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- 13h ago
नई दिल्ली। देश में संसाधनों के बेहतर उपयोग, कचरे में कमी और पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार चक्रीय अर्थव्यवस्था को व्यापक स्तर पर विकसित करने की दिशा में कदम उठा रही है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसके लिए पांच प्रमुख प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं। इनमें किफायती वित्त की उपलब्धता, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) व्यवस्था को प्रभावी बनाना, साझा पुनर्चक्रण अवसंरचना विकसित करना, उद्योगों की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को प्रोत्साहित करना और सरकारी खरीद के माध्यम से पुनर्चक्रित सामग्री की मांग बढ़ाना शामिल है।
भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के तीसरे सर्कुलर इकोनॉमी सम्मेलन को संबोधित करते हुए मंत्री ने कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था केवल कचरे के निपटान या पुनर्चक्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के उपयोग और उत्पादन से लेकर पुनर्प्राप्ति, पुनः उपयोग तथा उन्हें दोबारा अर्थव्यवस्था में शामिल करने तक की पूरी प्रक्रिया को बदलने वाला दृष्टिकोण है।
उन्होंने जोर दिया कि देश में चक्रीय अर्थव्यवस्था के अगले चरण में केवल पुनर्चक्रण की मात्रा बढ़ाने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए पुनर्चक्रण की गुणवत्ता, पारदर्शिता, पर्यावरणीय सुरक्षा और आर्थिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही, पुनर्चक्रित सामग्री के लिए स्थायी बाजार तैयार करना भी जरूरी है, ताकि कचरे से प्राप्त संसाधनों का दोबारा औद्योगिक उत्पादन में प्रभावी उपयोग हो सके।
भूपेंद्र यादव ने चक्रीय अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जिन पांच प्राथमिकताओं पर जोर दिया, उनका उद्देश्य उद्योगों, पुनर्चक्रण क्षेत्र और सरकारी संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है।
पहली प्राथमिकता—किफायती वित्त की उपलब्धता: पुनर्चक्रण संयंत्रों, आधुनिक तकनीकों और अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं के विकास के लिए वित्तीय संसाधनों की जरूरत होती है। किफायती वित्त मिलने से उद्योगों और उद्यमियों के लिए नई परियोजनाएं शुरू करना तथा मौजूदा क्षमता का विस्तार करना आसान हो सकता है।
दूसरी प्राथमिकता—ईपीआर व्यवस्था का प्रभावी क्रियान्वयन: विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व के तहत उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों की जिम्मेदारियों को संबंधित नियमों के अनुसार लागू करना महत्वपूर्ण है। इससे उत्पादों के उपयोग के बाद उत्पन्न होने वाले कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण को बढ़ावा मिल सकता है।
तीसरी प्राथमिकता—साझा पुनर्चक्रण अवसंरचना का विकास: आधुनिक प्रसंस्करण सुविधाओं, संग्रह केंद्रों और पुनर्चक्रण नेटवर्क की उपलब्धता बढ़ाने से कचरे के बेहतर प्रबंधन और संसाधनों की पुनर्प्राप्ति में मदद मिल सकती है।
चौथी प्राथमिकता—उद्योगों की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को प्रोत्साहन: उद्योगों में पहले से अपनाए जा रहे सफल और पर्यावरण के अनुकूल तरीकों को अन्य कंपनियों तक पहुंचाने से संसाधन दक्षता बढ़ाई जा सकती है।
पांचवीं प्राथमिकता—सरकारी खरीद से पुनर्चक्रित सामग्री की मांग बढ़ाना: सरकारी खरीद में गुणवत्ता के अनुरूप पुनर्चक्रित सामग्री और उससे बने उत्पादों को प्रोत्साहन मिलने से इनके लिए बाजार विकसित करने में सहायता मिल सकती है।
