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- 13h ago
नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (Special Intensive Revision) को लेकर चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक टकराव शुक्रवार को देश के कई हिस्सों में सड़कों पर दिखाई दिया। कांग्रेस ने एसआईआर प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन किया। दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू, लखनऊ, कोलकाता, देहरादून, गुवाहाटी, ईटानगर और कई अन्य शहरों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की।
कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में लिया। कुछ जगहों पर पुलिस की ओर से बैरिकेडिंग और अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की गई। मणिपुर में प्रदर्शन के दौरान स्थिति तनावपूर्ण होने और पुलिस की कार्रवाई की भी खबरें सामने आई हैं।
कांग्रेस का आरोप है कि एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता और प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। पार्टी ने सीईसी को पद से हटाने, उनके खिलाफ कार्रवाई और एसआईआर से जुड़े फैसलों की स्वतंत्र समीक्षा की मांग उठाई है। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि आयोग के भीतर विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय या टिप्पणियां होना सामान्य संस्थागत प्रक्रिया है और एसआईआर से जुड़े निर्णय आयोग ने नियमों और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए हैं।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई और पुलिस बल तैनात किया गया। प्रदर्शनकारियों ने एसआईआर प्रक्रिया को लेकर नारे लगाए और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की।
कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची से संबंधित किसी भी प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रहना जरूरी है। पार्टी ने एसआईआर से जुड़े निर्णयों, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए हैं।
देश के विभिन्न हिस्सों में शुक्रवार को हुए प्रदर्शनों के दौरान कांग्रेस ने इसी मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश की।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भी कांग्रेस विधायकों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नारेबाजी की। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही कांग्रेस विधायक निजामुद्दीन भट, इरफान हाफिज लोन और इफ्तिखार अहमद ने विरोध दर्ज कराया।
विधायकों ने ‘वोट बचाओ, लोकतंत्र बचाओ’ और ‘निष्पक्ष चुनाव के बिना लोकतंत्र नहीं’ जैसे संदेशों वाले बैनर दिखाए। जम्मू में विधानसभा से बाहर भी कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस की तैनाती की गई और कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई।
चंडीगढ़ में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन करते हुए सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बैरिकेडिंग की। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति भी बनी।
पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने एसआईआर को लेकर आयोग पर सवाल उठाए और ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने तथा उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। कांग्रेस ने चंडीगढ़ के सेक्टर-17 स्थित चुनाव आयोग कार्यालय तक मार्च निकालने का कार्यक्रम भी घोषित किया है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने शुक्रवार को प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान शहर में भारी बारिश हो रही थी, इसके बावजूद कार्यकर्ता चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरे।
प्रदर्शनकारियों ने एसआईआर प्रक्रिया और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर सवाल उठाए तथा सीईसी के इस्तीफे की मांग की। पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे कुछ कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया।
कांग्रेस ने देशभर में राज्य चुनाव आयोगों के कार्यालयों तक मार्च निकालने का आह्वान किया था और लखनऊ का प्रदर्शन इसी कार्यक्रम का हिस्सा रहा।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। यहां भी प्रदर्शनकारियों ने एसआईआर को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की।
कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर आम मतदाताओं के बीच स्पष्टता और विश्वास बनाए रखना जरूरी है।
असम में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सांसद गौरव गोगोई के नेतृत्व में प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गौरव गोगोई को हिरासत में ले लिया। राज्य में भी कांग्रेस ने एसआईआर और चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े सवालों को लेकर विरोध दर्ज कराया।
देश के अलग-अलग राज्यों में एक ही दिन प्रदर्शन कराने की रणनीति के जरिए कांग्रेस ने एसआईआर के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास किया।
हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों को लेकर राज्य चुनाव आयोग के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान कार्यालय के बाहर लगे आधिकारिक बोर्ड पर कालिख पोते जाने की घटना भी सामने आई।
