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- 13h ago
मथुरा। उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में आयोग से चयनित होकर पहुंचे अभ्यर्थियों को नियुक्ति और कार्यभार ग्रहण कराने की प्रक्रिया को लेकर मथुरा के चंपा अग्रवाल इंटर कॉलेज में विवाद खड़ा हो गया है। चयनित अभ्यर्थियों और उनके परिजनों ने विद्यालय प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि आयोग से चयनित होकर विद्यालय पहुंचे कई अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण नहीं कराया गया, जबकि कुछ अभ्यर्थियों को कथित तौर पर नियमों को दरकिनार करते हुए कार्यभार ग्रहण करा दिया गया।
अभ्यर्थियों और उनके परिजनों का आरोप है कि कुछ चयनित शिक्षकों से कार्यभार ग्रहण कराने के नाम पर तीन-तीन लाख रुपये की व्यवस्था करने के लिए कहा गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। विद्यालय प्रबंधन की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
मामला सामने आने के बाद अग्रवाल शिक्षा मंडल, जिसके अंतर्गत यह संस्था संचालित बताई जा रही है, की चुप्पी पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। परिजनों का कहना है कि संस्था के जिम्मेदार पदाधिकारियों को मामले की निष्पक्ष जांच कराकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
प्राप्त विवरण के अनुसार विज्ञापन संख्या 1/2022 के अंतर्गत टीजीटी और प्रवक्ता पदों के परिणाम के बाद चंपा अग्रवाल इंटर कॉलेज के लिए कई अभ्यर्थियों का चयन हुआ। इनमें प्रवक्ता पद पर गणित विषय के लिए शिवम शर्मा निवासी अलीगढ़, भूगोल के लिए विष्णु कुमार निवासी भरतपुर तथा रसायन विज्ञान के लिए अनामिका निवासी कानपुर का चयन बताया गया है।
सहायक अध्यापक पद पर कला विषय के लिए शिवांगी वर्मा पुत्री सर्वेश कुमार वर्मा निवासी लखीमपुर खीरी, संगीत के लिए मनीष पुत्र धर्मवीर निवासी मुजफ्फरनगर, शारीरिक शिक्षा के लिए प्रवीण कुमार पुत्र टीकम सिंह निवासी मथुरा तथा संस्कृत के लिए रणवीर सिंह पुत्र हरपाल सिंह निवासी बरेली का चयन बताया गया है।
इसी तरह विज्ञान विषय में दो पदों पर लोकेश कुमार पुत्र शिवरीनारायण शर्मा निवासी फरीदाबाद, हरियाणा और देवांश कुमार पुत्र राजेश कुमार शर्मा निवासी हाथरस के चयन की बात सामने आई है। सामाजिक विज्ञान में प्रियंका पांडे निवासी वृंदावन, मथुरा और चंद्रवीर सिंह पुत्र हरि सिंह निवासी अलीगढ़ के चयन की जानकारी दी गई है।
अभ्यर्थियों की ओर से आरोप लगाया गया है कि चयनित अभ्यर्थियों में से केवल तीन को कार्यभार ग्रहण कराया गया, जबकि अन्य अभ्यर्थियों को विद्यालय में मौजूद रहने के बावजूद ज्वाइन नहीं कराया गया।
परिजनों का दावा है कि 28 सितंबर को दोपहर करीब 1:30 बजे से शाम 4 बजे तक कई चयनित अभ्यर्थी विद्यालय में मौजूद रहे, लेकिन उन्हें कार्यभार ग्रहण नहीं कराया गया। उनका आरोप है कि उनसे अलग-अलग स्तर पर कागजात और प्रक्रिया पूरी करने के बावजूद ज्वाइनिंग के संबंध में कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया।
परिजनों की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि जिन तीन अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण कराया गया, उनकी ज्वाइनिंग की परिस्थितियों की जांच की जानी चाहिए।
परिजनों का दावा है कि यदि विद्यालय के सीसीटीवी कैमरों की 25 और 28 सितंबर की रिकॉर्डिंग सुरक्षित कर जांची जाए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि कौन अभ्यर्थी किस समय विद्यालय पहुंचा और प्रधानाचार्य तथा प्रबंधक कक्ष में क्या गतिविधियां हुईं।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है। इसलिए सीसीटीवी फुटेज, विद्यालय के अभिलेख और संबंधित पत्राचार की जांच को मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अभ्यर्थियों ने नियुक्ति पत्र उपलब्ध नहीं कराने का आरोप भी लगाया है। उनके अनुसार वे जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय तक गए, लेकिन वहां भी उन्हें नियुक्ति पत्र अथवा उसकी फोटो कॉपी उपलब्ध नहीं कराई गई।
