यूपी के सभी 75 जिलों में बनेंगे सरदार पटेल स्किल एंड एम्प्लॉयमेंट जोन, युवाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगा प्रशिक्षण और रोजगार: सीएम योगी
- 13h ago
नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, क्षेत्रीय संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता, व्यापारिक विवादों, आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग, संवाद और कूटनीति को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि आज दुनिया के सामने मौजूद समस्याएं किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। उनका प्रभाव विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं, समाजों और नागरिकों पर पड़ता है। ऐसे में आपसी बातचीत, कूटनीतिक प्रयास और साझा सहयोग के माध्यम से ही इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान तलाशा जा सकता है।
ओम बिरला सोमवार को नई दिल्ली स्थित संविधान सदन के ऐतिहासिक केंद्रीय कक्ष में 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का उद्घाटन करते हुए सदस्य और साझेदार देशों के संसदीय प्रतिनिधियों को संबोधित कर रहे थे। दो दिवसीय सम्मेलन में विभिन्न देशों के संसदीय नेताओं और प्रतिनिधियों ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग, विधायी प्रक्रियाओं, लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका तथा वैश्विक चुनौतियों के समाधान पर विचार-विमर्श किया।
लोकसभा अध्यक्ष ने अपने हिंदी संबोधन में कहा कि संसदें केवल कानून बनाने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि वे देशों के बीच आपसी समझ बढ़ाने, मतभेदों को कम करने और शांतिपूर्ण समाधान तलाशने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने पुराने संसद भवन, जिसे अब संविधान सदन के नाम से जाना जाता है, में विदेशी प्रतिनिधिमंडलों का स्वागत करते हुए भारत की संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लेख किया।
इस वर्ष ब्रिक्स संसदीय मंच की स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। ऐसे में यह सम्मेलन समूह के सदस्य देशों के बीच संसदीय संवाद को मजबूत करने और पिछले दो दशकों में विकसित सहयोग को आगे बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ओम बिरला ने कहा कि ब्रिक्स देशों का वैश्विक जनसंख्या, भूभाग, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्वपूर्ण स्थान है। इन देशों में दुनिया की करीब आधी आबादी निवास करती है और वैश्विक आर्थिक गतिविधियों में इनकी भागीदारी लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों की भौगोलिक परिस्थितियां, भाषाएं, संस्कृतियां और सामाजिक व्यवस्थाएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन मानवता के कल्याण, विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की साझा आकांक्षाएं उन्हें एक-दूसरे के करीब लाती हैं।
बिरला के अनुसार, वर्तमान समय में दुनिया को ऐसे बहुपक्षीय मंचों की आवश्यकता है, जहां विभिन्न देशों के प्रतिनिधि खुले मन से विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। संवाद के माध्यम से मतभेदों को समझने, साझा हितों की पहचान करने और समस्याओं के व्यावहारिक समाधान तैयार करने में सहायता मिलती है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सरकारों के साथ-साथ संसदों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। संसदों के पास कानून बनाने, बजट को मंजूरी देने, नीतियों पर चर्चा करने और सरकारों के कामकाज की निगरानी करने जैसे महत्वपूर्ण अधिकार होते हैं। इन अधिकारों के प्रभावी इस्तेमाल से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए संकल्पों को जमीन पर उतारने में मदद मिल सकती है।
लोकसभा अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक में सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए संयुक्त वक्तव्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साझा सहमति बनाना महत्वपूर्ण है, लेकिन वास्तविक सफलता तब मिलेगी, जब इन संकल्पों को ठोस परिणामों में बदला जाएगा।
उन्होंने विधायी सहयोग को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण माध्यम बताया। सदस्य देशों की संसदें अपने-अपने देश की परिस्थितियों के अनुरूप कानूनों और नीतियों को विकसित कर सकती हैं। इसके साथ ही बजट प्रावधानों, सरकारी योजनाओं की निगरानी और संसदीय समितियों के कामकाज के जरिए विकास संबंधी लक्ष्यों को आगे बढ़ाया जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर जलवायु परिवर्तन, डिजिटल तकनीक, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में देशों के सामने कई समान चुनौतियां हैं। यदि संसदें इन विषयों पर एक-दूसरे के अनुभवों और सफल नीतियों से सीखें, तो बेहतर कानून बनाने और सरकारी कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिल सकती है।