इस घटना ने प्रदर्शन के राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों पहलुओं को चर्चा में ला दिया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में प्रदेश कांग्रेस ने निर्वाचन भवन के पास प्रदर्शन किया। पार्टी ने एसआईआर प्रक्रिया को रोकने, मतदाता सूची से जुड़े फैसलों की स्वतंत्र जांच कराने और जांच पूरी होने तक आगामी चुनावों को स्थगित रखने जैसी मांगें उठाईं।
कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग के साथ एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ी फाइलों को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में रखने की मांग भी की। प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयोग के खिलाफ नारे लगाए।
मणिपुर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इंफाल में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और उनकी गिरफ्तारी की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों द्वारा चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर बढ़ने की कोशिश के दौरान पुलिस की कार्रवाई की खबर सामने आई। स्थानीय रिपोर्टों में आंसू गैस के इस्तेमाल का भी उल्लेख है।
यह घटनाक्रम बताता है कि एसआईआर का मुद्दा अब केवल मतदाता सूची के प्रशासनिक पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसे लेकर राजनीतिक दलों के बीच व्यापक बहस शुरू हो गई है।
एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अपात्र प्रविष्टियों की पहचान करना है। हालांकि, प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम हटने या उन्हें अपने नाम की पुष्टि के लिए अतिरिक्त प्रक्रिया से गुजरने की आशंका को लेकर राजनीतिक और कानूनी सवाल उठे हैं।
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान हटाए गए मतदाताओं के मामले में बड़ी संख्या में अपीलें दायर हुईं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 27.16 लाख हटाए गए मतदाताओं में से 22 लाख से अधिक ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की है। कुल मिलाकर 38.31 लाख अपीलें दायर हुईं, जिनमें कुछ नाम जोड़ने और कुछ अन्य नाम हटाने से संबंधित थीं।
यही प्रक्रिया इस विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है कि मतदाता सूची की सफाई और पात्र मतदाताओं के मताधिकार की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाए।
एसआईआर को लेकर राजनीतिक विवाद उस समय और तेज हुआ जब इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार एसआईआर से जुड़े कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज कराई।
रिपोर्ट के अनुसार, आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, चुनावी डेटाबेस तक पहुंच तथा कुछ तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में फैसलों को लेकर अपनी असहमति रिकॉर्ड पर दर्ज कराई।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ मामलों में मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम और स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठे।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में एसआईआर से जुड़ा एक नया सवाल जोड़े जाने को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस बदलाव में नए आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पिछले एसआईआर की मतदाता सूची में मौजूद होने से संबंधित जानकारी मांगी गई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयुक्तों ने सवाल उठाए थे।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता पंजीकरण फॉर्म में बदलाव सीधे नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया से जुड़ा है।
विवाद का एक अन्य पहलू मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल डेटाबेस और सॉफ्टवेयर तक पहुंच से संबंधित है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची के डेटा तक पहुंच और तकनीकी प्रणालियों में बदलाव को लेकर सवाल उठाए थे।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनावी सूची की तैयारी और नियंत्रण में स्थानीय स्तर पर मौजूद Electoral Registration Officers (ERO) की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसी संदर्भ में डिजिटल प्रणाली के बढ़ते केंद्रीकरण को लेकर भी सवाल दर्ज किए गए।
यह बहस केवल तकनीकी नहीं है। मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सुधारने की प्रक्रिया सीधे नागरिकों के मतदान अधिकार से जुड़ी है, इसलिए इस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही महत्वपूर्ण मानी जाती है।
चुनाव आयोग ने रिपोर्ट सामने आने के बाद अपने कामकाज का बचाव किया। आयोग ने कहा कि किसी बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय या टिप्पणियां होना सामान्य बात है।
आयोग ने यह भी कहा कि एसआईआर और चुनाव सुधारों से जुड़े उसके फैसले सभी तीन चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं और आयोग के आदेशों को कानूनी आधार प्राप्त है। आयोग के मुताबिक, केवल चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी भी सुधार के संबंध में सुझाव दे सकते हैं।