इन प्राथमिकताओं के माध्यम से सरकार का जोर पुनर्चक्रण को एक व्यापक आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित करने पर है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ औद्योगिक विकास, रोजगार और संसाधनों के बेहतर उपयोग को भी महत्व दिया जाए।
चक्रीय अर्थव्यवस्था ऐसी आर्थिक व्यवस्था है, जिसमें संसाधनों का इस्तेमाल अधिक समय तक किया जाता है और उत्पादों तथा सामग्रियों को उपयोग के बाद फेंकने के बजाय दोबारा उपयोग में लाने का प्रयास किया जाता है। इसका उद्देश्य कचरे को कम करना, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव घटाना और उत्पादन प्रक्रिया में सामग्री की उपयोगिता बनाए रखना है।
परंपरागत रैखिक अर्थव्यवस्था में सामान्यतः संसाधन निकाले जाते हैं, उनसे उत्पाद बनाए जाते हैं, उनका उपयोग किया जाता है और अंत में उन्हें कचरे के रूप में फेंक दिया जाता है। इसके विपरीत, चक्रीय अर्थव्यवस्था में उत्पादों की टिकाऊ डिजाइन, मरम्मत, पुनः उपयोग, पुनर्निर्माण और पुनर्चक्रण को महत्व दिया जाता है।
उदाहरण के लिए, प्लास्टिक पैकेजिंग को उपयोग के बाद उचित तरीके से एकत्र करके पुनर्चक्रित किया जा सकता है। धातुओं को दोबारा उत्पादन में शामिल किया जा सकता है और निर्माण कार्यों से निकलने वाली कुछ सामग्रियों का निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुसार फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस तरह की व्यवस्था से नए कच्चे माल की आवश्यकता कम करने, अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियों को घटाने और संसाधनों की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
भारत जैसे बड़े और तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि यहां शहरीकरण, औद्योगिक उत्पादन और उपभोग के विस्तार के साथ कचरे के प्रभावी प्रबंधन की जरूरत भी बढ़ रही है।
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व यानी ईपीआर व्यवस्था को चक्रीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था पुनर्चक्रण क्षेत्र में वित्तीय प्रोत्साहन उपलब्ध कराने और अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकती है।
ईपीआर का मूल उद्देश्य संबंधित नियमों के तहत उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों की जिम्मेदारियों को सुनिश्चित करना है, ताकि उत्पादों के उपयोग के बाद उत्पन्न होने वाले कचरे का उचित संग्रह, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण हो सके।
इस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन से पुनर्चक्रण क्षमता बढ़ाने, आधुनिक तकनीक अपनाने और पुनर्चक्रण मूल्य शृंखला में रोजगार के अवसर विकसित करने में मदद मिलने की संभावना है।
मंत्री के अनुसार, सरकार विभिन्न अपशिष्ट श्रेणियों के लिए डिजिटल अनुपालन व्यवस्था को मजबूत करने पर काम कर रही है। इसके साथ ही अलग-अलग ईपीआर पोर्टलों के बीच एकीकरण और परस्पर अनुकूलता सुनिश्चित करना भी प्राथमिकताओं में शामिल है।
डिजिटल व्यवस्था के बेहतर समन्वय से कंपनियों को संबंधित नियमों के अनुपालन में आसानी हो सकती है। इसके अलावा, आंकड़ों के प्रबंधन और निगरानी की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने में भी सहायता मिल सकती है।
भूपेंद्र यादव ने बताया कि सरकार अप्रैल 2027 तक पूरी तरह कार्यशील एकीकृत ईपीआर मंच विकसित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इस पहल का उद्देश्य विभिन्न अपशिष्ट श्रेणियों से संबंधित डिजिटल व्यवस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना और उद्योगों के लिए अनुपालन प्रक्रिया को अधिक सुगम बनाना है।