संसदीय संवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे विभिन्न देशों के जनप्रतिनिधियों को अपने नागरिकों की जरूरतों और प्राथमिकताओं को अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में सामने रखने का अवसर मिलता है। इससे वैश्विक नीतियों को अधिक समावेशी और जन-केंद्रित बनाने की संभावना बढ़ती है।
ब्रिक्स आज उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच है। इसके सदस्य देश आर्थिक विकास, व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार जैसे विषयों पर विचार-विमर्श करते हैं।
ब्रिक्स संसदीय मंच इस सहयोग को विधायी और संसदीय स्तर तक विस्तार देने का अवसर प्रदान करता है। यहां विभिन्न देशों के जनप्रतिनिधि अपने अनुभव साझा कर सकते हैं और यह समझने का प्रयास कर सकते हैं कि अलग-अलग व्यवस्थाओं में विकास संबंधी समस्याओं का समाधान किस तरह किया जा रहा है।
संसदीय कूटनीति की विशेषता यह है कि इसमें केवल औपचारिक सरकारी वार्ताओं तक सीमित रहने के बजाय जनप्रतिनिधियों के बीच सीधे संवाद की संभावनाएं भी बनती हैं। इससे एक-दूसरे की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, विभिन्न देशों के हित और प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे में सभी मुद्दों पर एकमत होना हमेशा आसान नहीं होता। इसके बावजूद नियमित संवाद और सहयोग के माध्यम से साझा हितों वाले क्षेत्रों में आगे बढ़ने का रास्ता तैयार किया जा सकता है।
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने भी संविधान सदन के ऐतिहासिक केंद्रीय कक्ष में उपस्थित विदेशी प्रतिनिधिमंडलों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों की विशाल जनसंख्या और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी इस समूह को अंतरराष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बनाती है।
हरिवंश ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनाए गए जन-केंद्रित और मानवता को प्राथमिकता देने वाले दृष्टिकोण का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि समूह की प्राथमिकताओं में मजबूती, नवाचार, सहयोग और स्थिरता को बढ़ावा देना शामिल है।
उन्होंने सदस्य देशों से अपनी क्षमताओं, अनुभवों और संसाधनों को साझा करने का आह्वान किया, ताकि वैश्विक प्रगति को अधिक समावेशी बनाया जा सके। उनके अनुसार, सहयोग का वास्तविक लाभ तभी व्यापक होगा, जब विकासशील देशों की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं को पर्याप्त महत्व दिया जाएगा।
हरिवंश ने वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और निर्णय लेने वाली व्यवस्थाओं में बदलती वैश्विक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।
ब्रिक्स के संदर्भ में ग्लोबल साउथ यानी एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य क्षेत्रों के अनेक विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक प्रभावी तरीके से उठाने का विषय महत्वपूर्ण रहा है।
इन देशों के सामने गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, शिक्षा, रोजगार और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने जैसी चुनौतियां हैं। कई विकासशील देश यह चाहते हैं कि वैश्विक वित्तीय संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी और प्रभाव बढ़े।
हरिवंश ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ की आवाज को अधिक प्रभावी बनाने के लिए ब्रिक्स के विस्तार की पैरवी की। उनके संबोधन में नई दिल्ली घोषणापत्र, वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत का भी उल्लेख किया गया।
ब्रिक्स के विस्तार से समूह में विभिन्न क्षेत्रों और आर्थिक परिस्थितियों वाले देशों की भागीदारी बढ़ी है। इससे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा का दायरा व्यापक हुआ है। दूसरी ओर, सदस्य देशों की बढ़ती विविधता के कारण साझा प्राथमिकताओं पर सहमति बनाना और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
ऐसी स्थिति में संसदीय मंच देशों के बीच सहयोग के व्यावहारिक क्षेत्रों की पहचान करने, अनुभव साझा करने और विकास संबंधी मुद्दों पर संवाद बढ़ाने में मदद कर सकता है।
भारत ने जून 2025 में ब्रासीलिया में आयोजित 11वें ब्रिक्स संसदीय मंच के दौरान इसकी अध्यक्षता संभाली थी। उस समय ओम बिरला को 12वें संसदीय मंच का अध्यक्ष नामित किया गया था।
