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- 13h ago
नई दिल्ली। सितंबर के महीने में आसमान और धरती के बीच एक महत्वपूर्ण खगोलीय बदलाव देखने को मिलता है। 23 सितंबर के आसपास शरद विषुव (Autumnal Equinox) की घटना होती है। इस दौरान सूर्य की सीधी किरणें भूमध्य रेखा के आसपास पड़ती हैं और पृथ्वी के उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्द्ध को सूर्य का प्रकाश लगभग समान मात्रा में प्राप्त होता है। यही वह समय है जब उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मियों का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगता है और शरद ऋतु का आगमन माना जाता है।
शरद विषुव के बाद उत्तरी गोलार्द्ध में दिन लगातार छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं। भारत भी उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है, इसलिए यहां भी सूर्यास्त धीरे-धीरे पहले होने लगता है और सूर्योदय का समय आगे खिसकता जाता है। यह बदलाव दिसंबर में आने वाले शीत अयनांत तक जारी रहता है।
हालांकि आम बोलचाल में विषुव को 12 घंटे दिन और 12 घंटे रात के रूप में बताया जाता है, लेकिन वास्तविकता थोड़ी अलग है। वायुमंडलीय अपवर्तन और सूर्य की डिस्क के आकार के कारण अधिकांश स्थानों पर विषुव के दिन भी वास्तविक उजाले की अवधि ठीक 12 घंटे नहीं होती। जिस दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक की अवधि लगभग बराबर होती है, उसे कई स्थानों पर Equilux के करीब माना जाता है और इसकी तारीख अक्षांश तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते समय अपनी धुरी पर लगभग 23.5 डिग्री झुकी हुई रहती है। यही झुकाव पृथ्वी पर ऋतुओं के बनने का प्रमुख कारण है। वर्ष के दौरान पृथ्वी की स्थिति बदलने के साथ कभी उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर अधिक झुका रहता है तो कभी दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुक जाता है।
वर्ष में दो प्रमुख अवसर ऐसे आते हैं जब सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा के आसपास लगभग सीधी पड़ती हैं। इन्हें विषुव कहा जाता है। एक विषुव मार्च में और दूसरा सितंबर में आता है। मार्च वाला वसंत विषुव और सितंबर वाला शरद विषुव कहलाता है।
विषुव के आसपास पृथ्वी के दोनों गोलार्द्धों को सूर्य का प्रकाश लगभग समान रूप से प्राप्त होता है। इसके बाद दोनों गोलार्द्धों में ऋतुओं का क्रम एक-दूसरे के विपरीत हो जाता है। जब भारत सहित उत्तरी गोलार्द्ध में शरद ऋतु शुरू होती है, उसी समय दक्षिणी गोलार्द्ध में वसंत ऋतु का आगमन होता है।
शरद विषुव के बाद सूर्य का प्रत्यक्ष पथ दक्षिण की ओर खिसकता हुआ दिखाई देता है। उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की ऊंचाई दोपहर के समय धीरे-धीरे कम होती जाती है। इसका सीधा असर दिन की अवधि पर पड़ता है।
भारत में इसके बाद सामान्य रूप से—
हालांकि मौसम में बदलाव अचानक नहीं आता। किसी शहर में गर्मी, उमस या बारिश कुछ समय तक बनी रह सकती है। इसलिए खगोलीय रूप से शरद ऋतु के आगमन और स्थानीय मौसम के बदलाव को एक ही घटना मानना सही नहीं होगा।
पृथ्वी का अक्ष 23.5 डिग्री झुका हुआ है। यही झुकाव सर्दियों में उत्तरी गोलार्द्ध को सूर्य से अपेक्षाकृत दूर झुकी हुई स्थिति में ले जाता है। इस दौरान सूर्य का प्रकाश उत्तरी गोलार्द्ध पर अधिक तिरछा पड़ता है।
तिरछी किरणों से सूर्य का दैनिक मार्ग भी छोटा हो जाता है। सूर्य क्षितिज के ऊपर कम समय तक दिखाई देता है। परिणामस्वरूप दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं।
