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- 11h ago
वॉशिंगटन। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले एक दशक में देश ने आर्थिक, तकनीकी, सामरिक और कूटनीतिक मोर्चों पर उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद भारत अब तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और अन्य वैश्विक संस्थाएं भी भारत को आने वाले वर्षों में विश्व आर्थिक विकास का प्रमुख चालक मान रही हैं।
अमेरिकी विदेश विभाग के वरिष्ठ अधिकारी जैकब हेलबर्ग का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका लंबे समय से चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए विश्वसनीय साझेदारों की तलाश में है। ऐसे में भारत का लोकतांत्रिक ढांचा, विशाल उपभोक्ता बाजार, कुशल मानव संसाधन और तेजी से विकसित होता तकनीकी क्षेत्र उसे अन्य देशों से अलग पहचान दिलाता है। अमेरिका के नीति निर्माताओं का मानना है कि भारत न केवल आर्थिक क्षेत्र में बल्कि उभरती प्रौद्योगिकियों के विकास में भी वैश्विक नेतृत्व की क्षमता रखता है।
भारत आज दुनिया का सबसे युवा देशों में से एक है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यही युवा शक्ति भारत की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी, डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भारतीय युवाओं ने वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियों में भारतीय मूल के पेशेवर शीर्ष पदों पर कार्यरत हैं, जो भारत की प्रतिभा क्षमता का प्रमाण है।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। अमेरिका, जापान और यूरोप की कई कंपनियां भारत में चिप निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में निवेश कर रही हैं। वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर की मांग बढ़ने के बीच भारत को एक संभावित उत्पादन केंद्र के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इस क्षेत्र में अपेक्षित सफलता हासिल करता है तो वह वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
डिजिटल क्रांति के क्षेत्र में भी भारत ने कई विकसित देशों को पीछे छोड़ते हुए नई मिसाल कायम की है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ने डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। करोड़ों लोग प्रतिदिन डिजिटल लेनदेन कर रहे हैं और कई देश भारतीय डिजिटल भुगतान मॉडल को अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) को लेकर भी भारत की पहल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हो रही है।
अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां भी उसकी बढ़ती क्षमता को दर्शाती हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने कम लागत में सफल अंतरिक्ष मिशनों के जरिए दुनिया को प्रभावित किया है। चंद्रयान-3 की सफलता के बाद भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला पहला देश बना था। इसके अलावा आदित्य-एल1 मिशन और गगनयान परियोजना ने भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। अमेरिका सहित कई देश अंतरिक्ष अनुसंधान में भारत के साथ सहयोग बढ़ा रहे हैं।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस, आकाश मिसाइल प्रणाली, ब्रह्मोस मिसाइल, अत्याधुनिक युद्धपोत और रक्षा उपकरणों के निर्माण ने भारत की सैन्य क्षमता को मजबूत किया है। आज भारत केवल रक्षा उपकरणों का आयातक नहीं बल्कि निर्यातक देश के रूप में भी उभर रहा है। कई देशों ने भारतीय रक्षा उत्पादों में रुचि दिखाई है।
वैश्विक कूटनीति में भी भारत की भूमिका लगातार मजबूत हुई है। हाल के वर्षों में भारत ने जी-20 की अध्यक्षता सफलतापूर्वक निभाई और विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक मंच पर प्रमुखता से उठाया। जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर भारत ने संतुलित और रचनात्मक नेतृत्व का परिचय दिया है। यही कारण है कि भारत को अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जाने लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और भारत की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन विशाल जनसंख्या, उत्पादन क्षमता, तकनीकी विकास और आर्थिक विस्तार के कारण भारत में दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा की क्षमता मौजूद है। अमेरिका समेत पश्चिमी देशों की कंपनियां अब "चाइना प्लस वन" रणनीति के तहत भारत में निवेश बढ़ा रही हैं। इसका उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित और विविधतापूर्ण बनाना है।
जैकब हेलबर्ग की टिप्पणी को भारत की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक ताकत की अंतरराष्ट्रीय मान्यता के रूप में देखा जा रहा है। यह बयान दर्शाता है कि विश्व की महाशक्तियां भारत को भविष्य की वैश्विक व्यवस्था के प्रमुख स्तंभों में से एक मानने लगी हैं। आने वाले वर्षों में यदि भारत अपनी आर्थिक सुधार प्रक्रिया, तकनीकी नवाचार, बुनियादी ढांचे के विकास और मानव संसाधन क्षमता को इसी गति से आगे बढ़ाता है, तो वह वैश्विक मंच पर और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। भारत की यही क्षमता आज दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही है और उसे 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण उभरती शक्तियों में शामिल कर रही है।