परिजनों का कहना है कि जब चयन आयोग की प्रक्रिया के बाद अभ्यर्थी संबंधित संस्था में पहुंचते हैं तो उन्हें अपनी नियुक्ति और कार्यभार ग्रहण की स्थिति स्पष्ट रूप से पता होनी चाहिए। इसी को लेकर उन्होंने विभागीय अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की है।
अभ्यर्थियों की ओर से दावा किया गया है कि आयोग से चयनित अभ्यर्थियों को संस्था के नियोक्ता द्वारा नियुक्ति पत्र भेजे जाने के बाद कार्यभार ग्रहण कराने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। इसी संदर्भ में उनका आरोप है कि तीन अभ्यर्थियों को कथित रूप से निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही कार्यभार ग्रहण करा दिया गया।
परिजनों के अनुसार 24 सितंबर 2026 को प्रबंधक और प्रधानाचार्य की ओर से तीन अभ्यर्थियों को 25 सितंबर को नियुक्ति के लिए डाक से सूचित किया गया था। उनका दावा है कि संबंधित डाक की सूचना अभ्यर्थियों को 26 सितंबर के बाद प्राप्त हुई, जबकि 25 सितंबर को ही उन्हें विद्यालय में कार्यभार ग्रहण करा दिया गया।
यही बिंदु अब विवाद का प्रमुख कारण बना हुआ है।
मामले में सबसे गंभीर आरोप चयनित अभ्यर्थियों के परिजनों की ओर से लगाया गया है। उनका कहना है कि जिन अभ्यर्थियों को ज्वाइन नहीं कराया गया, उनसे कथित तौर पर तीन-तीन लाख रुपये की व्यवस्था करने के लिए कहा गया।
हालांकि यह आरोप फिलहाल शिकायतकर्ताओं के कथन पर आधारित है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि इस संबंध में कोई लिखित शिकायत, ऑडियो, वीडियो, बैंक लेनदेन या अन्य साक्ष्य सामने आता है तो जांच में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
अभ्यर्थियों के परिजनों ने जिला विद्यालय निरीक्षक से मांग की है कि विद्यालय के प्रधानाचार्य कक्ष और प्रबंधक कक्ष की 25 सितंबर तथा 28 सितंबर की दोपहर 1:30 बजे से शाम 5 बजे तक की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सुरक्षित कराई जाए।
परिजनों का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज से यह पता चल सकता है कि इन तारीखों पर कौन-कौन लोग विद्यालय पहुंचे, किससे मुलाकात हुई और कार्यभार ग्रहण से संबंधित प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ी।
उन्होंने मांग की है कि फुटेज के साथ विद्यालय के उपस्थिति रजिस्टर, डाक रजिस्टर, नियुक्ति संबंधी पत्र, कार्यभार ग्रहण रिपोर्ट और अन्य संबंधित अभिलेखों की भी जांच की जाए।
परिजनों का आरोप है कि यदि समय रहते रिकॉर्ड सुरक्षित नहीं किया गया तो महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं। इसी कारण उन्होंने जांच शुरू होने से पहले संबंधित रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने की मांग की है।
हालांकि किसी रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ हुई है या नहीं, यह केवल सक्षम विभागीय जांच अथवा अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकता है।
मामले में बताया गया कि मंगलवार को संस्कृत विषय के चयनित अभ्यर्थी के साथ बौद्ध धर्माचार्य उमेश पाल भी विद्यालय पहुंचे। उन्होंने प्रधानाचार्य और प्रबंधक से अभ्यर्थी को कार्यभार ग्रहण कराने का अनुरोध किया।
बताया गया कि उन्होंने प्रबंधन के सामने अभ्यर्थी की आर्थिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों का हवाला देते हुए ज्वाइनिंग कराने की मांग रखी, लेकिन इसके बावजूद कार्यभार ग्रहण नहीं कराया गया।
पूरे मामले में विद्यालय का मूल संस्था अग्रवाल शिक्षा मंडल बताया जा रहा है। आरोपों के बाद संस्था के पदाधिकारियों से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार पदाधिकारियों ने मामले पर विस्तृत प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया।
