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- 13h ago
नई दिल्ली। भारत अब केवल दूसरे देशों में विकसित दूरसंचार तकनीकों को अपनाने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि भविष्य की संचार प्रणालियों और वैश्विक दूरसंचार मानकों के निर्माण में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस (आईएमसी)-2026 के तीसरे दिन भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता, स्वदेशी नेटवर्क के विकास और छठी पीढ़ी यानी 6जी तकनीक की तैयारियों को रेखांकित करते हुए कहा कि देश में विकसित 4जी नेटवर्क के बाद अब 5जी स्टैंडअलोन तकनीक भविष्य के 6जी नेटवर्क की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार करेगी।
सिंधिया के अनुसार, भारत ने दूरसंचार क्षेत्र में अपनी तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने के लिए स्वदेशी समाधानों के विकास पर जोर दिया है। अब देश का लक्ष्य केवल आधुनिक नेटवर्क सेवाओं का विस्तार करना नहीं, बल्कि उन तकनीकों, मानकों और नवाचारों के विकास में योगदान देना भी है, जिनका उपयोग आने वाले वर्षों में दुनिया भर के दूरसंचार नेटवर्क में किया जा सकता है।
इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दसवें संस्करण में वैश्विक दूरसंचार संगठनों, सरकारी प्रतिनिधियों, मोबाइल नेटवर्क कंपनियों, अनुसंधान संस्थानों और डीप-टेक कंपनियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, सुरक्षित डिजिटल बुनियादी ढांचे और अगली पीढ़ी के संचार नेटवर्क पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। इस वर्ष की थीम ‘स्केल विदाउट बाउंड्रीज’ के अंतर्गत यह चर्चा प्रमुख रही कि डिजिटल तकनीक का विस्तार किस प्रकार अधिक व्यापक, सुरक्षित, भरोसेमंद और टिकाऊ बनाया जा सकता है।
सम्मेलन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि 5जी और 6जी का भविष्य केवल तेज इंटरनेट तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में दूरसंचार नेटवर्क उद्योगों, अस्पतालों, परिवहन, कृषि, शिक्षा, आपदा प्रबंधन और स्मार्ट शहरों की कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने के साथ सुरक्षा, ऊर्जा दक्षता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और डिजिटल सेवाओं की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा।
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि भारत ने अपना 4जी स्टैक विकसित कर देशभर में उसकी तैनाती की है। यह उपलब्धि दूरसंचार क्षेत्र में स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब 5जी स्टैंडअलोन नेटवर्क और स्वदेशी तकनीक के विस्तार के माध्यम से 6जी की तैयारियों को आगे बढ़ाया जा रहा है।
दूरसंचार नेटवर्क की प्रत्येक पीढ़ी नई तकनीकी क्षमताएं लेकर आती है। 4जी ने मोबाइल इंटरनेट, वीडियो स्ट्रीमिंग और डिजिटल सेवाओं के व्यापक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 5जी तकनीक से अधिक क्षमता, कम विलंब और बड़ी संख्या में उपकरणों को जोड़ने की संभावनाएं बढ़ी हैं। आने वाली 6जी तकनीक से इन क्षमताओं को आगे बढ़ाने और संचार को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, संवेदक प्रणालियों तथा उन्नत कंप्यूटिंग के साथ अधिक गहराई से जोड़ने की उम्मीद है।
