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- 13h ago
नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कुछ पल ऐसे हैं, जो समय बीतने के बावजूद लोगों की यादों में हमेशा ताजा रहते हैं। वर्ष 2002 में इंग्लैंड के ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान पर नेटवेस्ट ट्रॉफी जीतने के बाद तत्कालीन भारतीय कप्तान सौरव गांगुली का बालकनी में अपनी टी-शर्ट उतारकर लहराना ऐसा ही एक क्षण था। वह दृश्य केवल एक क्रिकेट मैच की जीत का जश्न नहीं था, बल्कि भारतीय क्रिकेट के बढ़ते आत्मविश्वास, आक्रामकता और नए दौर की शुरुआत का प्रतीक बन गया था।
निर्देशक अभिनय देव की फिल्म 'दूसरा' इसी ऐतिहासिक घटना को एक अलग नजरिए से देखती है। यहां क्रिकेट के मैदान पर मिली जीत एक ऐसी लड़की के जीवन में बदलाव की प्रेरणा बनती है, जो पारिवारिक परंपराओं, सामाजिक अपेक्षाओं और रूढ़िवादी सोच के बीच अपनी पहचान तलाश रही है। फिल्म का उद्देश्य केवल एक चर्चित क्रिकेट घटना को दोबारा दिखाना नहीं, बल्कि उस घटना के भावनात्मक और प्रतीकात्मक प्रभाव को एक लड़की के संघर्ष के माध्यम से सामने लाना है।
'दिल्ली बेली' जैसी चर्चित फिल्म का निर्देशन कर चुके अभिनय देव ने इस बार अपेक्षाकृत गंभीर और सामाजिक विषय को चुना है। करीब 78 मिनट की यह फिल्म क्रिकेट, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और महिला सशक्तीकरण को एक साथ जोड़ने की कोशिश करती है। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका विचार है कि कभी-कभी किसी दूसरे व्यक्ति का साहस हमें अपनी जिंदगी की लड़ाई लड़ने की प्रेरणा दे सकता है।
'दूसरा' की कहानी तारा नाम की एक लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है, जो राजस्थान के एक रूढ़िवादी परिवार में पली-बढ़ी है। उसके आसपास का सामाजिक वातावरण ऐसा है, जहां लड़कियों की जिंदगी के फैसले अक्सर परिवार और समाज की स्थापित मान्यताओं के अनुसार तय होते हैं। उनकी इच्छाओं, सपनों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए जगह सीमित दिखाई देती है।
तारा भी इसी माहौल का हिस्सा है। उसके भीतर अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने की इच्छा है। वह अपनी पहचान बनाना चाहती है और अपने फैसले खुद लेने का अधिकार चाहती है। लेकिन परिवार की परंपराएं और सामाजिक बंदिशें उसके सामने लगातार बाधाएं खड़ी करती हैं।
फिल्म की कहानी उस समय एक दिलचस्प मोड़ लेती है, जब भारतीय क्रिकेट टीम वर्ष 2002 में इंग्लैंड को हराकर नेटवेस्ट ट्रॉफी जीतती है। लॉर्ड्स की बालकनी में सौरव गांगुली का जश्न पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाता है। मैदान पर भारतीय टीम की जीत और कप्तान का बेबाक अंदाज तारा के भीतर भी एक नई भावना जगाता है।
जिस तरह भारतीय टीम ने दबाव और चुनौतियों के बीच जीत हासिल की, उसी तरह तारा अपनी जिंदगी की सीमाओं से बाहर निकलने की हिम्मत जुटाने लगती है। क्रिकेट का यह ऐतिहासिक क्षण उसके लिए केवल टेलीविजन पर देखा गया खेल नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसा प्रतीक बन जाता है, जो उसे अपने अधिकारों और इच्छाओं के लिए खड़े होने का साहस देता है।
यहीं फिल्म का केंद्रीय विचार सामने आता है। जीत का अर्थ हमेशा किसी प्रतिद्वंद्वी को हराना नहीं होता। कई बार जीत उस डर को पीछे छोड़ने में होती है, जो व्यक्ति को अपने सपनों की ओर बढ़ने से रोकता है। तारा की कहानी इसी आंतरिक संघर्ष को सामने लाने की कोशिश करती है।
वर्ष 2002 का नेटवेस्ट ट्रॉफी फाइनल भारतीय क्रिकेट के यादगार मुकाबलों में गिना जाता है। इंग्लैंड ने भारत के सामने 326 रनों का लक्ष्य रखा था। भारतीय टीम ने युवराज सिंह और मोहम्मद कैफ की शानदार पारियों की बदौलत लक्ष्य हासिल किया और ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
