यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 13h ago
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक कर्तव्य पथ पर डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता बढ़ाने और इससे प्रभावित बच्चों के लिए संवेदनशील, सहयोगपूर्ण एवं समावेशी वातावरण तैयार करने के उद्देश्य से सोच फाउंडेशन की ओर से डिस्लेक्सिया अवेयरनेस वॉक का आयोजन किया गया। इस जागरूकता अभियान के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया गया कि डिस्लेक्सिया बुद्धिमत्ता की कमी नहीं है, बल्कि यह सीखने और विशेष रूप से पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया से जुड़ी एक अलग तरह की कठिनाई है। उचित सहयोग, सही मार्गदर्शन और अनुकूल शैक्षणिक वातावरण मिलने पर डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चे भी अपनी प्रतिभा और क्षमताओं के बल पर जीवन में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।
कार्यक्रम का मार्गदर्शन पूर्व सांसद तरुण विजय ने किया, जबकि दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा ने जागरूकता वॉक का उद्घाटन किया। इस आयोजन में युवाओं, अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतिभागियों ने एकजुट होकर डिस्लेक्सिया से संबंधित भ्रांतियों को दूर करने, प्रभावित बच्चों को समझने और उन्हें शिक्षा तथा सामाजिक जीवन में समान अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कर्तव्य पथ पर आयोजित इस पहल ने यह महत्वपूर्ण संदेश सामने रखा कि किसी बच्चे की सीखने की गति या पढ़ने-लिखने में आने वाली कठिनाइयों के आधार पर उसकी बुद्धिमत्ता, योग्यता अथवा भविष्य की संभावनाओं का आकलन नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों की व्यक्तिगत जरूरतों को समझना, उनकी क्षमताओं को पहचानना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना ही एक संवेदनशील एवं समावेशी समाज की पहचान है।
जागरूकता वॉक के दौरान प्रतिभागियों का उत्साह और एकजुटता देखते ही बनी। बड़ी संख्या में शामिल लोगों ने लाल टी-शर्ट और टोपियां पहनकर डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता का संदेश दिया। उनके हाथों में ‘डिस्लेक्सिया के लिए पैदल चलें’, ‘#एक्ट4डिस्लेक्सिया’ और ‘शानदार डिस्लेक्सिक’ जैसे संदेशों वाली तख्तियां एवं बैनर थे। इन नारों के माध्यम से समाज को यह समझाने का प्रयास किया गया कि डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों को दया या उपेक्षा की नहीं, बल्कि समझ, सम्मान, प्रोत्साहन और अवसरों की आवश्यकता है।
वॉक में शामिल लोगों ने इस बात पर जोर दिया कि सीखने की प्रक्रिया हर बच्चे के लिए एक जैसी नहीं होती। कुछ बच्चों को पढ़ने, शब्दों को पहचानने, वर्तनी समझने या लिखित जानकारी को संसाधित करने में अधिक समय और अतिरिक्त सहायता की जरूरत हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में उन्हें कमजोर या कम बुद्धिमान मानना अनुचित है। इसके बजाय उनकी सीखने की शैली को समझकर उपयुक्त शैक्षणिक सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है।
जागरूकता वॉक ने इस विचार को भी रेखांकित किया कि डिस्लेक्सिया के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण केवल स्कूलों या शिक्षकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। परिवार, मित्र, समुदाय और व्यापक समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब बच्चों को उनकी कठिनाइयों के कारण शर्मिंदगी या भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता, तब वे अपनी क्षमताओं को विकसित करने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की दिशा में बेहतर प्रयास कर सकते हैं।
दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा ने जागरूकता वॉक का उद्घाटन करते हुए डिस्लेक्सिया के बारे में समाज में जानकारी बढ़ाने और इससे जुड़ी गलत धारणाओं को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समय पर पहचान, उचित मार्गदर्शन, सहयोग और समान अवसर मिलने से डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चे शिक्षा सहित जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं।
उन्होंने बच्चों की व्यक्तिगत क्षमताओं को समझने और उन्हें आगे बढ़ने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका संदेश इस बात पर केंद्रित रहा कि बच्चों की कठिनाइयों को उनकी कमजोरी मानने के बजाय उनकी जरूरतों को समझकर समाधान तलाशे जाने चाहिए।