हालांकि, 6जी अभी विकास और वैश्विक मानकीकरण की प्रक्रिया में है। इसके अंतिम तकनीकी मानक, व्यावसायिक उपयोग और व्यापक तैनाती का स्वरूप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे अनुसंधान तथा मानक निर्धारण पर निर्भर करेगा। ऐसे में भारत के लिए शुरुआती अनुसंधान, तकनीकी परीक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण होगी।
सिंधिया ने भारत 6जी एलायंस के माध्यम से वैश्विक दूरसंचार मानकों के निर्माण में देश की भागीदारी को भी रेखांकित किया। इस तरह के सहयोगी मंच उद्योग, शिक्षण संस्थानों, अनुसंधानकर्ताओं और नीति निर्माताओं को एक साथ लाकर भविष्य की तकनीकों के विकास में योगदान देने का अवसर प्रदान करते हैं।
भारत के लिए इस दिशा में आगे बढ़ने का अर्थ केवल नेटवर्क उपकरण तैयार करना नहीं है, बल्कि दूरसंचार सॉफ्टवेयर, चिप डिजाइन, सुरक्षा तकनीक, नेटवर्क प्रबंधन और बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में भी अपनी क्षमता बढ़ाना है।
इंडिया मोबाइल कांग्रेस के प्रमुख कार्यक्रमों में अंतरराष्ट्रीय 6जी संगोष्ठी शामिल रही। इसमें वैश्विक मानकीकरण संस्थाओं और क्षेत्रीय गठबंधनों के प्रतिनिधियों ने आईएमटी-2030 के अंतर्गत 6जी तकनीक के विकास, अनुसंधान की प्राथमिकताओं और वैश्विक मानकों से जुड़े विषयों पर चर्चा की।
आईएमटी-2030, अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) की उस रूपरेखा से जुड़ा है, जिसके तहत 2030 के आसपास की अगली पीढ़ी की मोबाइल संचार तकनीक के लिए आवश्यकताओं और संभावित क्षमताओं पर काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य के नेटवर्क विभिन्न देशों और उपकरण निर्माताओं के बीच बेहतर तालमेल के साथ काम कर सकें।
वैश्विक मानकों का महत्व इसलिए अधिक है, क्योंकि दूरसंचार उपकरणों, नेटवर्क और मोबाइल सेवाओं को अलग-अलग देशों में एक-दूसरे के साथ संगत होना पड़ता है। यदि मानकों के निर्माण में भारत की भागीदारी बढ़ती है, तो देश की कंपनियों और अनुसंधान संस्थानों को अपने तकनीकी समाधानों को अंतरराष्ट्रीय जरूरतों के अनुरूप विकसित करने का अवसर मिल सकता है।
6जी के विकास में उच्च क्षमता वाले नेटवर्क, अधिक विश्वसनीय संचार, उन्नत सेंसर तकनीक और एआई के एकीकरण जैसे विषयों पर काम किया जा रहा है। भविष्य में इन तकनीकों का उपयोग स्वचालित उद्योगों, परिवहन प्रणालियों, स्मार्ट बुनियादी ढांचे और दूरस्थ सेवाओं में हो सकता है।
विशेषज्ञों के बीच चर्चा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि 6जी के लिए आवश्यक तकनीक विकसित करते समय केवल गति और क्षमता पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। नेटवर्क की सुरक्षा, ऊर्जा खपत, लागत और व्यापक उपलब्धता को भी ध्यान में रखना होगा, ताकि नई तकनीक का लाभ अधिक से अधिक लोगों और क्षेत्रों तक पहुंच सके।
सम्मेलन में आयोजित ‘सिलिकॉन टू सॉवरेन्टी’ सत्र का केंद्र स्वदेशी सेमीकंडक्टर निर्माण, चिप डिजाइन और डीप-टेक बौद्धिक संपदा को मजबूत करना रहा। इस सत्र में इस बात पर जोर दिया गया कि दूरसंचार क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए नेटवर्क सॉफ्टवेयर के साथ-साथ उसके लिए जरूरी हार्डवेयर और चिप तकनीक में भी क्षमता विकसित करनी होगी।
सेमीकंडक्टर आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार हैं। मोबाइल फोन, नेटवर्क उपकरण, डेटा सेंटर, उपग्रह संचार प्रणालियां और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े कंप्यूटिंग उपकरण इन चिपों पर निर्भर करते हैं। दूरसंचार नेटवर्क के विस्तार के साथ उच्च प्रदर्शन, ऊर्जा दक्षता और सुरक्षा की आवश्यकताओं के अनुरूप चिपों की मांग भी बढ़ रही है।
