17 सितंबर से मथुरा में शुरू होगा सेवा संकल्प अभियान, 5 लाख दीपों से जगमगाएंगे धार्मिक स्थल
- 11h ago
नई दिल्ली। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच भारत और रूस के बीच एक बार फिर उच्चस्तरीय कूटनीतिक संवाद होने जा रहा है। दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच 11 सितंबर को द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है। क्रेमलिन ने दोनों नेताओं की मुलाकात की पुष्टि करते हुए भारत को रूस का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बताया है।
राष्ट्रपति पुतिन के भारत दौरे से पहले क्रेमलिन के प्रवक्ता और रूसी राष्ट्रपति के प्रेस सचिव दिमित्री पेस्कोव ने मंगलवार को मीडिया से वर्चुअल बातचीत की। इस दौरान उन्होंने भारत-रूस संबंधों, ब्रिक्स के भविष्य, वैश्विक व्यवस्था में हो रहे बदलाव, अमेरिकी प्रतिबंधों, ऊर्जा सहयोग, परमाणु परियोजनाओं और रक्षा क्षेत्र में संभावित सहयोग को लेकर रूस का पक्ष सामने रखा।
पेस्कोव के बयानों से साफ संकेत मिला कि मोदी-पुतिन बैठक केवल औपचारिक द्विपक्षीय मुलाकात तक सीमित नहीं रहने वाली है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक संबंधों से जुड़े कई संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की संभावना है।
पेस्कोव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के संबंधों को बेहद करीबी और व्यावहारिक बताया। उन्होंने कहा कि दोनों नेता एक-दूसरे के साथ इतने खुले और ईमानदार तरीके से बातचीत करते हैं कि वैश्विक एजेंडे तथा द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर भी रचनात्मक चर्चा संभव होती है।
रूसी राष्ट्रपति के प्रवक्ता ने कहा कि भारत और रूस के बीच उच्चस्तरीय संपर्क दोनों देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में पुतिन की भारत यात्रा को रूस की ओर से भारत के साथ अपने संबंधों को प्राथमिकता देने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
दोनों देशों के बीच रक्षा, ऊर्जा, परमाणु सहयोग, अंतरिक्ष, व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर लंबे समय से सहयोग रहा है। ऐसे में आगामी बैठक में पुराने सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ नए क्षेत्रों में साझेदारी की संभावनाओं पर भी चर्चा हो सकती है।
ब्रिक्स की भूमिका पर पूछे गए सवाल के जवाब में पेस्कोव ने कहा कि ब्रिक्स को पारंपरिक अर्थों में किसी औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स कोई संगठन नहीं, बल्कि एक क्लब है। इसके पास कोई औपचारिक चार्टर, स्थायी नियम या स्थायी कार्यालय नहीं है। इसके बजाय यह उन देशों का समूह है, जो इस बात को लेकर समान दृष्टिकोण रखते हैं कि वैश्विक व्यवस्था कैसे काम करनी चाहिए और अलग-अलग क्षेत्रों में किस तरह सहयोग बढ़ाया जा सकता है।
रूस के मुताबिक ब्रिक्स का महत्व लगातार बढ़ रहा है और इसके माध्यम से सदस्य देश आर्थिक सहयोग के साथ-साथ राजनीतिक, सुरक्षा और सांस्कृतिक मुद्दों पर भी संवाद कर रहे हैं।
पेस्कोव ने ब्रिक्स सहयोग के तीन प्रमुख क्षेत्रों का भी उल्लेख किया। इनमें राजनीति एवं सुरक्षा, अर्थव्यवस्था एवं वित्त तथा सांस्कृतिक एवं मानवीय संपर्क शामिल हैं।
रूस इन तीनों क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही रूस ब्रिक्स के भीतर अधिक से अधिक देशों की भागीदारी बढ़ाने के विचार का भी समर्थन करता है।
इससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में ब्रिक्स का दायरा और व्यापक हो सकता है तथा विभिन्न देशों को अलग-अलग स्तर पर समूह की गतिविधियों में शामिल किया जा सकता है।
पेस्कोव ने ब्रिक्स में 'पार्टनर कंट्री' की नई श्रेणी को सकारात्मक विकास बताया। उन्होंने कहा कि 2024 में ब्रिक्स पार्टनर कंट्री की नई श्रेणी बनाई गई थी और अब यह व्यवस्था आगे बढ़ रही है।
रूस के अनुसार बेलारूस, बोलीविया, वियतनाम, कजाकिस्तान, क्यूबा, नाइजीरिया, मलेशिया, थाईलैंड, युगांडा और उज्बेकिस्तान को पार्टनर का दर्जा दिया गया है।
इन देशों के प्रतिनिधियों को धीरे-धीरे ब्रिक्स के अलग-अलग कार्य समूहों और सहयोग के विभिन्न प्रारूपों में शामिल किया जा रहा है।
रूस इसे ब्रिक्स के विस्तार और वैश्विक स्तर पर इसके प्रभाव को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानता है।
पेस्कोव के बयान में ब्रिक्स को लेकर रूस की व्यापक रणनीतिक सोच भी दिखाई दी। उन्होंने ब्रिक्स को केवल आर्थिक सहयोग का मंच मानने के बजाय इसे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में बढ़ते बदलाव का हिस्सा बताया।
