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- 13h ago
नई दिल्ली। भारत का कंज्यूमर ड्यूरेबल्स बाजार आने वाले वर्षों में तेज विस्तार के दौर में प्रवेश कर सकता है। कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) और बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) की ओर से जारी नई रिपोर्ट के मुताबिक, देश का कंज्यूमर ड्यूरेबल्स मार्केट वर्ष 2030 तक सालाना 8 से 10 प्रतिशत की दर से बढ़कर 3 से 3.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
सीआईआई कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड ड्यूरेबल्स समिट 2026 में जारी रिपोर्ट में बाजार की संभावनाओं के साथ-साथ भारत में घरेलू विनिर्माण, कंपोनेंट इकोसिस्टम, लोकलाइजेशन, तकनीकी क्षमता और निर्यात के विस्तार से जुड़े अवसरों का विश्लेषण किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत के विशाल घरेलू बाजार को यदि मजबूत मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, बेहतर तकनीक और प्रतिस्पर्धी लागत के साथ जोड़ा जाए तो देश केवल घरेलू मांग पूरी करने वाला बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक कंज्यूमर ड्यूरेबल्स मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
रिपोर्ट में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स बाजार के विस्तार के पीछे कई प्रमुख कारण बताए गए हैं। इनमें परिवारों की बढ़ती आय, उपभोक्ताओं की बदलती जरूरतें, बेहतर फाइनेंसिंग सुविधा और कई प्रमुख उत्पाद श्रेणियों में अभी भी कम बाजार पैठ शामिल है।
टीवी, एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर और वॉशिंग मशीन जैसे उत्पादों की मांग में आने वाले वर्षों में वृद्धि की संभावना जताई गई है। जैसे-जैसे अधिक परिवारों की आय बढ़ेगी और उपभोक्ताओं के पास आसान वित्तीय विकल्प उपलब्ध होंगे, वैसे-वैसे इन उत्पादों की पहुंच भी बढ़ सकती है।
बदलती जीवनशैली और शहरीकरण भी इस मांग को आगे बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं। उपभोक्ता अब सुविधा, ऊर्जा दक्षता, स्मार्ट फीचर्स और बेहतर तकनीक वाले उत्पादों को भी प्राथमिकता दे रहे हैं।
रिपोर्ट में केवल अंतिम उत्पादों के बाजार विस्तार को ही अवसर नहीं माना गया है। इसके अनुसार बाजार की वृद्धि से अगले पांच वर्षों में मटीरियल और कन्वर्जन के स्तर पर 40,000 से 50,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त घरेलू वैल्यू एडिशन अवसर पैदा हो सकता है।
इसका अर्थ है कि यदि भारत घरेलू स्तर पर अधिक कंपोनेंट का उत्पादन करने की क्षमता विकसित करता है तो बाजार के विस्तार का बड़ा हिस्सा देश के भीतर ही आर्थिक गतिविधियों और मूल्य सृजन में बदल सकता है।
हालांकि रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि वर्तमान लोकलाइजेशन की गति को देखते हुए 2030 तक इस अवसर का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा हो सकता है। इसलिए कंपोनेंट निर्माण की घरेलू क्षमता बढ़ाना आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण प्राथमिकता बन सकता है।
कंज्यूमर ड्यूरेबल्स उद्योग में अंतिम उत्पाद की असेंबली के साथ-साथ उसके प्रमुख कंपोनेंट का स्थानीय स्तर पर निर्माण भी महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रमुख श्रेणियों में बिल ऑफ मटीरियल्स यानी उत्पाद में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और कंपोनेंट का लोकलाइजेशन अभी 25 से 70 प्रतिशत के बीच है।
टीवी और रूम एयर कंडीशनर में लोकलाइजेशन का स्तर अपेक्षाकृत कम है। दूसरी ओर रेफ्रिजरेटर और वॉशिंग मशीन में स्थानीयकरण का स्तर ज्यादा बताया गया है।