यदि भारत चिप डिजाइन, परीक्षण, निर्माण और संबंधित तकनीकी अनुसंधान में अपनी क्षमता बढ़ाता है, तो इससे दूरसंचार उपकरणों के घरेलू विकास को समर्थन मिल सकता है। इससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला में किसी व्यवधान की स्थिति में जोखिम कम करने और भारतीय कंपनियों के लिए नए बाजारों के अवसर विकसित करने में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि, सेमीकंडक्टर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। इसके लिए पूंजी निवेश, अत्याधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित मानव संसाधन, अनुसंधान और वैश्विक तकनीकी सहयोग की आवश्यकता होती है। सम्मेलन में इस विषय पर चर्चा ने दूरसंचार और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को एक-दूसरे से जोड़कर देखने की जरूरत को सामने रखा।
इंडिया मोबाइल कांग्रेस में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और दूरसंचार नेटवर्क के बीच बढ़ते संबंधों पर विशेष ध्यान दिया गया। एआई का उपयोग नेटवर्क पर बढ़ते ट्रैफिक का विश्लेषण करने, तकनीकी समस्याओं की पहचान करने, संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने और संभावित साइबर खतरों का पता लगाने में किया जा सकता है।
नेटवर्क में करोड़ों उपकरणों और उपयोगकर्ताओं के जुड़ने से डेटा की मात्रा लगातार बढ़ती है। ऐसे में पारंपरिक निगरानी प्रणालियों के साथ एआई आधारित उपकरणों का उपयोग ऑपरेटरों को असामान्य गतिविधियों की पहचान करने और संभावित समस्याओं पर तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद कर सकता है।
हालांकि, एआई पर निर्भरता के साथ नई चुनौतियां भी पैदा होती हैं। गलत डेटा, अधूरी जानकारी या संदर्भ को समझने में चूक के कारण स्वचालित प्रणालियां गलत निर्णय ले सकती हैं। यदि ऐसे निर्णय किसी बड़े नेटवर्क पर लागू होते हैं, तो उनका असर बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं और सेवाओं पर पड़ सकता है।
इसलिए विशेषज्ञों ने एआई आधारित प्रणालियों के लिए स्पष्ट नीतिगत सीमाएं, पर्याप्त मानवीय निगरानी और निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया। दूरसंचार नेटवर्क जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियों में एआई का इस्तेमाल करते समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि स्वचालन के साथ जवाबदेही और सुरक्षा भी बनी रहे।
सम्मेलन में एआई आधारित नेटवर्क सुरक्षा और दूरसंचार आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा से जुड़े सत्र भी आयोजित किए गए। इनमें साइबर खतरों की पहचान, नेटवर्क की निगरानी, डिजिटल प्रणालियों की मजबूती और तकनीकी उपकरणों की विश्वसनीयता पर चर्चा हुई।
आधुनिक दूरसंचार नेटवर्क केवल मोबाइल फोन तक सीमित नहीं हैं। इनके माध्यम से बैंकिंग, सरकारी सेवाएं, स्वास्थ्य, परिवहन और औद्योगिक गतिविधियां भी जुड़ी होती हैं। इसलिए नेटवर्क में किसी बड़ी तकनीकी गड़बड़ी या साइबर हमले का प्रभाव अनेक क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
एआई आधारित सुरक्षा प्रणालियां संदिग्ध गतिविधियों, असामान्य डेटा प्रवाह और संभावित हमलों के संकेतों का विश्लेषण करने में मदद कर सकती हैं। लेकिन साइबर अपराधी भी एआई का उपयोग अधिक जटिल हमले तैयार करने, धोखाधड़ी को बढ़ाने और सुरक्षा प्रणालियों को चकमा देने के लिए कर सकते हैं।