यह प्रक्रिया दिसंबर के शीत अयनांत (Winter Solstice) के आसपास अपने चरम पर पहुंचती है। उत्तरी गोलार्द्ध में शीत अयनांत वर्ष का सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात वाला समय होता है। इसके बाद दिन फिर धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं।
यह सबसे अधिक पूछे जाने वाले सवालों में से एक है। सामान्य तौर पर विषुव को दिन और रात की बराबरी से जोड़ा जाता है, लेकिन वास्तविकता में किसी स्थान पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक की अवधि ठीक 12 घंटे होना जरूरी नहीं है।
इसके दो प्रमुख कारण हैं।
पृथ्वी का वायुमंडल सूर्य की रोशनी को मोड़ देता है। इसी कारण सूर्य वास्तविक ज्यामितीय स्थिति में क्षितिज से थोड़ा नीचे होने के बावजूद हमें दिखाई देने लगता है।
सूर्य आसमान में एक बिंदु नहीं बल्कि एक गोल डिस्क के रूप में दिखाई देता है। सूर्योदय का समय उस समय दर्ज किया जाता है जब सूर्य की ऊपरी किनारी क्षितिज से दिखाई देती है। इसी तरह सूर्यास्त उस समय माना जाता है जब सूर्य की ऊपरी किनारी क्षितिज के नीचे चली जाती है।
इसलिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक की अवधि को केवल सूर्य के केंद्र की ज्यामितीय स्थिति के आधार पर मापने पर अलग परिणाम मिलता है।
इसी वजह से विषुव और वास्तविक 12 घंटे के दिन-रात की तारीख एक ही होना जरूरी नहीं है।
भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। इसलिए सितंबर के विषुव के बाद यहां दिन की लंबाई धीरे-धीरे घटने लगती है। उत्तर भारत के शहरों में अक्टूबर आते-आते सुबह और शाम के तापमान में अंतर अधिक महसूस होने लगता है।
विशेषकर ग्रामीण और खुले क्षेत्रों में सुबह के समय हल्की ठंडक तथा शाम को मौसम सुहावना लग सकता है। हालांकि सितंबर के अंत और अक्टूबर की शुरुआत में कई क्षेत्रों में मानसून की गतिविधियां जारी रह सकती हैं। इसलिए शरद विषुव का अर्थ यह नहीं है कि पूरे देश में उसी दिन से ठंड शुरू हो जाएगी।
मौसम पर स्थानीय भौगोलिक स्थिति, बादल, वर्षा, हवा और समुद्र से दूरी जैसे कई कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी सितंबर के दौरान शुरू होती है। लेकिन मानसून की वापसी की तारीख हर वर्ष एक जैसी नहीं होती। मौसम विभाग मानसून की वापसी को अलग-अलग क्षेत्रों में दर्ज किए गए मौसम संबंधी मानकों के आधार पर निर्धारित करता है।
इसलिए शरद विषुव और मानसून की विदाई दो अलग-अलग प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं, हालांकि दोनों लगभग इसी समय के आसपास दिखाई दे सकती हैं।
उत्तर भारत में मानसून कमजोर पड़ने के बाद आसमान साफ होने लगता है। उमस कम होने पर सुबह और शाम का मौसम अपेक्षाकृत आरामदायक महसूस हो सकता है। इसके बाद अक्टूबर-नवंबर में तापमान और आर्द्रता में अलग तरह के मौसमी बदलाव दिखाई देते हैं।
शरद विषुव के आसपास आने वाली पूर्णिमा को पश्चिमी खगोलीय परंपरा में Harvest Moon यानी हार्वेस्ट मून कहा जाता है। परंपरागत रूप से यह नाम उत्तरी गोलार्द्ध में फसल कटाई के मौसम से जुड़ा रहा है।
इस पूर्णिमा की खासियत यह मानी जाती है कि वर्ष के इस समय चंद्रमा लगातार कई शामों में अपेक्षाकृत जल्दी उदित होता दिखाई दे सकता है। ऐतिहासिक रूप से इससे किसानों को सूर्यास्त के बाद भी कुछ अतिरिक्त प्राकृतिक रोशनी मिलती थी, जिससे फसल कटाई में मदद मिलती थी।
हालांकि हार्वेस्ट मून का लाल या नारंगी दिखाई देना कोई स्थायी खगोलीय विशेषता नहीं है। चंद्रमा क्षितिज के पास होने पर पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरने वाली रोशनी के कारण पीला, नारंगी या लाल दिखाई दे सकता है।
विषुव के समय पृथ्वी के दोनों गोलार्द्धों को सूर्य का प्रकाश लगभग बराबर मिलता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि धरती के हर स्थान पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक ठीक 12 घंटे का समय होता है।
