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- 13h ago
नई दिल्ली। लाल किला स्थित माधव दास पार्क में आयोजित श्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला में भगवान श्रीराम के वनगमन से जुड़े केवट प्रसंग का भावपूर्ण मंचन किया गया। रामायण के इस महत्वपूर्ण प्रसंग में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के गंगा तट पर पहुंचने तथा केवट द्वारा उन्हें नाव से गंगा पार कराने की कथा को मंच पर जीवंत किया गया। केवट की अनन्य भक्ति, प्रभु श्रीराम के प्रति उसकी श्रद्धा और दोनों के बीच हुए भावपूर्ण संवाद ने दर्शकों का मन मोह लिया। मंचन के दौरान पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से सराबोर नजर आया। भगवान श्रीराम के जयकारों से गूंजते रामलीला परिसर में श्रद्धालु कथा के विभिन्न दृश्यों से भावनात्मक रूप से जुड़ते दिखाई दिए।
रामलीला में प्रस्तुत केवट प्रसंग भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं में शामिल है, जो भक्ति, प्रेम, सेवा, समर्पण और मानवीय समानता का संदेश देती हैं। इस प्रसंग के माध्यम से कलाकारों ने यह दर्शाने का प्रयास किया कि प्रभु के प्रति सच्ची श्रद्धा किसी पद, प्रतिष्ठा या सामाजिक स्थिति की मोहताज नहीं होती। निष्कपट प्रेम और समर्पण ही भक्ति का वास्तविक आधार हैं।
रामलीला के मंचन में दिखाया गया कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण गंगा तट पर पहुंचते हैं। गंगा पार जाने के लिए भगवान श्रीराम केवट से नाव की सहायता मांगते हैं। इस दौरान केवट प्रभु श्रीराम के चरण पखारने की इच्छा व्यक्त करता है। केवट की इस अनूठी भावना के पीछे उसकी गहरी आस्था और भगवान के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाया गया।
केवट की भक्ति का यह रूप रामायण की कथा में विशेष महत्व रखता है। वह भगवान श्रीराम को केवल एक यात्री के रूप में नहीं देखता, बल्कि उनके प्रति अपने मन में गहरी श्रद्धा रखता है। उसके लिए प्रभु की सेवा करना किसी बड़े सौभाग्य से कम नहीं है। इसी भावना के चलते वह पहले भगवान श्रीराम के चरण धोने की इच्छा प्रकट करता है।
मंच पर इस दृश्य को भावपूर्ण संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। केवट की विनम्रता, सहजता और समर्पण ने प्रसंग को प्रभावशाली बनाया। भगवान श्रीराम और केवट के बीच संवाद के दौरान भक्ति की सरलता और आत्मीयता का सुंदर चित्रण देखने को मिला।
चरण पखारने के बाद केवट भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को अपनी नाव में बैठाकर गंगा पार कराता है। यह दृश्य सेवा और समर्पण की भावना को सामने लाता है। रामलीला के कलाकारों ने इस प्रसंग को पारंपरिक शैली में प्रस्तुत कर दर्शकों को रामायण की कथा से जोड़े रखा।
केवट प्रसंग रामकथा का ऐसा अध्याय है, जिसमें एक साधारण नाविक की असाधारण भक्ति सामने आती है। केवट के पास न कोई राजसी वैभव है और न ही कोई विशेष पद, लेकिन उसके हृदय में भगवान श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा है। वह अपनी सेवा को प्रभु के प्रति प्रेम व्यक्त करने का माध्यम मानता है।
इस प्रसंग का मूल संदेश यही है कि ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति के लिए बाहरी आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। मन की पवित्रता, विनम्रता, प्रेम और निस्वार्थ सेवा ही व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाती हैं। केवट का चरित्र इसी भावना का प्रतिनिधित्व करता है।
रामलीला के मंचन के माध्यम से यह संदेश भी दिया गया कि समाज में किसी व्यक्ति का महत्व उसकी आर्थिक स्थिति, पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, विचारों और मानवीय गुणों से तय होना चाहिए। भगवान श्रीराम और केवट के प्रसंग में आत्मीयता तथा सम्मान की जो भावना दिखाई देती है, वह सामाजिक समानता और आपसी सद्भाव का प्रतीक है।
रामलीला के दौरान भगवान श्रीराम और केवट के बीच हुए संवाद ने दर्शकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। संवादों के जरिए केवट की श्रद्धा और भगवान श्रीराम की सहजता को प्रस्तुत किया गया। इस प्रसंग की भावनात्मक गहराई ने रामलीला देखने पहुंचे श्रद्धालुओं को कथा से जोड़ दिया।
रामायण के प्रसंगों की विशेषता यह है कि उनमें जीवन के गहरे संदेश सरल घटनाओं और पात्रों के माध्यम से प्रस्तुत किए जाते हैं। केवट और श्रीराम का संवाद भी इसी परंपरा का उदाहरण है। इसमें भक्ति के साथ-साथ विनम्रता, सेवा और मानवीय संबंधों की गरिमा को प्रमुखता दी गई है।