इस तरह एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियों का उल्लेख है, वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने इन मतभेदों को संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा बताया है।
एसआईआर को लेकर विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में भी मतदाता सूची से जुड़े मामलों पर सुनवाई हुई है। पश्चिम बंगाल के मामले में अदालत के निर्देश के बाद कुछ मतदाताओं के नाम हटाने और बहाल करने से संबंधित मामलों की सुनवाई न्यायिक अधिकारियों के माध्यम से हुई।
चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में अपीलें लंबित हैं और इन्हें निपटाने के लिए अपीलीय व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है।
दिल्ली में भी एसआईआर के दौरान ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर जारी किए गए नोटिसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है।
इससे एसआईआर का मुद्दा अब राजनीतिक बहस के साथ-साथ न्यायिक जांच के दायरे में भी दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस ने एसआईआर और चुनाव आयोग के खिलाफ आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने का फैसला किया है। पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल के अनुसार, 25 सितंबर को प्रदेश कांग्रेस समितियों को राज्य चुनाव आयोग के कार्यालयों तक मार्च निकालने का निर्देश दिया गया था।
इसके बाद 28 सितंबर को जिला कांग्रेस समितियों की ओर से जिला कलेक्ट्रेट तक मार्च निकालने का कार्यक्रम रखा गया है।
कांग्रेस का कहना है कि उसका आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक उसकी ओर से उठाई गई मांगों पर कार्रवाई नहीं होती।
एसआईआर विवाद अब संसद तक पहुंचने की तैयारी में है। कांग्रेस ने अन्य विपक्षी दलों से संपर्क कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाने पर चर्चा की है।
रिपोर्टों के अनुसार, विपक्ष दोनों सदनों में नोटिस देने की तैयारी कर रहा है। इससे पहले भी ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर विपक्ष की ओर से संसद में प्रयास किए जा चुके हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया सामान्य प्रशासनिक पद से अलग है। इसके लिए संसद में विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है और इसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान रखा गया है।
यदि विपक्ष की ओर से नया प्रस्ताव लाया जाता है तो एसआईआर और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर संसद में व्यापक चर्चा की संभावना बन सकती है। विपक्ष की ओर से मतदाता सूची, आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली और सीईसी की जवाबदेही जैसे मुद्दे उठाए जाने की संभावना है।
दूसरी ओर चुनाव आयोग का रुख यह है कि उसके फैसले वैधानिक प्रक्रिया के तहत लिए जा रहे हैं और बहुसदस्यीय आयोग में होने वाली आंतरिक चर्चा को संस्थागत असहमति के सामान्य हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस कारण आने वाले दिनों में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के साथ कानूनी और संवैधानिक सवाल भी बहस के केंद्र में रहेंगे।
एसआईआर विवाद को मोटे तौर पर चार प्रमुख मुद्दों में समझा जा सकता है—
पहला, मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम कैसे सुरक्षित रखे जाएं।
दूसरा, नाम जोड़ने और हटाने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और सत्यापन योग्य हो।
तीसरा, मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस और सॉफ्टवेयर तक किस स्तर पर किस अधिकारी की पहुंच हो।
चौथा, चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग राय होने की स्थिति में निर्णय लेने की प्रक्रिया और जवाबदेही किस तरह सुनिश्चित हो।
इन सवालों पर राजनीतिक दलों, चुनाव विशेषज्ञों, अदालतों और चुनाव प्रशासन के बीच आगे भी चर्चा जारी रहने की संभावना है।
फिलहाल एसआईआर विवाद तीन समानांतर स्तरों पर आगे बढ़ रहा है। एक तरफ कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं। दूसरी तरफ संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव की तैयारी की चर्चा है। तीसरी ओर अदालतों में मतदाता सूची और एसआईआर से जुड़े विभिन्न मामले सुनवाई के दायरे में हैं।
चुनाव आयोग अपने फैसलों का बचाव कर रहा है और इन्हें कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप बता रहा है। वहीं विपक्ष आयोग की कार्यप्रणाली और एसआईआर की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठा रहा है।
इस पूरे विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण 28 सितंबर को प्रस्तावित जिला स्तर के कांग्रेस मार्च, संसद में संभावित नोटिस और एसआईआर से जुड़े न्यायिक मामलों की आगे की सुनवाई हो सकता है।
इस बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक प्रशासनिक प्रक्रिया होने के साथ सीधे नागरिकों के मतदान अधिकार से जुड़ा विषय है। इसलिए विवाद का अंतिम असर केवल राजनीतिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मतदाता सूची की पारदर्शिता, अपील की व्यवस्था, तकनीकी प्रणालियों और चुनावी संस्थाओं की जवाबदेही पर होने वाली व्यापक बहस में भी दिखाई देगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