इस जीत के बाद सौरव गांगुली का लॉर्ड्स की बालकनी में टी-शर्ट उतारकर लहराना क्रिकेट जगत में एक चर्चित दृश्य बन गया। उस समय इसे भारतीय टीम के आत्मविश्वास और जीत के उन्मुक्त जश्न से जोड़कर देखा गया। यह घटना भारतीय क्रिकेट की आक्रामक पहचान से भी जुड़ गई।
'दूसरा' इसी दृश्य को अपनी कहानी का प्रेरणास्रोत बनाती है। फिल्म में इस घटना का महत्व क्रिकेट के आंकड़ों या मैच के परिणाम तक सीमित नहीं है। यह तारा के लिए एक ऐसे व्यक्ति की छवि बन जाती है, जो सामाजिक अपेक्षाओं और परंपरागत व्यवहार की परवाह किए बिना अपनी खुशी और आत्मविश्वास व्यक्त करता है।
फिल्म का यह विचार दिलचस्प है कि एक ही घटना का अर्थ अलग-अलग लोगों के लिए अलग हो सकता है। क्रिकेट प्रेमियों के लिए गांगुली का जश्न भारतीय टीम की ऐतिहासिक जीत की याद है, जबकि तारा के लिए वही घटना अपने भीतर छिपे साहस को पहचानने का माध्यम बनती है।
इस तरह निर्देशक खेल और सामाजिक जीवन के बीच एक संबंध स्थापित करते हैं। क्रिकेट मैदान पर दिखाई देने वाला आत्मविश्वास तारा के निजी संघर्ष में एक नई ऊर्जा पैदा करता है। यही फिल्म की कहानी को सामान्य खेल-केंद्रित कथा से अलग बनाता है।
अभिनय देव ने 'दूसरा' के जरिए एक ऐसे विषय को चुनने का प्रयास किया है, जिसमें खेल, समाज और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कई आयाम एक साथ मौजूद हैं। उन्होंने सौरव गांगुली के ऐतिहासिक जश्न को सीधे क्रिकेट पर आधारित कहानी में बदलने के बजाय एक लड़की की जिंदगी से जोड़ने का रास्ता चुना है।
निर्देशन की सबसे उल्लेखनीय बात यही है कि फिल्म क्रिकेट के ऐतिहासिक क्षण को एक व्यापक सामाजिक संदर्भ देने की कोशिश करती है। तारा की कहानी के माध्यम से यह दिखाया जाता है कि किसी बाहरी घटना से मिलने वाली प्रेरणा व्यक्ति के भीतर किस तरह बदलाव की शुरुआत कर सकती है।
फिल्म में वास्तविक क्रिकेट फुटेज और काल्पनिक कहानी का मेल इसके कथानक को विशिष्ट बनाता है। पुराने मैच के दृश्य दर्शकों को उस दौर की याद दिलाते हैं, जबकि तारा की जिंदगी के दृश्य उस ऐतिहासिक घटना को निजी और भावनात्मक अर्थ प्रदान करते हैं।
अभिनय देव की पिछली फिल्मों की तुलना में 'दूसरा' का विषय अलग है। यहां हास्य या तेज रफ्तार मनोरंजन के बजाय सामाजिक बंधनों, पारिवारिक संबंधों और आत्मनिर्णय की इच्छा पर ध्यान दिया गया है।
हालांकि, फिल्म की अवधि कम होने के कारण कुछ प्रसंगों में तारा के आंतरिक संघर्ष को और विस्तार देने की गुंजाइश महसूस होती है। उसके मन में उठने वाले सवालों, परिवार के साथ उसके रिश्तों और स्वतंत्रता हासिल करने की प्रक्रिया को अधिक समय मिलता, तो भावनात्मक प्रभाव और गहरा हो सकता था।
इसके बावजूद फिल्म का मूल विचार प्रभावशाली है। निर्देशक ने एक परिचित खेल घटना के जरिए सामाजिक बदलाव की कहानी कहने का जोखिम उठाया है। यह प्रयोग फिल्म को अपनी अलग पहचान देता है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत प्लाबिता बोरठाकुर का अभिनय है। तारा के किरदार में वह एक ऐसी युवती की भावनाओं को सामने लाती हैं, जो अपने परिवार से जुड़ी हुई है, लेकिन अपनी स्वतंत्र पहचान भी चाहती है।
तारा का संघर्ष केवल बाहरी बंदिशों से नहीं है। उसके भीतर भी कई तरह के सवाल हैं। वह अपने परिवार से टकराव नहीं चाहती, लेकिन अपनी इच्छाओं को लगातार दबाते रहना भी उसके लिए आसान नहीं है। इस द्वंद्व को पर्दे पर विश्वसनीय बनाना आसान काम नहीं होता।
प्लाबिता बोरठाकुर अपने चेहरे के भावों, खामोशी और सीमित संवादों के जरिए किरदार की बेचैनी को व्यक्त करती हैं। उनका अभिनय तारा को केवल विद्रोह करने वाली लड़की के रूप में पेश नहीं करता, बल्कि उसे एक ऐसे इंसान के तौर पर सामने लाता है, जो अपने जीवन को समझने और अपने लिए सही रास्ता चुनने की कोशिश कर रही है।