मंच पर जब केवट प्रभु श्रीराम के चरण पखारने की इच्छा व्यक्त करता है, तो उसके मन में निहित श्रद्धा और समर्पण की भावना सामने आती है। वहीं, भगवान श्रीराम का सहज और मर्यादित व्यवहार उनके चरित्र की विशेषताओं को रेखांकित करता है। यही कारण है कि केवट प्रसंग रामलीला के लोकप्रिय और भावनात्मक दृश्यों में गिना जाता है।
केवट प्रसंग के मंचन के दौरान रामलीला परिसर में भक्तिमय माहौल बना रहा। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम के जयकारे लगाए और कलाकारों की प्रस्तुति का आनंद लिया। रामायण की कथा के परिचित प्रसंगों को मंच पर जीवंत होते देख दर्शकों में विशेष उत्साह नजर आया।
रामलीला की परंपरा में दर्शकों की सहभागिता का भी महत्वपूर्ण स्थान है। जब मंच पर भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों का अभिनय होता है, तो दर्शक केवल दर्शक बनकर नहीं रहते, बल्कि भावनात्मक रूप से कथा के साथ जुड़ जाते हैं। जयकारों और भक्ति भाव से वातावरण में धार्मिक उत्साह का संचार होता है।
लाल किला स्थित माधव दास पार्क में आयोजित श्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला भी इसी सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाती नजर आई। भगवान श्रीराम के वनगमन से जुड़े प्रसंग ने श्रद्धालुओं को रामायण के मूल संदेशों पर विचार करने का अवसर दिया।
रामलीला भारतीय संस्कृति की प्राचीन और लोकप्रिय नाट्य परंपराओं में शामिल है। इसके माध्यम से रामायण की कथा को अभिनय, संवाद, संगीत और मंचन के जरिए लोगों तक पहुंचाया जाता है। धार्मिक आस्था से जुड़े इस आयोजन का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज को नैतिकता, कर्तव्य, मर्यादा और सदाचार का संदेश देना भी है।
रामायण के विभिन्न पात्र अपने जीवन और व्यवहार के माध्यम से अलग-अलग आदर्श प्रस्तुत करते हैं। भगवान श्रीराम मर्यादा और कर्तव्यपालन के प्रतीक हैं, माता सीता धैर्य और आत्मसम्मान की प्रेरणा देती हैं, जबकि लक्ष्मण सेवा और भ्रातृप्रेम का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसी प्रकार केवट का चरित्र सच्ची भक्ति, विनम्रता और निस्वार्थ सेवा का संदेश देता है।
रामलीला के माध्यम से इन आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में भी मदद मिलती है। बच्चे और युवा मंच पर रामायण के प्रसंग देखकर भारतीय सांस्कृतिक विरासत से परिचित होते हैं। इस प्रकार रामलीला धार्मिक शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक मूल्यों के प्रसार का माध्यम बनती है।
वर्तमान समय में केवट प्रसंग का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। समाज में आपसी सम्मान, समानता और मानवीय संवेदनाओं को मजबूत करने के लिए इस प्रकार की कथाएं प्रेरणा देती हैं। केवट का चरित्र बताता है कि सेवा करने वाला व्यक्ति अपने कार्य से महान बनता है और सच्ची श्रद्धा के लिए किसी विशेष सामाजिक पहचान की आवश्यकता नहीं होती।
भगवान श्रीराम और केवट के बीच का प्रसंग यह भी सिखाता है कि प्रेम और विश्वास पर आधारित संबंधों में सहजता तथा सम्मान का विशेष महत्व होता है। जब व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की सहायता करता है, तो उसका कार्य समाज में सकारात्मक संदेश देता है।
रामलीला के मंच पर इस प्रसंग का चित्रण दर्शकों को यह समझने का अवसर देता है कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। धर्म के मूल में सेवा, करुणा, सत्य, सदाचार और सभी के प्रति सम्मान जैसे मूल्य निहित हैं। इन्हीं मूल्यों को अपने व्यवहार में अपनाकर समाज में बेहतर वातावरण बनाया जा सकता है।
श्री धार्मिक लीला कमेटी की रामलीला में केवट प्रसंग का मंचन भगवान श्रीराम की कथा के भावनात्मक और आध्यात्मिक पक्ष को सामने लाने वाला रहा। गंगा तट पर प्रभु श्रीराम और केवट के संवाद से लेकर नाव द्वारा गंगा पार कराने तक के दृश्य ने दर्शकों को भक्ति और समर्पण की भावना से जोड़ने का प्रयास किया।
यह प्रसंग याद दिलाता है कि सच्ची भक्ति में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं होता। विनम्रता, प्रेम और सेवा के माध्यम से ही व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। केवट की श्रद्धा और प्रभु श्रीराम के प्रति उसका समर्पण रामायण की कथा को विशेष अर्थ प्रदान करता है।
लाल किला स्थित माधव दास पार्क में रामलीला के इस मंचन ने एक बार फिर भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं की जीवंतता को रेखांकित किया। भगवान श्रीराम के जयकारों, भावपूर्ण संवादों और केवट की भक्ति से सजे इस प्रसंग ने दर्शकों के सामने मर्यादा, सेवा, समानता और समर्पण का संदेश रखा। रामलीला की यही विशेषता है कि वह सदियों पुरानी कथा को वर्तमान पीढ़ी के लिए भी प्रासंगिक बनाते हुए भारतीय संस्कृति की विरासत को आगे बढ़ाती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


