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- 11h ago
भारत और रूस के संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि दोनों देशों के बीच सहयोग केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं रहा है। रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़ते हुए अब दोनों देश औद्योगिक तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था, परिवहन, उन्नत विनिर्माण और नए ऊर्जा समाधानों में सहयोग की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
‘इनोप्रोम. इंडिया’ इसी बदलते रिश्ते की तस्वीर प्रस्तुत करने वाला मंच बन सकता है। भारत जिस तेजी से विनिर्माण क्षेत्र को विस्तार देने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, उसमें रूस जैसी तकनीकी क्षमता रखने वाली अर्थव्यवस्था के साथ सहयोग महत्वपूर्ण हो सकता है।
रूस के पास भारी उद्योग, मशीन निर्माण, ऊर्जा, परमाणु तकनीक, धातु एवं खनिज प्रसंस्करण, रेल तकनीक और एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों में दशकों का अनुभव है। दूसरी ओर भारत के पास विशाल उपभोक्ता बाजार, कुशल मानव संसाधन, तेजी से बढ़ता डिजिटल इकोसिस्टम और उत्पादन क्षमता का विस्तार करने की महत्वाकांक्षा है। दोनों पक्षों की ये विशेषताएं एक-दूसरे की पूरक बन सकती हैं।
भविष्य के औद्योगिक संबंधों में केवल उत्पादों की खरीद-बिक्री पर्याप्त नहीं होगी। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब स्थानीय उत्पादन, तकनीकी हस्तांतरण और संयुक्त अनुसंधान एवं विकास पर अधिक जोर दे रही हैं।
भारत और रूस के बीच भी यही मॉडल आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि रूसी तकनीक और भारतीय विनिर्माण क्षमता का संयोजन बढ़ता है, तो दोनों देशों में संयुक्त उत्पादन इकाइयों की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।
ऐसी परियोजनाएं भारत के लिए स्थानीय रोजगार और तकनीकी कौशल विकसित करने का माध्यम बन सकती हैं, जबकि रूसी कंपनियों के लिए भारतीय बाजार के साथ-साथ अन्य उभरते बाजारों तक पहुंच का अवसर पैदा कर सकती हैं।
यही कारण है कि ‘इनोप्रोम. इंडिया’ में होने वाली कारोबारी बैठकों और बी2बी संवाद को केवल तत्काल निवेश के नजरिये से नहीं, बल्कि दीर्घकालीन औद्योगिक सहयोग की दृष्टि से भी देखा जाएगा।
भारत दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क वाले देशों में शामिल है और देश में रेलवे के आधुनिकीकरण का काम लगातार आगे बढ़ रहा है। तेज गति वाली रेल प्रणालियां, आधुनिक कोच, यातायात प्रबंधन, सिग्नलिंग और डिजिटल रेलवे जैसी तकनीकें आने वाले वर्षों में भारत की परिवहन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं।
रूस के पास रेल निर्माण और भारी परिवहन प्रणालियों में व्यापक तकनीकी अनुभव है। ऐसे में रूस और भारत के बीच रेल क्षेत्र में सहयोग केवल तकनीक के आदान-प्रदान तक सीमित न रहकर संयुक्त विकास और उत्पादन तक पहुंच सकता है।
‘इनोप्रोम. इंडिया’ में प्रदर्शित हाई-स्पीड ट्रेन मॉडल इसी व्यापक संभावना की ओर संकेत करता है। यदि दोनों देशों के उद्योग इस क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाते हैं तो भारत के विशाल रेल बाजार में नई तकनीकों के विकास और स्थानीय निर्माण के अवसर पैदा हो सकते हैं।
क्षेत्रीय विमानन भारत के लिए तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र है। छोटे शहरों को हवाई संपर्क से जोड़ने, क्षेत्रीय हवाई अड्डों के विकास और घरेलू विमानन क्षमता बढ़ाने के लिए आधुनिक विमानों तथा विश्वसनीय इंजन तकनीक की आवश्यकता है।
रूस के एमसी-21, एसजे-100 और आईएल-114-300 जैसे विमान मॉडलों तथा पीडी-8 इंजन की मौजूदगी इस क्षेत्र में संभावित तकनीकी सहयोग को रेखांकित करती है।