उनके अभिनय में दिखाई देने वाला संयम किरदार को वास्तविकता के करीब रखता है। तारा की आजादी की चाहत किसी अचानक पैदा हुए विद्रोह की तरह नहीं, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होने वाली मानसिक प्रक्रिया की तरह सामने आती है।
फिल्म की कहानी का भावनात्मक केंद्र तारा ही है। क्रिकेट का ऐतिहासिक प्रसंग उसे प्रेरणा देता है, लेकिन उस प्रेरणा को अपनी जिंदगी में उतारने का संघर्ष उसी को करना पड़ता है। प्लाबिता इस अंतर को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करती हैं।
उनका अभिनय फिल्म के सामाजिक संदेश को अधिक विश्वसनीय बनाता है। दर्शक तारा की परिस्थितियों को समझ पाते हैं और उसके भीतर पैदा होने वाली बदलाव की इच्छा से जुड़ सकते हैं।
अंकुर विकल ने तारा के पिता की भूमिका निभाई है। उनका किरदार फिल्म के सामाजिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह ऐसे पिता की मानसिकता को सामने लाते हैं, जिसके भीतर बेटी के प्रति स्नेह हो सकता है, लेकिन उसकी सोच पुरानी सामाजिक मान्यताओं से बंधी हुई है।
इस तरह के किरदारों को केवल नकारात्मक रूप में दिखाना आसान होता है, लेकिन वास्तविक जीवन में पारिवारिक संघर्ष अक्सर अधिक जटिल होते हैं। कई बार परिवार के सदस्य अपने व्यवहार को गलत नहीं मानते, क्योंकि वे उन्हीं परंपराओं और मान्यताओं के बीच बड़े हुए होते हैं, जिन्हें वे आगे बढ़ाते रहते हैं।
तारा और उसके पिता के संबंध इसी व्यापक सामाजिक प्रश्न की ओर संकेत करते हैं। क्या परिवार की परंपराएं व्यक्ति की स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण हैं? क्या बेटी को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का अधिकार मिलना चाहिए? और क्या माता-पिता अपनी सोच में बदलाव लाकर बच्चों के सपनों को स्वीकार कर सकते हैं?
अंकुर विकल का अभिनय इस संघर्ष को कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है। उनका किरदार तारा की राह में मौजूद पारिवारिक और सामाजिक बाधाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
फिल्म की खासियत यह है कि वह केवल एक लड़की के सपनों की कहानी नहीं कहती, बल्कि उस वातावरण को भी सामने लाती है, जिसमें उसके सपनों को जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
फिल्म में बाल कलाकार त्विशा जोशी अपनी मासूमियत से ध्यान आकर्षित करती हैं। समीधा गुरु और कृष्णा गोकानी सहित अन्य कलाकार भी कहानी को आगे बढ़ाने में योगदान देते हैं।
किसी भी ऐसी फिल्म में सहायक कलाकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जहां मुख्य किरदार का संघर्ष परिवार और सामाजिक वातावरण से जुड़ा हो। आसपास के पात्रों के व्यवहार और प्रतिक्रियाओं के जरिए ही यह स्पष्ट होता है कि मुख्य किरदार किन परिस्थितियों में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है।
'दूसरा' में भी सहायक कलाकार तारा के परिवेश को समझने में मदद करते हैं। उनके जरिए फिल्म उस सामाजिक माहौल की झलक देती है, जहां परंपराओं का प्रभाव व्यक्तिगत फैसलों पर दिखाई देता है।
हालांकि, फिल्म की सीमित अवधि के कारण सभी पात्रों को समान विस्तार नहीं मिल पाता। कुछ किरदारों और उनके दृष्टिकोण को अधिक समय दिया जाता, तो कहानी की सामाजिक परतें और खुल सकती थीं।
फिर भी कलाकारों का सामूहिक योगदान फिल्म के केंद्रीय विचार को आगे बढ़ाता है। कहानी का मुख्य ध्यान तारा के संघर्ष पर बना रहता है और अन्य पात्र उसी संघर्ष के विभिन्न पहलुओं को सामने लाने में मदद करते हैं।
'दूसरा' का केंद्रीय विषय महिला स्वतंत्रता है। फिल्म यह सवाल उठाती है कि किसी लड़की के जीवन के फैसले आखिर कौन करे—वह स्वयं या वे सामाजिक परंपराएं, जिनके बीच उसका पालन-पोषण हुआ है?