इस अंतर से संकेत मिलता है कि कुछ उत्पाद श्रेणियों में भारत ने घरेलू विनिर्माण क्षमता विकसित की है, लेकिन कई महत्वपूर्ण तकनीकी कंपोनेंट अब भी वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर हैं।
रिपोर्ट में कुछ ऐसे अहम कंपोनेंट की पहचान की गई है जिनका स्थानीय उत्पादन बढ़ाना जरूरी माना गया है। इनमें टीवी डिस्प्ले पैनल, रूम एयर कंडीशनर के कंप्रेसर, रेफ्रिजरेटर इंसुलेशन और वॉशिंग मशीन मोटर प्रमुख हैं।
इन कंपोनेंट की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। साथ ही भारत में उत्पादों के निर्माण से जुड़ी वैल्यू चेन और अधिक गहरी हो सकती है।
हालांकि इन कंपोनेंट का स्थानीय उत्पादन शुरू करना केवल निवेश का मामला नहीं है। इसके लिए तकनीकी जानकारी, उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे माल, बड़े पैमाने पर उत्पादन, कुशल श्रम, अनुसंधान एवं विकास और वैश्विक स्तर की लागत प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता होगी।
रिपोर्ट के मुताबिक अहम कंपोनेंट के लोकलाइजेशन में टेक्नोलॉजी तक पहुंच और स्केल इकोनॉमिक्स प्रमुख चुनौतियों के रूप में सामने आ रहे हैं।
किसी कंपोनेंट का घरेलू स्तर पर उत्पादन तभी व्यावसायिक रूप से सफल हो सकता है जब उत्पादन का पैमाना पर्याप्त बड़ा हो और प्रति यूनिट लागत अंतरराष्ट्रीय उत्पादकों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी हो।
भारत के सामने एक चुनौती यह भी है कि घरेलू बाजार में उपभोक्ता कीमत के प्रति संवेदनशील हैं। ऐसे में कंपनियों को एक तरफ स्थानीय उत्पादन की शुरुआती लागत वहन करनी होगी और दूसरी ओर उत्पादों को ग्राहकों के लिए किफायती बनाए रखना होगा।
सीआईआई नेशनल कमिटी ऑन कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड ड्यूरेबल्स के चेयरमैन मुकुंदन मेनन ने कहा कि भारत के पास अपने बड़े घरेलू बाजार का इस्तेमाल कर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षमताएं विकसित करने का बड़ा अवसर है।
उनके अनुसार आगे की प्राथमिकताओं में घरेलू मांग बढ़ाना, कंपोनेंट इकोसिस्टम को मजबूत करना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों के जरूरी मानकों को पूरा कर सकें।
उन्होंने घरेलू खपत में वृद्धि की संभावनाओं पर जोर देते हुए कहा कि अलग-अलग कैटेगरी में बाजार पैठ बढ़ने से भारतीय मैन्युफैक्चरिंग बेस को मजबूत करने के लिए जरूरी पैमाना हासिल करने में मदद मिल सकती है।
सीआईआई स्किल्स स्टीयरिंग काउंसिल के चेयरमैन बी. त्यागराजन ने ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में सरकार और उद्योग के बीच सहयोग की जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि भारत जब घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और इंपोर्ट सब्स्टिट्यूशन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब उद्योग के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन करना और लागत के मामले में प्रतिस्पर्धी बने रहना महत्वपूर्ण होगा।
उनके अनुसार भारतीय कंपनियों को ऐसे उत्पाद विकसित करने होंगे जो घरेलू बाजार की कीमत संबंधी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए किफायती हों और साथ ही वैश्विक बाजारों के लिए आवश्यक गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मक मानकों को भी पूरा कर सकें।
रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि गहरे लोकलाइजेशन के लिए उद्योग को शुरुआती स्तर पर निवेश करना होगा। नए कंपोनेंट प्लांट, तकनीक, मशीनरी, अनुसंधान और कौशल विकास में निवेश की जरूरत होगी।