इस कारण सम्मेलन में सुरक्षा के दोहरे पहलू पर जोर रहा—एक ओर एआई का उपयोग नेटवर्क की रक्षा के लिए करना और दूसरी ओर स्वयं एआई प्रणालियों को सुरक्षित बनाना। इसके साथ डेटा की निजता, उपयोगकर्ता संरक्षण और नियामकीय अनुपालन को भी आवश्यक माना गया।
वैश्विक डिजिटल कनेक्टिविटी में समुद्र के भीतर बिछी संचार केबलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। अंतरराष्ट्रीय डेटा यातायात का बड़ा हिस्सा इन केबलों के माध्यम से गुजरता है। भारत की वैश्विक इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल सेवाओं के लिए भी यह बुनियादी ढांचा महत्वपूर्ण है।
सम्मेलन में समुद्र के भीतर मौजूद इन केबलों की सुरक्षा, मजबूती और उनसे जुड़े जोखिमों पर चर्चा की गई। प्राकृतिक आपदाएं, समुद्री गतिविधियां, तकनीकी क्षति और अन्य व्यवधान अंतरराष्ट्रीय संचार को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में केबल नेटवर्क की निगरानी, मरम्मत की क्षमता और वैकल्पिक कनेक्टिविटी व्यवस्था का महत्व बढ़ जाता है।
भारत जैसे देश के लिए यह विषय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां डिजिटल सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और अंतरराष्ट्रीय डेटा विनिमय की जरूरत लगातार बढ़ रही है। समुद्री केबलों में व्यवधान होने पर इंटरनेट सेवाओं की गुणवत्ता, डेटा ट्रांसमिशन और व्यावसायिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
इसलिए दूरसंचार बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को केवल देश के भीतर मौजूद टावरों और नेटवर्क उपकरणों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी से जुड़े पूरे तंत्र की मजबूती भी डिजिटल सुरक्षा का अहम हिस्सा है।
सम्मेलन में नेटवर्क एपीआई और भरोसेमंद इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) तकनीक पर भी विचार-विमर्श किया गया। नेटवर्क एपीआई के माध्यम से सॉफ्टवेयर और डिजिटल सेवाएं दूरसंचार नेटवर्क की कुछ क्षमताओं का उपयोग कर सकती हैं। इससे कंपनियों को अपनी जरूरत के अनुसार सुरक्षित और अनुकूलित सेवाएं तैयार करने में मदद मिल सकती है।
उदाहरण के तौर पर, किसी डिजिटल सेवा को नेटवर्क की उपलब्धता, कनेक्टिविटी की गुणवत्ता या उपयोगकर्ता सत्यापन जैसी सुविधाओं की जरूरत हो सकती है। मानकीकृत एपीआई के माध्यम से ऐसी क्षमताओं का उपयोग आसान बनाया जा सकता है। इससे उद्योगों के लिए नए डिजिटल उत्पाद और सेवाएं विकसित करने के अवसर बढ़ सकते हैं।
आईओटी तकनीक के माध्यम से सेंसर, मशीनें, वाहन और अन्य उपकरण इंटरनेट से जुड़कर डेटा साझा कर सकते हैं। स्मार्ट विनिर्माण, कृषि, लॉजिस्टिक्स और शहरी प्रबंधन में इसका उपयोग बढ़ रहा है। लेकिन अधिक उपकरणों के नेटवर्क से जुड़ने पर सुरक्षा और निजता से जुड़े जोखिम भी बढ़ सकते हैं।
इसलिए भरोसेमंद आईओटी व्यवस्था के लिए सुरक्षित पहचान, डेटा संरक्षण, नियमित सॉफ्टवेयर अपडेट और नेटवर्क के साथ उपकरणों की संगतता महत्वपूर्ण होगी। भविष्य के 6जी नेटवर्क में इन जरूरतों का महत्व और बढ़ने की संभावना है।
एआई आधारित सेवाओं के विस्तार से डेटा सेंटरों और दूरसंचार नेटवर्क की ऊर्जा मांग भी बढ़ रही है। बड़े एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और संचालित करने के लिए उच्च क्षमता वाले कंप्यूटिंग संसाधनों की जरूरत होती है। वहीं, नेटवर्क पर बढ़ते डेटा ट्रैफिक को संभालने के लिए भी उपकरणों, सर्वरों और संचार बुनियादी ढांचे का विस्तार करना पड़ता है।
