यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 13h ago
नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), ऑटोमेशन और तेजी से बदलती तकनीक के दौर में देश की कार्यव्यवस्था में बड़े बदलाव की संभावना के बीच केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने कहा है कि भविष्य की कार्यव्यवस्था केवल तकनीक आधारित नहीं हो सकती। इसमें तकनीकी प्रगति के साथ श्रमिकों की भागीदारी, कौशल विकास, कार्यस्थल की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और गरिमापूर्ण रोजगार को भी समान महत्व देना होगा।
सीआईआई की ओर से 'एआई के युग में औद्योगिक संबंधों और कार्यबल भागीदारी की पुनर्रचना' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय औद्योगिक संबंध एवं श्रम सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उद्योग और श्रमिकों के हितों को एक-दूसरे के विपरीत देखने की आवश्यकता नहीं है। दोनों के बीच बेहतर समन्वय से उत्पादकता, रोजगार और औद्योगिक विकास को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि तकनीक में तेजी से हो रहे बदलाव के कारण काम करने के तरीके, नौकरियों की प्रकृति और आवश्यक कौशल में लगातार परिवर्तन हो रहा है। ऐसे में श्रमिकों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करना सरकार, उद्योग और अन्य हितधारकों की साझा जिम्मेदारी होगी।
एआई और ऑटोमेशन अब केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। विनिर्माण, सेवा, बैंकिंग, लॉजिस्टिक्स, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और अनेक अन्य क्षेत्रों में तकनीक का उपयोग बढ़ रहा है।
इस बदलाव के कारण कई पारंपरिक कार्यों की प्रकृति बदल रही है। कुछ काम मशीनों और सॉफ्टवेयर के जरिए पहले से अधिक तेजी से किए जा सकते हैं, जबकि दूसरी ओर नई तकनीकों के संचालन, निगरानी, विश्लेषण और प्रबंधन से जुड़े नए कार्यों की आवश्यकता बढ़ रही है।
ऐसे माहौल में श्रमिकों को केवल वर्तमान काम के लिए प्रशिक्षित करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें भविष्य में आने वाले बदलावों के लिए भी तैयार करना होगा।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि तकनीकी बदलाव के दौर में लगातार री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग जरूरी होगी।
री-स्किलिंग का उद्देश्य कर्मचारियों को नई तरह के काम के लिए तैयार करना है, जबकि अप-स्किलिंग के माध्यम से मौजूदा कार्यक्षमता और विशेषज्ञता को नई तकनीक के अनुरूप मजबूत किया जा सकता है।
औद्योगिक क्षेत्र में इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि नई मशीनों, डिजिटल प्रणालियों और एआई आधारित तकनीकों के आने के साथ कर्मचारियों की भूमिकाएं बदल सकती हैं।
भविष्य में ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता होगी, जो केवल तकनीकी ज्ञान देने तक सीमित न रहें बल्कि श्रमिकों को बदलती कार्यप्रणाली, डिजिटल उपकरणों और नई जिम्मेदारियों के लिए तैयार करें।
मांडविया ने इस बात पर जोर दिया कि तकनीकी प्रगति का उद्देश्य कार्यस्थल पर मानवीय भागीदारी को खत्म करना नहीं होना चाहिए। उद्योगों में निर्णय प्रक्रिया और कार्यस्थल से जुड़े बदलावों में श्रमिकों की भूमिका को महत्व देना आवश्यक है।
उनके अनुसार उत्पादकता बढ़ाने के प्रयासों के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि श्रमिकों के हित, सुरक्षा और गरिमा प्रभावित न हों।
इस दृष्टिकोण से भविष्य के औद्योगिक संबंधों में संवाद और भागीदारी की भूमिका बढ़ सकती है। तकनीक से जुड़े बदलावों को लागू करने से पहले कर्मचारियों और श्रमिक प्रतिनिधियों से संवाद करने की व्यवस्था औद्योगिक वातावरण को बेहतर बनाने में सहायक हो सकती है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उद्योग की तरक्की और श्रमिकों का हित एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि उद्योग उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ता है तो रोजगार के अवसरों और आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
दूसरी ओर, प्रशिक्षित, सुरक्षित और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े श्रमिक उद्योग की उत्पादकता में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
इसीलिए औद्योगिक संबंधों की ऐसी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है जिसमें दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