वर्तमान में अलग-अलग प्रकार के अपशिष्ट के प्रबंधन के लिए संबंधित नियमों और व्यवस्थाओं के तहत अलग-अलग प्रक्रियाएं लागू हो सकती हैं। ऐसे में डिजिटल प्रणालियों के बीच बेहतर समन्वय से कंपनियों को जानकारी उपलब्ध कराने, अनुपालन संबंधी प्रक्रियाओं को पूरा करने और संबंधित आंकड़ों का प्रबंधन करने में सहायता मिल सकती है।
सरकार उद्योग जगत के साथ मिलकर व्यावहारिक समस्याओं की पहचान करने और उनका समाधान तलाशने की दिशा में भी काम कर रही है।
इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एकीकृत मंच कितना उपयोगकर्ता-अनुकूल बनता है, विभिन्न व्यवस्थाओं के बीच आंकड़ों का आदान-प्रदान किस तरह होता है और उद्योगों को अनुपालन में कितनी वास्तविक सुविधा मिलती है।
मंत्री ने कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था को अगले स्तर तक पहुंचाने के लिए पुनर्चक्रण की मात्रा बढ़ाने के साथ उसकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर भी ध्यान देना होगा।
पुनर्चक्रित सामग्री तभी बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग में आ सकती है, जब उसकी गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप हो और उसे सुरक्षित तरीके से तैयार किया गया हो। इसके लिए सामग्री के स्रोत, प्रसंस्करण की प्रक्रिया और अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता के बारे में पारदर्शिता आवश्यक है।
उदाहरण के तौर पर, पुनर्चक्रित प्लास्टिक, धातु, कागज और निर्माण सामग्री का दोबारा इस्तेमाल करते समय संबंधित क्षेत्र के गुणवत्ता मानकों और सुरक्षा आवश्यकताओं का पालन करना महत्वपूर्ण है।
यदि पुनर्चक्रित सामग्री की गुणवत्ता में निरंतरता बनी रहती है, तो कंपनियों का उस पर भरोसा बढ़ सकता है। इससे पुनर्चक्रित सामग्री के लिए बाजार का विस्तार करने और नए कच्चे माल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पुनर्चक्रण की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि कितना कचरा एकत्र किया गया, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उसमें से कितनी सामग्री उपयोगी संसाधन के रूप में वापस अर्थव्यवस्था में पहुंची।
चक्रीय अर्थव्यवस्था के विस्तार में पुनर्चक्रण से जुड़ी अवसंरचना की महत्वपूर्ण भूमिका है। कई उद्योगों और छोटे उद्यमों के लिए आधुनिक प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित करना महंगा हो सकता है। ऐसे में साझा सुविधाओं का विकास संसाधनों के अधिक कुशल उपयोग का रास्ता खोल सकता है।
साझा पुनर्चक्रण अवसंरचना में संग्रह केंद्र, छंटाई सुविधाएं, प्रसंस्करण संयंत्र और संबंधित तकनीकी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं। इन सुविधाओं का उपयोग एक से अधिक कंपनियों या उद्यमों द्वारा किया जा सके, तो लागत कम करने और संचालन को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है।
इसके साथ ही, कचरे के संग्रह और प्रसंस्करण के लिए मजबूत नेटवर्क विकसित करना भी जरूरी है। यदि अपशिष्ट का संग्रह व्यवस्थित तरीके से नहीं होता या उसे प्रसंस्करण केंद्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर होती है, तो पुनर्चक्रण की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इसलिए साझा अवसंरचना के विकास के साथ संग्रह, परिवहन, छंटाई और प्रसंस्करण के विभिन्न चरणों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना भी महत्वपूर्ण होगा।
