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- 13h ago
नई दिल्ली। देश में टीबी उन्मूलन की मुहिम को वैज्ञानिक शोध के स्तर पर नई मजबूती देने की दिशा में एम्स नई दिल्ली और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने महत्वपूर्ण साझेदारी की है। बैंक की कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) पहल के तहत एम्स नई दिल्ली के मेडिसिन विभाग में ‘माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के जीनोटाइप और फेनोटाइप के साथ-साथ इसके नैदानिक प्रभाव का व्यापक अध्ययन’ नामक शोध परियोजना शुरू की गई है।
इस परियोजना का उद्देश्य टीबी पैदा करने वाले माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के आनुवंशिक और जैविक गुणों को गहराई से समझना तथा यह पता लगाना है कि बैक्टीरिया की इन विशेषताओं का बीमारी के स्वरूप और मरीजों के उपचार पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है।
शोध परियोजना का शुभारंभ 6 अक्टूबर को एम्स नई दिल्ली के निदेशक प्रो. निखिल टंडन और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया दिल्ली जोन के महाप्रबंधक एच.के. दास की मौजूदगी में किया गया।
इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि शोध को केवल प्रयोगशाला में बैक्टीरिया के अध्ययन तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि उसके क्लिनिकल प्रभावों को भी समझने की कोशिश की जाएगी।
शोधकर्ता टीबी बैक्टीरिया के जीनोटाइप और फेनोटाइप के बीच संबंधों का अध्ययन करेंगे। सरल शब्दों में कहें तो जीनोटाइप बैक्टीरिया की आनुवंशिक विशेषताओं से जुड़ा है, जबकि फेनोटाइप में उन आनुवंशिक और जैविक विशेषताओं के कारण दिखाई देने वाले गुणों को समझा जाता है।
इन दोनों के बीच संबंध को समझने से यह जानने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग बैक्टीरियल विशेषताएं बीमारी के व्यवहार और मरीजों की क्लिनिकल स्थिति से किस तरह जुड़ी हैं।
यही वजह है कि इस अध्ययन को बेसिक साइंस से क्लिनिकल केयर तक जोड़ने वाली ट्रांसलेशनल रिसर्च की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
टीबी एक जटिल संक्रामक बीमारी है और इसके प्रभाव को समझने के लिए केवल मरीज के लक्षणों का अध्ययन पर्याप्त नहीं होता। बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया की जैविक और आनुवंशिक विशेषताओं को समझना भी महत्वपूर्ण है।
प्रस्तावित शोध में इन विशेषताओं और उनके नैदानिक प्रभावों के बीच संभावित संबंधों का अध्ययन किया जाएगा। इससे बीमारी की प्रकृति और संक्रमण के व्यवहार को लेकर वैज्ञानिक समझ को और मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
शोध से जुटाए जाने वाले वैज्ञानिक प्रमाण भविष्य में टीबी मरीजों के क्लिनिकल प्रबंधन और देखभाल को बेहतर बनाने के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
टीबी के उपचार में सही चिकित्सकीय प्रबंधन के लिए बीमारी के व्यवहार को समझना महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में यदि बैक्टीरिया की आनुवंशिक और जैविक विशेषताओं तथा मरीजों में बीमारी के प्रभाव के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध सामने आता है तो वह भविष्य के अनुसंधान और क्लिनिकल रणनीतियों के लिए उपयोगी आधार बन सकता है।
हालांकि किसी भी शोध के परिणामों को मरीजों के उपचार में लागू करने से पहले वैज्ञानिक परीक्षण और वैधता की प्रक्रिया से गुजरना जरूरी होता है, लेकिन इस तरह की परियोजनाएं भविष्य में बेहतर उपचार पद्धतियों के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
एम्स नई दिल्ली के निदेशक प्रो. निखिल टंडन ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के एमडी एवं सीईओ आशीष पांडे और यूनियन बैंक सोशल फाउंडेशन ट्रस्ट के सहयोग के लिए आभार जताया।
उन्होंने कहा कि देश के बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों से निपटने के लिए प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बीच इस तरह के शोध सहयोग महत्वपूर्ण हैं।
ऐसी साझेदारियों के माध्यम से वैज्ञानिक संस्थानों को महत्वपूर्ण शोध परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सहयोग मिल सकता है और कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के संसाधनों को सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण अनुसंधान के साथ जोड़ा जा सकता है।
इस परियोजना में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की सीएसआर पहल की भूमिका महत्वपूर्ण है। सीएसआर के संसाधनों को केवल सामाजिक सहायता तक सीमित रखने के बजाय वैज्ञानिक शोध और सार्वजनिक स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस्तेमाल करने से दीर्घकालिक प्रभाव पैदा किया जा सकता है।
टीबी जैसी बीमारी के मामले में शोध का लाभ तत्काल किसी एक मरीज तक सीमित नहीं रहता। बैक्टीरिया के व्यवहार, बीमारी की प्रकृति और क्लिनिकल प्रभावों को लेकर बेहतर वैज्ञानिक जानकारी भविष्य में बड़ी संख्या में मरीजों के उपचार और देखभाल के लिए उपयोगी हो सकती है।