सम्मेलन में मांडविया ने देश में लागू चार श्रम संहिताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन संहिताओं के माध्यम से श्रम कानूनों को अधिक सरल और आधुनिक बनाने तथा श्रमिकों के संरक्षण को मजबूत करने का प्रयास किया गया है।
चार श्रम संहिताएं व्यापक रूप से इन क्षेत्रों से संबंधित हैं—
सरकार की ओर से इनका उद्देश्य श्रम कानूनों के ढांचे को अधिक व्यवस्थित करना, अनुपालन को सरल बनाना और श्रमिकों से जुड़े प्रावधानों को व्यापक रूप देना बताया गया है।
मांडविया ने सामाजिक सुरक्षा को भविष्य की कार्यव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। बदलते रोजगार बाजार में केवल नियमित और संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों तक सामाजिक सुरक्षा सीमित रखने के बजाय व्यापक श्रमबल को इसके दायरे में लाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
भारत में बड़ी संख्या में लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इसलिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को व्यापक बनाने का मुद्दा श्रम नीति के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल है।
तकनीकी बदलाव के कारण रोजगार के स्वरूप में परिवर्तन होने की स्थिति में सामाजिक सुरक्षा का महत्व और बढ़ सकता है। रोजगार की प्रकृति बदलने पर श्रमिकों के लिए स्वास्थ्य, दुर्घटना, पेंशन और अन्य सुरक्षा व्यवस्थाओं तक पहुंच महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
केंद्रीय मंत्री ने संगठित क्षेत्र के साथ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों तक भी सामाजिक सुरक्षा का कवच पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
निर्माण, परिवहन, घरेलू कार्य, छोटे कारोबार, कृषि से जुड़े काम और विभिन्न सेवा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में श्रमिक असंगठित व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करते हैं।
तकनीकी बदलाव का असर इन क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। इसलिए भविष्य की श्रम नीतियों में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की जरूरतों को भी शामिल करना आवश्यक होगा।
मांडविया ने कहा कि तकनीकी बदलाव के दौर में सरकार, उद्योग, श्रमिक और अन्य हितधारकों के बीच सार्थक सामाजिक संवाद जरूरी है।
औद्योगिक क्षेत्र में बदलाव केवल नीतियां बनाने से नहीं आ सकता। इसके लिए उद्योग संगठनों, श्रमिक प्रतिनिधियों, सरकार और अन्य संबंधित पक्षों के बीच नियमित संवाद आवश्यक होगा।
नई तकनीक लागू करने, कार्यप्रणाली बदलने, कर्मचारियों के प्रशिक्षण और कार्यस्थल की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर संवाद से ऐसी व्यवस्था तैयार की जा सकती है, जिसमें बदलाव के साथ श्रमिकों की चिंताओं को भी समझा जा सके।
एआई और ऑटोमेशन के विस्तार के साथ औद्योगिक संबंधों का स्वरूप भी बदल सकता है। पहले जहां मुख्य चर्चा वेतन, काम के घंटे और रोजगार की शर्तों तक केंद्रित रहती थी, वहीं आने वाले समय में तकनीकी बदलाव, डेटा, डिजिटल निगरानी, नए कौशल, प्रशिक्षण और रोजगार के बदलते स्वरूप जैसे विषय भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसलिए औद्योगिक संबंधों की व्यवस्था को भी नई परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता होगी।
कंपनियों के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि वे तकनीकी बदलावों के साथ कर्मचारियों को प्रशिक्षण दें और कार्यस्थल पर बदलावों के बारे में पारदर्शी संवाद बनाए रखें।
ऑटोमेशन का एक उद्देश्य उत्पादन क्षमता और दक्षता बढ़ाना हो सकता है। लेकिन औद्योगिक विकास के साथ कार्यस्थल की सुरक्षा को भी प्राथमिकता देना आवश्यक है।
केंद्रीय मंत्री ने भविष्य की कार्यव्यवस्था में श्रमिकों की सुरक्षा को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि तकनीकी प्रगति के साथ कार्यस्थल पर सुरक्षित परिस्थितियां सुनिश्चित करनी होंगी।
नई मशीनों और तकनीकी प्रणालियों के इस्तेमाल के लिए कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण देना भी जरूरी होगा। इससे दुर्घटनाओं के जोखिम को कम करने और तकनीक के बेहतर इस्तेमाल में मदद मिल सकती है।
भविष्य की कार्यव्यवस्था में श्रमिकों की भागीदारी का अर्थ केवल काम करने तक सीमित नहीं रहेगा। औद्योगिक बदलावों से जुड़े निर्णयों में श्रमिकों की राय और अनुभव को भी महत्व देने की आवश्यकता होगी।
किसी उद्योग में नई तकनीक लागू होने पर सबसे पहले उसका प्रभाव कार्यस्थल पर मौजूद कर्मचारियों पर पड़ता है। ऐसे में उनकी व्यावहारिक जानकारी तकनीक को लागू करने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में उपयोगी हो सकती है।