डिस्लेक्सिया को लेकर समाज में अनेक बार ऐसी धारणाएं देखने को मिलती हैं, जिनमें पढ़ने या लिखने में कठिनाई का सामना करने वाले बच्चों को पर्याप्त मेहनत न करने वाला अथवा पढ़ाई में कमजोर मान लिया जाता है। जबकि डिस्लेक्सिया एक विशिष्ट अधिगम कठिनाई है, जिसका बुद्धिमत्ता से सीधा संबंध नहीं है। ऐसे बच्चों को उनकी जरूरत के अनुसार शिक्षण पद्धति, अतिरिक्त समय, विशेष शैक्षणिक सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करने से उनकी सीखने की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकता है।
हर्ष मल्होत्रा के संदेश का प्रमुख भाव भी यही रहा कि बच्चों की क्षमताओं को पहचानना और उनके विकास के लिए अवसर उपलब्ध कराना सामूहिक जिम्मेदारी है। समाज में जागरूकता बढ़ने से अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों की कठिनाइयों को बेहतर ढंग से समझने तथा समय रहते उपयुक्त सहायता उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
पूर्व सांसद तरुण विजय ने कार्यक्रम का मार्गदर्शन करते हुए डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता फैलाने और समावेशी शिक्षा को प्रोत्साहित करने में सोच फाउंडेशन की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने इस दिशा में अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के विभिन्न वर्गों की सक्रिय भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया।
डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता का उद्देश्य केवल किसी अधिगम कठिनाई के बारे में जानकारी देना नहीं है, बल्कि बच्चों के प्रति समाज के व्यवहार और दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव लाना भी है। जब परिवार और विद्यालय किसी बच्चे की सीखने संबंधी जरूरतों को स्वीकार करते हैं, तब उसके लिए अपनी क्षमताओं को विकसित करने के अधिक अवसर तैयार होते हैं।
तरुण विजय के मार्गदर्शन में आयोजित इस वॉक ने सामाजिक भागीदारी के महत्व को सामने रखा। इस प्रकार के जनजागरूकता कार्यक्रम लोगों को एक साझा उद्देश्य से जोड़ते हैं और उन्हें यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि वे अपने आसपास के बच्चों के लिए अधिक सहयोगपूर्ण वातावरण बनाने में किस प्रकार योगदान दे सकते हैं।
समावेशी शिक्षा की अवधारणा भी इसी सोच पर आधारित है कि प्रत्येक बच्चे को सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण व्यवस्था विकसित करना, शिक्षकों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना और अभिभावकों के साथ संवाद स्थापित करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
डिस्लेक्सिया एक विशिष्ट अधिगम कठिनाई है, जो मुख्य रूप से पढ़ने और लिखित भाषा से जुड़ी कुछ प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है। इससे प्रभावित बच्चों को अक्षरों और ध्वनियों के संबंध को समझने, शब्दों को सही ढंग से पढ़ने, वर्तनी लिखने या पढ़ी गई सामग्री को सहजता से समझने में कठिनाई हो सकती है। हालांकि, हर बच्चे का अनुभव अलग होता है और कठिनाइयों का स्वरूप भी अलग-अलग हो सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डिस्लेक्सिया का अर्थ कम बुद्धिमत्ता नहीं है। किसी बच्चे को पढ़ने में कठिनाई हो सकती है, लेकिन वह रचनात्मक सोच, समस्या समाधान, मौखिक अभिव्यक्ति, कला, खेल या अन्य क्षेत्रों में उत्कृष्ट क्षमता प्रदर्शित कर सकता है। इसलिए बच्चों की योग्यता का आकलन केवल उनकी पढ़ने-लिखने की गति या परीक्षा के अंकों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
डिस्लेक्सिया की समय पर पहचान और उचित मूल्यांकन से बच्चे की जरूरतों को समझने में मदद मिल सकती है। इसके बाद विशेषज्ञों और शिक्षकों के मार्गदर्शन में ऐसी शिक्षण रणनीतियां अपनाई जा सकती हैं, जो बच्चे की सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाएं। अतिरिक्त समय, स्पष्ट निर्देश, बहु-संवेदी शिक्षण पद्धतियां और व्यक्तिगत सहयोग कुछ बच्चों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
