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- 13h ago
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने किसानों, दिल्ली के ट्रैफिक प्रबंधन और देश के रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर कई अहम फैसले किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट और कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स की बैठकों में रबी मार्केटिंग सीजन 2027-28 के लिए छह प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी, दिल्ली के लिए इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) और ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज-III को मंजूरी दी गई।
सरकार के मुताबिक इन फैसलों का फोकस एक तरफ किसानों को उनकी फसलों का लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराने और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने पर है, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के बढ़ते यातायात को रियल-टाइम तकनीक के माध्यम से व्यवस्थित करने और देश में बढ़ती अक्षय ऊर्जा क्षमता के लिए मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क तैयार करने पर है।
केंद्रीय कैबिनेट ने मार्केटिंग सीजन 2027-28 के लिए सभी छह अनिवार्य रबी फसलों के MSP में वृद्धि को मंजूरी दी है। इनमें गेहूं, जौ, चना, मसूर, रेपसीड एवं सरसों और कुसुम शामिल हैं।
सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार नए MSP इस प्रकार होंगे—
| फसल | 2027-28 का MSP | MSP में बढ़ोतरी |
|---|---|---|
| गेहूं | ₹2,610 प्रति क्विंटल | ₹25 |
| जौ | ₹2,286 प्रति क्विंटल | ₹136 |
| चना | ₹5,958 प्रति क्विंटल | ₹83 |
| मसूर | ₹7,390 प्रति क्विंटल | ₹390 |
| रेपसीड एवं सरसों | ₹6,613 प्रति क्विंटल | ₹413 |
| कुसुम | ₹7,215 प्रति क्विंटल | ₹675 |
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कुसुम के MSP में सबसे अधिक ₹675 प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। इसके बाद रेपसीड एवं सरसों में ₹413, मसूर में ₹390, जौ में ₹136, चने में ₹83 और गेहूं में ₹25 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है।
सरकार के आधिकारिक आंकड़ों में चने का नया MSP ₹5,958 प्रति क्विंटल दर्ज है। इसलिए खबर में ₹5,928 की जगह ₹5,958 लिखा जाना चाहिए। वर्ष 2026-27 में चने का MSP ₹5,875 प्रति क्विंटल था, जिसमें ₹83 की वृद्धि के बाद यह ₹5,958 हुआ है।
केंद्र सरकार के मुताबिक रबी फसलों के लिए घोषित MSP में अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत के मुकाबले पर्याप्त मार्जिन रखा गया है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार गेहूं पर लागत के मुकाबले अनुमानित मार्जिन 106 प्रतिशत, रेपसीड एवं सरसों पर 96 प्रतिशत, मसूर पर 92 प्रतिशत, चने पर 59 प्रतिशत, जौ पर 58 प्रतिशत और कुसुम पर 50 प्रतिशत है।
सरकार ने कहा है कि MSP में यह बढ़ोतरी 2018-19 के केंद्रीय बजट में घोषित उस नीति के अनुरूप है, जिसमें MSP को अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत के कम से कम 1.5 गुना के स्तर पर रखने की बात कही गई थी।
केंद्र के अनुसार गेहूं उत्पादक किसानों को 2014-15 से 2025-26 के दौरान MSP के रूप में कुल ₹7.31 लाख करोड़ का भुगतान किया गया। यह राशि 2004-05 से 2013-14 के दौरान ₹2.56 लाख करोड़ थी।
इसी तरह छह रबी फसलों के किसानों को 2014-15 से 2025-26 के दौरान MSP के तहत कुल ₹8.36 लाख करोड़ का भुगतान किया गया, जबकि 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह राशि ₹2.65 लाख करोड़ थी।