तारा की कहानी एक ऐसे परिवेश में सामने आती है, जहां महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे निर्धारित सीमाओं के भीतर रहें। उनकी इच्छाओं और आकांक्षाओं को कई बार परिवार की प्रतिष्ठा या समाज की मान्यताओं के आधार पर परखा जाता है।
ऐसे माहौल में अपनी पहचान तलाशना केवल व्यक्तिगत निर्णय लेने का मामला नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक सोच से टकराने की प्रक्रिया बन जाता है।
फिल्म इस संघर्ष को क्रिकेट के ऐतिहासिक क्षण से जोड़कर एक अलग दृष्टिकोण देती है। गांगुली का जश्न तारा को यह महसूस कराने वाला प्रतीक बनता है कि आत्मविश्वास और अपने फैसलों पर भरोसा करना भी महत्वपूर्ण है।
फिल्म का संदेश यह नहीं है कि हर परिस्थिति में संघर्ष का रास्ता ही चुना जाए, बल्कि यह कि व्यक्ति को अपनी इच्छाओं, क्षमताओं और अधिकारों को पहचानने का अवसर मिलना चाहिए।
महिला स्वतंत्रता का अर्थ केवल घर से बाहर निकलना या किसी एक सामाजिक नियम को तोड़ना नहीं है। इसमें शिक्षा, विचारों की स्वतंत्रता, अपनी पसंद व्यक्त करने का अधिकार और जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों में भागीदारी जैसे पहलू भी शामिल हैं।
तारा की कहानी इन्हीं सवालों की ओर ध्यान खींचती है। यही वजह है कि फिल्म का विषय क्रिकेट से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक संदर्भ ग्रहण करता है।
राम संपत का संगीत फिल्म के भावनात्मक वातावरण को सहारा देता है। फिल्म की कहानी में क्रिकेट के ऐतिहासिक दृश्य और तारा की निजी जिंदगी के प्रसंग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे में संगीत और संपादन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
पुराने क्रिकेट फुटेज दर्शकों को वर्ष 2002 के उस दौर में वापस ले जाते हैं, जब भारतीय टीम की जीत ने देशभर में उत्साह पैदा किया था। लॉर्ड्स की बालकनी में सौरव गांगुली का जश्न आज भी भारतीय क्रिकेट की सबसे चर्चित छवियों में से एक है।
फिल्म में इन दृश्यों का इस्तेमाल कहानी के भावनात्मक प्रभाव को बढ़ाने के लिए किया गया है। वास्तविक खेल फुटेज और काल्पनिक घटनाओं के बीच तालमेल स्थापित करना संपादन की बड़ी जिम्मेदारी होती है।
अगर क्रिकेट का हिस्सा बहुत अधिक प्रभावी हो जाए, तो तारा की कहानी पीछे छूट सकती है। वहीं, यदि खेल के ऐतिहासिक संदर्भ को पर्याप्त महत्व न मिले, तो फिल्म का केंद्रीय विचार कमजोर पड़ सकता है। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना इस तरह की फिल्म के लिए आवश्यक है।
'दूसरा' का तकनीकी पक्ष इसी चुनौती के इर्द-गिर्द काम करता है। क्रिकेट की यादों को तारा के संघर्ष से जोड़ने का विचार फिल्म की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
'दूसरा' अपनी कहानी और विषय के साथ-साथ रिलीज से पहले सामने आए कानूनी विवाद के कारण भी सुर्खियों में रही। पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान सौरव गांगुली और उनकी अधिकृत बायोपिक का निर्माण कर रही लव फिल्म्स एलएलपी ने फिल्म के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था।
गांगुली की ओर से यह मुद्दा उठाया गया कि फिल्म में उनकी पहचान, व्यक्तित्व और वर्ष 2002 के ऐतिहासिक लॉर्ड्स सेलिब्रेशन का व्यावसायिक इस्तेमाल उचित अनुमति के बिना किया गया है। इस आधार पर फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