इसके साथ कंपनियों को पर्याप्त बाजार आकार हासिल करने की चुनौती भी होगी। यदि उत्पादन का पैमाना छोटा रहा तो घरेलू कंपोनेंट की लागत आयातित कंपोनेंट के मुकाबले अधिक हो सकती है।
इसलिए लोकलाइजेशन को केवल नीति का विषय नहीं बल्कि एक व्यावसायिक रूप से टिकाऊ मॉडल बनाना आवश्यक होगा।
बीसीजी के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीनियर पार्टनर अभीक सिंघी ने कहा कि 2030 तक भारत का कंज्यूमर ड्यूरेबल्स बाजार 3 से 3.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
उन्होंने इस अवसर को केवल घरेलू बाजार की वृद्धि तक सीमित न मानते हुए कहा कि अगला चरण कंपोनेंट, तकनीक, उत्पाद डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग में गहरी क्षमताएं विकसित करने का होना चाहिए।
उनके अनुसार भारत को अपने घरेलू बाजार के पैमाने का इस्तेमाल वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए करना होगा। लोकलाइजेशन को व्यावसायिक रूप से लाभकारी बनाने, बड़े पैमाने पर उत्पादन करने और लागत के लिहाज से प्रतिस्पर्धी बनने को प्राथमिकता देनी होगी।
उन्होंने भारतीय कंपनियों को केवल 'भारत के लिए निर्माण' से आगे बढ़कर 'दुनिया के लिए डिजाइन और निर्माण' की क्षमता विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत बताई।
घरेलू बाजार की वृद्धि के साथ रिपोर्ट में निर्यात की संभावनाओं पर भी जोर दिया गया है। यदि भारतीय कंपनियां गुणवत्ता, लागत, तकनीक और डिजाइन के मामले में वैश्विक मानकों के अनुरूप क्षमता विकसित करती हैं तो देश से कंज्यूमर ड्यूरेबल्स के निर्यात में भी वृद्धि की गुंजाइश बन सकती है।
भारत का बड़ा घरेलू बाजार कंपनियों को उत्पादन का पैमाना हासिल करने में मदद कर सकता है। यही पैमाना बाद में निर्यात के लिए प्रतिस्पर्धात्मक लाभ में बदला जा सकता है।
रिपोर्ट में रिसर्च एंड डेवलपमेंट और प्रोडक्ट इनोवेशन को भी उद्योग की दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए जरूरी बताया गया है।
कंज्यूमर ड्यूरेबल्स का बाजार तेजी से स्मार्ट और तकनीक आधारित हो रहा है। ऊर्जा दक्षता, कनेक्टेड डिवाइस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फीचर और बेहतर उपयोगकर्ता अनुभव जैसे क्षेत्रों में नवाचार की मांग बढ़ रही है।
ऐसे में केवल कम लागत पर उत्पाद तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। भारतीय कंपनियों को उत्पाद डिजाइन और तकनीकी विकास में भी अपनी क्षमता बढ़ानी होगी।
रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित उत्पादकता सुधार को भी भविष्य के लिए महत्वपूर्ण अवसर माना गया है।
मैन्युफैक्चरिंग में एआई का इस्तेमाल उत्पादन प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाने, गुणवत्ता नियंत्रण, मशीन मेंटेनेंस, मांग का अनुमान लगाने और सप्लाई चेन प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।
यदि इन तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है तो कंपनियों के लिए लागत कम करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
रिपोर्ट में एक अनुमान लगाने योग्य और स्पष्ट रेगुलेटरी माहौल को भी दीर्घकालीन निवेश के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।
कंज्यूमर ड्यूरेबल्स उद्योग में बड़ी क्षमता स्थापित करने के लिए कंपनियों को कई वर्षों का निवेश करना पड़ता है। ऐसे में कंपनियों के लिए नीतियों, मानकों और नियामकीय आवश्यकताओं में स्थिरता और स्पष्टता महत्वपूर्ण होती है।
एक स्पष्ट रोडमैप उद्योग को निवेश संबंधी फैसले लेने में मदद कर सकता है और घरेलू तथा विदेशी कंपनियों को भारत में दीर्घकालीन क्षमता विकसित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।
