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- 13h ago
नई दिल्ली। दिल्ली में दशहरा आते ही केवल कैलेंडर की तारीख नहीं बदलती, राजधानी का रंग-रूप भी बदल जाता है। लालकिले के आसपास का इलाका हो या शहर के दूसरे हिस्से—हर तरफ रामकथा के पात्र उतर आते हैं। कहीं राम वनवास की पीड़ा है, कहीं हनुमान की भक्ति का जोश, कहीं रावण के अहंकार की गर्जना और कहीं विजयादशमी के दिन सत्य की जीत का जयघोष।
इसी विराट सांस्कृतिक परंपरा में श्री धार्मिक लीला कमेटी की 103 वर्ष पुरानी रामलीला अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। माधवदास पार्क, लालकिला मैदान में होने वाली यह रामलीला केवल मंच पर कथा सुनाने का आयोजन नहीं है। यह दिल्ली के बदलते सामाजिक जीवन, रंगमंच, आस्था और सामुदायिक संस्कृति की एक लंबी यात्रा की गवाह है।
103 वर्षों में दिल्ली बदल गई। शहर की गलियां बदलीं, जीवनशैली बदली, मनोरंजन के साधन बदले, दर्शकों की पसंद बदली और मंचीय तकनीक पूरी तरह बदल गई। लेकिन रामकथा का आकर्षण कायम रहा।
2026 में भी कमेटी पारंपरिक रामकथा को आधुनिक मंचीय प्रयोगों के साथ नई पीढ़ी तक ले जाने की तैयारी कर रही है। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी खासियत है—समय बदलता रहा, लेकिन कथा की आत्मा नहीं बदली।
103 वर्ष का सफर किसी भी सांस्कृतिक संस्था के लिए मामूली उपलब्धि नहीं है। यह केवल वर्षों की गिनती नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियों का संग्रह है।
एक समय था जब रामलीला देखने के लिए लोग दूर-दूर से पैदल या बैलगाड़ी और सार्वजनिक परिवहन के साधनों से पहुंचते थे। मैदान में जगह बनाने के लिए परिवार घंटों पहले आकर बैठते थे। बच्चे अपने माता-पिता के साथ आते और बुजुर्ग उन्हें रामकथा के पात्रों और प्रसंगों का अर्थ समझाते।
आज वही दर्शक मोबाइल फोन, इंटरनेट, ओटीटी और सोशल मीडिया के दौर में जी रहा है। उसके पास मनोरंजन के अनगिनत साधन हैं। इसके बावजूद रामलीला के मैदान में भीड़ जुटती है।
यही इस परंपरा की ताकत है।
रामलीला का आकर्षण केवल कहानी में नहीं है। वह सामूहिक अनुभव में है। हजारों लोगों के बीच एक साथ राम का नाम सुनना, मंच पर सीता हरण देखना, हनुमान का प्रवेश होते ही जयकारा लगाना और रावण दहन के समय आसमान में उठती रोशनी को देखना—ये अनुभव किसी मोबाइल स्क्रीन पर पूरी तरह नहीं मिल सकते।
कभी रामलीला का मंच सीमित साधनों से तैयार होता था। पर्दे, पेंट किए हुए बैकड्रॉप, पारंपरिक वेशभूषा और कलाकारों के संवाद ही प्रस्तुति की सबसे बड़ी ताकत होते थे।
आज मंच पर आधुनिक लाइटिंग, बेहतर साउंड सिस्टम, डिजिटल तकनीक, विशेष प्रभाव और बड़े सेट दिखाई देते हैं।
दर्शक भी अब केवल संवाद सुनना नहीं चाहता। वह दृश्य को महसूस करना चाहता है।
लेकिन आधुनिकता के बीच सबसे बड़ी चुनौती यही है कि तकनीक कहानी पर हावी न हो।
श्री धार्मिक लीला कमेटी की 103 वर्ष की यात्रा इस संतुलन का उदाहरण है। प्रस्तुति का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान और रावण के चरित्रों का मूल अर्थ नहीं बदलना चाहिए।
तकनीक मंच को आकर्षक बना सकती है, लेकिन कथा को जीवंत कलाकार और उसके मूल्य ही बनाते हैं।
रामलीला की असली शक्ति उसके संवादों से कहीं ज्यादा उसके चरित्रों में छिपी है।
राम केवल राजा नहीं, मर्यादा के प्रतीक हैं। सीता केवल कथा की नायिका नहीं, धैर्य और संघर्ष की प्रतिमूर्ति हैं। लक्ष्मण समर्पण का संदेश देते हैं। भरत त्याग और भाईचारे का उदाहरण बनते हैं। हनुमान सेवा, भक्ति और शक्ति के संयमित उपयोग का संदेश देते हैं।
और रावण?
