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मिज़ो अनुवाद कार्यशाला में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने सभी भाषाओं की समानता पर बल दिया

नई दिल्ली। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी), भारत ने 17-18 मार्च  को आइजोल स्थित मिजोरम विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी गेस्ट हाउस के सेमिनार हॉल में दो-दिवसीय ‘मिज़ो अनुवाद कार्यशाला’ का आयोजन किया। इस कार्यशाला में बीस अनुवादक एक साथ आए, ताकि चल रहे अनुवाद कार्यक्रम के तहत अंग्रेज़ी से मिज़ो भाषा में अनूदित चुनिंदा पुस्तकों का व्यवस्थित रिव्यू किया जा सके। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भाषाई सटीकता, वैचारिक स्पष्टता, शैलीगत एकरूपता और शब्दावली की निरंतरता को सुदृढ़ करना था। इसने पांडुलिपियों की सहयोगात्मक रिव्यु के लिए एक व्यवस्थित मंच प्रदान किया, जिससे अनुवादकों को अंतिम संपादकीय प्रक्रिया से पहले अपने कार्य को और बेहतर बनाने का अवसर मिला। इन सत्रों में अनुवाद के उच्च मानकों को बनाए रखने के लिए अकादमिक गंभीरता, सहकर्मी मूल्यांकन और साझा उत्तरदायित्व पर विशेष बल दिया गया।
उद्घाटन समारोह का शुभारंभ प्रो. वनलालछवना, अर्थशास्त्र विभाग, एसईएमआईएस, मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल द्वारा किया गया। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के मुख्य संपादक और संयुक्त निदेशक कुमार विक्रम ने स्वागत भाषण दिया और देश में एक मज़बूत अनुवाद तंत्र बनाने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “सभी भाषाएँ समान हैं, और कोई भी भाषा बड़ी या छोटी नहीं होती। हर भाषा का समान महत्व होता है और अनुवाद ज्ञान तथा अवसरों तक सभी की समान पहुँच सुनिश्चित करता है।” उन्होंने युवा लेखकों को प्रोत्साहित करने और साहित्यिक परिवेश को मज़बूत बनाने में पीएम-युवा जैसी पहलों के महत्व पर बल दिया। बोगोटा अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में ‘गेस्ट ऑफ़ ऑनर’ के रूप में भारत की भागीदारी का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय मंच भारतीय साहित्य की वैश्विक पहचान को बढ़ाते हैं और सार्थक सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देते हैं।
प्रो. वनलालछवना ने सभा को संबोधित किया और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत अनुवाद व्यवस्था पर चर्चा की, विशेष रूप से ‘त्रि-भाषा सूत्र’ पर, जो बहुभाषी दक्षता और शैक्षिक समावेशिता को बढ़ावा देता है। उन्होंने कहा, “मातृभाषा में दी गई शिक्षा समझ को मज़बूत करती है, विशेष रूप से विज्ञान और जटिल विषयों में।” उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हर भाषा के प्रति सम्मान एकता और बौद्धिक विकास को बढ़ावा देता है। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची पर बात करते हुए, उन्होंने भाषाई विविधता की संवैधानिक मान्यता को रेखांकित किया और तेलुगु, मिज़ो, कन्नड़, मलयालम, बोडो तथा अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान को प्रोत्साहित किया। उन्होंने यह भी बताया कि मिज़ो भाषा में, शाब्दिक अर्थ और प्रासंगिक अर्थ अक्सर अलग-अलग होते हैं, जिसके कारण अनुवाद में सावधानीपूर्वक व्याख्या और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को समझने की आवश्यकता होती है।
रिव्यू सत्रों का आयोजन मिज़ोरम विश्वविद्यालय के मिज़ो विभाग के प्रमुख डॉ. ज़ोरामदिंथारा और मिज़ोरम विश्वविद्यालय के पच्छुंगा विश्वविद्यालय कॉलेज के मिज़ो विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. लालनुनपुइया रेंथलेई के मार्गदर्शन में किया गया। उन्होंने पांडुलिपियों में भाषाई सटीकता, सुसंगति और एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए विद्वतापूर्ण सुझाव प्रदान किए। इस कार्यशाला का उद्देश्य प्रकाशन से पूर्व सामूहिक रिव्यू करना, स्पष्टता और एकरूपता सुनिश्चित करना, अनुवाद संबंधी चुनौतियों का सामूहिक रूप से समाधान करना तथा संपादकीय मानकों को सुदृढ़ बनाना था। इसके अपेक्षित परिणामों में भाषाई परिष्कार में सुधार, सुसंगति में वृद्धि तथा अंतिम संपादकीय प्रक्रिया हेतु पांडुलिपियों की तैयारी शामिल थी।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के सहायक संपादक द्विजेंद्र कुमार द्वारा दिए गए ‘धन्यवाद ज्ञापन’ के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने सभी गणमान्य व्यक्तियों, विद्वानों और प्रतिभागियों के योगदान को सराहा। इस कार्यशाला ने व्यवस्थित रिव्यू और अकादमिक सहयोग के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशन को बढ़ावा देने और भारत के अनुवाद तंत्र को सुदृढ़ करने के प्रति राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट किया। संवाद की भावना को प्रतिध्वनित करते हुए, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने दोहराया कि “सभी भाषाएँ समान हैं”, जबकि मुख्य अतिथि ने इस बात पर बल दिया कि मातृभाषा के प्रति सम्मान और अनुवाद की सुदृढ़ पद्धतियाँ शिक्षा, एकता और राष्ट्रीय एकीकरण को मज़बूत करती हैं।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।
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