भारत के लिए विमानन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल विमान तैयार करना नहीं है। इसमें इंजन, एवियोनिक्स, कंपोनेंट, मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल, प्रशिक्षण और सप्लाई चेन का विकास भी शामिल है।
यदि दोनों देशों के उद्योग इन क्षेत्रों में दीर्घकालीन साझेदारी विकसित करते हैं, तो यह भारत के क्षेत्रीय विमानन बाजार को नई दिशा दे सकती है।
ऊर्जा सुरक्षा भारत की विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण आधार है। बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ देश को बड़ी मात्रा में स्थिर, विश्वसनीय और कम-कार्बन ऊर्जा की आवश्यकता होगी। ऐसे में परमाणु ऊर्जा का महत्व आने वाले समय में और बढ़ सकता है।
रूस और भारत के बीच परमाणु ऊर्जा सहयोग पहले से ही एक महत्वपूर्ण आयाम रखता है। ‘इनोप्रोम. इंडिया’ में वीवीईआर-1200 आधारित परमाणु विद्युत संयंत्र का मॉडल इस सहयोग की तकनीकी गहराई को प्रदर्शित करेगा।
परमाणु क्षेत्र में सहयोग का महत्व केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसमें इंजीनियरिंग, उपकरण निर्माण, सुरक्षा प्रणालियां, तकनीकी प्रशिक्षण, अनुसंधान और स्थानीय आपूर्ति शृंखला जैसे अनेक क्षेत्र शामिल हैं।
भारत में स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने के साथ परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में घरेलू उद्योगों की भागीदारी बढ़ाना दोनों देशों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है।
आधुनिक उद्योग की प्रतिस्पर्धा तेजी से महत्वपूर्ण खनिजों और कच्चे माल की उपलब्धता से जुड़ती जा रही है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण, ऊर्जा भंडारण और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों के लिए अनेक विशेष खनिज आवश्यक हैं।
इसीलिए ‘इनोप्रोम. इंडिया’ के कार्यक्रम में महत्वपूर्ण खनिज और कच्चे माल पर चर्चा विशेष महत्व रखती है।
भारत और रूस यदि खनिज संसाधनों, प्रसंस्करण तकनीक और आपूर्ति शृंखला के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाते हैं, तो इससे दोनों देशों की औद्योगिक सुरक्षा मजबूत हो सकती है।
भविष्य में खनिजों की उपलब्धता के साथ-साथ उनके प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन पर भी ध्यान देना आवश्यक होगा। यही वह क्षेत्र है जहां तकनीकी सहयोग औद्योगिक साझेदारी को नई गहराई दे सकता है।
भविष्य के शहर केवल सड़कों, इमारतों और परिवहन व्यवस्था से नहीं बनेंगे। वे सेंसर, डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्रणालियों से संचालित होंगे।
मॉस्को के डिजिटल ट्विन जैसे मॉडल यह दिखाते हैं कि किसी बड़े शहर की गतिविधियों का डिजिटल रूप से अनुकरण करके परिवहन, ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और शहरी सेवाओं को अधिक कुशल बनाया जा सकता है।
भारत में भी स्मार्ट सिटी, शहरी गतिशीलता और डिजिटल गवर्नेंस का विस्तार हो रहा है। इसलिए डिजिटल ट्विन और एआई आधारित शहरी प्रबंधन जैसी तकनीकों में सहयोग दोनों देशों के शहरों के लिए उपयोगी हो सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार के साथ डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की ऊर्जा मांग भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन रही है। ऐसे में केवल तेज कंप्यूटिंग ही पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि कम ऊर्जा में अधिक गणना करने वाली तकनीकों की आवश्यकता होगी।
प्रदर्शनी में एआई डेटा प्रोसेसिंग की ऊर्जा खपत कम करने से जुड़े ऑप्टिकल कंप्यूटिंग समाधान का प्रदर्शन इसी चुनौती को सामने लाता है।