इस दृष्टि से एम्स और बैंक की यह साझेदारी सार्वजनिक स्वास्थ्य और शोध वित्तपोषण के बीच सहयोग का उदाहरण बन सकती है।
स्वास्थ्य अनुसंधान में ट्रांसलेशनल रिसर्च का उद्देश्य प्रयोगशाला में हासिल वैज्ञानिक जानकारी को वास्तविक मरीजों की देखभाल से जोड़ना होता है।
टीबी के संदर्भ में भी यह महत्वपूर्ण है कि माइक्रोबायोलॉजी और जेनेटिक स्तर पर हासिल जानकारी को क्लिनिकल परिस्थितियों के साथ जोड़कर देखा जाए।
एम्स की प्रस्तावित परियोजना इसी दिशा में आगे बढ़ती दिखाई देती है। इसमें बैक्टीरिया की विशेषताओं के अध्ययन के साथ-साथ उनके नैदानिक प्रभावों को समझने पर जोर है।
इससे शोध के निष्कर्षों को मरीजों की बीमारी और उपचार से संबंधित वास्तविक परिस्थितियों के संदर्भ में समझने का अवसर मिलेगा।
शोध का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य ऐसे वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना है जो टीबी के बेहतर क्लिनिकल प्रबंधन में योगदान कर सकें।
यदि अध्ययन के दौरान बैक्टीरिया की आनुवंशिक एवं जैविक विशेषताओं और मरीजों की बीमारी के बीच महत्वपूर्ण संबंध सामने आते हैं तो इससे भविष्य के अनुसंधान के लिए नए सवाल और संभावनाएं भी पैदा हो सकती हैं।
इस तरह की जानकारी शोधकर्ताओं और चिकित्सकों को बीमारी को अधिक व्यापक दृष्टिकोण से समझने में मदद कर सकती है।
देश में टीबी उन्मूलन की दिशा में सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ-साथ वैज्ञानिक अनुसंधान की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बीमारी की पहचान, संक्रमण की समझ, उपचार और मरीजों की देखभाल से जुड़े क्षेत्रों में लगातार शोध की आवश्यकता बनी रहती है।
ऐसे में एम्स जैसे प्रमुख चिकित्सा एवं शोध संस्थान में शुरू होने वाली परियोजनाएं टीबी से जुड़े वैज्ञानिक ज्ञान को आगे बढ़ाने में योगदान कर सकती हैं।
इस परियोजना की खासियत यह है कि इसमें बैक्टीरिया के जीनोटाइप, फेनोटाइप और उनके क्लिनिकल प्रभाव को एक साथ समझने का प्रयास किया जा रहा है।
टीबी के खिलाफ लड़ाई में वैज्ञानिक अनुसंधान तभी व्यापक प्रभाव पैदा करता है जब प्रयोगशाला में प्राप्त जानकारी का संबंध मरीजों की वास्तविक जरूरतों से जुड़ सके।
यही कारण है कि इस परियोजना को केवल एक वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में नहीं, बल्कि प्रयोगशाला से क्लिनिकल प्रैक्टिस तक ज्ञान पहुंचाने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा रहा है।
शोध के निष्कर्षों से भविष्य में बीमारी की समझ, मरीजों के क्लिनिकल प्रबंधन और उपचार संबंधी अनुसंधान के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं।
हालांकि इन संभावित लाभों को शोध पूरा होने और उसके वैज्ञानिक निष्कर्ष सामने आने के बाद ही स्पष्ट रूप से आंका जा सकेगा।
एम्स नई दिल्ली और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की यह पहल यह भी दर्शाती है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की जटिल चुनौतियों से निपटने में सरकारी संस्थानों, शैक्षणिक एवं चिकित्सा संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों के बीच सहयोग कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।
एक ओर एम्स की चिकित्सा विशेषज्ञता और शोध क्षमता है, तो दूसरी ओर सीएसआर के माध्यम से उपलब्ध वित्तीय सहयोग इस तरह की परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।
ऐसी साझेदारियों का उद्देश्य केवल वर्तमान स्वास्थ्य चुनौतियों का अध्ययन करना नहीं, बल्कि भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों और क्लिनिकल प्रबंधन के लिए मजबूत वैज्ञानिक आधार तैयार करना भी है।
टीबी के खिलाफ लड़ाई में हर वैज्ञानिक अध्ययन की वास्तविक उपयोगिता उसके निष्कर्षों और उन निष्कर्षों के प्रभावी इस्तेमाल से तय होती है। एम्स में शुरू हुई यह परियोजना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण शोध प्रयास है।
माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के आनुवंशिक और जैविक गुणों को समझने से लेकर उनके नैदानिक प्रभावों का अध्ययन करने तक, यह परियोजना टीबी को अधिक वैज्ञानिक और व्यापक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करेगी।
शोध से निकलने वाले प्रमाण यदि भविष्य में बीमारी की बेहतर पहचान, उपचार और मरीजों की देखभाल को अधिक प्रभावी बनाने में योगदान देते हैं, तो यह पहल टीबी उन्मूलन के व्यापक प्रयासों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। एम्स नई दिल्ली ने भी संकेत दिया है कि संस्थान भविष्य में नवाचार, शोध और संस्थागत साझेदारियों के माध्यम से ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाता रहेगा, जिनका व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सके।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