रावण यह याद दिलाता है कि ज्ञान, शक्ति और सामर्थ्य होने के बावजूद यदि अहंकार मनुष्य पर हावी हो जाए तो उसका पतन निश्चित है।
इसीलिए रामलीला का मैदान एक तरह का खुला संस्कार विद्यालय भी है।
यहां दादा अपने पोते को बताते हैं कि राम कौन हैं। माता अपने बच्चे को सीता की कथा समझाती है। पिता हनुमान की भक्ति का उदाहरण देता है। बच्चे मंच पर दिखाई देने वाले पात्रों के जरिए उन मूल्यों को समझते हैं, जिन्हें किताबों में पढ़ना उनके लिए शायद उतना सहज न हो।
मोबाइल जानकारी दे सकता है, इंटरनेट कहानी सुना सकता है, लेकिन संस्कार का सामूहिक अनुभव रामलीला के मैदान में ही पैदा होता है।
दिल्ली की रामलीला संस्कृति ने वर्षों से रंगमंच, टेलीविजन और फिल्म जगत के कलाकारों को भी आकर्षित किया है। श्री धार्मिक लीला कमेटी के मंच पर लोकप्रिय कलाकारों की मौजूदगी दर्शकों के लिए अतिरिक्त आकर्षण रही है।
अभिनेता बिंदु दारा सिंह हनुमान की भूमिका के लिए विशेष रूप से पहचाने जाते हैं। उनके पिता और दिग्गज अभिनेता दारा सिंह की हनुमान के रूप में बनी लोकप्रिय छवि ने इस भूमिका को एक अलग भावनात्मक पहचान दी है।
जब बिंदु दारा सिंह हनुमान के रूप में मंच पर आते हैं तो दर्शकों के लिए यह सिर्फ एक कलाकार का प्रवेश नहीं रहता। उसके साथ पिछली पीढ़ी की स्मृतियां भी जुड़ जाती हैं।
इसी तरह इस मंच से शाहबाज खान और शिल्पा रायजादा जैसे कलाकार भी क्रमश: रावण और सीता की भूमिकाओं में दर्शकों के सामने आ चुके हैं।
फिल्म और टेलीविजन के कलाकारों के जुड़ने से रामलीला की पहुंच नए दर्शक वर्ग तक बढ़ती है। लेकिन यहां एक दिलचस्प सवाल भी सामने आता है—
क्या दर्शक कलाकार को देखने आता है या रामकथा को?
आदर्श स्थिति यही है कि सितारा मंच पर आए, लेकिन सितारे से बड़ी रामकथा रहे।
हर वर्ष रावण का पुतला पहले से बड़ा बनाया जाता है। आतिशबाजी बढ़ती है। मंचीय तकनीक बेहतर होती है। हजारों लोग रावण दहन देखने पहुंचते हैं।
लेकिन रावण के प्रतीक का अर्थ आज भी वही है।
अहंकार, लोभ, क्रोध, मोह, मद, मत्सर, छल और अन्याय—ये सभी किसी न किसी रूप में आधुनिक समाज के सामने मौजूद हैं।
इसलिए विजयादशमी का असली सवाल यह नहीं है कि रावण का पुतला कितना ऊंचा था।
सवाल यह है कि—
हमारे भीतर का कौन-सा रावण जला?