वहीं, फिल्म निर्माताओं की ओर से यह पक्ष रखा गया कि 'दूसरा' सौरव गांगुली की बायोपिक नहीं है। उनके अनुसार, फिल्म एक काल्पनिक लड़की की कहानी है, जो भारतीय क्रिकेट के एक ऐतिहासिक क्षण से प्रेरणा लेती है।
22 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने 23 अक्टूबर को प्रस्तावित सिनेमाघर रिलीज पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया और मामले में आगे सुनवाई निर्धारित की। इस फैसले से फिल्म की प्रस्तावित रिलीज के रास्ते में तत्काल अंतरिम राहत मिली, लेकिन इससे गांगुली की ओर से उठाए गए सभी कानूनी सवालों पर अंतिम निर्णय नहीं हो गया था।
यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी फिल्म की रिलीज पर अंतरिम रोक न लगना और किसी विवाद में अंतिम कानूनी अधिकारों का निर्धारण होना अलग-अलग बातें हैं। मामले के अंतिम नतीजे के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए अदालत की आगे की कार्यवाही और आदेशों को देखना आवश्यक होगा।
रिलीज से पहले हुए इस विवाद ने फिल्म के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ाई। क्रिकेट प्रेमियों के बीच यह सवाल चर्चा में रहा कि फिल्म एक ऐतिहासिक खेल घटना को किस तरह प्रस्तुत करती है और उसके साथ अपनी काल्पनिक कहानी का संबंध कैसे स्थापित करती है।
क्रिकेट प्रेमियों के लिए 'दूसरा' का सबसे आकर्षक पहलू वर्ष 2002 की नेटवेस्ट ट्रॉफी जीत की यादें हैं। लॉर्ड्स के मैदान पर भारतीय टीम की ऐतिहासिक जीत और सौरव गांगुली का जश्न भारतीय क्रिकेट के ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें आज भी उत्साह के साथ याद किया जाता है।
लेकिन फिल्म केवल क्रिकेट प्रेमियों के लिए नहीं है। इसकी कहानी उन दर्शकों को भी आकर्षित कर सकती है, जो सामाजिक विषयों, महिला स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पहचान पर आधारित सिनेमा देखना पसंद करते हैं।
फिल्म का विचार इस मायने में अलग है कि वह खेल की जीत को एक लड़की की निजी जिंदगी के बदलाव से जोड़ती है। क्रिकेट मैदान पर मिली सफलता और तारा के व्यक्तिगत संघर्ष के बीच संबंध स्थापित करने की कोशिश इसे एक सामान्य खेल-कथा से अलग बनाती है।
हालांकि, जो दर्शक क्रिकेट मैच की विस्तृत कहानी, खिलाड़ियों के जीवन या नेटवेस्ट ट्रॉफी के पूरे घटनाक्रम की उम्मीद लेकर आएंगे, उनके लिए यह फिल्म अलग अनुभव पेश करती है। इसका ध्यान मैच के तकनीकी विवरणों की तुलना में उस ऐतिहासिक क्षण के प्रतीकात्मक प्रभाव पर अधिक है।
यही फिल्म की खूबी भी है और उसकी सीमा भी। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि दर्शक क्रिकेट की घटना और तारा की कहानी के बीच बनाए गए संबंध को किस हद तक महसूस कर पाते हैं।
'दूसरा' की सबसे बड़ी खूबी इसका नया विचार है। भारतीय क्रिकेट के एक ऐतिहासिक क्षण को महिला स्वतंत्रता की कहानी के साथ जोड़ना एक दिलचस्प सिनेमाई प्रयोग है। प्लाबिता बोरठाकुर का अभिनय इस प्रयोग को भावनात्मक आधार देता है, जबकि अंकुर विकल का किरदार सामाजिक और पारिवारिक संघर्ष को सामने लाता है।
फिल्म की सीमित अवधि भी इसे एक अलग गति देती है। करीब 78 मिनट में कहानी अपने केंद्रीय विचार पर ध्यान बनाए रखने की कोशिश करती है। वास्तविक क्रिकेट फुटेज और काल्पनिक कथा का मिश्रण फिल्म को ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान करता है।