यदि ऐसी तकनीकों को बड़े पैमाने पर विकसित किया जाता है, तो भविष्य के डेटा सेंटर, एआई मॉडल और डिजिटल सेवाओं के लिए ऊर्जा दक्षता में सुधार संभव हो सकता है।
यह क्षेत्र भारत के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि देश में डिजिटल सेवाओं और एआई का विस्तार तेजी से हो रहा है।
उद्योग 4.0 के दौर में फैक्ट्रियां तेजी से स्वचालित हो रही हैं। रोबोटिक्स, सेंसर, डिजिटल नियंत्रण, मशीन विजन और डेटा एनालिटिक्स आधुनिक विनिर्माण के महत्वपूर्ण उपकरण बन चुके हैं।
‘इनोप्रोम. इंडिया’ में औद्योगिक रोबोट और ऑटोमेटेड स्टोरेज सिस्टम जैसे समाधान इसी परिवर्तन को प्रदर्शित करेंगे।
भारत के लिए स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ गुणवत्ता, सुरक्षा और उत्पादकता में सुधार का अवसर भी है।
रूस के औद्योगिक स्वचालन संबंधी अनुभव और भारत की विशाल विनिर्माण क्षमता का मेल नए औद्योगिक मॉडल विकसित कर सकता है।
3डी प्रिंटिंग और एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग अब केवल प्रयोगशाला तकनीक नहीं रह गई है। विमानन, ऑटोमोबाइल, चिकित्सा उपकरण, रक्षा और भारी इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में इसका उपयोग लगातार बढ़ रहा है।
एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि जटिल डिजाइन को अपेक्षाकृत कम सामग्री और कम चरणों में तैयार किया जा सकता है। इससे प्रोटोटाइप तैयार करने और विशेष औद्योगिक पुर्जों के उत्पादन में समय कम किया जा सकता है।
भारत और रूस इस क्षेत्र में अनुसंधान, सामग्री विज्ञान और औद्योगिक उत्पादन के स्तर पर सहयोग कर सकते हैं।
रूस की डिजिटल तकनीक और भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना दोनों देशों के बीच सहयोग का एक नया क्षेत्र बन सकती है।
भारत ने डिजिटल भुगतान, डिजिटल पहचान, ऑनलाइन सरकारी सेवाओं और बड़े पैमाने के डिजिटल प्लेटफॉर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय क्षमता विकसित की है। दूसरी ओर रूस ने साइबर सुरक्षा, सॉफ्टवेयर, शहरी डिजिटल प्रबंधन और औद्योगिक डिजिटल प्रणालियों में अपनी क्षमताएं विकसित की हैं।
यदि दोनों पक्ष इन अनुभवों का आदान-प्रदान करते हैं तो डिजिटल अर्थव्यवस्था में सहयोग के नए मॉडल सामने आ सकते हैं।
भारत-रूस औद्योगिक सहयोग का प्रभाव केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। छोटे और मध्यम उद्योग इस साझेदारी के महत्वपूर्ण लाभार्थी बन सकते हैं।
बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं के लिए हजारों प्रकार के कंपोनेंट, मशीन पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, पैकेजिंग सामग्री और सेवाओं की आवश्यकता होती है। यदि इनकी आपूर्ति स्थानीय कंपनियों से होती है तो एमएसएमई क्षेत्र को नए बाजार मिल सकते हैं।
संयुक्त परियोजनाओं के विस्तार के साथ भारतीय छोटे उद्योग रूसी कंपनियों की वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा भी बन सकते हैं।
औद्योगिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण परिणाम कौशल विकास भी हो सकता है। आधुनिक मशीनरी, रोबोटिक्स, एआई, विमानन, रेल तकनीक और ऊर्जा प्रणालियों के लिए प्रशिक्षित तकनीकी मानव संसाधन की आवश्यकता होगी।
भारत के युवा कार्यबल को यदि इन क्षेत्रों में आधुनिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है तो औद्योगिक निवेश का लाभ रोजगार के रूप में भी दिखाई दे सकता है।
दोनों देशों के विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग को बढ़ावा देकर संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम, अनुसंधान परियोजनाएं और औद्योगिक इंटर्नशिप विकसित की जा सकती हैं।
