबंधों का प्रश्न अलग हो सकता है, लेकिन ऐसे कदमों का आधार लागू कानून और संबंधित परिस्थितियां होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के आसपास के क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू होने से संबंधित बोर्ड हटाने का निर्देश भी दिया।
अदालत ने इस कदम को न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। न्याय तक पहुंच में केवल अदालत में याचिका दाखिल करने का अधिकार ही नहीं, बल्कि अदालत परिसर तक पहुंचने और न्यायिक कार्यवाही में भाग लेने की व्यावहारिक सुविधा भी शामिल है।
यदि किसी क्षेत्र में प्रतिबंधों के कारण नागरिकों को यह आशंका होने लगे कि वे अदालत तक नहीं पहुंच सकेंगे, तो ऐसी स्थिति न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंच के सवाल खड़े कर सकती है।
बीएनएसएस की धारा 163 के तहत सक्षम प्राधिकारी कुछ परिस्थितियों में तत्काल रोकथाम संबंधी आदेश जारी कर सकता है। हालांकि, ऐसे आदेशों का दायरा, उनकी अवधि और उनका लागू होना संबंधित आदेश तथा परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का उल्लेख करते हुए यह ध्यान रखना जरूरी है कि बोर्ड हटाने का आदेश अपने आप में हर प्रकार के प्रतिबंध को समाप्त करने के समान नहीं है। वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए अदालत के लिखित आदेश और संबंधित प्रशासनिक निर्देशों का अध्ययन आवश्यक होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत के मुद्दे पर भी स्पष्ट निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए और हिरासत की कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही होनी चाहिए।
सीजेपी के प्रदर्शन से पहले दिल्ली में लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आई थीं। याचिकाकर्ताओं ने पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए नागरिकों के अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया के पालन से जुड़े सवाल उठाए थे।
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है। यह सिद्धांत प्रशासनिक कार्रवाई में जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
हिरासत की वैधता का निर्धारण संबंधित परिस्थितियों, लागू कानून, कार्रवाई के आधार और अधिकारियों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया के आधार पर होता है। इसलिए प्रत्येक मामले में यह देखना आवश्यक है कि हिरासत किस कारण से की गई और क्या संबंधित कानूनी आवश्यकताओं का पालन हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण और निहत्थे तरीके से एकत्र हुए लोगों के संबंध में भी निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 163 के तहत लागू प्रतिबंधित क्षेत्र के बाहर शांतिपूर्ण सभा करने वाले लोगों के मामलों में कानून के मुताबिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सार्वजनिक स्थानों पर सभा और विरोध-प्रदर्शन के अधिकार तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन जरूरी होता है।
सीजेपी और अन्य प्रदर्शनकारियों की ओर से आरोप लगाया गया था कि उन्हें अपनी मांगें रखने के लिए दिल्ली पहुंचने से रोका गया और कई लोगों को हिरासत में लिया गया। याचिकाकर्ताओं ने पुलिस की कार्रवाई को नागरिक स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जोड़कर अदालत के सामने रखा।
अदालत के निर्देशों का आशय यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी कार्रवाई में लागू प्रतिबंधों और कानूनी प्रक्रिया का पालन हो। प्रतिबंधित क्षेत्र के बाहर सभा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के मामले में परिस्थितियों और कानून को ध्यान में रखना आवश्यक होगा।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर स्थान पर किसी भी प्रकार की सभा पर कोई प्रतिबंध लागू नहीं हो सकता। बल्कि यह कि प्रशासनिक कार्रवाई संबंधित कानून, लागू आदेशों और वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिका में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध बयानों पर विचार करने के बाद संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए। अदालत ने जवाब में हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा।