सम्मेलन में नेटवर्क और एआई डेटा सेंटरों की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों पर चर्चा इस बात का संकेत है कि डिजिटल विकास को टिकाऊ बनाने के लिए ऊर्जा दक्षता पर ध्यान देना जरूरी होगा।
भविष्य में नेटवर्क उपकरणों की ऊर्जा खपत कम करने, संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और डेटा सेंटरों के संचालन को अधिक कुशल बनाने वाले समाधान महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इससे परिचालन लागत घटाने के साथ डिजिटल बुनियादी ढांचे के पर्यावरणीय प्रभाव को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है।
भारत के लिए यह चुनौती इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में डिजिटल सेवाओं की मांग बढ़ रही है और साथ ही उद्योगों को विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति की आवश्यकता भी है। नई तकनीकों के विकास के साथ ऊर्जा दक्षता को शुरुआती डिजाइन और योजना का हिस्सा बनाना आवश्यक होगा।
भारती एयरटेल के कोर नेटवर्क एवं सुरक्षा विभाग के उपाध्यक्ष संजीव धल्लम ने कहा कि एआई संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करने और उन पर तेजी से कार्रवाई करने में दूरसंचार कंपनियों की मदद कर रहा है। उनके अनुसार, एआई के निर्णयों के लिए सही संदर्भ, स्पष्ट नीतिगत सीमाएं और मानवीय निगरानी जरूरी हैं, विशेषकर तब जब किसी कार्रवाई का प्रभाव बड़े नेटवर्क पर पड़ सकता है।
दूरसंचार कंपनियों को लगातार बदलते ट्रैफिक, साइबर खतरों और उपयोगकर्ताओं की जरूरतों के बीच नेटवर्क की विश्वसनीयता बनाए रखनी होती है। एआई इस प्रक्रिया में उपयोगी साबित हो सकता है, लेकिन उसका इस्तेमाल सोच-समझकर और तय सुरक्षा मानकों के अंतर्गत किया जाना आवश्यक है।
रिलायंस जियो के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं उन्नत तकनीक प्रमुख राधे सरदा ने कहा कि नेटवर्क-एज-ए-सर्विस बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जा सकने वाली व्यवस्था बन रही है। उनके अनुसार, 5जी स्टैंडअलोन, नेटवर्क स्लाइसिंग और एज कंप्यूटिंग जैसी तकनीकें उद्योगों को उनकी जरूरतों के अनुसार कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने में मदद कर रही हैं।
नेटवर्क स्लाइसिंग के जरिए एक ही भौतिक नेटवर्क पर अलग-अलग जरूरतों के अनुरूप तार्किक नेटवर्क तैयार किए जा सकते हैं। वहीं, एज कंप्यूटिंग में डेटा को उसके स्रोत के नजदीक संसाधित करने की व्यवस्था होती है, जिससे कुछ अनुप्रयोगों में विलंब कम किया जा सकता है।
इन तकनीकों का उपयोग आपातकालीन परिस्थितियों में प्राथमिकता के आधार पर संचार उपलब्ध कराने, स्मार्ट विनिर्माण और ऐसे औद्योगिक अनुप्रयोगों में हो सकता है, जहां तुरंत प्रतिक्रिया देना आवश्यक होता है।
फोर्टिनेट के प्रौद्योगिकी एवं उत्पाद प्रबंधन के कार्यकारी उपाध्यक्ष रॉबर्ट मे ने कहा कि एआई को अपनाने के साथ डेटा सुरक्षा, नियामकीय अनुपालन और डिजिटल संप्रभुता सुनिश्चित करना भी जरूरी है। उन्होंने एआई आधारित प्रणालियों को सुरक्षित बनाने और साइबर सुरक्षा के काम में एआई का उपयोग करने, दोनों पर समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता बताई।