इस जागरूकता वॉक के माध्यम से समाज को यही संदेश देने का प्रयास किया गया कि बच्चों की कठिनाइयों को समझना और उन्हें उपयुक्त सहयोग प्रदान करना उनके आत्मविश्वास तथा शैक्षणिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों के विकास में अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कई बार बच्चे पढ़ने या लिखने में लगातार कठिनाई का सामना करते हैं, लेकिन उनकी समस्या को आलस्य, लापरवाही या पर्याप्त अभ्यास न करने से जोड़ दिया जाता है। ऐसी प्रतिक्रिया बच्चों के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती है और उनके लिए पढ़ाई को और अधिक तनावपूर्ण बना सकती है।
इसके विपरीत, यदि अभिभावक धैर्य के साथ बच्चे की कठिनाइयों को समझें और शिक्षक उसकी जरूरत के अनुसार शिक्षण पद्धति अपनाएं, तो बच्चे को सीखने की प्रक्रिया में बेहतर सहयोग मिल सकता है। किसी बच्चे की तुलना लगातार दूसरे बच्चों से करने के बजाय उसकी व्यक्तिगत प्रगति पर ध्यान देना भी आवश्यक है।
विद्यालयों में शिक्षकों को डिस्लेक्सिया के सामान्य संकेतों और बच्चों की विभिन्न अधिगम आवश्यकताओं के बारे में जागरूक करना उपयोगी हो सकता है। साथ ही, जरूरत पड़ने पर योग्य विशेषज्ञों से मूल्यांकन और मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए। उचित सहयोग मिलने से बच्चे न केवल शैक्षणिक कौशल विकसित कर सकते हैं, बल्कि उनमें आत्मविश्वास और स्वतंत्र रूप से सीखने की क्षमता भी बढ़ सकती है।
सोच फाउंडेशन की ओर से आयोजित जागरूकता वॉक ने इस व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी को रेखांकित किया कि बच्चों को ऐसा वातावरण मिलना चाहिए, जहां वे बिना किसी डर, संकोच या भेदभाव के अपनी समस्याओं को साझा कर सकें और अपनी क्षमताओं को विकसित कर सकें।
समावेशी शिक्षा का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक बच्चे को उसकी जरूरतों के अनुरूप सीखने और विकास करने का अवसर मिले। इसका अर्थ केवल विद्यालय में प्रवेश उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसा शैक्षणिक वातावरण तैयार करना भी है, जहां बच्चों की विविध क्षमताओं और सीखने की शैलियों को स्वीकार किया जाए।
डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों के लिए यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यदि शिक्षण व्यवस्था में केवल एक ही तरीके से पढ़ने, लिखने और परीक्षा देने की अपेक्षा की जाती है, तो कुछ बच्चों को अपनी वास्तविक समझ और प्रतिभा प्रदर्शित करने में कठिनाई हो सकती है। उपयुक्त शैक्षणिक सहायता और जरूरत के अनुसार उचित सुविधाएं उपलब्ध कराने से उन्हें अपनी क्षमताओं का बेहतर प्रदर्शन करने का अवसर मिल सकता है।
इसके लिए शिक्षकों का प्रशिक्षण, अभिभावकों के साथ नियमित संवाद, बच्चों की जरूरतों का समय पर आकलन और विद्यालयों में संवेदनशील वातावरण विकसित करना आवश्यक है। साथ ही, बच्चों के साथियों को भी यह समझाना महत्वपूर्ण है कि सीखने के अलग-अलग तरीके होना स्वाभाविक है और किसी भी बच्चे का मजाक उड़ाना या उसे अलग-थलग करना स्वीकार्य नहीं है।
कर्तव्य पथ पर आयोजित जागरूकता वॉक ने समावेशी शिक्षा की इसी भावना को जनसामान्य तक पहुंचाने का प्रयास किया। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए केवल नीतियां पर्याप्त नहीं हैं; इसके लिए सामाजिक सोच और व्यवहार में भी सकारात्मक बदलाव आवश्यक है।
जागरूकता वॉक में प्रदर्शित ‘#एक्ट4डिस्लेक्सिया’ संदेश ने लोगों को केवल जानकारी प्राप्त करने तक सीमित न रहने, बल्कि सकारात्मक बदलाव के लिए सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा दी। डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता तब अधिक प्रभावी होती है, जब उसका असर परिवारों, विद्यालयों और समुदायों के व्यवहार में दिखाई देता है।
इस दिशा में कुछ बुनियादी कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं। बच्चों की सीखने संबंधी कठिनाइयों को गंभीरता से समझना, जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों की सहायता लेना, उन्हें अपमानजनक टिप्पणियों से बचाना और उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों को प्रोत्साहित करना ऐसे ही कदम हैं। विद्यालयों में शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच जागरूकता बढ़ाना भी बच्चों के लिए बेहतर वातावरण तैयार करने में मदद कर सकता है।
समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी से यह संदेश अधिक व्यापक हो सकता है कि डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चे भी अपनी रुचियों और क्षमताओं के अनुसार आगे बढ़ सकते हैं। उनकी सफलता के लिए सबसे जरूरी है कि उन्हें समय पर सहयोग मिले और उनकी कठिनाइयों को उनकी पहचान या क्षमता का अंतिम पैमाना न बना दिया जाए।