‘इनोप्रोम. इंडिया’ निवेशकों के लिए भी महत्वपूर्ण मंच साबित हो सकता है। औद्योगिक निवेश अब केवल पूंजी लगाने का विषय नहीं है। निवेशक तकनीक, बाजार, मानव संसाधन, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा और नियामकीय वातावरण को भी ध्यान में रखते हैं।
भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और विशाल घरेलू बाजार रूसी कंपनियों के लिए आकर्षक अवसर प्रस्तुत कर सकता है। वहीं रूस की तकनीकी और औद्योगिक विशेषज्ञता भारतीय कंपनियों के लिए नए सहयोग और संयुक्त परियोजनाओं के रास्ते खोल सकती है।
हाल के वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था ने आपूर्ति शृंखला की कमजोरियों को करीब से देखा है। किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता उद्योगों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
इसी संदर्भ में भारत और रूस के बीच विश्वसनीय औद्योगिक आपूर्ति शृंखला विकसित करना महत्वपूर्ण हो सकता है।
ऊर्जा, खनिज, मशीनरी, औद्योगिक उपकरण, परिवहन और तकनीकी उत्पादों में दीर्घकालीन आपूर्ति व्यवस्था दोनों देशों के उद्योगों को अधिक स्थिरता दे सकती है।
भविष्य में भारत-रूस व्यापार का अगला चरण केवल व्यापार की मात्रा बढ़ाने का नहीं, बल्कि वैल्यू एडिशन बढ़ाने का हो सकता है।
कच्चे माल के व्यापार से आगे बढ़कर तैयार उत्पाद, मशीनरी, तकनीकी समाधान, संयुक्त ब्रांड और उच्च मूल्य वाले औद्योगिक उत्पाद विकसित करना दोनों देशों के लिए अधिक लाभकारी हो सकता है।
यही कारण है कि ‘इनोप्रोम. इंडिया’ में प्रदर्शित तकनीकें संभावित संयुक्त उत्पादन और सह-विकास की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देती हैं।
भारत जिस समय अपनी विनिर्माण क्षमता को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, उस समय रूस के साथ औद्योगिक सहयोग कई रणनीतिक अवसर प्रदान कर सकता है।
भारी इंजीनियरिंग से लेकर विमानन, परमाणु ऊर्जा से लेकर रेल, महत्वपूर्ण खनिजों से लेकर एआई और रोबोटिक्स तक ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जहां दोनों देशों की विशेषज्ञताएं एक-दूसरे को मजबूत कर सकती हैं।
भारत के लिए इसका अर्थ होगा—तकनीक तक पहुंच, स्थानीय उत्पादन, कौशल विकास और नए बाजारों का विस्तार।
रूस के लिए भी भारत केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि दीर्घकालीन औद्योगिक साझेदार के रूप में महत्वपूर्ण हो सकता है।
भारत का विशाल बाजार, तेजी से बढ़ता बुनियादी ढांचा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विनिर्माण क्षमता रूसी कंपनियों के लिए नए कारोबारी अवसर पैदा कर सकती है।
भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी के माध्यम से रूसी तकनीक को नए बाजारों और औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुंचाने की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
‘इनोप्रोम. इंडिया’ का आयोजन ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ब्रिक्स जैसे मंचों पर आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्रा में व्यापार, तकनीकी साझेदारी, आपूर्ति शृंखला और निवेश जैसे मुद्दे तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं।
ऐसे माहौल में भारत में आयोजित रूस-केंद्रित औद्योगिक आयोजन का महत्व केवल दो देशों के संबंधों तक सीमित नहीं रहता। यह व्यापक उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच तकनीकी और औद्योगिक सहयोग की संभावनाओं को भी सामने ला सकता है।
तीन दिनों तक चलने वाला यह आयोजन उद्योगपतियों, सरकारी प्रतिनिधियों, तकनीकी विशेषज्ञों, निवेशकों और कारोबारी प्रतिनिधियों को एक ही मंच पर लाएगा।