नोकिया की भारत कंट्री मैनेजर विभा मेहरा ने कहा कि दूरसंचार क्षेत्र को व्यापक प्रौद्योगिकी उद्योग के साथ मिलकर भविष्य की तैयारी करनी होगी। इसके लिए सरकार, उद्योग और विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग के साथ कर्मचारियों के कौशल विकास तथा पुनःप्रशिक्षण पर ध्यान देना जरूरी है।
5जी, 6जी, एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा जैसी तकनीकों के विस्तार से दूरसंचार क्षेत्र में नए प्रकार के कौशल की जरूरत बढ़ेगी। नेटवर्क संचालन, सॉफ्टवेयर विकास, डेटा विश्लेषण, सुरक्षा और सेमीकंडक्टर डिजाइन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित पेशेवरों की मांग महत्वपूर्ण हो सकती है।
यदि उद्योग और शिक्षण संस्थान मिलकर प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित करते हैं, तो विद्यार्थियों और कामकाजी पेशेवरों को नई तकनीकी जरूरतों के अनुरूप तैयार किया जा सकता है। इससे कंपनियों को कुशल मानव संसाधन मिलने के साथ तकनीकी नवाचार को भी बढ़ावा मिल सकता है।
सम्मेलन में यह विचार भी सामने आया कि तकनीकी आत्मनिर्भरता केवल उपकरणों और सॉफ्टवेयर के विकास से हासिल नहीं होती। इसके लिए ऐसे विशेषज्ञों की जरूरत होती है, जो अनुसंधान से लेकर डिजाइन, परीक्षण, तैनाती और रखरखाव तक पूरी तकनीकी प्रक्रिया को समझ सकें।
जीएसएमए की एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सार्वजनिक नीति प्रमुख जेनेट व्हाइट ने कहा कि ऑनलाइन धोखाधड़ी, साइबरबुलिंग और अन्य डिजिटल खतरों से निपटने के लिए सुरक्षा, निजता और उपयोगकर्ता संरक्षण को डिजिटल सेवाओं की शुरुआत से ही शामिल करना होगा।
डिजिटल सेवाओं के विस्तार से लोगों को संचार, शिक्षा, बैंकिंग और अन्य सुविधाओं तक पहुंच मिली है। लेकिन इंटरनेट के बढ़ते उपयोग के साथ धोखाधड़ी, व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग और ऑनलाइन उत्पीड़न जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं।
इन जोखिमों से निपटने के लिए केवल तकनीकी सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं। डिजिटल मंचों, दूरसंचार कंपनियों और नीति निर्माताओं के बीच समन्वय, उपयोगकर्ताओं के लिए जागरूकता कार्यक्रम और शिकायतों के निपटारे की प्रभावी व्यवस्था भी जरूरी है।
नई पीढ़ी के नेटवर्क और एआई आधारित सेवाओं में निजता तथा सुरक्षा को शुरुआत से शामिल करना इसलिए महत्वपूर्ण है, ताकि तकनीकी विकास के साथ उपयोगकर्ताओं का भरोसा भी बना रहे।
सी-डॉट के कार्यकारी उपाध्यक्ष डॉ. दिलीप कृष्णास्वामी ने कहा कि उपग्रह आधारित नेटवर्क, एज एआई और 6जी तकनीक दूरदराज के क्षेत्रों तक जरूरी सेवाएं पहुंचाने, आपदा प्रबंधन को मजबूत करने और ग्रामीण भारत में नए आर्थिक अवसर पैदा करने में मदद कर सकती हैं।
भारत के कई दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पारंपरिक दूरसंचार नेटवर्क का विस्तार चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उपग्रह आधारित कनेक्टिविटी ऐसे क्षेत्रों में संचार सेवाएं उपलब्ध कराने का एक विकल्प प्रदान करती है। यदि इसे स्थलीय नेटवर्क के साथ प्रभावी ढंग से जोड़ा जाए, तो कनेक्टिविटी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
एज एआई का उपयोग स्थानीय स्तर पर डेटा का विश्लेषण करने और कुछ सेवाओं के लिए तुरंत निर्णय लेने में किया जा सकता है। आपदा प्रबंधन में इसका इस्तेमाल मौसम संबंधी जानकारी, संभावित जोखिमों और राहत कार्यों के समन्वय में सहायक हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और स्थानीय उद्यमों से जुड़ी डिजिटल सेवाओं के लिए भी बेहतर कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण है।