सरकार के मुताबिक हाल के वर्षों में गेहूं और चावल जैसे अनाजों के अलावा दालों और तिलहनों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए इन फसलों के MSP को बढ़ाया गया है। इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना भी है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 से 2025-26 के दौरान गेहूं की खरीद 3,715 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गई, जबकि 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह 2,254 लाख मीट्रिक टन थी।
इसी अवधि में छह रबी फसलों की कुल खरीद 3,921 लाख मीट्रिक टन रही, जबकि 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह 2,302 लाख मीट्रिक टन थी। सरकार इन आंकड़ों को MSP व्यवस्था के तहत खरीद में हुई वृद्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
कैबिनेट ने दिल्ली के लिए इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) लागू करने को भी मंजूरी दी है। इस परियोजना पर ₹1,789.52 करोड़ खर्च होंगे। परियोजना का उद्देश्य दिल्ली के ट्रैफिक सिग्नलों को रियल-टाइम यातायात की स्थिति के अनुसार अधिक अनुकूल बनाना है।
सरकार के मुताबिक दिल्ली में बड़ी संख्या में ट्रैफिक सिग्नल अभी निर्धारित समय के आधार पर संचालित होते हैं। नए सिस्टम में तकनीक और रियल-टाइम ट्रैफिक डेटा के आधार पर सिग्नल टाइमिंग को समायोजित करने की व्यवस्था होगी।
उदाहरण के तौर पर यदि किसी सड़क पर वाहनों की संख्या अधिक है और दूसरी दिशा में यातायात कम है, तो सिस्टम मौजूदा ट्रैफिक स्थिति के अनुसार सिग्नल के समय में बदलाव करने में सक्षम होगा। इससे यातायात के प्रवाह को बेहतर तरीके से व्यवस्थित करने का लक्ष्य है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार ITMS परियोजना के तहत दिल्ली के 42 चिन्हित ट्रैफिक कॉरिडोर को शामिल किया जाएगा। इसे तीन चरणों में 24 महीने में लागू करने की योजना है। इसके बाद पांच वर्ष के लिए संचालन एवं रखरखाव की व्यवस्था भी परियोजना में शामिल है।
नई व्यवस्था में AI आधारित एडाप्टिव ट्रैफिक सिग्नल, तकनीक आधारित ट्रैफिक प्रवर्तन और रियल-टाइम ट्रैफिक सूचना जैसी सुविधाओं को शामिल किया जाएगा।
सरकार के अनुसार इससे एंबुलेंस को प्राथमिकता के साथ रास्ता उपलब्ध कराने तथा जाम और सड़क संबंधी घटनाओं पर प्रतिक्रिया समय कम करने में भी मदद मिल सकती है।
मौजूदा व्यवस्था में कई सिग्नल निर्धारित समय के हिसाब से काम करते हैं। ऐसे में कई बार किसी दिशा में वाहन कम होने के बावजूद सिग्नल का समय पहले से निर्धारित रहता है।
ITMS में सेंसर, कैमरा, डेटा और अन्य तकनीकी प्रणालियों के माध्यम से यातायात की स्थिति का विश्लेषण करने की व्यवस्था होगी। इसके आधार पर सिग्नल टाइमिंग में बदलाव किया जा सकेगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ सिग्नल बदलना नहीं, बल्कि दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों के ट्रैफिक नेटवर्क को एक-दूसरे से जोड़कर अधिक समन्वित तरीके से संचालित करना है।
केंद्र सरकार ने ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज-III (GEC-III) को भी मंजूरी दी है। इस योजना का कुल परियोजना परिव्यय ₹1,86,405 करोड़ है।
सरकार के मुताबिक इस योजना के माध्यम से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 135 गीगावाट तक अक्षय ऊर्जा के ट्रांसमिशन और पावर इवैक्युएशन की सुविधा विकसित की जाएगी। परियोजना को वित्त वर्ष 2032-33 तक स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज-III में 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।