जागरूकता वॉक में ‘शानदार डिस्लेक्सिक’ जैसे संदेशों का इस्तेमाल इस बात पर ध्यान आकर्षित करता है कि किसी बच्चे को केवल उसकी अधिगम कठिनाई के आधार पर परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। प्रत्येक बच्चा अलग व्यक्तित्व, रुचियों और क्षमताओं के साथ आगे बढ़ता है। डिस्लेक्सिया उसकी संपूर्ण पहचान नहीं है।
बच्चों को उनकी प्रतिभा पहचानने और उसे विकसित करने के अवसर देना जरूरी है। यदि किसी बच्चे को पढ़ने में अधिक समय लगता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह विचारों को समझने या नए समाधान तलाशने में सक्षम नहीं है। उपयुक्त सहयोग और सकारात्मक प्रोत्साहन से बच्चे अपने कौशल को निखार सकते हैं और अपनी रुचि के क्षेत्रों में आगे बढ़ सकते हैं।
इसलिए अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के लिए जरूरी है कि वे बच्चों की उपलब्धियों को पहचानें, उनकी चुनौतियों को समझें और उन्हें अपनी क्षमताओं पर विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करें। किसी भी बच्चे की तुलना दूसरों से करने के बजाय उसकी व्यक्तिगत प्रगति और प्रयासों को महत्व देना अधिक उपयोगी है।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने ‘समझें, स्वीकारें, साथ दें’ का संकल्प लिया। इस संकल्प के माध्यम से डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों को सम्मान, सहयोग और समान अवसर उपलब्ध कराने का संदेश दिया गया। प्रतिभागियों ने जागरूकता के महत्व को रेखांकित करते हुए यह भावना सामने रखी कि बच्चों की क्षमताओं को विकसित करने के लिए समाज का सहयोग और सकारात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है।
‘समझें’ का अर्थ है कि डिस्लेक्सिया और उससे जुड़ी अधिगम कठिनाइयों के बारे में सही जानकारी प्राप्त की जाए। ‘स्वीकारें’ का अर्थ है कि बच्चों की अलग-अलग सीखने की जरूरतों को बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार किया जाए। वहीं, ‘साथ दें’ का संदेश इस बात पर जोर देता है कि बच्चों को शिक्षा, सामाजिक सहभागिता और व्यक्तिगत विकास के अवसर उपलब्ध कराने में परिवार, विद्यालय और समाज अपनी भूमिका निभाएं।
यह संकल्प कार्यक्रम के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करता है। जागरूकता तभी सार्थक होती है, जब वह लोगों के व्यवहार में संवेदनशीलता, बच्चों के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना के रूप में दिखाई दे।
सोच फाउंडेशन की ओर से कर्तव्य पथ पर आयोजित डिस्लेक्सिया अवेयरनेस वॉक ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक विषय को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में लाने का प्रयास किया। पूर्व सांसद तरुण विजय के मार्गदर्शन और दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा के उद्घाटन के साथ आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न वर्गों के लोगों की भागीदारी ने जागरूकता के सामूहिक महत्व को रेखांकित किया।
इस आयोजन का व्यापक संदेश यही रहा कि बच्चों की सीखने संबंधी कठिनाइयों को समझना, उनके प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना और उन्हें समान अवसर प्रदान करना समाज की साझा जिम्मेदारी है। डिस्लेक्सिया को लेकर जानकारी बढ़ने से भ्रांतियों को दूर करने, समय पर सहायता उपलब्ध कराने और विद्यालयों में अधिक समावेशी वातावरण विकसित करने की दिशा में मदद मिल सकती है।
बच्चों की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत मेहनत पर निर्भर नहीं करती; उन्हें मिलने वाला सहयोग, शैक्षणिक वातावरण और समाज का व्यवहार भी उनके विकास को प्रभावित करता है। इसलिए जरूरी है कि परिवार, शिक्षक, विद्यालय और सामाजिक संस्थाएं मिलकर ऐसा वातावरण बनाएं, जहां प्रत्येक बच्चे को अपनी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर मिले।
कर्तव्य पथ पर गूंजा ‘समझें, स्वीकारें, साथ दें’ का संदेश इसी सोच को मजबूत करता है। डिस्लेक्सिया से प्रभावित बच्चों को समझना, उनकी क्षमताओं का सम्मान करना और उन्हें आगे बढ़ने में सहयोग देना ही इस जागरूकता अभियान की मूल भावना रही।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