ऐसे में अभ्यर्थियों और उनके परिजनों का कहना है कि संस्था को सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए कि चयनित अभ्यर्थियों की ज्वाइनिंग में क्या प्रक्रिया अपनाई गई और किन अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण कराया गया।
अभ्यर्थियों और उनके परिजनों ने पूरे प्रकरण की विभागीय स्तर पर जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच में केवल मौखिक आरोपों पर निर्भर रहने के बजाय दस्तावेजी रिकॉर्ड, डाक रजिस्टर, सीसीटीवी फुटेज, उपस्थिति रजिस्टर और कार्यभार ग्रहण संबंधी दस्तावेजों को आधार बनाया जाए।
उनकी मांग है कि यदि जांच में किसी अधिकारी या प्रबंधन पदाधिकारी की ओर से नियमों का उल्लंघन या अवैध लेनदेन प्रमाणित होता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
मामले में दोनों पक्षों के दस्तावेज और बयान सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी। यदि चयनित अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण कराने में अलग-अलग मानक अपनाए गए हैं तो उसके कारणों का रिकॉर्ड में होना जरूरी है।
इसी तरह तीन लाख रुपये मांगने के आरोप की पुष्टि या खंडन भी जांच के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों से ही हो सकेगा। इसलिए पूरे मामले में निष्पक्ष विभागीय जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
अभ्यर्थियों और परिजनों की ओर से संस्था के प्रशासनिक कामकाज को लेकर अन्य आरोप भी लगाए गए हैं। उनका कहना है कि वृंदावन से स्थानांतरण होकर प्रधानाचार्य डॉ. राकेश कुमार माहेश्वरी के आने और प्रबंधक मनीष कुमार लोहे वाले के पद संभालने के बाद संस्था में कई फैसलों को लेकर सवाल उठे हैं।
परिजनों का दावा है कि लिपिकों की भर्ती पर रोक होने के बावजूद तीन बाबुओं की भर्ती के लिए प्रयास किए गए। इसमें भी उन्होंने कथित लेनदेन की आशंका जताई है। हालांकि इस आरोप की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और विद्यालय प्रबंधन की ओर से इस संबंध में विस्तृत प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।
मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आयोग से चयनित सभी अभ्यर्थियों की ज्वाइनिंग को लेकर समान प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई। यदि कुछ अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण कराया गया और कुछ को नहीं, तो इसके पीछे लिखित कारण क्या हैं?
दूसरा सवाल यह है कि जिन अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण कराया गया, उनकी नियुक्ति और ज्वाइनिंग से संबंधित दस्तावेज किस तारीख को प्राप्त हुए और किस आधार पर उनकी कार्यभार ग्रहण रिपोर्ट तैयार की गई?
तीसरा और सबसे गंभीर सवाल तीन लाख रुपये की कथित मांग को लेकर है। यदि यह आरोप गलत है तो प्रबंधन के पास इसे स्पष्ट करने के लिए अपने रिकॉर्ड और दस्तावेज मौजूद होने चाहिए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह गंभीर प्रशासनिक और कानूनी विषय बन सकता है।
चंपा अग्रवाल इंटर कॉलेज से जुड़े इस प्रकरण में चयनित अभ्यर्थियों और उनके परिजनों की नजर अब विभागीय अधिकारियों की कार्रवाई पर है। परिजनों का कहना है कि उन्हें किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत विवाद से नहीं, बल्कि चयन के बाद नियमानुसार कार्यभार ग्रहण और नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता से मतलब है।
उनकी मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर सभी चयनित अभ्यर्थियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया जाए। साथ ही यदि किसी स्तर पर अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
फिलहाल मामला आरोपों, दस्तावेजों और जांच के बीच है। विद्यालय प्रबंधन और अग्रवाल शिक्षा मंडल का विस्तृत पक्ष सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।