सम्मेलन में सीआईआई राष्ट्रीय चक्रीय अर्थव्यवस्था परिषद की अध्यक्ष अंजलि सिंह ने कहा कि उद्योगों की जिम्मेदारी केवल उत्पादों के उपयोग के बाद उनके निपटान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। कंपनियों को उत्पाद की डिजाइन, सामग्री के चयन और आपूर्ति शृंखला में पारदर्शिता जैसे शुरुआती चरणों से ही चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को अपनाना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यदि उत्पादों को शुरुआत से ही टिकाऊ, मरम्मत योग्य और पुनर्चक्रण के अनुकूल बनाया जाए, तो उनके उपयोग के बाद उत्पन्न होने वाले कचरे को कम करने में मदद मिल सकती है।
उदाहरण के तौर पर, ऐसी पैकेजिंग तैयार करना जिसे आसानी से अलग-अलग सामग्रियों में छांटा जा सके, या ऐसे उत्पाद बनाना जिनके खराब हिस्सों को बदलकर उन्हें फिर से उपयोग में लाया जा सके, चक्रीय अर्थव्यवस्था के व्यावहारिक उपाय हैं।
अंजलि सिंह ने कहा कि सीआईआई भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था संबंधी महत्वाकांक्षाओं को विभिन्न क्षेत्रों और मूल्य शृंखलाओं में व्यावहारिक रूप देने के लिए सरकार, उद्योग और अन्य संबंधित पक्षों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध है।
उनके अनुसार, उद्योगों की सक्रिय भागीदारी के बिना चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को बड़े पैमाने पर लागू करना कठिन होगा।
सीआईआई वेस्ट टू वर्थ टेक्नोलॉजीज के अध्यक्ष मसूद मलिक ने कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए खुले और बाजार आधारित दृष्टिकोण के साथ उद्योगों के बीच संवाद तथा सहयोग आवश्यक है।
पुनर्चक्रण से प्राप्त सामग्री का उपयोग तभी व्यापक स्तर पर बढ़ सकता है, जब उसके लिए पर्याप्त मांग उपलब्ध हो और कंपनियों को आर्थिक रूप से व्यवहार्य व्यावसायिक मॉडल मिलें।
यदि पुनर्चक्रित सामग्री की लागत, गुणवत्ता या उपलब्धता में अनिश्चितता रहती है, तो उद्योगों के लिए उसका इस्तेमाल बढ़ाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में बाजार की मांग, गुणवत्ता मानकों और प्रसंस्करण क्षमता के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना महत्वपूर्ण होगा।
उद्योगों के बीच सहयोग से तकनीकी जानकारी साझा करने, सफल कार्यप्रणालियों को अपनाने और नए व्यावसायिक अवसर विकसित करने में मदद मिल सकती है।
मसूद मलिक के विचारों के अनुरूप, चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए ऐसा वातावरण विकसित करना जरूरी है, जिसमें पुनर्चक्रण केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी न रहकर एक व्यवहार्य आर्थिक गतिविधि भी बने।
भूपेंद्र यादव की पांच प्राथमिकताओं में सरकारी खरीद के माध्यम से पुनर्चक्रित सामग्री की मांग बढ़ाना भी शामिल है। इस पहल का महत्व इसलिए है, क्योंकि पुनर्चक्रण उद्योग के विकास के लिए केवल सामग्री का उत्पादन करना पर्याप्त नहीं है। उसके लिए स्थायी और भरोसेमंद बाजार भी होना चाहिए।
सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थानों की खरीद प्रक्रिया में संबंधित गुणवत्ता और तकनीकी मानकों के अनुरूप पुनर्चक्रित सामग्री से बने उत्पादों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है।
इससे पुनर्चक्रित सामग्री की मांग बढ़ाने, कंपनियों को नए उत्पाद विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करने और संसाधनों को दोबारा अर्थव्यवस्था में शामिल करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इस तरह की खरीद में गुणवत्ता, सुरक्षा, लागत और उपयोग की आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी जरूरी है। पुनर्चक्रित सामग्री से बने उत्पादों को निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए, ताकि उनका इस्तेमाल व्यावहारिक और विश्वसनीय बना रहे।
सरकारी खरीद और उद्योगों के बीच बेहतर समन्वय से पुनर्चक्रित सामग्री के लिए बाजार विकसित करने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।