भारत की अध्यक्षता के दौरान जन-केंद्रित विकास, तकनीकी नवाचार, सहयोग और स्थिरता जैसे विषयों को प्रमुखता दिए जाने की बात कही गई। इसका उद्देश्य विकास संबंधी चर्चाओं में आम नागरिकों की जरूरतों को महत्व देना और विभिन्न देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग को प्रोत्साहित करना है।
जन-केंद्रित दृष्टिकोण का अर्थ है कि विकास की योजनाओं और नीतियों का आकलन केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में होने वाले वास्तविक सुधारों से भी किया जाए। रोजगार के अवसर, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा और डिजिटल सुविधाओं तक पहुंच इसके महत्वपूर्ण पहलू हैं।
संसदीय प्रतिनिधियों के लिए यह अवसर भी महत्वपूर्ण है कि वे अपने देशों में लागू सफल योजनाओं और नीतियों की जानकारी साझा करें। इससे अन्य देशों को अपने सामाजिक और आर्थिक संदर्भ के अनुसार उपयोगी अनुभव अपनाने में सहायता मिल सकती है।
12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के दौरान पूर्ण सत्रों के अतिरिक्त सदस्य और साझेदार देशों की संसदीय समितियों के अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़े अध्यक्षों की विशेष बैठक भी आयोजित की गई।
इस बैठक में संसदीय कूटनीति, क्षमता निर्माण और विधायी कार्यों से जुड़ी बेहतर प्रक्रियाओं के आदान-प्रदान पर चर्चा की जानी है। संसदीय समितियां विभिन्न नीतियों, विधेयकों और प्रशासनिक विषयों का विस्तृत अध्ययन करती हैं। इसलिए इनके बीच सहयोग से कानून निर्माण और संसदीय निगरानी की गुणवत्ता में सुधार की संभावनाएं बन सकती हैं।
अलग-अलग देशों में संसदीय समितियों की संरचना और अधिकारों में अंतर हो सकता है, लेकिन उनके सामने कई समान चुनौतियां रहती हैं। जटिल नीतिगत मुद्दों का अध्ययन करना, विशेषज्ञों से सुझाव लेना, सरकारी कार्यक्रमों के परिणामों की समीक्षा करना और कानूनों के प्रभाव का आकलन करना इनमें शामिल है।
ऐसे में अनुभव साझा करने से संसदीय कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है। यह सहयोग लोकतांत्रिक संस्थाओं की क्षमता बढ़ाने और जनप्रतिनिधियों को अधिक जानकारीपूर्ण निर्णय लेने में भी सहायक हो सकता है।
सम्मेलन के दौरान 64 देशों के साथ गठित संसदीय मैत्री समूहों की बैठकों का भी उल्लेख किया गया। इन बैठकों का उद्देश्य विभिन्न देशों के जनप्रतिनिधियों के बीच संबंधों को मजबूत करना और अंतरराष्ट्रीय संसदीय सहयोग को नई गति देना है।
संसदीय मैत्री समूह औपचारिक कूटनीतिक संबंधों के अतिरिक्त जनप्रतिनिधियों के स्तर पर संवाद के अवसर उपलब्ध करा सकते हैं। इनके माध्यम से व्यापार, शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और लोगों के बीच संपर्क जैसे विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकता है।
ऐसे समूह विभिन्न देशों के अनुभवों को समझने और साझा हितों वाले विषयों पर सहयोग की संभावनाएं तलाशने में उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, इन बैठकों से प्राप्त सुझावों को प्रभावी बनाने के लिए संबंधित सरकारों और संसदीय संस्थाओं के बीच निरंतर समन्वय आवश्यक होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच में भाग लिया और विदेशी प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की। इस भागीदारी को भारत की ओर से संसदीय संवाद और बहुपक्षीय सहयोग को महत्व दिए जाने के संदर्भ में देखा जा रहा है।
ब्रिक्स सदस्य और साझेदार देशों के संसदीय नेताओं की मौजूदगी ने सम्मेलन को वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया। मंच का उद्देश्य विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों को एक साथ लाकर संसदीय सहयोग को मजबूत करना और जन-केंद्रित विकास को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करना है।
प्रधानमंत्री की भागीदारी के साथ सम्मेलन में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता, ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार जैसे विषयों को विशेष महत्व मिला।
भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की अधिक प्रभावी भागीदारी और वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर देता रहा है। ब्रिक्स जैसे मंच इन मुद्दों पर चर्चा के लिए एक अवसर प्रदान करते हैं।
दो दिवसीय सम्मेलन का समापन 27 अक्टूबर को संयुक्त वक्तव्य को औपचारिक रूप से अपनाने के साथ निर्धारित किया गया है। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला समापन संबोधन देंगे और ब्रिक्स संसदीय मंच की अध्यक्षता औपचारिक रूप से चीन को सौंप दी जाएगी।