रिपोर्ट की एक अहम बात यह है कि भारत में कई बड़े घरेलू उपकरणों की बाजार पैठ अभी भी अन्य समान बाजारों की तुलना में कम है। रिपोर्ट के अनुसार कुछ प्रमुख श्रेणियों में भारत की घरेलू पैठ संबंधित देशों की तुलना में 20 से 90 प्रतिशत अंक तक कम है।
यही कम पैठ भविष्य के लिए बड़ी मांग क्षमता तैयार करती है। यदि आय में वृद्धि, आसान फाइनेंसिंग और बदलती जीवनशैली जैसे कारक साथ आते हैं तो इन उत्पादों की मांग में लंबे समय तक वृद्धि बनी रह सकती है।
लोकलाइजेशन के मामले में रेफ्रिजरेटर और वॉशिंग मशीन जैसी श्रेणियों में भारत ने अपेक्षाकृत अधिक स्थानीय क्षमता विकसित की है। इसके बावजूद इन उत्पादों के कुछ महत्वपूर्ण कंपोनेंट में और गहरे स्थानीयकरण की गुंजाइश बनी हुई है।
इससे संकेत मिलता है कि भारत ने अंतिम उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग में प्रगति की है, लेकिन कंपोनेंट इकोसिस्टम को और मजबूत करना अभी भी आवश्यक है।
टीवी और रूम एयर कंडीशनर जैसी श्रेणियों में लोकलाइजेशन का स्तर तुलनात्मक रूप से कम बताया गया है। इन उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले कुछ तकनीकी और उच्च-मूल्य वाले कंपोनेंट अभी भी आयात पर निर्भर हैं।
विशेष रूप से टीवी डिस्प्ले पैनल और एयर कंडीशनर कंप्रेसर जैसे कंपोनेंट में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना चुनौतीपूर्ण लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जा रहा है।
सीआईआई-बीसीजी की रिपोर्ट भारत के कंज्यूमर ड्यूरेबल्स उद्योग के लिए एक ऐसे दौर की ओर संकेत करती है जिसमें घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता एक-दूसरे को बढ़ावा दे सकती हैं।
एक तरफ बढ़ती आय, कम बाजार पैठ और बदलती उपभोक्ता आदतों से घरेलू मांग बढ़ सकती है। दूसरी तरफ लोकलाइजेशन, कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात क्षमता में सुधार से इस मांग को घरेलू आर्थिक गतिविधि में बदला जा सकता है।
आने वाले वर्षों में उद्योग के सामने दोहरी चुनौती होगी। उसे एक तरफ भारतीय उपभोक्ताओं के लिए उत्पादों को किफायती रखना होगा और दूसरी तरफ वैश्विक प्रतिस्पर्धा के स्तर की गुणवत्ता, तकनीक और लागत हासिल करनी होगी।
यदि कंपनियां केवल आयातित कंपोनेंट की असेंबली पर निर्भर रहती हैं तो घरेलू वैल्यू एडिशन सीमित रह सकता है। वहीं गहरे लोकलाइजेशन के लिए बड़े निवेश और पर्याप्त बाजार पैमाने की आवश्यकता होगी।
रिपोर्ट के अनुसार भारत के कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर को अगले चरण में कई मोर्चों पर एक साथ काम करने की आवश्यकता होगी। इनमें प्रमुख रूप से:
रिपोर्ट का व्यापक संदेश यह है कि भारत के पास कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में घरेलू मांग के दम पर वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने का अवसर है। 2030 तक 3 से 3.25 लाख करोड़ रुपये का संभावित बाजार आकार कंपनियों के लिए बड़ा घरेलू आधार उपलब्ध करा सकता है।
यदि इसके साथ मजबूत कंपोनेंट इकोसिस्टम, तकनीकी क्षमता, प्रतिस्पर्धी लागत, अनुसंधान एवं विकास और निर्यात रणनीति को जोड़ा जाता है तो भारत कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकता है।
इस लिहाज से आने वाले पांच वर्ष उद्योग के लिए केवल बाजार विस्तार के नहीं, बल्कि घरेलू मूल्य सृजन, कंपोनेंट निर्माण, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की क्षमता विकसित करने के भी महत्वपूर्ण वर्ष हो सकते हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