यदि मैदान में रावण जलता है और घर लौटने के बाद वही अहंकार, क्रोध और स्वार्थ हमारे व्यवहार में मौजूद रहता है, तो उत्सव का अर्थ अधूरा रह जाता है।
रामलीला इसी आत्ममंथन का अवसर देती है।
समय के साथ रामलीला का दायरा केवल धार्मिक कथा तक सीमित नहीं रहा। सामाजिक संदेशों को मंचन के साथ जोड़ने की कोशिश भी होती रही है।
पर्यावरण संरक्षण, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सामाजिक समरसता, नशे से दूरी, शिक्षा और परिवार के महत्व जैसे मुद्दों को रामकथा के पात्रों के माध्यम से सामने रखा जा सकता है।
राम का वन जाना त्याग की कथा है। उसी प्रसंग के जरिए पर्यावरण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दिया जा सकता है।
सीता का चरित्र धैर्य और गरिमा की बात करता है। उसी से बेटियों के सम्मान और शिक्षा का संदेश जोड़ा जा सकता है।
हनुमान सेवा का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। उसी आदर्श को जरूरतमंद की सहायता और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा जा सकता है।
यानी रामलीला अतीत की कथा सुनाते हुए वर्तमान के सवालों से संवाद कर सकती है।
दिल्ली की खूबसूरती यह है कि यहां रामलीला का कोई एक रूप नहीं है।
अलग-अलग समितियां अपनी शैली, प्रस्तुति, कलाकारों और तकनीक के साथ रामकथा को जीवित रखती हैं। लालकिला मैदान की रामलीलाएं राजधानी की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
कहीं पारंपरिक संवाद और अभिनय है, कहीं आधुनिक प्रकाश व्यवस्था और डिजिटल प्रभाव। कहीं फिल्मी कलाकार दर्शकों का आकर्षण हैं तो कहीं स्थानीय कलाकार वर्षों की साधना के साथ मंच पर उतरते हैं।
कहीं मंच विशाल है, कहीं प्रस्तुति सादगी से होती है।
लेकिन इन सभी विविधताओं के बीच एक चीज समान रहती है—रामकथा।
यही विविधता दिल्ली की रामलीला को विशिष्ट बनाती है।
रामलीला की पहुंच अब केवल दिल्ली के मैदानों तक सीमित नहीं रही है।
2026 में श्री धार्मिक लीला कमेटी की ओर से रूस हाउस में विशेष रामलीला का मंचन किया गया, जिसमें रूस सहित 10 से अधिक देशों के राजनयिकों के शामिल होने की जानकारी सामने आई।
यह पहल रामलीला को एक व्यापक सांस्कृतिक संवाद के रूप में देखने का अवसर देती है।
जब विदेशी राजनयिक भारतीय रामकथा के मंचन को देखते हैं तो उनके सामने केवल धार्मिक कथा नहीं होती। उनके सामने भारतीय समाज की हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृति, परिवार की अवधारणा, कर्तव्य, त्याग, मर्यादा और धर्म के भारतीय अर्थों की एक झलक भी आती है।
इस तरह रामलीला सांस्कृतिक कूटनीति का माध्यम भी बन सकती है।
आज का बच्चा दृश्य माध्यमों की दुनिया में बड़ा हुआ है। उसके लिए कहानी केवल सुनाई नहीं जाती, दिखाई भी जाती है।
इसलिए रामलीला के सामने चुनौती साफ है—परंपरा को बचाते हुए प्रस्तुति को समय के अनुरूप बनाना।
डिजिटल स्क्रीन, आधुनिक प्रकाश व्यवस्था, बेहतर साउंड, विशेष प्रभाव और सोशल मीडिया प्रचार आज रामलीला को नए दर्शकों तक पहुंचाने के साधन बन सकते हैं।
लेकिन तकनीक साधन है, उद्देश्य नहीं।
अगर तकनीक कथा को समझने में मदद करती है तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि तकनीक इतनी हावी हो जाए कि दर्शक राम के चरित्र के बजाय केवल दृश्य प्रभाव याद रखे, तो उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
इसलिए संतुलन जरूरी है—
मंच नया हो सकता है, संदेश पुराना नहीं।
तकनीक आधुनिक हो सकती है, मूल्य नहीं।
प्रस्तुति बदल सकती है, रामकथा की आत्मा नहीं।
103 वर्ष पुरानी परंपरा के सामने अब सबसे बड़ा सवाल अगली 100 साल की यात्रा का है।
इसके लिए युवाओं को केवल दर्शक बनाकर नहीं रखा जा सकता।
उन्हें कलाकार बनना होगा। तकनीकी टीम का हिस्सा बनना होगा। आयोजन की जिम्मेदारी संभालनी होगी। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रामलीला की कहानी बतानी होगी। सोशल मीडिया के जरिए नई पीढ़ी तक इसकी भाषा में पहुंचना होगा।
आज का युवा जिस भाषा में संवाद करता है, रामलीला को भी उस भाषा को समझना होगा—बिना अपनी मूल पहचान खोए।
युवा तकनीक ला सकते हैं, वरिष्ठ पीढ़ी परंपरा दे सकती है।
जब दोनों साथ आते हैं, तभी विरासत आगे बढ़ती है।
रामलीला की सबसे बड़ी खूबसूरती शायद यही है कि इसमें तीन-चार पीढ़ियां एक साथ बैठती हैं।
बुजुर्गों के पास स्मृतियां हैं।
माता-पिता के पास अनुभव हैं।
युवाओं के पास ऊर्जा और तकनीक है।
बच्चों के पास सवाल हैं।
रामलीला इन सभी को एक ही मैदान में ले आती है।
एक बच्चा पूछता है—राम वन क्यों गए?