संयुक्त वक्तव्य के माध्यम से सम्मेलन में हुई चर्चाओं और सदस्य देशों की साझा प्राथमिकताओं को सामने लाने का अवसर मिलेगा। इसमें शामिल विषयों का वास्तविक महत्व इस बात से तय होगा कि सदस्य देश सहमत बिंदुओं को अपनी संसदीय प्रक्रियाओं, नीतिगत चर्चाओं और सहयोग कार्यक्रमों में किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
अध्यक्षता का हस्तांतरण ब्रिक्स संसदीय मंच की संस्थागत निरंतरता का हिस्सा है। इसके जरिए समूह के सदस्य देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और आगामी बैठकों के लिए प्राथमिकताएं निर्धारित करने का अवसर मिलता है।
ब्रिक्स संसदीय मंच में उठाए गए मुद्दे ऐसे समय में महत्वपूर्ण हैं, जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कई स्तरों पर बदलाव के दौर से गुजर रही है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, भू-राजनीतिक तनाव, तकनीकी परिवर्तन और जलवायु संबंधी चुनौतियां देशों के बीच सहयोग की आवश्यकता को बढ़ा रही हैं।
विकासशील देशों के लिए वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, व्यापार के अवसरों, ऊर्जा सुरक्षा और आधुनिक तकनीक तक पहुंच जैसे विषय विशेष महत्व रखते हैं। इन क्षेत्रों में सहयोग से विकास की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, लेकिन इसके लिए सदस्य देशों के बीच विश्वास और साझा प्राथमिकताओं की पहचान आवश्यक है।
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की अवधारणा का प्रमुख आधार यह है कि अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में विभिन्न क्षेत्रों और देशों के हितों को पर्याप्त स्थान मिले। इसके लिए संवाद, संस्थागत सुधार और प्रभावी बहुपक्षीय सहयोग महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
संसदीय मंच इस प्रक्रिया में सहायक हो सकता है, क्योंकि जनप्रतिनिधि विभिन्न देशों की सामाजिक आवश्यकताओं, आर्थिक प्राथमिकताओं और लोकतांत्रिक अपेक्षाओं को चर्चा में शामिल कर सकते हैं।
लोकतंत्र में संसद की भूमिका कानून बनाने के साथ-साथ सरकार को जवाबदेह बनाए रखने और जनता की आवाज को प्रतिनिधित्व देने की भी होती है। संसदीय मंचों पर विचार-विमर्श से विभिन्न देशों को अपनी संस्थागत प्रक्रियाओं की समीक्षा करने और दूसरे देशों के अनुभवों से सीखने का अवसर मिलता है।
संसदों के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र विधायी क्षमता का विकास है। बदलती तकनीक, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पर्यावरण और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे विषयों पर कानून बनाना लगातार अधिक जटिल होता जा रहा है। इन मुद्दों पर विशेषज्ञता साझा करना और बेहतर संसदीय प्रक्रियाएं विकसित करना उपयोगी साबित हो सकता है।
इसके अलावा, संसदीय समितियों के माध्यम से नीतियों के प्रभाव का आकलन करने, सार्वजनिक व्यय की निगरानी करने और नागरिकों की समस्याओं को सामने लाने की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकता है।
12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का व्यापक संदेश यह है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में किसी भी देश के लिए सभी चुनौतियों का समाधान अकेले करना आसान नहीं है। क्षेत्रीय संघर्षों से लेकर आर्थिक अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन तक, अनेक समस्याओं का प्रभाव सीमाओं से परे जाता है।
ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का अर्थ केवल बैठकों और घोषणाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। साझा संकल्पों को प्रभावी नीतियों, बेहतर कानूनों, संसदीय निगरानी और व्यावहारिक सहयोग में बदलना आवश्यक है।
ओम बिरला और हरिवंश नारायण सिंह के संबोधनों में इसी बात पर जोर दिया गया कि संसदें संवाद, कूटनीति और सहयोग को मजबूत बनाने में प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भागीदारी ने भी सम्मेलन के महत्व को रेखांकित किया।
कुल मिलाकर, नई दिल्ली में आयोजित 12वां ब्रिक्स संसदीय मंच भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय संसदीय सहयोग को आगे बढ़ाने, ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को प्रमुखता देने और वैश्विक चुनौतियों के शांतिपूर्ण समाधान पर चर्चा करने का महत्वपूर्ण अवसर है। सम्मेलन की सफलता अंततः इस बात से आंकी जाएगी कि यहां बनी सहमति और साझा संकल्प भविष्य में किस हद तक ठोस परिणामों में बदलते हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