इसी वजह से सामाजिक संवाद और कार्यबल की भागीदारी को भविष्य के औद्योगिक संबंधों का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है।
एआई और ऑटोमेशन को लेकर अक्सर रोजगार पर संभावित प्रभाव की चर्चा होती है। लेकिन तकनीकी बदलाव के साथ नए प्रकार के कार्य और नई भूमिकाएं भी विकसित हो सकती हैं।
डिजिटल तकनीक, डेटा प्रबंधन, एआई संचालन, साइबर सुरक्षा, मशीन मेंटेनेंस, तकनीकी प्रशिक्षण और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में नई विशेषज्ञताओं की आवश्यकता बढ़ सकती है।
इसलिए चुनौती केवल यह नहीं है कि तकनीक के कारण कौन से काम बदलेंगे, बल्कि यह भी है कि नए अवसरों के लिए श्रमिकों को समय रहते कैसे तैयार किया जाए।
भविष्य की कार्यव्यवस्था में युवाओं के कौशल विकास की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। केवल पारंपरिक शैक्षणिक योग्यता रोजगार के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। तकनीकी और व्यावसायिक कौशल के साथ डिजिटल दक्षता की आवश्यकता भी बढ़ सकती है।
उद्योगों की जरूरत के अनुसार प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित करना और शिक्षा संस्थानों तथा उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल बनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।
इससे युवाओं को बदलते रोजगार बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने में मदद मिल सकती है।
मांडविया ने भारत के 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को साथ लेकर चलना होगा।
विकास का लाभ व्यापक आबादी तक पहुंचाने के लिए उत्पादकता बढ़ाने के साथ रोजगार के अवसर पैदा करना और श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा।
उनके अनुसार जब उद्योगों की वृद्धि और श्रमिकों की गरिमा एक साथ आगे बढ़ेगी, तभी टिकाऊ आर्थिक विकास की मजबूत नींव तैयार की जा सकेगी।
भविष्य की कार्यव्यवस्था को तैयार करने में सरकार की भूमिका नीति और नियमन तक सीमित नहीं रहेगी। उद्योगों को भी कर्मचारियों के प्रशिक्षण और सुरक्षित कार्यस्थल के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
इसी तरह श्रमिकों को भी बदलती तकनीक के अनुरूप नए कौशल हासिल करने और अपनी कार्यक्षमता विकसित करने के लिए तैयार रहना होगा।
श्रम संगठनों और अन्य हितधारकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी, ताकि तकनीकी बदलावों से जुड़े मुद्दों पर संवाद और समाधान की प्रक्रिया आगे बढ़ सके।
केंद्रीय मंत्री ने औद्योगिक क्षेत्र में साझेदारी की संस्कृति को मजबूत करने की जरूरत बताई। इसका अर्थ है कि उद्योग और श्रमिकों के बीच संबंध केवल नियोक्ता और कर्मचारी तक सीमित न रहें, बल्कि दोनों पक्ष औद्योगिक विकास की प्रक्रिया में साझेदार के रूप में काम करें।
ऐसी व्यवस्था में उत्पादकता बढ़ाने के साथ श्रमिकों की सुरक्षा, कौशल और सामाजिक सुरक्षा को भी महत्व दिया जा सकता है।
एआई और ऑटोमेशन आने वाले वर्षों में कार्यस्थल की तस्वीर को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ प्रक्रियाएं अधिक स्वचालित हो सकती हैं, जबकि कुछ नौकरियों में तकनीक और मानव श्रम का संयोजन बढ़ सकता है।
इस बदलाव के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि कार्यबल को नई परिस्थितियों के लिए कितनी तेजी से तैयार किया जाता है।
कौशल प्रशिक्षण, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल सुरक्षा और श्रमिक भागीदारी पर समय रहते ध्यान देने से तकनीकी बदलाव के साथ आने वाली चुनौतियों का सामना करने की क्षमता बढ़ सकती है।
सम्मेलन में दिए गए संदेश का व्यापक केंद्र यही रहा कि तकनीक आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण साधन हो सकती है, लेकिन कार्यव्यवस्था का अंतिम उद्देश्य केवल उत्पादकता बढ़ाना नहीं होना चाहिए।
श्रमिकों की गरिमा, सुरक्षा, कौशल, सामाजिक सुरक्षा और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी को भी समान महत्व देना आवश्यक होगा।
एआई और ऑटोमेशन के दौर में भारत के सामने एक ओर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने का अवसर है, तो दूसरी ओर बड़ी श्रमशक्ति को बदलती अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने की चुनौती भी है। सरकार, उद्योग और श्रमिक संगठनों के बीच निरंतर संवाद इस बदलाव को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मांडविया के संदेश में इसी संतुलन पर जोर दिखाई दिया—तकनीक के साथ कौशल, उत्पादकता के साथ श्रमिक हित और आर्थिक विकास के साथ रोजगार एवं सामाजिक सुरक्षा को आगे बढ़ाना।