हालांकि, इन संभावनाओं को व्यापक स्तर पर साकार करने के लिए नेटवर्क की लागत, उपकरणों की उपलब्धता, ऊर्जा आपूर्ति, स्थानीय कौशल और सेवा की विश्वसनीयता जैसे मुद्दों पर भी काम करना होगा।
इंडिया मोबाइल कांग्रेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रामकृष्ण पी. ने कहा कि दसवें संस्करण तक पहुंचा यह आयोजन अब तकनीकी प्रदर्शन से आगे बढ़कर वैश्विक मानकीकरण, अनुसंधान और नवाचार के लिए महत्वपूर्ण मंच बन गया है। उनके अनुसार, 6जी और एआई के दौर में डिजिटल बुनियादी ढांचे के मानक तय करने के लिए सरकारों, अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संगठनों, उद्योग जगत और स्टार्टअप के बीच सहयोग आवश्यक है।
आईएमसी में विभिन्न कंपनियों और संस्थानों को अपनी तकनीकों, उत्पादों और अनुसंधान के परिणामों को प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। इससे उद्योग जगत को संभावित साझेदारों, निवेशकों और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ संवाद करने का मंच मिलता है।
वैश्विक स्तर पर दूरसंचार मानकों का विकास एक सामूहिक प्रक्रिया है। इसमें नेटवर्क उपकरण निर्माता, मोबाइल ऑपरेटर, चिप डिजाइन कंपनियां, अनुसंधान संस्थान और नियामकीय निकाय अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं। ऐसे में भारत की सक्रिय भागीदारी से देश के तकनीकी अनुभव और जरूरतों को अंतरराष्ट्रीय चर्चा में शामिल करने का अवसर मिल सकता है।
सम्मेलन का महत्व इस बात में भी है कि यहां दूरसंचार के साथ एआई, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा, क्वांटम संचार और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को एक व्यापक डिजिटल अर्थव्यवस्था के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
दूरसंचार विभाग, संचार मंत्रालय और सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) की ओर से आयोजित चार दिवसीय सम्मेलन में 100 से अधिक देशों के 1.5 लाख से अधिक प्रतिभागियों के शामिल होने की संभावना बताई गई है। आयोजन में 600 से अधिक भागीदारों एवं प्रदर्शकों, 500 से अधिक स्टार्टअप और 900 से अधिक विशेषज्ञों की भागीदारी निर्धारित है।
सम्मेलन में 120 से अधिक सत्रों के माध्यम से 2,000 से अधिक तकनीकी उपयोगों और समाधानों को प्रस्तुत किया जा रहा है। इन सत्रों में नेटवर्क की नई क्षमताओं, उद्योगों के डिजिटल रूपांतरण, सुरक्षित संचार, सेमीकंडक्टर तकनीक और उभरते डिजिटल समाधानों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।
स्टार्टअप की भागीदारी इस आयोजन का महत्वपूर्ण पहलू है। उभरती कंपनियां अक्सर किसी विशिष्ट तकनीकी समस्या के समाधान, नए सॉफ्टवेयर, नेटवर्क सुरक्षा या डिजिटल सेवाओं पर काम करती हैं। बड़े उद्योगों और अनुसंधान संस्थानों के साथ उनका सहयोग नए उत्पादों और तकनीकी प्रयोगों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।
हालांकि, किसी तकनीक का प्रदर्शन से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर उपयोग में आना उसकी लागत, विश्वसनीयता, सुरक्षा और बाजार की जरूरतों पर निर्भर करता है। इसलिए ऐसे सम्मेलनों में प्रदर्शित समाधानों को वास्तविक परिस्थितियों में लागू करने के लिए परीक्षण, मानकीकरण और व्यावसायिक सहयोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।
