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- 13h ago
नई दिल्ली। चुनाव आयोग की ओर से किए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मतदाता सूची को लेकर देश की राजधानी में सियासी घमासान तेज हो गया है। INDIA गठबंधन के 19 विपक्षी दलों के सांसद मंगलवार को संसद भवन के मकर द्वार से चुनाव आयोग की ओर मार्च के लिए निकले। विपक्षी सांसदों ने हाथों में पोस्टर और तख्तियां ले रखी थीं और चुनाव आयोग तथा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारेबाजी की।
मार्च के दौरान विपक्षी सांसदों ने नारा लगाया—
"एक कचौड़ी, दो समोसा, ज्ञानेश तुम्हारा क्या भरोसा।"
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और चुनाव आयोग को इस पूरी प्रक्रिया पर पारदर्शी तरीके से जवाब देना चाहिए।
INDIA गठबंधन के सांसद संसद भवन परिसर में एकजुट हुए और मकर द्वार से चुनाव आयोग की ओर बढ़ने की कोशिश की। मार्च में कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी, एनसीपी-एसपी समेत कई विपक्षी दलों के सांसद शामिल रहे।
विपक्षी सांसदों के हाथों में अलग-अलग संदेश लिखी तख्तियां थीं। समाजवादी पार्टी के सांसदों ने चुनाव आयोग और भाजपा के बीच कथित नजदीकी को लेकर तीखे संदेश लिखे।
एक पोस्टर पर लिखा था—
"चुनाव आयोग की रबड़ स्टैंप का हत्था बीजेपी है।"
वहीं एक अन्य पोस्टर पर लिखा था—
"बीजेपी ही CEC है।"
एक सांसद ने "PDA के वोट का अधिकार छीन रही भाजपा सरकार" लिखा संदेश लेकर प्रदर्शन किया।
एक अन्य तख्ती पर सवाल किया गया कि जब CEC का मुख्यालय पहले से मौजूद है तो भाजपा के अलग मुख्यालय की जरूरत क्यों है।
इन नारों और पोस्टरों के जरिए विपक्ष ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर अपना राजनीतिक संदेश सामने रखा।
विपक्षी दलों का मुख्य विरोध मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने का खतरा है।
राहुल गांधी और कांग्रेस लगातार चुनाव आयोग से मतदाता सूची में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि अगर किसी वैध मतदाता का नाम सूची से हटता है तो उसके पास उसे चुनौती देने और अपना नाम वापस जुड़वाने का प्रभावी अवसर होना चाहिए।
विपक्ष इसे सिर्फ मतदाता सूची का प्रशासनिक मामला नहीं बल्कि मताधिकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा मुद्दा बता रहा है।
विपक्ष के मार्च से पहले भाजपा ने चुनाव आयोग को लेकर लगाए जा रहे आरोपों पर जोरदार पलटवार किया।
भाजपा सांसद और प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि विपक्षी दल एक प्रायोजित प्रयास के तहत राहुल गांधी को सत्ता की गद्दी पर बैठाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह प्रयास आज से नहीं बल्कि लंबे समय से चल रहा है।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति पर सवाल उठाए जाने के जवाब में पात्रा ने कहा कि उनकी नियुक्ति 19 फरवरी 2025 को हुई, जबकि उससे पहले भी भाजपा लोकसभा और कई विधानसभा चुनाव जीत चुकी थी।
उनका तर्क था कि यह कहना गलत है कि भाजपा ज्ञानेश कुमार की मदद से चुनाव जीतती है।
इसी दौरान संबित पात्रा ने एक राजनीतिक और धार्मिक संदर्भ वाला तंज कसते हुए कहा—
"हमारी मदद ज्ञानेश नहीं, गणेश जी कर रहे हैं।"
उन्होंने गणेश जी को बुद्धि, विद्या और ज्ञान का देवता बताते हुए कहा कि देश की जनता समझती है कि किसे वोट देना है।
संबित पात्रा ने विपक्ष के मौजूदा आंदोलन को राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से स्थापित करने की कोशिश से जोड़ते हुए निशाना साधा।
उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी को लॉन्च और रिलॉन्च करने की कोशिश लगातार की जा रही है और जब चुनावी राजनीति में सफलता नहीं मिली तो विपक्ष ने अराजकता का रास्ता अपनाया।
पात्रा ने कहा कि विपक्ष ने पहले सुप्रीम कोर्ट, HAL और हिंदुओं सहित कई मुद्दों पर हमला किया और अब चुनाव आयोग को निशाना बनाया जा रहा है।
ये भाजपा नेता के राजनीतिक आरोप हैं, जबकि विपक्ष इन आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग कर रहा है।
संबित पात्रा के 'ज्ञानेश नहीं, गणेश जी' वाले बयान पर समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन ने भी प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा कि गणेशजी गलत चीजों का साथ नहीं देते।
जया बच्चन ने कहा कि किसी भी शुभ काम की शुरुआत गणेशजी की प्रार्थना से की जाती है और उन्हें भरोसा है कि गणेशजी लोगों की रक्षा करेंगे।
इस तरह चुनाव आयोग को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद में धार्मिक प्रतीकों और शब्दों का इस्तेमाल भी राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा बन गया।
संबित पात्रा ने राहुल गांधी से मतदाता सूची को लेकर कई सवाल भी पूछे।
उन्होंने मृतक मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर सवाल किया कि क्या करोड़ों मृत लोगों के नाम मतदाता सूची में बने रहने चाहिए।
उन्होंने कांग्रेस से यह भी पूछा कि अगर मृतक, डुप्लीकेट और अन्य अपात्र प्रविष्टियों की पहचान की जा रही है तो इस पर आपत्ति क्यों की जा रही है।
पात्रा ने कर्नाटक और तमिलनाडु के चुनाव परिणामों का भी जिक्र करते हुए सवाल किया कि क्या कांग्रेस उन चुनावों को भी 'वोट चोरी' का परिणाम बताएगी।
उन्होंने विपक्ष के मौजूदा आंदोलन को राहुल गांधी की राजनीतिक 'रिलॉन्चिंग' की कोशिश बताया।
संबित पात्रा ने चुनाव आयोग की नियुक्ति की पुरानी व्यवस्था का उल्लेख करते हुए विपक्ष से सवाल किया।
उन्होंने कहा कि 1993 तक चुनाव आयोग की नियुक्ति की प्रक्रिया में प्रधानमंत्री की भूमिका प्रमुख थी और सवाल किया कि क्या उस समय भी केवल अपने पसंदीदा लोगों को नियुक्त किया जाता था?