भूमध्य रेखा, ध्रुवों और अलग-अलग अक्षांशों पर दिन की अवधि अलग-अलग होती है। पृथ्वी के ध्रुवों के पास विषुव का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि वहां लंबे समय तक चलने वाली दिन या रात की स्थिति बदलने लगती है।
विषुव के आसपास भूमध्य रेखा पर सूर्य दोपहर के समय लगभग सिर के ऊपर दिखाई दे सकता है। वहीं जैसे-जैसे हम उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ते हैं, सूर्य की स्थिति और दिन की अवधि में अंतर बढ़ता जाता है।
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और अपनी धुरी पर झुकी रहती है। इस कारण पूरे साल सूर्य की सीधी किरणों का स्थान उत्तर और दक्षिण के बीच बदलता रहता है।
लगभग मार्च में सूर्य की सीधी किरणें भूमध्य रेखा की ओर आती हैं और मार्च विषुव होता है। इसके लगभग छह महीने बाद सितंबर में सूर्य फिर भूमध्य रेखा के ऊपर आता है और सितंबर विषुव होता है।
इस तरह वर्ष में दो बार पृथ्वी पर दिन और रात की अवधि लगभग बराबरी के करीब पहुंचती है।
विषुव की तारीख हर वर्ष बिल्कुल एक जैसी नहीं रहती। पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में ठीक 365 दिन नहीं बल्कि लगभग 365.24 दिन लगते हैं। इसी अंतर को समायोजित करने के लिए लीप वर्ष की व्यवस्था की गई है।
इसी वजह से विषुव का सटीक समय और तारीख वर्ष-दर-वर्ष थोड़ा बदल सकती है। इसलिए किसी विशेष वर्ष में विषुव का सही समय जानने के लिए खगोलीय गणनाओं और आधिकारिक खगोलीय पंचांग को देखना अधिक उचित होता है।
सितंबर विषुव के बाद उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लगातार घटती रहती है। यह बदलाव दिसंबर के शीत अयनांत तक जारी रहता है।
शीत अयनांत के बाद स्थिति उलटने लगती है। दिन फिर धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं और रातों की अवधि कम होने लगती है। इसी प्राकृतिक चक्र के कारण पृथ्वी पर हर वर्ष ऋतुओं का क्रम दोहराता रहता है।
इस पूरी प्रक्रिया का आधार पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना और उसकी धुरी का लगभग 23.5 डिग्री झुका होना है।
शरद विषुव कोई ऐसा दृश्य खगोलीय नजारा नहीं है जिसमें आकाश में अचानक कोई चमकदार वस्तु दिखाई दे। यह पृथ्वी की स्थिति और सूर्य के संबंध में होने वाला एक खगोलीय परिवर्तन है।
इसे देखने के लिए टेलीस्कोप की आवश्यकता नहीं होती। इसके प्रभाव को दिन की लंबाई, सूर्यास्त-सूर्योदय के समय और मौसम में धीरे-धीरे होने वाले बदलाव के रूप में महसूस किया जा सकता है।
आसमान में सूर्य को सीधे देखने से आंखों को नुकसान हो सकता है, इसलिए सूर्य की ओर बिना उचित सौर फिल्टर के सीधे देखना सुरक्षित नहीं है।
शरद विषुव केवल खगोल विज्ञान की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी के मौसम चक्र को समझने में भी मदद करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि दिन और रात की लंबाई क्यों बदलती है, ऋतुएं क्यों आती हैं और सूर्य की ऊंचाई वर्ष के अलग-अलग समय में क्यों बदलती रहती है।
23 सितंबर के आसपास होने वाला यह बदलाव हमें यह भी याद दिलाता है कि पृथ्वी लगातार गतिशील है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमने के साथ सूर्य की परिक्रमा करती रहती है और इसी गति तथा अक्षीय झुकाव के कारण हमारे दिन, रात और ऋतुओं का पूरा चक्र चलता रहता है।
इसलिए 23 सितंबर को होने वाला शरद विषुव धरती के वार्षिक खगोलीय चक्र की एक महत्वपूर्ण घटना है। इसके बाद उत्तरी गोलार्द्ध में दिन धीरे-धीरे छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में इसके विपरीत मौसमी बदलाव शुरू हो जाता है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