किसी भी औद्योगिक मेले की सफलता केवल प्रदर्शित उत्पादों से नहीं मापी जाती। वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि कितने नए संपर्क बनते हैं, कितने समझौते आगे बढ़ते हैं और कितनी परियोजनाएं जमीन पर उतरती हैं।
इस दृष्टि से ‘इनोप्रोम. इंडिया’ एक बड़े बिजनेस नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म की भूमिका निभा सकता है।
आने वाले वर्षों में भारत-रूस औद्योगिक संबंधों के लिए कुछ क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं—संयुक्त अनुसंधान, तकनीकी हस्तांतरण, स्थानीय विनिर्माण, स्टार्टअप सहयोग, कौशल विकास, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति, डिजिटल तकनीक और उन्नत इंजीनियरिंग।
यदि इन क्षेत्रों में संस्थागत सहयोग मजबूत होता है तो दोनों देशों के बीच औद्योगिक साझेदारी अधिक व्यापक और टिकाऊ बन सकती है।
‘इनोप्रोम. इंडिया’ में खड़े विमान मॉडल, ट्रेन मॉडल, परमाणु संयंत्र का मॉडल, औद्योगिक रोबोट या डिजिटल ट्विन को केवल प्रदर्शनी की वस्तु के रूप में देखना इस आयोजन के व्यापक महत्व को सीमित कर देगा।
इनमें से प्रत्येक तकनीक के पीछे एक पूरा औद्योगिक इकोसिस्टम मौजूद है—अनुसंधान, इंजीनियरिंग, उत्पादन, सप्लाई चेन, कौशल, निवेश और बाजार।
इसलिए यह मेला यह दिखाने का अवसर भी होगा कि भविष्य का उद्योग किस दिशा में जा रहा है और भारत तथा रूस उसमें किस तरह मिलकर भूमिका निभा सकते हैं।
भारत और रूस के संबंधों ने कई दशकों में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच विश्वास और रणनीतिक सहयोग की एक मजबूत नींव मौजूद रही है। अब इस संबंध को नई पीढ़ी की तकनीक और औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप विस्तार देने की आवश्यकता है।
‘इनोप्रोम. इंडिया’ इसी परिवर्तन का प्रतीक बन सकता है।
यह आयोजन एक तरफ रूस की वैज्ञानिक एवं औद्योगिक विशेषज्ञता को भारतीय उद्योग जगत के सामने प्रस्तुत करेगा, तो दूसरी ओर भारत की विनिर्माण क्षमता, बाजार और नवाचार की संभावनाओं को रूसी कंपनियों के लिए सामने रखेगा।
परमाणु ऊर्जा से लेकर विमानन तक, रेलवे से लेकर महत्वपूर्ण खनिजों तक, रोबोटिक्स से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक और पारंपरिक भारी उद्योग से लेकर डिजिटल ट्विन और ऑप्टिकल कंप्यूटिंग तक—साझेदारी का दायरा तेजी से व्यापक हो रहा है।
आने वाले वर्षों में इस सहयोग की असली परीक्षा इस बात से होगी कि प्रदर्शनी में दिखाई गई तकनीकें कितनी संयुक्त परियोजनाओं में बदलती हैं, कितने निवेश समझौतों में बदलते हैं और कितने भारतीय एवं रूसी उद्योग वास्तव में एक-दूसरे की आपूर्ति शृंखलाओं का हिस्सा बनते हैं।
यही ‘इनोप्रोम. इंडिया’ की सबसे बड़ी संभावित उपलब्धि होगी।
नई दिल्ली में होने वाला यह आयोजन इसलिए केवल तीन दिनों का औद्योगिक मेला नहीं, बल्कि भारत और रूस के बीच भविष्य के आर्थिक संबंधों की संभावित रूपरेखा प्रस्तुत करने वाला मंच है। यदि तकनीक, पूंजी, बाजार, कौशल और औद्योगिक अनुभव का सही संयोजन बनता है, तो यह साझेदारी दोनों देशों के लिए नई विकास संभावनाएं पैदा कर सकती है।
भारत की ‘आत्मनिर्भरता’ और रूस की तकनीकी क्षमता का मेल आने वाले समय में ऐसे औद्योगिक मॉडल को जन्म दे सकता है जिसमें दोनों देश केवल एक-दूसरे के बाजार न रहें, बल्कि मिलकर उत्पाद विकसित करें, तकनीक तैयार करें, उत्पादन करें और वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाएं।
इसी अर्थ में ‘इनोप्रोम. इंडिया’ को भारत-रूस संबंधों के अगले औद्योगिक अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है—एक ऐसा अध्याय जिसमें सहयोग का केंद्र केवल व्यापार नहीं, बल्कि तकनीक, नवाचार, संयुक्त उत्पादन, निवेश, कौशल और आत्मनिर्भरता होगा।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