उन्होंने राजीव गांधी के दौर का जिक्र करते हुए विपक्ष से पूछा कि क्या उस समय इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर उठाए गए सवालों के संदर्भ में भी इसी तरह के विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे।
भाजपा का तर्क है कि चुनाव आयोग को लेकर सवाल उठाने से पहले राजनीतिक दलों को अपने पुराने रुख और चुनावी इतिहास पर भी विचार करना चाहिए।
जब INDIA गठबंधन के सांसद चुनाव आयोग की ओर आगे बढ़े तो पुलिस ने बैरिकेड लगाकर उन्हें रोक दिया।
मार्च के रास्ते में बैरिकेडिंग के बाद विपक्षी सांसद आगे नहीं बढ़ सके। इसके बाद प्रदर्शन का रूप बदल गया और नेता वहीं बैठकर विरोध करने लगे।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा भी बैरिकेड के पास धरने पर बैठ गए।
प्रियंका गांधी के साथ एनसीपी-एसपी सांसद सुप्रिया सुले और INDIA ब्लॉक के कई अन्य सांसद भी विरोध में बैठे।
इस दौरान विपक्षी सांसदों ने नारेबाजी जारी रखी और चुनाव आयोग से अपनी मांगों पर जवाब देने की मांग की।
मंगलवार का घटनाक्रम केवल एक विरोध मार्च तक सीमित नहीं रहा।
एक तरफ विपक्ष संसद से चुनाव आयोग तक मार्च निकालकर अपनी ताकत दिखा रहा था, तो दूसरी तरफ भाजपा प्रेस कॉन्फ्रेंस और बयानों के जरिए विपक्ष के आरोपों को चुनौती दे रही थी।
यानी चुनाव आयोग का मुद्दा अब तीन स्तरों पर दिखाई दे रहा है—
संसद में विपक्ष की आवाज, सड़क पर प्रदर्शन और भाजपा का राजनीतिक पलटवार।
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—विश्वास।
विपक्ष चाहता है कि मतदाता सूची में किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका दूर की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी योग्य नागरिक का वोट न छिने।
भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची को साफ-सुथरा रखना चुनाव प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है और मृतक, डुप्लीकेट या अपात्र नाम हटाना जरूरी है।
चुनाव आयोग पर अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह इस प्रक्रिया से जुड़े आंकड़े और नियमों को इतनी स्पष्टता से सामने रखे कि राजनीतिक आरोपों के बीच आम मतदाता को वास्तविक स्थिति समझने में परेशानी न हो।
विपक्ष का नया नारा सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
"एक कचौड़ी, दो समोसा, ज्ञानेश तुम्हारा क्या भरोसा"
इसके जवाब में भाजपा की ओर से—
"हमारी मदद ज्ञानेश नहीं, गणेश जी कर रहे हैं"
जैसे बयान सामने आए।
दोनों तरफ से शब्दों की लड़ाई तेज है, लेकिन इस राजनीतिक शोर के बीच असली सवाल मतदाता सूची और मतदाता के अधिकार का है।
क्या SIR के दौरान हटाए गए नामों की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है?
क्या वैध मतदाताओं के नाम सुरक्षित रहेंगे?
क्या मृतक और डुप्लीकेट नाम हटाने के साथ वास्तविक मतदाताओं को पर्याप्त आपत्ति का मौका मिलेगा?
और क्या चुनाव आयोग विपक्ष के सवालों का ऐसा जवाब देगा जिससे विवाद राजनीतिक नारों से निकलकर दस्तावेजी तथ्यों तक पहुंचे?
INDIA गठबंधन ने साफ संकेत दिया है कि वह चुनाव आयोग के खिलाफ अपने अभियान को जारी रखेगा। वहीं भाजपा भी विपक्ष के 'वोट चोरी' के आरोपों को लगातार चुनौती देने की तैयारी में है।
ऐसे में चुनाव आयोग और SIR को लेकर राजनीतिक टकराव आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है।
फिलहाल राजधानी की तस्वीर बेहद राजनीतिक है—
एक तरफ हाथों में पोस्टर लिए विपक्षी सांसद हैं।
दूसरी तरफ भाजपा के पलटवार वाले बयान हैं।
बीच में चुनाव आयोग है।
और इस पूरे विवाद के केंद्र में है देश का सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार—मतदाता का वोट।
आखिरकार इस राजनीतिक लड़ाई का फैसला नारों से नहीं, बल्कि मतदाता सूची के आंकड़ों, प्रक्रिया की पारदर्शिता और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही होगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