आईएमसी-2026 में 5जी और 6जी, एआई नेटवर्क, सेमीकंडक्टर, गैर-स्थलीय नेटवर्क, साइबर सुरक्षा, क्वांटम संचार, उद्योगों का डिजिटल रूपांतरण, सर्कुलर इकोनॉमी और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण प्रमुख विषयों में शामिल हैं।
गैर-स्थलीय नेटवर्क में उपग्रहों और अन्य अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों के माध्यम से कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की तकनीकों पर काम किया जाता है। इन्हें स्थलीय नेटवर्क के साथ जोड़ने से दूरस्थ क्षेत्रों में संचार सेवाओं के विस्तार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
क्वांटम संचार और संबंधित तकनीकों पर अनुसंधान भी सुरक्षित डिजिटल संचार के भविष्य से जुड़ा हुआ है। वहीं, सर्कुलर इकोनॉमी के अंतर्गत इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के पुनः उपयोग, मरम्मत, पुनर्चक्रण और संसाधनों के अधिक कुशल इस्तेमाल पर ध्यान दिया जाता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के क्षेत्र में घरेलू क्षमता बढ़ाना भी भारत की तकनीकी रणनीति के लिए महत्वपूर्ण है। दूरसंचार नेटवर्क के विस्तार के लिए उपकरणों, चिपों और संबंधित हार्डवेयर की जरूरत होती है। यदि घरेलू उद्योग इन क्षेत्रों में अधिक क्षमता विकसित करते हैं, तो इससे रोजगार, अनुसंधान और विनिर्माण गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
भारत का 5जी से 6जी की ओर बढ़ना दूरसंचार क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलता है। स्वदेशी नेटवर्क तकनीक, सेमीकंडक्टर डिजाइन, एआई आधारित नेटवर्क प्रबंधन और साइबर सुरक्षा में निवेश से देश की तकनीकी क्षमताएं मजबूत हो सकती हैं। साथ ही, वैश्विक मानकीकरण प्रक्रिया में भागीदारी भारतीय कंपनियों और अनुसंधान संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी तकनीक विकसित करने का अवसर दे सकती है।
लेकिन इस दिशा में कई चुनौतियां भी हैं। अत्याधुनिक अनुसंधान के लिए दीर्घकालिक निवेश, कुशल विशेषज्ञों की उपलब्धता, तकनीकी परीक्षण, वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप समाधान विकसित करना आवश्यक होगा। नई तकनीकों को सस्ती और भरोसेमंद सेवाओं के रूप में आम लोगों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इसके साथ डिजिटल सुरक्षा, निजता, ऊर्जा दक्षता और दूरदराज के क्षेत्रों में कनेक्टिविटी की उपलब्धता पर निरंतर ध्यान देना होगा। यदि तकनीकी विकास के साथ इन पहलुओं को भी प्राथमिकता दी जाती है, तो भविष्य के नेटवर्क उद्योगों और आम नागरिकों दोनों के लिए अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, इंडिया मोबाइल कांग्रेस-2026 में हुई चर्चाओं ने यह रेखांकित किया कि भारत की दूरसंचार रणनीति अब केवल नेटवर्क विस्तार तक सीमित नहीं है। देश स्वदेशी तकनीक, एआई, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और वैश्विक मानकीकरण में अपनी भागीदारी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के वक्तव्य के अनुसार, 4जी से मिली तकनीकी क्षमता और 5जी स्टैंडअलोन नेटवर्क का अनुभव 6जी की तैयारियों में महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। आने वाले वर्षों में अनुसंधान, उद्योग सहयोग और मानकीकरण में भारत की भागीदारी यह निर्धारित करने में अहम होगी कि देश भविष्य की वैश्विक दूरसंचार व्यवस्था में कितनी प्रभावी भूमिका निभा पाता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