दूसरी ओर, तारा के संघर्ष को अधिक विस्तार देने की गुंजाइश महसूस होती है। उसके परिवार के साथ रिश्तों, आंतरिक उथल-पुथल और स्वतंत्रता की दिशा में उठाए गए कदमों को अधिक समय दिया जाता, तो कहानी का भावनात्मक प्रभाव और मजबूत हो सकता था।
कुछ सहायक पात्रों की पृष्ठभूमि और सामाजिक परिस्थितियों को भी अधिक विस्तार दिया जा सकता था। इससे फिल्म का सामाजिक संदेश और व्यापक रूप से सामने आता।
फिर भी, फिल्म का विषय और उसका प्रतीकात्मक दृष्टिकोण उसे देखने लायक बनाते हैं। यह दर्शकों को केवल कहानी देखने के लिए नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और साहस के अर्थ पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती है।
अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं, जिनमें मनोरंजन के साथ सामाजिक सवाल भी उठाए जाते हैं, तो 'दूसरा' का विचार आपको आकर्षित कर सकता है। यह फिल्म क्रिकेट की ऐतिहासिक घटना को एक निजी संघर्ष से जोड़कर दिखाती है कि प्रेरणा कहीं से भी मिल सकती है।
प्लाबिता बोरठाकुर का संवेदनशील अभिनय तारा के किरदार को विश्वसनीय बनाता है। अंकुर विकल की भूमिका कहानी में पारिवारिक सोच और पीढ़ियों के बीच अंतर को सामने लाती है। अभिनय देव का निर्देशन इस पूरी कथा को क्रिकेट और सामाजिक स्वतंत्रता के बीच जोड़ने की कोशिश करता है।
फिल्म का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि किसी दूसरे की जीत हमारे भीतर भी बदलाव की शुरुआत कर सकती है। सौरव गांगुली का ऐतिहासिक जश्न क्रिकेट के मैदान पर भारतीय टीम के आत्मविश्वास का प्रतीक था। 'दूसरा' उसी आत्मविश्वास को तारा की जिंदगी में स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की प्रेरणा के रूप में देखने का प्रयास करती है।
हालांकि, फिल्म की पटकथा में कुछ प्रसंगों को अधिक विस्तार देने की जरूरत महसूस होती है, लेकिन इसका मूल विचार इसे एक अलग पहचान प्रदान करता है।
'दूसरा' ऐसी फिल्म है, जो क्रिकेट के इतिहास में दर्ज एक चर्चित क्षण को एक लड़की के व्यक्तिगत संघर्ष के साथ जोड़ती है। अभिनय देव का प्रयोगात्मक दृष्टिकोण, प्लाबिता बोरठाकुर का प्रभावशाली अभिनय और सौरव गांगुली के ऐतिहासिक लॉर्ड्स सेलिब्रेशन की यादें फिल्म को एक अलग स्वर देती हैं।
यह फिल्म याद दिलाती है कि जीत के मायने हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकते हैं। क्रिकेट के मैदान पर ट्रॉफी हासिल करना एक उपलब्धि है, लेकिन अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने का साहस जुटाना भी किसी बड़ी जीत से कम नहीं।
तारा की कहानी इसी विचार को सामने लाती है। उसके लिए क्रिकेट का एक ऐतिहासिक दृश्य अपने भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने का माध्यम बनता है। वह प्रेरणा उसे सामाजिक बंदिशों पर सवाल उठाने और अपनी पहचान तलाशने की दिशा में आगे बढ़ाती है।
कुल मिलाकर, 'दूसरा' क्रिकेट प्रेमियों, सामाजिक विषयों पर आधारित सिनेमा पसंद करने वाले दर्शकों और महिला स्वतंत्रता की कहानियों में रुचि रखने वालों के लिए एक अलग तरह का सिनेमाई अनुभव पेश करती है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह विचार है कि कभी-कभी किसी दूसरे की बेबाक जीत ही हमारे भीतर अपनी जिंदगी बदलने का साहस जगा देती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