आधिकारिक योजना के अनुसार कुल ₹1,86,405 करोड़ के परिव्यय में से ₹1,36,378 करोड़ इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम के विकास के लिए और ₹50,000 करोड़ 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम के लिए निर्धारित हैं।
बैटरी स्टोरेज का उद्देश्य अक्षय ऊर्जा उत्पादन में होने वाले उतार-चढ़ाव को संभालने, ग्रिड में लचीलापन बढ़ाने, भीड़भाड़ कम करने और पीक आवर्स में बिजली की उपलब्धता को बेहतर बनाने में मदद करना है।
देश में सौर और पवन ऊर्जा की बड़ी संभावनाएं कई ऐसे क्षेत्रों में हैं, जहां बिजली की खपत उत्पादन की तुलना में कम है। राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्र और लद्दाख जैसे इलाकों में अक्षय ऊर्जा उत्पादन की संभावनाओं का इस्तेमाल करने के लिए मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क की जरूरत है।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर का उद्देश्य ऐसे उत्पादन केंद्रों से बिजली को उन क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए ट्रांसमिशन क्षमता विकसित करना है जहां उसकी आवश्यकता है।
रिन्यूएबल ऊर्जा में उत्पादन मौसम और समय के साथ बदलता रहता है। सौर ऊर्जा दिन के समय उपलब्ध होती है, जबकि पवन ऊर्जा का उत्पादन भी मौसम और हवा की स्थिति पर निर्भर करता है। ऐसे में बिजली ग्रिड को इन उतार-चढ़ाव के अनुरूप तैयार करना जरूरी है।
सरकार ने 2030 तक 500 गीगावाट नॉन-फॉसिल फ्यूल आधारित बिजली क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसी दिशा में ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करने और अक्षय ऊर्जा की बिजली को ग्रिड तक पहुंचाने की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज-III को इसी व्यापक लक्ष्य से जोड़कर देखा जा रहा है। परियोजना के तहत राज्यों के भीतर ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करने के साथ-साथ बैटरी स्टोरेज को भी जोड़ा जाएगा।
कैबिनेट के इन फैसलों को तीन अलग-अलग क्षेत्रों से जोड़कर देखा जा सकता है। पहला फैसला सीधे किसानों और कृषि क्षेत्र से संबंधित है। छह रबी फसलों के MSP में बढ़ोतरी से सरकार ने 2027-28 मार्केटिंग सीजन के लिए नई समर्थन मूल्य व्यवस्था तय की है।
दूसरा फैसला दिल्ली के शहरी परिवहन से जुड़ा है। ITMS के माध्यम से ट्रैफिक सिग्नल और यातायात प्रबंधन को रियल-टाइम तकनीक से जोड़ने की योजना है।
तीसरा फैसला बिजली और ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित है। GEC-III के माध्यम से अक्षय ऊर्जा की बढ़ती क्षमता को ग्रिड से जोड़ने के लिए ट्रांसमिशन और स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाएगा।
इस तरह एक ही कैबिनेट बैठक से जुड़े फैसलों में कृषि, शहरी परिवहन और ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर तीनों क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
MSP में सबसे अधिक वृद्धि कुसुम, रेपसीड एवं सरसों और मसूर जैसी फसलों में होने से सरकार की फसल विविधीकरण नीति भी सामने आती है। गेहूं के मुकाबले इन फसलों में अधिक MSP वृद्धि की गई है।
केंद्र का कहना है कि अधिक MSP के माध्यम से दालों और तिलहनों की खेती को प्रोत्साहित करने की कोशिश की जा रही है। इससे कृषि क्षेत्र में फसल पैटर्न में विविधता लाने का लक्ष्य है। हालांकि MSP का वास्तविक लाभ किसानों तक कितना पहुंचता है, यह खरीद व्यवस्था, बाजार कीमत, स्थानीय मंडियों और सरकारी खरीद की उपलब्धता जैसे कारकों पर भी निर्भर करता है।
केंद्रीय कैबिनेट के इन फैसलों में—
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