रूस का कहना है कि दुनिया में एकध्रुवीय व्यवस्था कमजोर हो रही है और विभिन्न देश वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत, रूस, चीन और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच बढ़ते सहयोग को इसी व्यापक बदलाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब वैश्विक राजनीति में पश्चिमी देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी हुई है। ऐसे में ब्रिक्स के मंच से निकलने वाले राजनीतिक और आर्थिक संदेशों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।
पेस्कोव ने बताया कि रियो डी जनेरियो में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान रूसी प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कामकाज को बेहतर बनाने से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विशेषज्ञ स्तर पर बातचीत शुरू करने की पहल की थी।
रूस इस पहल को महत्वपूर्ण मानता है और उसके अनुसार ब्रिक्स के कई देशों ने इसका समर्थन किया है।
इससे यह संकेत मिलता है कि ब्रिक्स के भीतर केवल व्यापार और आर्थिक सहयोग ही नहीं, बल्कि वैश्विक संस्थाओं में सुधार और अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में आ रहे हैं।
रूस ने ब्रिक्स देशों के बीच बढ़ते वित्तीय सहयोग को लेकर भी महत्वपूर्ण दावा किया है। पेस्कोव के मुताबिक रूस और ब्रिक्स देशों के बीच अब करीब 90 प्रतिशत भुगतान राष्ट्रीय मुद्राओं में हो रहा है।
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स देशों के बीच लंबे समय से डॉलर पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा देने को लेकर चर्चा होती रही है।
यदि राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापारिक भुगतान का हिस्सा लगातार बढ़ता है तो इससे सदस्य देशों के बीच सीमा पार व्यापार के लिए नए वित्तीय तंत्र विकसित करने की जरूरत बढ़ सकती है।
हालांकि इस दिशा में वास्तविक प्रगति के लिए बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, मुद्रा विनिमय व्यवस्था और सीमा पार भुगतान प्रणाली को और मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
भारत द्वारा रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिका की ओर से प्रस्तावित प्रतिबंधों और टैरिफ संबंधी कदमों पर पेस्कोव ने कड़ा रुख अपनाया।
उन्होंने प्रस्तावित अमेरिकी प्रतिबंध विधेयक को "अवैध" और अस्वीकार्य बताया।
रूस का तर्क है कि देशों को अपने आर्थिक हितों के अनुरूप व्यापारिक संबंध तय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर भारत पर किसी प्रकार का बाहरी दबाव दोनों देशों के बीच व्यापार और रणनीतिक संबंधों के संदर्भ में संवेदनशील मुद्दा बन सकता है।
मोदी-पुतिन वार्ता के दौरान ऊर्जा व्यापार और वैश्विक प्रतिबंधों के बदलते माहौल पर भी चर्चा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
रूस ने भारत के साथ नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ने की इच्छा भी जाहिर की है।
पेस्कोव ने कहा कि रूस भारत के साथ नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के विकास को लेकर बातचीत का इंतजार कर रहा है।
परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भारत और रूस के बीच पहले से ही सहयोग रहा है। ऐसे में नए संयंत्रों और भविष्य की परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं पर चर्चा दोनों देशों के रणनीतिक ऊर्जा सहयोग को और व्यापक कर सकती है।
भारत के लिए भी परमाणु ऊर्जा को ऊर्जा सुरक्षा और कम-कार्बन बिजली उत्पादन के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा जाता है।
पुतिन की भारत यात्रा के दौरान रक्षा क्षेत्र से जुड़ी संभावित बातचीत भी महत्वपूर्ण रहने वाली है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि रूस के अत्याधुनिक एसयू-57 लड़ाकू विमानों की भारत को संभावित बिक्री का मुद्दा दोनों देशों के एजेंडे में शामिल है।
इस बयान के बाद रक्षा क्षेत्र में इस बात को लेकर चर्चा तेज हो सकती है कि क्या भारत और रूस के बीच एसयू-57 को लेकर किसी प्रकार की समझ या आगे की बातचीत होती है।
भारत लंबे समय से अपनी वायुसेना के आधुनिकीकरण और लड़ाकू विमानों की क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है। ऐसे में किसी भी नई रक्षा साझेदारी का मूल्यांकन तकनीकी क्षमता, लागत, उत्पादन, रखरखाव और भारत की दीर्घकालिक रक्षा जरूरतों के आधार पर किया जाएगा।
मोदी-पुतिन बैठक ऐसे समय हो रही है जब रूस-यूक्रेन युद्ध अब भी वैश्विक कूटनीति का बड़ा मुद्दा बना हुआ है।
भारत ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से होना चाहिए। भारत ने युद्ध को समाप्त करने और शांति स्थापित करने के प्रयासों का समर्थन किया है।
ऐसे में मोदी और पुतिन के बीच बातचीत में यूक्रेन युद्ध, शांति प्रयासों और संघर्ष से जुड़े व्यापक वैश्विक प्रभावों पर चर्चा संभावित मानी जा रही है।
भारतीय प्रयासों के बारे में पूछे जाने पर पेस्कोव ने कहा कि रूस भारतीय प्रयासों का स्वागत करता है।
यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत रूस के साथ अपने पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों के साथ भी अपने संबंधों को आगे बढ़ा रहा है।
भारत के सामने वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में एक जटिल कूटनीतिक संतुलन कायम रखने की चुनौती है। एक तरफ रूस भारत का लंबे समय से रणनीतिक और रक्षा साझेदार है, वहीं दूसरी ओर भारत के अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक संबंध भी लगातार मजबूत हुए हैं।
रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिमी प्रतिबंध और वैश्विक व्यापार में बदलते समीकरणों के बीच भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर जोर देता रहा है।
मोदी-पुतिन वार्ता इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण होगी कि दोनों देश अपने पारंपरिक संबंधों को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
पेस्कोव ने भारत-रूस संबंधों को केवल तेल और रक्षा सहयोग तक सीमित मानने से इनकार किया। उन्होंने दोनों देशों के संबंधों को व्यापक और बहुआयामी बताया।
ऊर्जा और रक्षा के अलावा परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, शिक्षा, विज्ञान एवं तकनीक, व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क जैसे क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं।
रूस में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों का उल्लेख करते हुए पेस्कोव ने उनका स्वागत किया और दोनों देशों के बीच मानवीय एवं शैक्षणिक संपर्कों के महत्व को रेखांकित किया।
भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार में ऊर्जा क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। हालांकि दोनों देशों के सामने यह चुनौती भी है कि व्यापार को कुछ प्रमुख क्षेत्रों पर अत्यधिक निर्भरता से निकालकर अधिक विविध बनाया जाए।
मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि, खाद्य उत्पाद, तकनीक, परिवहन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को व्यापक बना सकती हैं।
राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान को बढ़ावा देने की कोशिश भी इसी व्यापक आर्थिक सहयोग का हिस्सा हो सकती है।
दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ब्रिक्स का विस्तार, नई साझेदारियां, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था जैसे मुद्दे सम्मेलन के केंद्र में रह सकते हैं।
इन सबके बीच मोदी-पुतिन बैठक विशेष महत्व रखती है। दोनों नेताओं की बातचीत से भारत-रूस संबंधों की भविष्य की दिशा के बारे में महत्वपूर्ण संकेत मिल सकते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की प्रस्तावित बैठक के संभावित एजेंडे में द्विपक्षीय व्यापार, ऊर्जा सहयोग, परमाणु परियोजनाएं, रक्षा सहयोग, एसयू-57 लड़ाकू विमान, यूक्रेन संकट, वैश्विक प्रतिबंध, राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापारिक भुगतान और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं।
हालांकि बैठक के अंतिम एजेंडे और किसी संभावित समझौते की आधिकारिक जानकारी दोनों नेताओं की बातचीत के बाद ही स्पष्ट होगी।
फिलहाल क्रेमलिन के बयानों ने इतना जरूर साफ कर दिया है कि रूस भारत को अपने सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में से एक मानता है और पुतिन की भारत यात्रा को दोनों देशों के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
पुतिन की भारत यात्रा ऐसे दौर में हो रही है जब दुनिया तेजी से बदल रही है। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, यूक्रेन युद्ध जारी है, अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और वैश्विक दक्षिण अपनी आवाज को अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहा है।
ऐसे माहौल में भारत और रूस के बीच होने वाली मोदी-पुतिन वार्ता का महत्व केवल दो देशों के संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें ऊर्जा सुरक्षा से लेकर रक्षा, परमाणु सहयोग, वैश्विक व्यापार, बहुध्रुवीय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक कई बड़े मुद्दों की दिशा तय करने वाले संकेत मिल सकते हैं।
ब्रिक्स के मंच पर जहां भारत वैश्विक दक्षिण की भूमिका को मजबूत करने की कोशिश करेगा, वहीं रूस बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के अपने दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने का प्रयास करेगा। ऐसे में दिल्ली में होने वाली मोदी-पुतिन मुलाकात दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के अगले चरण का आधार तैयार कर सकती है।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