दादा जवाब देते हैं—पिता के वचन के लिए।
बच्चा फिर पूछता है—भरत राजा क्यों नहीं बने?
जवाब आता है—क्योंकि भाई के अधिकार का सम्मान किया।
फिर वह पूछता है—रावण इतना विद्वान होकर भी क्यों हार गया?
जवाब मिलता है—क्योंकि ज्ञान के साथ विनम्रता न हो तो ज्ञान भी विनाश का कारण बन सकता है।
यही संवाद किसी किताब के एक पन्ने से कहीं ज्यादा गहरा संस्कार दे सकता है।
क्योंकि रामलीला केवल अतीत की कहानी नहीं सुनाती।
वह वर्तमान के सवालों का जवाब खोजने की कोशिश भी करती है।
परिवार टूट रहे हों तो राम-भरत का संबंध याद आता है।
सत्ता और स्वार्थ का संघर्ष हो तो राम का त्याग सामने आता है।
अहंकार बढ़े तो रावण का अंत याद आता है।
सेवा की जरूरत हो तो हनुमान का चरित्र सामने खड़ा होता है।
मुश्किल समय में धैर्य की जरूरत हो तो सीता का संघर्ष याद आता है।
यही कारण है कि रामलीला हर साल लौटती है।
पात्र बदलते हैं।
कलाकार बदलते हैं।
मंच बदलता है।
तकनीक बदलती है।
दर्शकों की पीढ़ी बदलती है।
लेकिन रामकथा की प्रासंगिकता नहीं बदलती।
श्री धार्मिक लीला कमेटी की 103 वर्ष की यात्रा केवल अतीत की उपलब्धि नहीं है। यह भविष्य की जिम्मेदारी भी है।
जिस परंपरा को पिछली पीढ़ियों ने संभाला, उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना होगा।
इसके लिए रामलीला को आधुनिक दर्शक की भाषा समझनी होगी, लेकिन अपनी सांस्कृतिक आत्मा को बचाए रखना होगा।
क्योंकि विरासत का अर्थ यह नहीं कि पुरानी चीज को उसी रूप में दोहराया जाए।
विरासत का अर्थ है—मूल भावना को बचाकर उसे नए समय में जीवित रखना।
लालकिले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जब रामलीला का मंच सजता है तो वह केवल एक नाटक का मंच नहीं होता।
वह दिल्ली की सामूहिक स्मृति का मंच होता है।
यहां आस्था है।
अभिनय है।
संस्कृति है।
समाज है।
परिवार है।
पीढ़ियों का संवाद है।
और सबसे बढ़कर वह सवाल है, जो हर वर्ष विजयादशमी के दिन हमारे सामने खड़ा होता है—
रावण हर साल जलता है, लेकिन क्या हमने अपने भीतर के रावण को पहचानना शुरू किया है?
शायद रामलीला की 103 वर्ष की यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यही है।
रामलीला केवल राम की कथा नहीं है। यह समाज को हर वर्ष अपने भीतर के राम और रावण को पहचानने की याद दिलाने वाली परंपरा है।
मंच बदलता रहेगा।
तकनीक बदलती रहेगी।
कलाकार आते-जाते रहेंगे।
दर्शकों की पीढ़ियां बदलती रहेंगी।
लेकिन जब तक समाज मर्यादा, सत्य, त्याग, सेवा और न्याय के अर्थ तलाशता रहेगा, तब तक रामकथा मंच पर लौटती रहेगी। और लालकिले की धरती पर 103 वर्षों से जल रही यह सांस्कृतिक मशाल आने वाली पीढ़ियों को भी यही संदेश देती रहेगी—कथा पुरानी हो सकती है, लेकिन उसके सवाल कभी पुराने नहीं होते।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