इसके साथ ही अधिकारियों को अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि सुनवाई के दौरान उल्लेख की गई अन्य गैर-सूचीबद्ध याचिकाओं को अवमानना की कार्यवाही के साथ जोड़ा जाएगा।
अवमानना संबंधी कार्यवाही का उद्देश्य यह जांचना हो सकता है कि अदालत के किसी आदेश का पालन हुआ है या नहीं अथवा न्यायिक निर्देशों के उल्लंघन के आरोपों पर क्या स्थिति है। हालांकि, नोटिस जारी होने को अपने आप में अवमानना सिद्ध हो जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। संबंधित पक्षों का जवाब और अदालत का आगे का निर्णय महत्वपूर्ण होगा।
हलफनामे और अनुपालन रिपोर्ट के माध्यम से अदालत को यह जानकारी मिल सकती है कि उसके निर्देशों के बाद प्रशासन ने क्या कदम उठाए और किन परिस्थितियों में कार्रवाई की गई।
याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली पुलिस की उस कार्रवाई को चुनौती दी थी, जिसके दौरान शनिवार को सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े लोगों और विपक्षी दलों के कई नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आई थीं। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री स्तर के नेताओं के शामिल होने का भी उल्लेख किया गया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि राजधानी में लागू पाबंदियों और सुरक्षा व्यवस्था के कारण प्रदर्शनकारियों की आवाजाही तथा शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने की क्षमता प्रभावित हुई।
सीजेपी ने चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही की मांग को आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बताया था। पार्टी नेताओं ने पहले भी आरोप लगाया था कि प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए व्यापक पुलिस व्यवस्था की गई।
इन आरोपों और पुलिस की कार्रवाई पर अंतिम निष्कर्ष के लिए संबंधित प्रशासनिक आदेशों, पुलिस के आधिकारिक पक्ष और अदालत के लिखित निर्देशों को साथ में देखना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में न्याय तक पहुंच और आम नागरिकों की आवाजाही का विषय विशेष महत्व रखता है। राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था लागू किए जाने पर प्रशासन की जिम्मेदारी होती है कि वह संभावित खतरे का आकलन करे और आवश्यक कदम उठाए। वहीं, इन कदमों से अदालतों, सार्वजनिक परिवहन और सामान्य नागरिक गतिविधियों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत तक पहुंच केवल न्यायिक प्रक्रिया में शामिल पक्षकारों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। वकीलों, कर्मचारियों और अन्य जरूरी कार्यों से अदालत आने वाले लोगों की आवाजाही भी प्रभावित हो सकती है।
इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने आसपास के क्षेत्र में धारा 163 से संबंधित बोर्ड हटाने और बैरिकेडिंग की समीक्षा करने के निर्देश दिए। अदालत ने इंटरनेट, मेट्रो और रेल सेवाओं को सामान्य रखने पर भी जोर दिया।
इन निर्देशों का वास्तविक क्रियान्वयन संबंधित अधिकारियों की अनुपालन रिपोर्ट और आगे की न्यायिक कार्यवाही से स्पष्ट होगा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली प्रशासन और पुलिस बैरिकेडिंग की समीक्षा, इंटरनेट सेवाओं, सार्वजनिक परिवहन और हिरासत संबंधी प्रक्रियाओं पर क्या कदम उठाते हैं।
अदालत ने संबंधित पक्षों से हलफनामा और अनुपालन रिपोर्ट मांगी है। इससे निर्देशों के पालन की स्थिति सामने आने की संभावना है। साथ ही, अवमानना याचिका के संबंध में जारी नोटिस पर संबंधित पक्षों का जवाब और अदालत की आगे की सुनवाई भी महत्वपूर्ण होगी।
सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामले में चुनावी जवाबदेही की मांग, नागरिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन का सवाल चर्चा में बना हुआ है।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा, इंटरनेट सेवाओं को कानून के मुताबिक जारी रखने, मेट्रो और रेल परिचालन सामान्य बनाए रखने तथा अवैध हिरासत रोकने से जुड़े निर्देश दिए हैं। अदालत ने न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने और शांतिपूर्ण सभा के मामलों में कानून के अनुरूप कार्रवाई करने पर भी जोर दिया। अब इन निर्देशों के अनुपालन और अवमानना याचिका पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया से मामले की स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