‘मेनस्ट्रीमिंग सर्कुलर इकोनॉमी’ विषय पर आयोजित तीसरे सीआईआई सर्कुलर इकोनॉमी सम्मेलन में उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्देश्य चक्रीय अर्थव्यवस्था को विभिन्न उद्योग क्षेत्रों और मूल्य शृंखलाओं में व्यापक रूप से लागू करने के उपायों पर विचार-विमर्श करना था।
इस दौरान संसाधनों के पुनर्चक्रण के मापन के मानकों, रिवर्स लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता मानकों और नए व्यावसायिक मॉडलों पर चर्चा की गई।
रिवर्स लॉजिस्टिक्स का अर्थ है उपयोग के बाद उत्पादों या सामग्रियों को वापस संग्रह केंद्रों, प्रसंस्करण इकाइयों या पुनर्चक्रण संयंत्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था। यह प्रक्रिया चक्रीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रभावी संग्रह और परिवहन के बिना कई प्रकार की सामग्री को दोबारा उपयोग में लाना कठिन हो सकता है।
सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि पुनर्चक्रण को केवल अपशिष्ट प्रबंधन की गतिविधि के रूप में देखने के बजाय उसे संसाधन दक्षता, औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
चक्रीय अर्थव्यवस्था का विस्तार पुनर्चक्रण, अपशिष्ट संग्रह, सामग्री प्रसंस्करण, उत्पाद डिजाइन और पर्यावरण प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में नए व्यावसायिक अवसर पैदा कर सकता है।
कचरे को उपयोगी संसाधनों में बदलने के लिए संग्रह नेटवर्क, छंटाई केंद्र, आधुनिक प्रसंस्करण सुविधाओं और तकनीकी सेवाओं की आवश्यकता होती है। इससे संबंधित गतिविधियों में रोजगार के अवसर विकसित हो सकते हैं।
इसके अलावा, कंपनियों को अपने उत्पादों की डिजाइन में बदलाव करने, आपूर्ति शृंखला में पारदर्शिता बढ़ाने और संसाधनों के इस्तेमाल को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नई तकनीकों तथा व्यावसायिक मॉडलों की जरूरत पड़ सकती है।
हालांकि, इन अवसरों का वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि पुनर्चक्रण की गुणवत्ता कितनी बेहतर होती है, बाजार में पुनर्प्राप्त सामग्री की मांग कितनी बढ़ती है और उद्योगों को आवश्यक वित्त तथा अवसंरचना कितनी आसानी से उपलब्ध होती है।
भूपेंद्र यादव की ओर से निर्धारित पांच प्राथमिकताएं चक्रीय अर्थव्यवस्था को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए वित्त, तकनीक, बाजार, नियमन और उद्योगों की भागीदारी को एक साथ जोड़ने पर केंद्रित हैं।
किफायती वित्त से नई परियोजनाओं को प्रोत्साहन मिल सकता है। ईपीआर व्यवस्था को मजबूत करने से संबंधित उत्पादकों की जिम्मेदारियों के क्रियान्वयन में मदद मिल सकती है। साझा पुनर्चक्रण अवसंरचना से प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाई जा सकती है, जबकि उद्योगों की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों और सरकारी खरीद से पुनर्चक्रित सामग्री के बाजार को मजबूत किया जा सकता है।
इसके साथ ही, अप्रैल 2027 तक एकीकृत ईपीआर मंच विकसित करने का लक्ष्य डिजिटल अनुपालन व्यवस्था को अधिक समन्वित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।
कुल मिलाकर, सरकार का जोर चक्रीय अर्थव्यवस्था को केवल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था तक सीमित रखने के बजाय उत्पादन, उपभोग, पुनः उपयोग और औद्योगिक विकास की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा बनाने पर है। इन प्राथमिकताओं का प्रभावी क्रियान्वयन होने पर संसाधनों के बेहतर उपयोग, पुनर्चक्रित सामग्री की मांग और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


